क्या आप जानते हैं कि हमारे भारत में एक ऐसा गांव है जहां पर हनुमान जी बैन है? जी हां, वहां हनुमान जी की पूजा नहीं होती। ना कोई मंदिर है, ना कोई मूर्ति, ना किसी के घर में उनकी तस्वीर टंगी है।
यहां तक कहते हैं कि लाल भगवा झंडे को भी वहां मनाही है क्योंकि हनुमान जी की निशानी है। अब आप सोचिए कितनी अजीब बात है। हमारे देश में गाड़ियों में ट्रकों में लोग हनुमान जी की तस्वीर रखते हैं। मंगलवार को हर सुबह मंदिर के बाहर हनुमान जी के लिए लाइन लगती है। मुश्किल घड़ी आए हर कोई हनुमान चालीसा पढ़ता है। भूत प्रेत का डर आए हनुमान चालीसा पढ़ता है। शायद ही कोई ऐसा मोहल्ला हो जहां पर आप चलेंगे और आपको हर 10-15 मिनट में एक हनुमान जी का मंदिर ना दिखे।
लेकिन उत्तराखंड के गांव में हनुमान जी को बैन कर दिया गया है और वहां के लोगों का कहना है कि उनकी नाराजगी आज की थोड़ी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस नाराजगी की वजह कोई जमीन का झगड़ा नहीं है। राजनीतिक विवाद नहीं है। कोई नई कंट्रोवर्सी नहीं है। इसकी वजह उस किताब में लिखी है जो हम सब बचपन सुनते आए हैं।
रामायण और आज की कहानी उसी गांव की है। इस कहानी में एक ऐसा भी हिस्सा है जो लगभग हर जगह से काट दिया जाता है। एक बुजुर्ग औरत का हिस्सा जिसने बस एक मुसाफिर को रास्ता दिखाया था और उसे कीमत सदियों तक चुकाई गई। अब सवाल कि कौन सा मंदिर है, कहां मंदिर है जहां हनुमान जी बैन है? तो उत्तराखंड के चमोली जिले और जोशीमठ से नीति घाटी की तरफ जाने वाली सड़क जिस पर करीब 50 कि.मी. चलने के बाद जुम्मा नाम की एक जगह आती है और यह वो जगह है जहां से कोई आगे गाड़ी नहीं आती। यहां आपको धौलीगंगा पर बना एक पुल पैदल पार करना पड़ता है।
उसके बाद शुरू होती है 8 से 10 कि.मी. की सीधी चढ़ाई जिसका रास्ता इतना पतला है कि दो लोग साथ नहीं चल सकते। एक तरफ गहरी खाई है और ऊपर से बर्फ से ढकी चोटियां खड़ी हैं। इस चढ़ाई के आखिर में जो गांव मिलता है उसका नाम है द्रोणागिरी जो समुद्र तल से करीब 12,000 फीट की ऊंचाई पर बसा है। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा 11,000 के आसपास भी है। खैर, 2011 की जनगणना में इस गांव की दर्ज आबादी सिर्फ 92 थी और परिवार सिर्फ 31 थे। लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। इसकी वजह मैं आपको आगे बताऊंगा। यहां भोटिया जनजाति के लोग रहते हैं। यानी वो समाज जो सदियों से तिब्बत की सीमा के पास इन्हीं ऊंचे पहाड़ों में रहा और जिनकी रोजीरोटी हमेशा से जड़ी बूटियों और ऊन के व्यापार पर टिकी रही।
यह पूरा इलाका आज भी दुर्लभ औषधि पौधे के लिए जज आता है जो इस पूरी कहानी की जड़ भी है। अब सवाल है कि हनुमान जी बैन क्यों हुए? यह बड़ा इंपॉर्टेंट सवाल है। तो पौराणिक कथा और गांव वालों की जो कहानी है वह कुछ इस तरह से है कि 12,000 फीट की ऊंचाई पर रात का मतलब सिर्फ अंधेरा नहीं होता। वहां कपड़ों से होकर सीधे हड्डियों में उतरने वाली ठंड भी है और हर छोटी आवाज सुनाई पड़ती है। और एक ऐसी रात थी जहां पर एक बुजुर्ग औरत ने पत्थर