यह गैंगरेप और मर्डर का मामला है। हमारे कानून में इसके लिए विशेष संशोधन हैं। वे बीएनएसएस में भी मौजूद हैं। सीआरपीसी में भी कहा गया था कि जांच 60 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए। पहले ही छह साल बीत चुके हैं। वे उन 60 दिनों के भीतर हमारे तीन महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज करने में विफल रहे। हमें यह संतोषजनक नहीं लगा। सुप्रीम कोर्ट ने एक नियम स्थापित किया है कि ऐसी स्थितियों में, पीड़ित सीबीआई कोर्ट में एक आवेदन दायर कर सकता है, और कोर्ट मामले की निगरानी का आदेश दे सकता है। तो, हमने वह आवेदन दायर किया है। पहले, कोर्ट ने तर्क दिया कि उनके पास अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें हाई कोर्ट से आदेश लेना होगा। फिर, हमने सुप्रीम कोर्ट का आदेश पेश किया। जज हेमंत यशवंत ठाकर तब संतुष्ट हो गए। मामला दर्ज हो गया है, और 18 नवंबर को सुनवाई तय है।यहां दो या तीन मुद्दे हैं।
पहला, आरोपियों को अभी तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? क्योंकि सतीश सालियान का बयान पहले ही दर्ज हो चुका था। इसके साथ ही, हमने एक पेन ड्राइव दी जिसमें चश्मदीद गवाह की गवाही थी। हमने सभी डिजिटल सबूत पेश किए। हमने अतिरिक्त गवाहों के नाम दिए। हाई कोर्ट ने तो एक मिनी-चार्जशीट भी दी। उस मिनी-चार्जशीट के अनुसार, रोहन राय से लेकर पुलिस अधिकारियों तक कम से कम 30 लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए था। यह हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार है।
हमारे आवेदन में, हमने आदित्य ठाकरे, डीनो मोरिया और सूरज पंचोली जैसे लोगों को भी शामिल किया है। हमने उनकी मोबाइल टावर लोकेशन दी। हमने दो अधिकारियों के नाम भी दिए और अनुरोध किया कि उनके बयान दर्ज किए जाएं। उनके बयान अभी तक दर्ज नहीं हुए हैं। इसीलिए हमने यह आवेदन दायर किया, भाग एक।भाग दो और धाराएं जोड़ने के बारे में है। यहां मकोका लागू होता है। मकोका कानून के लिए जरूरी है कि आरोपी के सिंडिकेट के खिलाफ दो लंबित चार्जशीट हों। इनमें तीन साल से अधिक की सजा होनी चाहिए, और कोर्ट ने उसका संज्ञान लिया हो। सचिन वाजे के खिलाफ पहले से ही चार्जशीट है। रिया चक्रवर्ती के खिलाफ पहले से ही चार्जशीट है। इसलिए, यहां मकोका आकर्षित होता है। इसके अतिरिक्त, हमने यूएपीए लगाने के लिए भी सबूत दिए हैं।
हमने आदित्य ठाकरे की अल जजीरा के साथ बैठक के बारे में हमारी एएनआई शिकायत सहित सभी उपलब्ध सबूत प्रस्तुत किए हैं। तो, यहां सबसे गंभीर विषय और धारा में उद्धव ठाकरे और अनिल देशमुख जैसे लोग शामिल हैं, जो है आईपीसी 409, मुख्यमंत्री और गृह मंत्री के पद पर रहते हुए, और ये पुलिस अधिकारी, सर, यह सार्वजनिक संपत्ति है। सब कुछ जनता के पैसे से चलता है। यह टैक्सपेयर के पैसे से चलता है। तो, जनता ने उन्हें वहां क्यों बिठाया है? उन्हें वहां इसलिए बिठाया गया है ताकि वे कानून के अनुसार काम करें। आम आदमी और कानून के बड़े हित के लिए, वे शपथ लेते हैं, है ना, कि मैं कानून और संविधान को बनाए रखूंगा। तो, उन्हें इन पदों पर उसी के अनुसार काम करने के लिए दिया गया है। उन्होंने क्या किया? उन्होंने अपने पद, पुलिस मशीनरी और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग क्यों किया?
