नाथूराम गोडसे का नाम भारतीय इतिहास के सबसे विवादित नामों में गिना जाता वह व्यक्ति जिसने महात्मा गांधी की हत्या की खुद को अखंड भारत की रक्षा करने वाला मानता था। लेकिन इतिहास उसे एक ऐसे हत्यारे के रूप में याद करता है जिसकी गोलियों ने सिर्फ एक इंसान को नहीं बल्कि भारत की चेतना को भी गहरा घाव दिया। इस कहानी को समझने के लिए हमें उस बचपन तक लौटना होगा।
जहां एक बच्चे की पहचान डर और विचारों की दिशा धीरे-धीरे बदलने लगी थी। मई की तपति दोपहर थी। साल था 1910 महाराष्ट्र के पुणे जिले के शांत गांव बारामती में विनायक वामन राव गोडसे के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया रामचंद्र। लेकिन इस जन्म के साथ घर में सिर्फ खुशी नहीं आई। उसके साथ एक अनकाहा डर भी था। विनायक और उनकी पत्नी लक्ष्मी पहले ही अपने तीन बेटों को जन्म के तुरंत बाद खो चुके थे। इस लगातार दुख ने उनके मन में एक गहरा अंधविश्वास पैदा कर दिया था।
उन्हें लगने लगा था कि शायद उनके परिवार पर कोई श्राप है जो बेटों को जीवित नहीं रहने देता। इसी डर ने रामचंद्र के जीवन की दिशा बदल दी। परिवार ने तय किया कि उसे बेटे की तरह नहीं बल्कि बेटी की तरह पाला जाएगा। उसकी नाक छेदी गई और उसे नथ पहनाई गई। वह लड़कों के कपड़ों के बजाय लड़कियों जैसे कपड़ों में बड़ा होने लगा।
गांव के लोग उसे नाथूराम कहने लगे यानी वह राम। जिसने नथ पहनी हो। बचपन के विशाल जब कोई बच्चा अपनी पहचान को समझना शुरू करता है। नाथूराम के लिए उलझन से भरे थे। वह एक ऐसी दोहरी पहचान के बीच बड़ा हो रहा था जिसे उसने खुद नहीं चुना था। बाद में कई मनोवैज्ञानिकों ने माना कि ऐसे विरोधाभासी बचपन से इंसान के भीतर गहरी हताशा, असुरक्षा या आक्रामकता जन्म ले सकती है। नाथूराम का मन स्कूल की पढ़ाई में कभी पूरी तरह नहीं लगा। 1928 में वह दसवीं की परीक्षा में असफल हुआ और फिर उसने स्कूल छोड़दिया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वह ज्ञान से दूर थाउसके भीतर पढ़ने और समझने की तीव्र भूख थी। जो सामान्य कक्षा की दीवारों में सीमित नहीं हो सकती थी।
वह घंटों पुस्तकालयों में बैठता। हिंदू धर्म ग्रंथ, मराठा इतिहास और वैश्विक राजनीति पढ़ता धीरे-धीरे वीर सावरकर की रचनाओं ने उस पर गहरा प्रभाव डालना शुरू किया। सावरकर के विचार उसके मन में एक नए राजनीतिक और धार्मिक दृष्टिकोण की नींव रखने लगे। लेकिन इस कहानी का एक महत्वपूर्ण मोड़ यह है कि नाथूराम गोडसे हमेशा से गांधी विरोधी नहीं था। एक समय ऐसा भी था जब वह महात्मा गांधी का गहरा प्रशंसक था। [गहरी सांस लेने की आवाज़] 1930 के दशक में जब गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तब नाथूराम भी उन हजारों युवाओं में शामिल था जो बापू की आवाज पर सड़कों पर उतर आए थे। उस समय वह गांधी जी की अहिंसा और सत्याग्रह की शक्ति पर विश्वास करता था।
उसे लगता था कि गांधी जी ही वह नेता हैं जो भारत को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त करा सकते हैं। उसके भीतर गांधी के प्रति सम्मान था और आजादी के संघर्ष को लेकर एक साफ आशा भी फिर समय बदला। 1932 में नाथूराम रत्नागिरी पहुंचा। जहां उसकी मुलाकात विनायक दामोदर सावरकर से हुई।
