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धर्मेंद्र के निधन के बाद हुआ चौकाने वाला खुलासा, सामने आया देओल परिवार का राज़

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धर्मेंद्र अब हमारे बीच नहीं रहे? यह सवाल पिछले कुछ दिनों से हर तरफ घूम रहा है। लोग आपस में यही पूछते नजर आ रहे हैं कि आखिर सच्चाई क्या है? अस्पताल से आया वह 1 मिनट का वीडियो सिर्फ फैंस को ही नहीं बल्कि पूरे देओल परिवार को भीतर तक हिला गया। अब हर किसी के मन में शंका है कि क्या परिवार वाकई दुनिया से कुछ छिपा रहा है? लेकिन दोस्तों सच तो यह है कि धर्मेंद्र की जिंदगी और विवादों का रिश्ता नया बिल्कुल नहीं है। जिस तरह आज उन पर आरोप लग रहे हैं कि परिवार हकीकत छिपा रहा है। वैसा ही एक सच उन्होंने सालों पहले खुद भी छुपाया था।

एक ऐसा सच जिसने उनके करियर को मोड़ दिया और उनकी गृहस्ती में ऐसा तूफान लाया कि पूरा बॉलीवुड हिल गया था। मगर उससे पहले जान लेते हैं उस लड़के की कहानी जो एक छोटे से गांव से निकलकर पूरे देश का ही मैन बन गया। 8 दिसंबर 1935 पंजाब के फगवाड़ा जिले के एक साधारण से गांव में एक बच्चे का जन्म होता है। नाम रखा जाता है धर्म सिंह देओल। घर का माहौल बिल्कुल सादा था। पिता सरकारी स्कूल में [संगीत] हेड मास्टर मां सादगी से घर संभालने वाली ना शोरशराबा ना तामझाम बस मेहनत ईमानदारी और अनुशासन की सीख सबको उम्मीद थीकि मास्टर जी का बेटा पढ़ाई में नाम कमाएगा अच्छी नौकरी करेगा और गांव की इज्जत बढ़ाएगा लेकिन धर्मेंद्र के दिल में कुछ और ही चल रहा था। स्कूल की घंटियों और किताबों के बीच भी उनका मन सिर्फ फिल्मों में अटक जाता था। गांव में मेले लगते और टेंट के भीतर प्रोजेक्टर पर पुरानी फिल्में चलती तो धर्मेंद्र घंटों वहीं बैठ जाते।

मानो वहीं उनकी असली दुनिया हो। हीरो का दर्द सहना, लड़ाई करना और फिर भी हंसते रहना। यह सब उन्हें किसी जादू की तरह खींचता था। चौपाल पर जब ट्रांजिस्टर बजता और फिल्मी गाने आते तो धर्मेंद्र उनमें खो जाते। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था। यह उनका सपना था। वह पर्दे पर दिखना चाहते थे। लोग उनका नाम लें, अभिनय की तारीफ करें। लेकिन तब किसी को अंदाजा भी नहीं था कि गांव का यह सीधा-साधा लड़का एक दिन देश का सबसे बड़ा ही मैन कहलाएगा।

लेकिन जैसे-जैसे सपने बड़े होते हैं, जिम्मेदारियां भी उतनी ही जल्दी कंधों पर आ जाती हैं। घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। पिता की आय सीमित, परिवार बड़ा इसलिए पढ़ाई बीच में ही रुक गई। धर्मेंद्र को उम्र से पहले ही समझदार बनना पड़ा। उधर पंजाबी परिवारों में जल्दी शादी का रिवाज भी था। तो साल 1954 आते-आते परिवार ने बिना ज्यादा पूछे उनकी शादी तय कर दी। घर में हलचल शुरू हो गई। खुद धर्मेंद्र भी समझ नहीं पा रहे थे कि जिंदगी उन्हें किस मोड़ पर ले जा रही है। दुल्हन थी प्रकाश कौर पूरी तरह घरेलू शांत और सादगी में पली लड़की। ना फिल्मों का शौक, ना किसी दिखावे का चाव शादी अरेंज थी।

दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह जानते भी नहीं थे। उन दिनों यही होता था। पहली बार ठीक से चेहरा शादी के दिन ही दिखता था। शादी के बाद जिम्मेदारियां और बढ़ी। धर्मेंद्र खेतीबाड़ी में पिता का हाथ बंटाने लगे। फिर छोटे-मोटे काम और रेलवे की नौकरी सुबह से रात तक यही दिनचर्या बन गई। लेकिन थके शरीर के बावजूद शाम होते ही चौपाल पर पहुंच जाते।

जहां फिल्मी किस्से हवा में उड़ते थे। वहीं बैठकर अंदर की बेचैनी बढ़ती जाती थी। उन्हें लगता था कि जिंदगी निकल रही है और अगर अभी सपने कापीछा नहीं किया तो जिंदगी भर पछतावा रहेगा। फिर आया फिल्मफेयर टैलेंट हंट 1958। पूरे देश से तस्वीरें भेजी जा रही थी और दोस्तों की सलाह पर धर्मेंद्र ने भी अपनी फोटो भेज दी। चयनकर्ताओं ने उन्हें बुलाया।

यही खबर सुनकर उनके भीतर की आग और तेज हो गई। घर में प्रतिक्रिया मिलीजुली थी। पिता ने डांटा, पढ़ाई छोड़ दी, शादी कर ली। अब एक्टिंग के पीछे क्यों भाग रहे हो? मां परेशान थी कि बड़ा शहर कैसे संभालेगा। लेकिन धर्मेंद्र के सपने ने उन्हें पीछे हटने नहीं दिया। उन्होंने ठान लिया कि अब बस आगे बढ़ना है। फिर शुरू हुआ मुंबई का सफर। गांव का शर्मीला लड़का जब मुंबई की चमक दमक में आया, तो उसे जल्दी ही एहसास हुआ कि यहां बिना पहचान या पैसे के टिकना बेहद कठिन है। स्टेशन की भीड़ देखकर ही घबरा गया था। पर हिम्मत नहीं हारी।

एक छोटे से कमरे में रहकर काम ढूंढना शुरू किया। कमरा इतना छोटा था कि खड़ा होना भी मुश्किल। गर्मी में पंखा ठीक से नहीं चलता था। सुबह से शाम तक स्टूडियो के चक्कर गार्ड पहचानता भी नहीं था। कई बार दरवाजे से ही लौटा देते थे। पैसा इतना कम था कि कई रातें भूखे पेट गुजरती थी। लेकिन उम्मीद कभी नहीं टूटी। उन्होंने सेट पर जाकर शूटिंग देखदेख कर सीखा। कैमरे, लाइटें, डायलॉग सब कुछ धीरे-धीरे छोटे-मोटे रोल मिलने लगे। भीड़ में खड़ा आदमी बैकग्राउंड में चलता इंसान। फिर 1960 में मिला पहला बड़ा मौका। दिल भी तेरा हम भी तेरे। फिल्म सुपरहिट नहीं हुई।

लेकिन धर्मेंद्र की आंखों की सादगी और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने सबका ध्यान खींच लिया। सबने महसूस किया। यह लड़का अलग है। इसके बाद शुरू हुआ उनका असली संघर्ष। फिल्में तो मिल रही थी, लेकिन हर फिल्म हिट नहीं होती थी। कुछ बुरी तरह फ्लॉप हो जाती, कुछ ठीक-ठाक चल जाती। कई बार ऐसा होता कि महीनों तक कोई कामनहीं मिलता और कभी एक साथ दो-तीन फिल्मों की शूटिंग करनी पड़ती।

लोग उन्हें एक हैंडसम चेहरे के तौर पर देखते थे। लेकिन धर्मेंद्र सिर्फ हीरो बनकर रह जाना नहीं चाहते थे। उनका इरादा एक्टर बनने का था। यही वजह थी कि उन्होंने हर तरह की भूमिकाएं पकड़ कर सीखने की कोशिश की। कभी गांव का सीधा साधा लड़का, कभी रोमांटिक हीरो तो कभी ऐसा गुस्सैल इंसान जिसके भीतर दर्द दबा हो। इसी दौरान उन्हें अनपढ़ और हकीकत जैसी फिल्में मिली।

