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वो 3 नाम जिन्होंने इंदिरा से लिखवाया लोकतंत्र का काला अध्याय! इमरजन्सी का वो सच..

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नमस्कार एक बार फिर स्वागत है आपका हमारे इस कार्यक्रम में और संतोष मिश्रा जो कि जानेमाने लेखक हैं आप उनको सुनते रहे हैं और देश में जून का महीना जो है वो एक बहुत ही विशेष परिस्थितियों के लिए भी एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। जी हां आप समझ गए होंगे इमरजेंसी देश में इमरजेंसी लगी थी और जो है वह आज उस पीढ़ी का लोग अगर होंगे तो आज वो 50 साल के हो गए होंगे। संतोष मिश्रा से हम जानते हैं कि आप देश में आपातकाल लगा था उसे किस रूप में देखते हैं और क्या भविष्य में भी इस तरह की कभी कोई परिस्थितियां भारत में देखने को मिल सकती हैं? स्वागत है संतोष मिश्रा। नमस्कार और दर्शकों को भी नमस्कार। देखिए आपातकाल की तो बात क्या की जाए। देश आजाद हुआ 1947 में और देश की आजादी में कांग्रेस या आप ये कह सकते हैं गांधी परिवार अपना बहुत ज्यादा कहता है कि हमने आजाद कराया देश या हमारी पीढ़ियों ने काम किया। किसी और लोगों ने नहीं काम किया देश की आजादी में। 1947 के बाद जो देश तो आजाद हो गया। संविधान भी बन गया। संविधान के चेयर पर्सन थे डॉ. अंबेडकर। सबको पता ही है। लेकिन जो अंबेडकर के संविधानों को 21 जून 1975 उसको बिल्कुल तोड़ा मरोड़ा गया। या यह कह सकते हैं आप बिल्कुल उसे खत्म कर दिया गया।

क्यों किया गया यह? इसका जवाब 50 साल हो गए। आज तक किसी के पास नहीं है। क्योंकि संविधान की बात करते हैं लोग। हम लोग लोकतंत्र में वह कहते हैं कि हमने लोकतंत्र को लेकर आए। वह कौन सा लोकतंत्र ले आए? कांग्रेस ने आज तक इसका कभी जवाब नहीं दिया। अगर उन्होंने मतलब आजादी की लड़ाई में क्योंकि इन्होंने भाग नहीं लिया। बहुत से लोगों ने नहीं लिया होगा। ठीक है। लेकिन आपने क्या किया? 1900 75 में जो है जिसे हम काला अध्याय भी कह सकते हैं। लोग एकाएक एक दिन में कि सब प्रेस की आजादी छीन ली गई। लोग लोगों की आजादी छीन। कौन से संविधान की बात करती थी वो? इंदिरा गांधी को मैं आप यह कह सकते हो उन्होंने हिटलर से भी ज्यादा अपनी हिटलर गिरी दिखाई। हिटलर ने तो जो किया पूरी दुनिया को पता है लेकिन हिटलर की तुलना मैं कर सकता हूं इंदिरा गांधी से क्योंकि 1975 में मान लो कांग्रेस ये कहती तो कांग्रेस को किसी चीज का कहने का हक नहीं है कि जी उन्होंने जो 1975 में अपना बता रही हैं कि आपातकाल में बहुत से लोग उन लोगों को भी बंद कर दिया गया जो लोग आपातकाल के ये कह सकते हो कहीं दूर-दूर तक इन्वॉल्व नहीं थे। असंतोष जी क्या आपातकाल जो है वह एक व्यक्ति की जिद थी क्योंकि उसको जो है उसके चुनाव को अवैध करार दे दिया गया था या फिर आपको लगता है कि एक ये सनक थी या फिर ये खुद को बचाने की एक जद्दोजहद थी। देखिए इसका सीधा-सीधा तरीका यही है कि ये एक आदमी की जिद्द थी। वह अपनी मैंने आपको बताया ना कि जैसे हिटलर ने अपनी पूरी हिटलर गिरी चलाई और उस देश का क्या नतीजा है दुनिया को पता है जो चीज है वहां परमाणु अटैक हुआ इसी चीज का तो नतीजा था जी और दूसरा यह है जो अपना इंदिरा गांधी ने चलाया भाई सीधा-सीधा उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर के सीधा-सीधा संविधान पे प्रश्न चिन्ह उठाया संविधान जिन लोगों ने बनाया उस कमेटी के के चेयर पर्सन बाबासाहेब अंबेडकर थे। तो इसका मतलब वो अंबेडकर के खिलाफ थी। बाबा साहब के खिलाफ थी। क्योंकि इमरजेंसी लाने का क्या वो था? एक ही आदमी की जिद्दी थी ना।