सावरकर उन दिनों नजरबंद थे लेकिन उनके विचार सीमाओं में बंद नहीं थे। वे आग की तरह फैल रहे थे। सावरकर ने नाथूराम को इतिहास और राष्ट्रवाद को देखने का एक अलग चश्मा दिया। उनके विचारों में अहिंसा हमेशा महान नहीं थी। अगर अहिंसा राष्ट्रहित के विरुद्ध चली जाए तो वह कायरता भी बन सकती है। यही सोच नाथूराम के भीतर बैठे गांधीवादी विश्वास को धीरे-धीरे कमजोर करने लगी। सावरकर के हिंदुत्व संबंधी सिद्धांतों ने उसके मन पर गहरा असर डाला।
नाथूराम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा और बाद में हिंदू महासभा के निकट आया। अब वह गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में कुरान की आयतें पढ़े जाने से असहज होने लगा। उसे लगने लगा कि गांधी जी मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए हिंदुओं के हितों की उपेक्षा कर रहे हैं। नाथूराम ने अपने मित्र नारायण आपट्टे के साथ मिलकर अग्रणी नाम का अखबार शुरू किया। इस अखबार के माध्यम से वह गांधी जी की नीतियों की तीखी आलोचना करने लगा। समय के साथ उसके लेखों में तर्क की जगह कटुता और नफरत की चिंगारी अधिक दिखाई देने लगी। वह एक प्रभावशाली वक्ता भी बन चुका था। उसके शब्द भीड़ को प्रभावित कर सकते थे।
उसके लिए अब भारत केवल एक भूगोल नहीं था। वह उसे एक हिंदू राष्ट्र के रूप में देखने लगा था। जिसकी अखंडता पर कोई भी समझौता उसे स्वीकार नहीं था। इतिहास की विडंबना यही थी कि जो हाथ कभी गांधी जी के समर्थन में उठे थे वही हाथ अब गुप्त ठिकानों पर पिस्तौल चलाने का अभ्यास करने की दिशा में पढ़ रहे थे। [गहरी सांस लेने की आवाज़] बचपन में जिसे नत पहनाकर बचाने की कोशिश की गई थी। वही नाथूराम अब खुद को एक रक्षक मानने लगा था। लेकिन आने वाला इतिहास उसे रक्षक नहीं गांधी के हत्यारे के रूप में याद करने वाला था।
यही विरोधाभास इस पूरी कहानी को और भी भारी बना देता है। विभाजन की आहट नजदीक आ रही थी। उसी आहट ने नाथूराम के मन में प्रतिशोध की आग को और तेज कर दिया। यह आग अब विचारों की बहस से आगे बढ़कर हिंसा की ओर मुड़ने लगी थी। साल 1946 की शुरुआत भारत के इतिहास में एक काले मोड़ की तरह दर्ज होने वाली थी। देश आजादी के करीब था। हवा में स्वतंत्रता की खुशबू थी। लेकिन उसी हवा में बारूद, डर और इंसानी खून की गंध भी घुलने लगी थी। मोहम्मद अली जिन्ना के प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के आह्वान ने कोलकाता की गलियों को और के अंधेरे में धकेल दिया। शहर जो कभी राजनीतिक नारों से गूंजता था। अब चीखों और लाशों की खबरों से कांप रहा था। इसके बाद नोआखली में हिंदुओं के नरसंहार की खबरें महाराष्ट्र तक पहुंची। और नाथूराम गोडसे के भीतर क्रोध की आग और भड़क उठी। वह अपने अखबार अग्रणी के दफ्तर में बैठकर उन रिपोर्टों को पढ़ता। हर खबर उसके भीतर जमा हो रहे गुस्से को और तेज कर देती।
उसकी कलम से अब केवल शब्द नहीं निकलते थे। उनमें आक्रोश, आरोप और बदले की भावना साफ दिखाई देने लगी थी। घोड़से के लिए सबसे बड़ा आघात गांधी जी का वह विचार था जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि मुसलमान हिंदुओं को मारना चाहे तो हिंदुओं को बहादुरी से मर जाना चाहिए। घोड़से ने इसे अहिंसा नहीं माना। उसे यह आत्मघाती कायरता लगी। उसके मन में यह धारणा मजबूत होने लगी कि गांधी जी की अहिंसा केवल हिंदुओं से त्याग मांगती है। जबकि दूसरी ओर कट्टरपंथ हथियारों और हिंसा के साथ खड़ा है। यहीं से गांधी जी के प्रति उसके पुराने सम्मान का अंत अंत लगभग पूरा हो गया। उस स्थान पर अब एक ठंडी सोची समझी और खतरनाक नफरत बैठ चुकी थी।