इन फिल्मों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया। दर्शकों ने पहली बार महसूस किया कि यह लड़का सिर्फ सुंदर चेहरे का नहीं बल्कि असली टैलेंट का धनी है। धीरे-धीरे इंडस्ट्री भी यह समझने लगी कि धर्मेंद्र कैमरा ऑन होते ही किरदार में उतर जाते हैं और किसी भी सीन को असली भावना के साथ निभाते हैं। लोगों को महसूस होने लगा था कि यह सिर्फ लुक्स वाला हीरो नहीं बल्कि हर तरह की भूमिका निभाने वाला मजबूत कलाकार है। फिर आया वो साल जिसने उनकी किस्मत बदल दी। 19 66 फूल और पत्थर रिलीज हुई और इतनी बड़ी हिट साबित हुई कि धर्मेंद्र रातोंरात सुपरस्टार बन गए।

सिनेमाघरों के बाहर टिकट की लाइनें लगने लगी। गांव शहर हर जगह उनके पोस्टर टंगने लगे। फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नामांकन मिला और उसके बाद फिल्मों की लाइन लग गई। लेकिन करियर की चमक के बीच उनकी निजी जिंदगी भी बदल रही थी। उस समय तक उनकी पत्नी प्रकाश कौर पंजाब में थी बच्चों के साथ। धर्मेंद्र मुंबई में संघर्ष कर रहे थे और घर में प्रकाश अकेले सब संभाल रही थी। जब भी धर्मेंद्र घर आते, बच्चों के साथ खेलते, पत्नी के साथ समय बिताते और लगता कि सब ठीक है। लेकिन जैसे-जैसे काम बढ़ा, यात्राएं बढ़ी और धर्मेंद्र का घर से दूर रहना भी बढ़ता गया। परिवार के लिए समय कम होता गया। मगर प्रकाश कभी शिकायत नहीं करती थी।

वह समझती थी कि उनके पति अब एक ऐसे सफर पर बढ़ चुके हैं जिसे रोकना संभव नहीं। इसी दौरान धर्मेंद्र हर तरह के रोल करते हुए इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे। रोमांस, एक्शन, ड्रामा हर जगह परफेक्ट। उनके हावभाव, उनकी आंखें, उनकी सहजता सब कुछ दर्शकों को अपना सा लगता था। तभी इंडस्ट्री में एक नया नाम उभरा हेमा मालिनी। दक्षिण भारत से आई यह लड़की अपने पहले ही रोल से पूरे देश की ड्रीम गर्ल बन चुकी थी। उसकी खूबसूरती और डांसिंग स्किल्स की हर जगह चर्चा होती थी।

इसी सुनहरे दौर में धर्मेंद्र और हेमा की राहें पहली बार टकराई। फिल्म शराफत के सेट पर। शुरुआत में काम सिर्फ प्रोफेशनल था, लेकिन असली कनेक्शन तब बढ़ा जब उन्होंने साथ में तुम हसीन, मैं जवान की और फिर सीता और गीता जैसी बड़ी फिल्में साइन की। धर्मेंद्र की सहजता और हेमा की शालीनता दोनों को एक दूसरे की [संगीत] तरफ खींचने लगी। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह रिश्ता आगे चलकर इतना बड़ा विवाद बनेगा। फिल्म के सेट पर बिताया गया समय दोनों को धीरे-धीरे करीब लाने लगा। धर्मेंद्र वैसे तो शर्मीले इंसान थे, लेकिन हेमा के सामने आते ही थोड़ा खुल जाते।

शूटिंग के दौरान अक्सर सीन को दो-तीन बार रिहर्सल करने का बहाना बना लेते ताकि थोड़ा और वक्त मिल जाए। हेमा भी उनकी सहजता से प्रभावित होने लगी। दोनों के बीच कोई दिखावा, कोई नाटक नहीं था। सब कुछ बहुत धीरे-धीरे और सच्चे दिल से बढ़ रहा था। इस समय तक हेमा इंडस्ट्री की टॉप अदाकाराओं में शुमार थी। उनकी मां जया चक्रवर्ती हर चीज पर नजर रखती थी और नहीं चाहती थी कि बेटी किसी शादीशुदा आदमी के साथ जुड़कर अपनी जिंदगी मुश्किल में डाल दे।

लेकिन दिल के रिश्ते नियम कायदे नहीं मानते। धर्मेंद्र की मौजूदगी ने हेमा को भी बदलना शुरू कर दिया था। दोस्ती अब प्यार में बदल रही थी। शुरू में दोनों खुद भी इसे मानने को तैयार [संगीत] नहीं थे। लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरा दोनों के बीच खिंचाव बढ़ता गया। धर्मेंद्र उस वक्त देश के सबसे बड़े सुपरस्टार थे और हेमा ड्रीम गर्ल। पर्दे पर इनकी केमिस्ट्री जादू मानी जाती थी।