के मकान का दरवाजा खोला। उसके सामने जो खड़ा था वो इंसान नहीं था। सामने एक विशाल आकृति खड़ी थी जो हाफ रही थी जिसे बहुत जल्दी थी। उसने ना अपना परिचय दिया ना कोई भूमिका बांधी। बस एक सवाल पूछा कि संजीवनी बूटी किस पहाड़ पर है? अब यहां थोड़ा पीछे चलना पड़ेगा आपको ताकि आपको समझ में आए कि उस रात वहां वो क्यों खड़े थे। क्योंकि दूसरी तरफ लंका में युद्ध चल रहा था। मेघनाथ के वार से लक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे और वैद्य सुशीर्ण ने कह दिया था कि अब इनकी जान सिर्फ एक बूटी बचा सकती है जो हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत पर मिलती है और शर्त सिर्फ एक थी कि वो बूटी सूरज निकलने से पहले पहुंचनी चाहिए। अब जो यहां पहुंचे थे वो थे हनुमान जी। हनुमान जी के पास पूरी रात भी नहीं थी। शायद कुछ घंटे थे। उनके सामने एक पहाड़ खड़ा था जिस पर हजारों तरह के पौधे उगते रहते हैं और जो अंधेरे में एक जैसे दिख रहे थे। उन्हें [संगीत] बूटी पहचाननी आती नहीं थी। उधर एक भाई की सांसे अटकी थी। तो हनुमान जी ने वही किया जो शायद उस हालात में कोई भी करता। पूरे पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा तोड़ा उसे उठाकर लेकर चले गए। लक्ष्मण जी बच गए। बाकी पूरी दुनिया के लिए चमत्कार था। रामायण का सबसे मशहूर दृश्य आज भी यही माना जाता है कि हनुमान जी एक हाथ में पूरा पहाड़ उठाए हुए आसमान में उड़ रहे हैं। हर कैलेंडर पर पोस्टर पर तस्वीर पर आज भी दिखाई पड़ता है। लेकिन उस दिन उस गांव के लिए कुछ और था क्योंकि उनके लिए वो पहाड़ सिर्फ पहाड़ नहीं था। उनका देवता था। उसकी वो पूजा करते थे, दवा लेते थे और उसी के भरोसे उनका पेट चलता था जो किसी ने पूछा नहीं। अब सवाल कि उस औरत का हुआ क्या? देखिए यह बड़ा इंटरेस्टिंग हिस्सा है। जबकि मेरी नजर में असली कहानी यही है क्योंकि गांव वालों की जो मौखिक परंपरा चली आ रही है.
उसके मुताबिक सुबह होते ही लोगों ने देखा कि उनके पहाड़ का ऊपरी हिस्सा गायब है। उस दिन गुस्सा सिर्फ हनुमान जी पर नहीं उतरा। कहा जाता है कि जिस बुजुर्ग औरत ने रात में रास्ता बताया था। गांव ने उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया। नाता तोड़ दिया और उसे अलग कर दिया। जबकि उसका कसूर सिर्फ इतना था कि रात के अंधेरे में एक थके मुसाफिर ने उससे रास्ता पूछा। उसने बता दिया। कई रिपोर्ट्स में यह भी लिखा है कि उसकी सजा वही खत्म नहीं हुई।
गांव की परंपरा में उस औरत को पर्वत की मुख्य पूजा में शामिल होने की इजाजत आज तक नहीं है। लेकिन मैं आपको बता दूं कि इस दावे पर जमीनी रिपोर्टिंग बहुत कम है। इसलिए इसे मान्यता की तरह बीजेगा तथ्य की तरह नहीं। एक और बात पक्की है। उस औरत का नाम आज तक किसी को याद नहीं है। और पूरी कहानी में वो सिर्फ एक बुढ़िया है। जबकि जिस भगवान को उसने रास्ता दिखाया था वो आज हिंदुस्तान में पूजे जाते हैं। और जिस गांव ने उसे बाहर किया था वो आज भी उसी बात पर अड़ा हुआ है। उससे भी किसी ने पूछा नहीं था। अब सवाल कि वहां अब क्या दिखता है?