14 अगस्त 1947 की आधी रात को जब दुनिया सो रही थी। भारतीय उपमहाद्वीप का भूगोल लहूलुहान हो रहा था। विभाजन की रेखा ने लाखों परिवारों को एक झटके में दो हिस्सों में बांट दिया। जिन घरों में पीढ़ियों की यादें थी वे अचानक सीमा के इस पार या उस पार छूट गए। नाथूराम ने दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर उन ट्रेनों को आते देखा जिनमें इंसानी लाशों की भयावह कहानियां भरी थी। शरणार्थी शिविरों में उसने उन लोगों की चीखें सुनी जिनके परिवार सीमा पार बिखर चुके थे। यह दृश्य उसके मन में स्थाई घाव बनकर बैठ गया। घोड़से के लिए अखंड भारत केवल एक राजनीतिक विचार नहीं था। वह उसे अपनी आत्मा का हिस्सा मानता था। और धीरे-धीरे वह गांधी जी को उसी आत्मा के टूटने का जिम्मेदार समझने लगा। यह सोच इतिहास की जटिल सच्चाइयों से अधिक उसके भीतर जमा प्रतिशोध और कट्टर मान्यताओं से संचालित हो रही थी। फिर जनवरी 1948 में 55 करोड़ का विवाद सामने आया। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया था। भारत सरकार ने सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान को दिए जाने वाले 55 करोड़ रुपए रोक लिए थे। लेकिन गांधी जी इस बात पर अड़ गए कि यह राशि पाकिस्तान को दी जानी चाहिए।
गांधी जी ने दिल्ली के बिलाल हाउस में आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनकी मांग थी कि पाकिस्तान को यह पैसा तुरंत दिया जाए। [गहरी सांस लेने की आवाज़] साथ ही दिल्ली की मस्जिदों में शरण लिए हुए हिंदू शरणार्थियों को वहां से बाहर निकाला जाए। क्योंकि वे दंगों और ठंड से बचने के लिए वहां टिके हुए थे। घुड़ से और उसके साथियों नारायण आपट्टे मदन लाल पाहवा और विष्णु करकरे के लिए यह बात असहनीय थी। उन्हें लगा कि जिस देश पर हमला हुआ है उसी देश का धन उस दुश्मन को दिया जा रहा है [गहरी सांस लेने की आवाज़] और वह भी गांधी जी के दबाव में। घोड़से ने अपने अखबार में तीखा आरोप लगाया कि गांधी अब भारत के राष्ट्रपिता नहीं बल्कि पाकिस्तान के रक्षक बन गए हैंउसके मन में यह विचार और गहरा हो गया कि जब तक गांधी जीवित हैं हिंदू राष्ट्र सुरक्षित नहीं हो सकेगा।
अब उसे अग्रणी के लेख और भाषण अपर्याप्त लगने लगे। शब्द, बहस और आलोचना उसे कमजोर उपाय लगने लगे थे। घोड़से और आपटे ने तय किया कि अब कलम को विराम देकर हथियार को आगे लाया जाएगा। इसके बाद गुप्त मुलाकातों का दौर शुरू हुआ। सावरकर के कट्टर समर्थक और ग्वालियर के डॉक्टर परचुरे से उन्होंने एक इतालवी का इंतजाम किया। यह फैसला अचानक भावनात्मक आवेश में नहीं लिया गया था। घोड़से के मन में यह एक योजनाबद्ध और ठंडे दिमाग से बनाई गई रणनीति बन चुकी थी।
घोड़से मानने लगा था कि गांधी जी का वध करना उसका धर्म है। उसने अपने भीतर इस हिंसक विचार को धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य का रूप दे दिया। वह खुद को अर्जुन की तरह देखने लगा और गांधी जी को ऐसे भीष्म पितामह की तरह जो उसकी नजर में गलत पक्ष की रक्षा कर रहे थे। 20 जनवरी 1948 को मदद लाल पहवा ने बिरला हाउस में बम फोड़कर गांधी जी को डराने की कोशिश की। हमला नाकाम रहा। मदन लाल पकड़ा गया। [गहरी सांस लेने की आवाज़] लेकिन गोसे और आपटे दिल्ली की भीड़ में गायब हो गए।