लेकिन पर्दे के पीछे जो चल रहा था वही असली कहानी थी। सेठ पर धर्मेंद्र अक्सर [संगीत] हेमा को खुश करने के छोटे-छोटे तरीके ढूंढते। कभी उन्हें चाय भेज देना, कभी कोई मजाक कर देना। और धीरे-धीरे यह मोहब्बत गहराती गई। लेकिन असली मुश्किल यह थी कि धर्मेंद्र शादीशुदा थे। दो बच्चों के पिता थे और पंजाब में उनकी पत्नी प्रकाश अकेली सब संभाल रही थी। यह रिश्ता फैसला मांग रहा था। एक तरफ परिवार दूसरी तरफ प्यार। धर्मेंद्र दो हिस्सों में बढ़ते जा रहे थे। हेमा ने कई बार खुद को रोकने की कोशिश की.

लेकिन दिल जिद्दी होता है और जब शोले की शूटिंग हुई तो यह रिश्ता और भी गहरा हो गया। रोमांटिक सीन के दौरान धर्मेंद्र जानबूझकर रिटेक लेते ताकि हेमा के साथ कुछ और वक्त बिताया जा सके। अब यह रिश्ता छुपाना मुश्किल होने लगा था। हेमा की मां जया चक्रवर्ती पूरी तरह खिलाफ थी। उन्होंने बेटी को समझाया कि यह रास्ता खतरे से भरा है, लेकिन प्यार तर्क नहीं सुनता। धर्मेंद्र ने भी मां को मनाने की कोशिश की।

एक बार तो फूलों की बड़ी टोकरी लेकर हेमा के घर पहुंचे सिर्फ यह दिखाने कि उनका इरादा साफ है। लेकिन मां का दिल नहीं पिघला। उधर पंजाब में प्रकाश कौर सब समझ चुकी थी। उन्होंने ना मीडिया में कुछ कहा, ना घर को छोड़ने की बात। वह चाहती थी कि परिवार टूटे नहीं और यहीं से धर्मेंद्र और हेमा की प्रेम कहानी में सबसे बड़ा तूफान आयाक्योंकि उस समय भारत में हिंदू विवाह अधिनियम यह साफ कहता था कि पहली पत्नी की अनुमति के बिना दूसरी शादीमुमकिन नहीं है।

यानी अगर धर्मेंद्र हेमा से निकाह करना चाहते, तो या तो उन्हें तलाक लेना पड़ता जो प्रकाश कौर किसी भी हाल में मानने को तैयार नहीं थी या फिर ऐसा रास्ता चुनना पड़ता जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। आखिरकार 1979 में धर्मेंद्र और हेमा ने वही कदम उठा लिया जिसने पूरे देश [संगीत] को हिला दिया। दोनों ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया। क्योंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहु विवाह की इजाजत होती है। धर्मेंद्र बने दिलावर खान और हेमा बनी आयशा भी। इस फैसले ने बॉलीवुड और मीडिया में भूचाल ला दिया।

हर अखबार, हर रेडियो, हर पत्रिका में बस एक ही सवाल, क्या धर्मेंद्र ने सिर्फ शादी के लिए धर्म बदला? क्या यह सही था या गलत? लेकिन दोनों ने इन सवालों का कोई जवाबl नहीं दिया। चुपचाप कुछ गिने-चुने लोगों की मौजूदगी में निकाह हो गया। ना कोई शोर ना कोई तमाशा बस एक नया रिश्ता जन्म ले चुका था।

हेमा ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया कि उनके लिए धर्म परिवर्तन कोई धार्मिक फैसला नहीं था बल्कि एक कानूनी औपचारिकता थी ताकि समाज और कानून उनके रिश्ते के बीच ना आए। उनके लिए सबसे बड़ा धर्म हमेशा प्यार ही रहा। लेकिन निकाह के बाद जिंदगी आसान नहीं हुई। दो परिवार दोनों अलग दिशाओं में खड़े थे। एक तरफ प्रकाश कौर और उनके बेटे सनी बॉबी और दूसरी ओर धर्मेंद्र और हेमा का नया घर। रिश्ता छिपाया नहीं जा सकता था पर संभालना भी बेहद मुश्किल हो गया था। धर्मेंद्र दोनों घरों के बीच लगातार झूलते रहे। कभी हेमा के साथ शूटिंग, तो कभी बेटों [संगीत] की स्कूल मीटिंग। मानो दो दुनिया एक ही इंसान पर भार बनकर बैठ गई हो।