गैंगरेप और मर्डर के आरोपियों को बचाने के लिए। तो, उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 409 लगती है। इसमें आजीवन कारावास की सजा है। हमने सीबीआई को इन चीजों को जोड़ने के लिए पहले ही एक आवेदन दिया था। उन्होंने इसे जोड़ा है या नहीं, उन्होंने हमें अभी तक सूचित नहीं किया है। तो, हमने कोर्ट से कहा है कि वो सीधे उनसे स्टेटस रिपोर्ट मंगवाए। सुनवाई 18 तारीख को तय है।सर, आप एक विरोध प्रदर्शन की भी योजना बना रहे हैं। पूरे मामले की सुनवाई 18 तारीख को है। विरोध 19 तारीख को है। विरोध का उद्देश्य क्या है? आप किस उद्देश्य से विरोध करने की तैयारी कर रहे हैं? देखिए, मुद्दा सिर्फ दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत का नहीं है। यह हर आम आदमी का मुद्दा है जो, जब शक्तिशाली आरोपी शामिल होते हैं, जैसे आदित्य ठाकरे जैसे राजनेता। जहां परमबीर सिंह जैसे पुलिस अधिकारी शामिल होते हैं। ऐसी स्थितियों में, आम आदमी को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए। और ये आरोपी, देखिए, अगर आप यहां सिग्नल तोड़ते हैं, तो 25 पुलिसकर्मी आपका पीछा करते हैं, कहते हैं नियमों का पालन होना चाहिए।
अगर किसी आम आदमी के खिलाफ शिकायत होती है, तो व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है। तो, इस मामले में, हाई कोर्ट के आदेश पर गैंगरेप और मर्डर का मामला दर्ज होने के बाद भी, आज तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। तो, यह चलन जहां बड़े लोगों के लिए, ऐसा है कि – अगर आप गरीब हैं, तो जेल जाइए, अगर आप अमीर हैं, तो आपको जमानत मिल जाएगी। यह नहीं चलेगा, और इसीलिए हम इसे एक जन आंदोलन बना रहे हैं। सतीश सालियान जी 19 तारीख को शाम 4 बजे आजाद मैदान पहुंचेंगे। हम सभी से अनुरोध कर रहे हैं। हमने कल देश के सभी सांसदों को पत्र भेजे हैं। हमने उन सभी से अनुरोध किया है, क्योंकि यह किसी पार्टी का मामला नहीं है। यह एक बेटी से जुड़ा मामला है। हर किसी के घर में बेटी है। हर किसी की बहन है। तो, आप सभी को इसमें शामिल होना चाहिए। आप देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। तो, हमारे साथ आइए और अपने स्तर पर सीबीआई और अन्य को पत्र लिखिए। संसद में मुद्दा उठाइए कि इतने सारे सबूत हैं। और आपको एक और बात बता दूं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का क्राइम नंबर 15 ऑफ 2020। एनसीबी ने डीनो मोरिया और आदित्य ठाकरे के फोन को निगरानी पर रखा और पाया कि वे दोनों मुंबई में ड्रग्स का कारोबार चलाते हैं।
रिया चक्रवर्ती उनके साथ पार्टनर है। रिया चक्रवर्ती को गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई थी। और मामला आज भी चल रहा है। ऐसी स्थिति में, डीनो मोरिया और आदित्य ठाकरे को आज तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने नशा मुक्त भारत और महिला सुरक्षा का नारा दिया है। इन दो एजेंडों पर, हमारे गृह मंत्री माननीय अमित शाह जी ने भी कहा है कि वे भारत को नशा मुक्त बनाएंगे। तो, अमित शाह जी, आपके अधिकारी आपको यह नहीं बता रहे हैं। यह रिकॉर्ड पर है। क्राइम नंबर 15 ऑफ 2020 की फाइल मंगवाइए। उनके फोन निगरानी में हैं। सभी चैट बरामद हो चुकी हैं। उन्होंने न केवल ड्रग्स का कारोबार किया है। सुशांत सिंह राजपूत की हत्या की योजना से संबंधित पूरी चैट बरामद हुई है। रिया चक्रवर्ती से। रिया चक्रवर्ती और आदित्य ठाकरे के बीच की चैट बरामद हुई है।