वे डरे नहीं थे। वे पीछे हटे थे ताकि अपनी योजना को और अधिक घातक बना सकें। अब उनके सामने लक्ष्य साफ था। समय बहुत कम था और नाथूराम गोडसे का मन हिंसा की अंतिम सीमा पार करने की ओर बढ़ चुका था। 20 जनवरी 1900 48 को बिरला हाउस में हुए बम धमाके ने पूरी दिल्ली को हिला दिया था। मदन लाल पहावा पुलिस की गिरफ्त में था। उसने साजिश की परतों को खोलना शुरू कर दिया था। लेकिन उस समय दिल्ली पुलिस उन मुख्य साजिशकर्ताओं तक नहीं पहुंच सकी जो उसी घटना के पीछे खड़े थे। नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे वहां से सुरक्षित निकल भागे। यह असफलता गोडसे के लिए हार नहीं थी। उसने इसे एक सबक की तरह लिया। उसे समझ में आ गया कि बड़ी भीड़, धमाके और उलझी हुई योजना से लक्ष्य हासिल नहीं होगा। अब उसे अकेले और सीधे तरीके से आगे बढ़ना होगा। अगले 10 दिन घोड़से और आपटे लगातार पुलिस की नजरों से बचते रहे। वे कानपुर, बॉम्बे और पुणे के बीच घूमते रहे। हर जगह सावधानी थी।
हर कदम पर शक का डर था। आखिरकार वे ग्वालियर पहुंचे। जहां उनकी मुलाकात डॉक्टर परचुरे से हुई। ग्वालियर में डॉक्टर परचुरे ने उन्हें वह हथियार सौंपा जो आगे चलकर इतिहास की दिशा बदलने वाला था। यह सात चेंबर वाली इतालवी पिस्तौल थी। घुड़से के लिए यह केवल लोहे का एक हथियार नहीं था। उसके कट्टर विचारों में यह न्याय का दंड बन चुका था। उसने ग्वालियर के जंगलों में सुनसान जगहों पर निशाना लगाने का अभ्यास किया। हर अभ्यास के साथ उसके भीतर गांधी जी के प्रति जमा नफरत और कठोर होती गई। अब उसके मन में कोई संदेह नहीं बचा था। वह अपने निर्णय को अपराध नहीं बल्कि कर्तव्य मानने की भूल कर चुका था। 29 जनवरी की शाम गोडसे और आपटे फिर दिल्ली लौटे।
वे जानते थे कि होटलों और ठहरने की जगहों पर पुलिस की नजर हो सकती है। इसीलिए उन्होंने एक साधारण और गुमनाम स्थान चुना। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का प्रतीक्षा कक्ष। उस रात दिल्ली की ठंड बहुत तेज थी। लेकिन गोसे के भीतर बदले की आग उसे सोने नहीं दे रही थी। वह बार-बार अपनी पिस्तौल साफ करता, गोलियों को गिनता। अपने मन में आने वाले दिन की पूरी तस्वीर बनाता। नारायण आपटे ने उसे एक और तरीका सुझाया। उसने कहा कि वे फिर से भेष बदलकर हमला कर सकते हैं। लेकिन गोडसे ने इसे ठुकरा दिया।
उसने कहा कि वह कायर की तरह छिप कर नहीं बल्कि सामने खड़े होकर अपना काम करेगा। यह वाक्य उसके भीतर बैठ चुकी कट्टरता और आत्मधार्मिक भ्रम को साफ दिखाता था। 30 जनवरी 1900 48 की सुबह इतिहास की सबसे भारी सुबहों में से एक बनने वाली थी। विडला हाउस में महात्मा गांधी हमेशा की तरह सुबह 3:30 बजे जागे। उन्होंने प्रार्थना की शहद और नींबू का पानी पिया और फिर अपने लेखन कार्य में लग गए। विडंबना देखिए जिस समय गांधी जी शांति और अहिंसा से जुड़े विचारों पर काम कर रहे थे उसी समय पुरानी दिल्ली स्टेशन पर नाथूराम गड़ से अपनी में सात भर रहा था। दो विचारधाराएं एक ही शहर में एक ही दिन अंतिम टकराव की ओर बढ़ रही थी। उस सुबह गोडसे ने एक फल वाले से कुछ संतरे खरीदे।
वह उन्हें खाते हुए अपनी अगली चाल के बारे में सोचता रहा। उसके चेहरे पर घबराहट नहीं थी। वह अपने भीतर इस हिंसक कार्य को किसी धार्मिक अनुष्ठान जैसा अर्थ दे चुका था। शाम के 4:00 बजे के आसपास गांधी जी के कमरे में गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पहुंचे। [गहरी सांस लेने की आवाज़] दोनों के बीच देश की स्थिति पर गंभीर चर्चा हुई। यह बातचीत लंबी चली और इसी कारण गांधी जी अपनी प्रार्थना सभा के लिए लगभग 10 मिनट देर से निकले। उधर बिड़ला हाउस के गेट पर सुरक्षा पहले से अधिक सतर्क थी। लेकिन गांधी जी ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि उनके पास आने वाले श्रद्धालुओं की तलाशी ना ली जाए।
कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि यदि उन्हें मरना ही है तो वे अपने लोगों के बीच मरना पसंद करेंगे। शाम 5:10 पर गांधी जी अपने कमरे से बाहर निकले। उनके दोनों ओर मनु और आभा थी जिन्हें वे अपनी चलती लाठियां कहा करते थे। गांधी जी ने उनके कंधों पर हाथ रखा और धीरे-धीरे प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ने लगे। भीड़ के बीच एक युवक खाकी कपड़ों में खड़ा था। उसके हाथ में संतरों का एक थैला था। बाहर से वह एक सामान्य श्रद्धालु जैसा दिखता था। लेकिन उसके भीतर छिपा इरादा उस शाम को भारतीय इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में बदलने वाला था।
घोड़ से भीड़ को चीरते हुए गांधी जी के सामने आने का रास्ता बनाने लगा। नारायण आपटे और विष्णु करकरे कुछ दूरी पर खड़े थे। वे इस योजना के पीछे की दूसरी परत की तरह मौजूद थे। अब वह क्षण नजदीक था। सूरज ढलने को था। मिडला हाउस के बगीचे में एक भारी सा सन्नाटा फैल रहा था। एक ओर सत्य और अहिंसा का वह प्रतीक था। जिसने बिना हथियार के साम्राज्य को चुनौती दी थी। दूसरी ओर वह युवक था जो यह मान चुका था कि हिंसा ही राष्ट्र को बचाने का रास्ता है। इतिहास कुछ ही पलों में एक ऐसे मोड़ पर पहुंचने वाला था जिसकी गूंज आने वाली पीढ़ियों तक सुनाई देने वाली थी। शाम के 5:17 बज चुके थे।
बिरला हाउस का बगीचा उस दिन एक ऐसे क्षण का गवाह बनने वाला था जिसकी गूंज जाने वाले दशकों तक पूरी दुनिया में सुनाई देती रही। महात्मा गांधी जिन्हें दुनिया का एक बड़ा हिस्सा सत्य और अहिंसा का प्रतीक मानता था। प्रार्थना स्थल की सीढ़ियों की ओर बढ़ रहे थे। [गहरी सांस लेने की आवाज़] तभी खाकी बुशर्ट और नीली पतलूून पहने नाथूराम गो से भीड़ से बाहर निकला। उसने दोनों हाथ जोड़कर गांधी जी को प्रणाम किया और कहा नमस्ते गांधी जी। गांधी जी की भतीजी मन्नू ने उसे किनारे हटाने की कोशिश की।
उसने कहा कि बापू को पहले ही देर हो चुकी है। इसलिए वह सामने से हट जाए। लेकिन घोड़ से वहां हटने नहीं आया था।
वह अपने भीतर पहले से तय की हुई हिंसक योजना को पूरा करने आया था। उसने अपने बाएं हाथ से मनु को धक्का दिया। फिर जैकेट के भीतर छिपी पिस्तौल बाहर निकाली। कुछ पल के लिए समय जैसे ठहर गया। उसके चेहरे पर हिचकिचाहट नहीं थी। वहां केवल कठोर निश्चय और कट्टर भ्रम दिखाई दे रहा था। तीन चली। एक के बाद एक।
पहली गोली गांधी जी के शरीर के निचले हिस्से में लगी। दूसरी उनके पेट में लगी। तीसरी गोली उनके सीने को चीरती हुई निकल गई। गांधी जी के सफेद वस्त्र रक्त से लाल हो गए। कहा जाता है कि उनके होठों से अंतिम शब्द निकले। हे राम। फिर बापू धीरे-धीरे जमीन पर गिर पड़े। अहिंसा के सबसे बड़े पुजारी को हिंसा ने छीन लिया था। कुछ क्षणों के लिए पूरे परिसर में सन्नाटा छा गया। फिर चीखपकार शुरू हुई। लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि अभी-अभी क्या हो गया है। भारत ने अपने सबसे बड़े नैतिक प्रतीक को खो दिया था। घोड़ से वहां से भागा नहीं। उसने पिस्तौल ऊपर उठाई और खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। वह चाहता था कि लोग उसे देखें। उसका नाम जाने और उसके कृत को उसकी राजनीतिक सोच के संदर्भ में समझें। लेकिन इतिहास ने इस घटना को गांधी की हत्या के रूप में दर्ज किया और घुड़से को हत्यारे के रूप में कुछ ही घंटों बाद जवाहरलाल नेहरू ने कांपती हुई आवाज में देश को संबोधित किया।