बाकी लोगों की तो थी नहीं। कितने लोगों को जेल में डाल दिया गया? जो जिनका कोई कसूर नहीं था। वो कौन सा कानून या क्या दुनिया को दिखाना चाहती थी? तो ये उनकी जिद का नतीजा था एक ही आदमी की जीत का। आज की जो युवा पीढ़ी है क्योंकि आप युवाओं के बीच में रहते हैं। इमरजेंसी के बारे में जब वह जानती है, पढ़ती है, सुनती है तो क्या प्रतिक्रिया देती है? देखिए इमरजेंसी के बारे में जो प्रतिक्रिया है कि एक परिवार की जििद है ये कि एक परिवार का अगर आदमी आप उसको सत्ता में नहीं लाओगे तो आपको यह दिन देखना पड़ेगा। अगर एक ही परिवार आगे बढ़ता जाएगा क्योंकि लोकतंत्र की लड़ाई में सभी लोगों ने भाग लिया। आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी जी ने तो कोई प्रधानमंत्री बने नहीं। महात्मा गांधी जी ने ही तो आजादी की लड़ाई में उनका सबसे बड़ा रोल था। वो भारत के प्रधानमंत्री बने नहीं। राष्ट्रपति बने नहीं। निस्वार्थ उन्होंने देश की सेवा की महात्मा गांधी जी ने और बिना हथियार के लड़ाई लड़ी। एक वो भी कहते हैं ना हिंसा से भी लड़ाई लड़ी जाती है। वो अहिंसा और सत्य की लड़ाई लड़ी महात्मा गांधी ने। क्या जिन सपनों को महात्मा गांधी जी ने देखा था क्या कांग्रेस ने उसे पूरा होने दिया? इंदिरा गांधी पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद वह प्रधानमंत्री बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू के और उनको इंदिरा गांधी को मुझे लगता है कहीं ना कहीं मन में एहसास हो गया होगा कि मैं चुनाव हार जाऊंगी या मेरे खिलाफ है चुनाव का अवैध जो घोषित किया इलाहाबाद हाई कोर्ट के जहां तक मुझे ध्यान है तो उसके बाद उन्होंने इमरजेंसी लग गई 21 महीने चली इमरजेंसी सबको पता ही है अपने हिसाब से उन्होंने चलाया जैसे भी चलाया सारी चीजें छीन ली गई लोगों की तो यह तो सीधासीधा अगर आप किसी परिवार की पार्टी के आदमी को हरा देते तो यही होगा देखने को। आप लगभग पूरे देश में यात्राएं करते हैं। कभी आपको पिछले महीने या इस महीने कोई ऐसे व्यक्ति मिले जो कभी किसी ने इमरजेंसी को सही भी ठहराया हो। देखिए मैं उन लोगों को भी जानता हूं। मैं उन लोगों से मिला और अभी मैंने एक घोषी में भी मैं गया था जहां पर इमरजेंसी में जो लोग बंद थे दिल्ली के भी कुछ लोग बंदे थे। उन लोगों से मिला। मैं जो है उन्होंने इमरजेंसी में उनके परिवार के साथ बहुत बदसलूकी हुई और एक तानाशाही वाला माहौल बनाया गया। ऐसा नहीं कि नहीं जानता मैं देश में बहुत लोग लेते हैं और किसी भी आदमी ने ये आज की बात हो या हम तो आज की बात कर रहे