तो, एक बार यह सारा रिकॉर्ड मंगवाइए और मोदी जी के नशा मुक्त भारत और महिला सुरक्षा के सपने को पूरा कीजिए। यह हमारा अनुरोध है, और हम सभी इस संदेश को पहुंचाने के लिए आजाद मैदान में इकट्ठा हो रहे हैं।सर, आपने पूरे मामले में देरी या न्याय में देरी के बारे में भारत सरकार के साथ मुआवजे के लिए भी एक याचिका दायर की है; यह किस तरह की याचिका है और आपने सरकार से मुआवजे के रूप में क्या मांगा है? हां, क्या हुआ है कि एक कानून है, और बहुत कम लोग उस कानून का उपयोग करते हैं। लेकिन दिशा और सुशांत के माध्यम से, अब पूरे देश के लोगों में इस बारे में जागरूकता बढ़ेगी। अधिक से अधिक लोग इसका उपयोग करेंगे। यदि किसी आम आदमी के साथ अन्याय होता है। यदि उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। तो देखिए, यह सरकार किस लिए बनाई गई थी? ये पुलिस विभाग, ये अधिकारी, नौकरशाह, कोर्ट- ये क्या हैं? यह सुनिश्चित करने के लिए कि कानून व्यवस्था ठीक से बनी रहे।
इन सबको संभालने के लिए इन सभी लोक सेवकों को नियुक्त किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के पास सुप्रीम कोर्ट बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल का 2020 का संविधान पीठ का मामला और के. वीरास्वामी का 1991 का संविधान पीठ का मामला है। उन्होंने कहा कि इस देश में, मैं आपको कुल मिलाकर बताऊं, चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक, मजिस्ट्रेट से लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश तक, हर व्यक्ति जनता का सेवक है। एक लोक सेवक। क्योंकि उनकी पूरी तनख्वाह से लेकर उनके सारे खर्चे टैक्सपेयर के पैसे से कवर होते हैं। और ये सार्वजनिक विश्वास के पद हैं जिन पर उन्हें नियुक्त किया गया है। अब, उनकी जिम्मेदारी क्या है? यदि किसी व्यक्ति के साथ अन्याय होता है, तो उसे न्याय दिलाने में मदद करना, पापियों को सजा देना, दोषियों को सजा देना, अच्छे लोगों की रक्षा करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना। यह सभी की जिम्मेदारी है। अब, यदि कोई अधिकारी इसमें विफल रहता है और किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। ललिता कुमारी मामले में, संविधान पीठ ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति शिकायत दर्ज करने जाता है, तो उसकी एफआईआर दर्ज करना उसका संवैधानिक अधिकार है। यदि एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है, तो यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। तो, इस मामले में, दिशा के गैंगरेप और हत्या को छुपाने के लिए राज्य की पुलिस मशीनरी का इस्तेमाल किया गया था। यह मौलिक अधिकारों का पहला उल्लंघन था। दूसरा, जब उन्होंने खुद शिकायत दर्ज की, तो इन अधिकारियों ने फिर से एक झूठी रिपोर्ट बनाई; एफआईआर दर्ज करने के बजाय एसआईटी ने इसे आकस्मिक मृत्यु के रूप में दर्ज किया। तो इस मामले में क्या हुआ? हाई कोर्ट ने सब कुछ स्पष्ट कर दिया। महाराष्ट्र सरकार की एसआईटी फर्जी और अवैध थी। इसके अधिकारी फर्जी थे क्योंकि उन्होंने फर्जी रिपोर्ट बनाई थी, और उनके सारे झूठ कोर्ट के आदेश में उजागर हो गए। दिशा के बारे में, वे कह रहे हैं कि वह 1:20 पर ऊपर से गिरी, लेकिन 1:16 तक वह बात कर रही थी। यह सचिन वाजे की स्क्रिप्ट है, परमबीर सिंह की स्क्रिप्ट है, और पुलिस वहां 12:30 पर पहुंच गई, जैसा कि सीसीटीवी में देखा गया है। तो कोर्ट ने पूछा, क्या आपको आधे घंटे पहले ही सपना