अगर आप आज उस गांव में जाएंगे तो आपको पूरे गांव में हनुमान जी का एक मंदिर नहीं दिखेगा। ना कोई मूर्ति मिलेगी ना किसी घर की दीवार पर तस्वीर और ना किसी दुकान काउंटर पर। लोग बताते हैं कि यहां लाल झंडा लगाने पर ही पाबंदी है क्योंकि वो हनुमान जी की निशानी है। पूजा यहां होती है खुद द्रोणागिरी पर्वत की क्योंकि यहां पहाड़ देवता हैं। हर साल जून के महीने में उनकी विशेष पूजा होती है। ढोल बजते हैं और उस मेले में दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। एक चीज है जो वहां जाने वाले हर इंसान को दिख जाती है कि इस पहाड़ की चोटी बाकी हिमालय चोटियों की तरह नुकीली नहीं है बल्कि ऊपर से कटी हुई है। चपटी सी दिखती है। हालांकि भूगोल इसकी अलग वजह बताता है, लेकिन गांव वाले उसी को अपना सबूत मानते हैं। एक और बात साफ कर देनी चाहिए कि यह परंपरा आज कितनी सख्ती से निभाई जाती है यह कहना मुश्किल है।
क्योंकि गांव की नई पीढ़ी पढ़ने और नौकरी के लिए बाहर निकल चुकी है और हो सकता है कि उनमें से बहुतों के लिए यह सिर्फ दादा-दादी की सुनाई हुई कहानी है। लेकिन गांव वाले क्या कहते हैं, यह बात ध्यान से सुनने वाली है। जब वहां के लोग यह किस्सा सुनाते हैं, तो वह यह नहीं कहते कि हमारा पहाड़ टूट गया। वो कहते हैं हमसे पूछा नहीं गया और ये बहुत बड़ा फर्क है। यहां शिकायत नुकसान की नहीं है। शिकायत तरीके की है। अब आगे जो मैं कहने जा रहा हूं वो मेरी समझ है और गांव वालों का दावा नहीं है। इसलिए आप उसे उसी तरह लीजिएगा कि जिस समाज की पूरी जिंदगी एक पहाड़ की मिट्टी और उस पर उगने वाले पौधों पर टिकी हो उस समाज के लिए वो पहाड़ संपत्ति नहीं रहता। क्योंकि बीमार पड़ो तो दवा वहीं से आती है। ठंड में
गुजारा उसी से होता है। सौदा भी उसी के भरोसे। ऐसी चीज को इंसान रिश्तेदार परिवार मान लेता है और किसी परिवार का हाथ कोई बिना बताए काट नहीं सकता। इसलिए मुझे यह कहानी सिर्फ हनुमान जी के विरोध की कहानी नहीं लगती है बल्कि उस आदमी की कहानी भी लगती है जिसका पहाड़ जिसकी जंगल या जिसकी जमीन किसी बड़े मकसद के नाम पर ले ली गई और उसे बताया नहीं गया। अब सवाल कि उस गांव का हाल क्या है? मैं आपको वो बात बता रहा हूं जो ऊपर अधूरी छोड़ी थी। भोटिया समाज हमेशा से मौसम के साथ चलता आया। गर्मियों में वो ऊपरी गांव में आते हैं और सर्दियों में बर्फ पड़ने पर नीचे उतर जाते हैं और यह सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है जिसमें कुछ भी दुखद नहीं। इसलिए जनगणना का वो छोटा सा आंकड़ा पूरा सच नहीं बताता। लेकिन आज जो हो रहा है वो अलग है क्योंकि आज लोग मौसम की वजह से नहीं बल्कि मजबूरी की वजह से नहीं जा रहे हैं। वापस नहीं लौट रहे हैं क्योंकि रोजगार नहीं है, अस्पताल नहीं है, बच्चों के लिए स्कूल नहीं है या दूर है। इसलिए मैं साफ कर दूं कि इसका उस पुरानी कहानी संबंध नहीं है क्योंकि पलायन की वजह बिल्कुल अलग है और सबके सामने है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में ऐसे सैकड़ों गांव हैं जिन पर अब सिर्फ ताले लटके हैं। जिनकी खिड़कियां बंद है। जिनकी गलियों में सिर्फ हवा चलती है। फिर भी तस्वीर यह बनती है कि जिस गांव को अपने पहाड़ का एक टुकड़ा जाने का दुख आज तक है उस गांव से अब पूरे के पूरे परिवार जा रहे हैं और दोनों बार वो चुपचाप है क्योंकि किसी ने पूछा नहीं। खैर जून जुलाई का महीना चल रहा है। वहां ढोल बज रहे हैं। पूजा हो रही है। पहाड़ अभी भी वहीं टिके हैं। उसकी चोटी अभी भी ऊपर से कटी हुई है। बस उस गांव किसी छत पर लाल झंडा नहीं है और शायद लहराएगा भी नहीं।