50 साल हो गए इमरजेंसी को। लेकिन मुझे लगता है उस समय भी जिन लोगों ने उसको गलत सहया था वह सब जेल में भेजे गए। उनका कोई कसूर नहीं था। मान लो हम लोकतंत्र में पैदा हुए हैं तो हमें अपनी बात रखने का आजादी से पूरा अधिकार है। अगर 1947 में भारत को आजादी मिली तो कि तो मुझे जो लगता है सीधा-सीधा बाबा साहब अंबेडकर के संविधान को उन्होंने चुनौती देने की कोशिश की। चलिए संविधान को चुनौती देने की बात तो ठीक है लेकिन अगर इमरजेंसी नहीं लगी होती तो जयप्रकाश नारायण या दिल्ली से कहें तो मदद लाल खुराना के सी त्यागी ये सब कई बड़े जो है वो नेता है इमरजेंसी ने जो है वो इस देश की राजनीति को बड़े नेता दिए तो ये कहते हैं कि कुछ बुरे में भी कुछ अच्छा हो जाता है। देखिए इमरजेंसी ने नहीं दिए। यह एक आम आदमी को उठाया गया और जेल में डाल दिया गया। यह लोग कोई अलग से नहीं आए। इन्होंने इमरजेंसी जिस लोकतंत्र को बचाने के लिए इन्होंने एक लड़ाई लड़ी उससे बहुत लोग निकल के आए जैसा आपने बताया मैं और लोगों को भी जानता हूं जो है करीब-करीब आरएसएस के 1200 1300 लोगों जी अच्छा यहां आपको रोकूंगा 1975 में इमरजेंसी लगी और 77 में चुनाव हुए मोरारजी देसाई की सरकार बनी और सरकार महज कुछ महीनों में गिर जाती है तो आपको लगता है कि जहां पर जिस इमर इमरजेंसी के खिलाफ जो है वो तमाम जो नेता लामबंद थे जिनको कि जेल में तरह तरह की यातनाएं दी गई काला पानी की सजाएं तक दी गई जो है मतलब उनके साथ पूरा अत्याचार हुआ बाद में जब उन्हें सत्ता मिली तो संभाल नहीं पाए और फिर से सत्ता उसी व्यक्ति के पास चली गई जिसके लिए इतना सारा कुछ हुआ देखिए ऐसा है क्योंकि इमरजेंसी के बाद जो लोग आए बहुत से लोग तो जेल में ही रहे और कोई भी नई चीज आती है उसको ठीक करने के लिए समय लगता है और आप ये कह सकते हो उसके बाद इमरजेंसी से जो नेता एक साथ गठबंधन में आए थे गठबंधन की सरकार बनी। मोरारजी देसाई भाई जी ने उसको लीड किया था। बिल्कुल बात सही है। उनकी सरकार गिर गई क्योंकि उस पार्टी में से भी जो गठबंधन के नेता थे वो अलग-अलग पार्टी में टूट गए। उसके बाद कुछ समय बाद भारतीय जनता पार्टी की जो जनसंघ कह सकते हो आप। ठीक है? या और लोग थे जिन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई। उसके बाद तो 35 साल बाद तो हो गया बीजेपी को बने हुए बीजेपी भी तो उसके बाद ही बनी ना जिनकी सरकार है इस समय तो मेरे को जो लगता है कि इमरजेंसी का एक जो है अच्छा आपको लगता है कभी कि भारत मेंकि हालांकि परिस्थितियां ऐसी दिखती कि भारत में फिर कभी इमरजेंसी का दौर आ सकता है?

देखिए कई चीजें ऐसी होती हैं कि लोकतंत्र के खिलाफ जब लोग खड़े होते हैं या वह सत्ता को अपने परिवार की बपौती समझ लें। उत्तर प्रदेश में कहावत ऐसी तो फिर ऐसी चीजें होंगी ही होंगी और लोकतंत्र में सभी लोगों को अपनी बात रखने का बिल्कुल अधिकार है क्योंकि उनको कहीं ना कहीं डर था इंदिरा गांधी को कि मैं चुनाव हार जाऊंगी या ऐसा कुछ हो जाए हार गई ही चुनाव जब मोरारजी देसाई की वो सरकार बनी चाहे वो कितने भी टाइम के लिए क्योंकि आपने सीधा-सीधा लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश की और जो भी लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश करेगा उसका हर हर्ष क्या होगा यह बताने की आवश्यकता नहीं है। वो इतिहास बन जाएगा। जी तो दर्शकों सुना आपने संतोष मिश्रा को और संतोष मिश्रा को अच्छा लगता है हमें आप लगातार सुनते रहते हैं लेकिन बहुत सारे लोग आज चैनल पर पहली बार आए होंगे तो अगर आप पहली बार आए हैं तो चैनल को सब्सक्राइब कर लें और उसके साथ में जो एक बेल आइकन जो है जिसे घंटी कहते हैं उसको जरूर प्रेस कर दें और सारे अपने नोटिफिकेशंस ऑन कर दें जिससे कि जैसे ही वीडियो डले आपके पास उसकी सूचना नोटिफिकेशन के जरिए पहुंच जाए। अगले एपिसोड में हम फिर हाजिर होंगे एक बेबाक मुद्दे पर। संतोष मिश्रा के साथ। नमस्कार।

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