आ गया था कि वह मरने वाली है? तो, इस तरह के फर्जी, झूठे रिकॉर्ड जो बनाए गए हैं, इसके लिए एक कानून है। सुप्रीम कोर्ट ने पुष्टि की कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने आदेश दिया था कि यदि कोई एफआईआर/शिकायत दर्ज करता है और पुलिस उसे नहीं लेती है, तो उसे सरकार से 1 लाख रुपये का मुआवजा मिलना चाहिए। ये संज्ञेय मामले हैं जहां एफआईआर दर्ज नहीं की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसकी पुष्टि की। अब, दूसरा कानून क्या है? मोहम्मद नईम आजाद वाला, जहां पुलिस ने खुद एक व्यक्ति के खिलाफ उसे बदनाम करने के लिए जानकारी फैलाई।
वह पुलिस के खिलाफ आवाज उठा रहा था। तो, उसे दबाने के लिए। उस मामले में भी, सुप्रीम कोर्ट ने 5 लाख रुपये का मुआवजा दिया। और तीसरा, सबसे महत्वपूर्ण, जिसे आपने खुद कवर किया था, वह शरगधर चौहान मामला था। एफआईआर दर्ज न करने के संबंध में, तत्कालीन मुख्यमंत्री, विलासराव देशमुख ने एक सर्कुलर जारी किया और मामले को दूसरी दिशा में मोड़ दिया। उन्होंने कहा, “पहले हम जांच करेंगे, फिर हम एफआईआर दर्ज करेंगे।” जैसा कि इस मामले में हुआ, सतीश सालियान की शिकायत या राशिद खान पठान की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने के बजाय, उन्होंने इसे एडीआर में बदल दिया।
वे गैंगरेप और हत्या के मामले की जांच आकस्मिक मृत्यु के रूप में कर रहे हैं। इसके बाद, बॉम्बे हाई कोर्ट ने लागत लगाई, और सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि विलासराव देशमुख को मुख्यमंत्री रहते हुए व्यक्तिगत रूप से पार्टी बनाया जाए और 1 लाख रुपये की लागत लगाई जाए। इन सबके आधार पर, सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के तहत, महाराष्ट्र सरकार को नोटिस दिया गया है, क्योंकि आपको सतीश सालियान को 30 दिन का नोटिस देना होता है। आप प्रक्रिया जानते हैं; उन 30 दिनों के भीतर, सतीश सालियान को 200 करोड़ रुपये का डीडी भुगतान करें। सुप्रीम कोर्ट का कानून है और जस्टिस भूषण गवई का फैसला है, और नंबी नारायणन मामले में – जिस पर ‘रॉकेट्री’ फिल्म बनी थी, जिसमें शाहरुख खान ने भूमिका निभाई थी – मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के उस मामले में, कोर्ट ने 50 लाख रुपये को अंतरिम मुआवजे के रूप में दिया और कहा कि यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों से वसूली जानी चाहिए। तो इस मामले में, राज्य पहले डीडी जारी करेगा और सतीश सालियान को मुआवजा देगा, और फिर, जैसा कि हमने विस्तार से बताया है, यह उन सभी से वसूला जाएगा जो दोषी हैं। इसमें तत्कालीन पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह, सचिन वाजे, मालवणी पुलिस स्टेशन के अधिकारी, तत्कालीन मुख्यमंत्री और गृह मंत्री, और यहां तक कि विवेक फणसालकर या गृह सचिव जैसे वर्तमान अधिकारी भी शामिल हैं; उन सभी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। सरकार उनसे पैसे वसूलेगी क्योंकि सरकार जो पैसा देती है वह टैक्सपेयर्स से आता है, और यह सही नहीं है कि अधिकारी गलतियां करें और मुआवजा हमारे टैक्सपेयर्स के पैसे से दिया जाए। सरकार कानून के अनुसार तुरंत इसका भुगतान करेगी, लेकिन इसे दोषी पाए गए अधिकारियों से वसूलना होगा। हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार, प्रथम दृष्टया दोषी पाए गए लगभग 30 लोगों की एक सूची है, इसलिए इसे उनसे वसूलना होगा। तो, यह नोटिस दिया गया है।