उनके शब्दों में उस क्षण का दुख साफ सुनाई देता था। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन से रोशनी चली गई है और हर तरफ अंधेरा छा गया है। बापू के जाने से ऐसा लगा मानो देश की आत्मा टूट गई हो। आजादी के कुछ ही महीनों बाद भारत ने उस व्यक्ति को खो दिया था। [गहरी सांस लेने की आवाज़] जिसने स्वतंत्रता संघर्ष को नैतिक शक्ति दी थी। इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा। लाल किले के भीतर एक विशेष अदालत बनाई गई। न्यायाधीश आत्मचरण के सामने नाथूराम गोडसे नारायण आपटे और उनके साथियों पर मुकदमा चला। घोड़से ने वकील की सहायता लेने से इंकार कर दिया।
उसने अदालत में अपना बयान पढ़ा। उस बयान में उसने अपने अपराध को राजनीतिक और वैचारिक तर्कों से सही ठहराने की कोशिश की। उसने कहा कि उसने गांधी को इसलिए नहीं मारा क्योंकि वह व्यक्तिगत रूप से बुरे थे बल्कि इसलिए मारा क्योंकि उसके अनुसार गांधी के विचार भारत माता की अखंडता के लिए घातक थे। घोड़से ने अपनी तुलना रामायण के राम और महाभारत के अर्जुन से की। उसने तर्क दिया कि जैसे अर्जुन ने धर्म के पक्ष में अपने ही लोगों के उठाए थे। वैसे ही उसने गांधी जी को मारकर अपना राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा किया। यह तर्क उसके मन में बैठे कट्टर विश्वासों और हिंसा को धर्म का रूप देने वाली सोच को दिखाता था। उसने विभाजन की त्रासदी पाकिस्तान को दिए गए 55 करोड़ रुपए और हिंदुओं के प्रति गांधी जी की कथित उदासीनता को अपनी गोलियों का कारण बताया। घोड़ से मानता था कि गांधी के बिना भारत एक अधिक मजबूत सैन्य राष्ट्र बन सकेगा।
लेकिन अदालत ने उसके तर्कों को हत्या का औचित्य नहीं माना। इतिहास की यह कानूनी लड़ाई अंततः 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल के फांसी घर तक पहुंची। नाथूराम गोडसे और नारायण आपे को मौत की सजा दी गई। फांसी से पहले गोडसे के हाथों में अखंड भारत का नक्शा और भगवत गीता थी। उसके अंतिम शब्द थे अखंड भारत अमर रहे। घोड़से ने सोचा था कि गांधी को मारकर वह गांधीवादी विचारों को समाप्त कर देगा।
लेकिन इतिहास की विडंबना यही रही कि गांधी अपनी मृत्यु के बाद और भी बड़े प्रतीक बन गए। उनका शरीर खत्म हुआ। लेकिन सत्य, अहिंसा और नैतिक प्रतिरोध का विचार दुनिया भर में और फैल गया। आज दशकों बाद भी भारत का मन इस घटना को लेकर दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। एक तरफ वे लोग हैं जो गांधी को सत्य और अहिंसा का मार्गदर्शक मानते हैं। दूसरी तरफ एक छोटा लेकिन मुखर वर्ग है जो गोडसे के तर्कों में देशभक्ति खोजने की कोशिश करता है।
घोड़से एक था या एक भटका हुआ राष्ट्रवादी यह बहस आज भी कई लोगों के बीच जारी है। लेकिन एक कठोर सत्य से बचा नहीं जा सकता। उन तीन गोलियों ने केवल महात्मा गांधी के शरीर को समाप्त नहीं किया। उन्होंने भारत की चेतना पर ऐसा घाव किया जिसे समय भी पूरी तरह नहीं भर पाया और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल क्रोध, प्रतिशोध और से नहीं बनता। इतिहास हमें बार-बार याद दिलाता है कि विचारों से लड़ाई विचारों से ही लड़ी जाती है।