हेमा और धर्मेंद्र की दो बेटियां ईशा और अहाना भी इसी जटिल माहौल में पली बढ़ी। हेमा चाहती थी कि बेटियां पिता के प्यार से वंचित ना रहे और दूसरी तरफ सनी बॉबी भी बचपन से अपने पिता को हीरो की तरह [संगीत] देखते आए थे। भावनाओं, नाराजगी, दूरी सब कुछ बीच-बीच में उभरता रहता था। मीडिया भी अक्सर यही पूछता रहता था। कौन सा घर असली है? लेकिन धर्मेंद्र हमेशा चुप रहे। उन्होंने कभी अपने घर को मीडिया की आग में नहीं झोंका। सिर्फ इतना कहते कि एक दिल दो परिवार [संगीत] भी संभाल सकता है। वक्त बीतता गया। रिश्तों की गांठें ढीली नहीं पड़ी।

करियर ढलान पर आने लगा। पहले कम फिल्में फिर सिर्फ खास रोल और धीरे-धीरे स्क्रीन [संगीत] से दूरियां बढ़ गई। दूसरी तरफ बेटों के करियर की जिम्मेदारियां बढ़ती गई। उन्हें लॉन्च करना, फिल्में सेट करना यह सब भी वह निभाते रहे। उम्र बढ़ने के साथ धर्मेंद्र ज्यादा समय बांद्रा वाले घर और अपने फार्म हाउस में बिताने लगे। खेती, पेड़-पौधे, जानवर इन सब में उन्हें सुकून मिलने लगा। फिल्मों से दूरी बढ़ी लेकिन परिवारों की दूरियां वहीं की वहीं रही। दोनों घरों की दुनिया हमेशा अलग-अलग रही। प्रकाश कौर और हेमा का आमने-सामने आना लगभग नामुमकिन था। इसी बीच उनकी संपत्ति को लेकर भी चर्चाएं शुरू हो गई। कौन सी प्रॉपर्टी किसके पास जाएगी? कौन सा घर, किस परिवार को।

रिपोर्टें कहने लगी कि उनके पास कई बंगले, प्रॉपर्टी, फार्म हाउस, बिजनेस और विजेता फिल्म्स का बड़ा साम्राज्य है। फिर आया साल 2025 और पूरी इंडस्ट्री हिल गई। 10 नवंबर को खबर आई कि धर्मेंद्र को ब्रच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। परिवार ने पहले कहा रूटीन चेकअप है। लेकिन बाहर खबरें फैलने लगी कि मामला गंभीर है। उन्हें में रखा गया है। इसी दौरान एक वीडियो वायरल हुआ। एक बुजुर्ग महिला को बेड पर बैठा दिखाया गया। लोग अंदाजा लगाने लगे कि शायद यह प्रकाश कौर है।

वीडियो कितना असली था कहना मुश्किल था लेकिन उसने सोशल मीडिया में आग लगा दी। मीडिया घर के बाहर जमा हो गई। प्राइवेसी खत्म हो गई। सनी देओल तक गुस्से में बाहर आकर बोले, अफवाहें फैलाना बंद करो। 11 नवंबर को कुछ पोर्टलों ने झूठी खबर [संगीत] चला दी कि धर्मेंद्र का निधन हो गया। देश भर में हड़कंप मच गया। लेकिन तुरंत बाद हेमा मालिनी सामने आई और इस खबर को पूरी तरह झूठा बताया। ईशा देओल ने भी सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि पापा ठीक हैं। परिवार ने फिर एक बड़ा फैसला लिया।

धर्मेंद्र को अस्पताल से डिस्चार्जकर घर शिफ्ट किया गया। घर को आईसीयू जैसा तैयार किया गया। नर्स, डॉक्टर, मशीनें सब वहीं यह फैसला इलाज के खिलाफ नहीं था बल्कि अफवाहों से दूरी बनाने के लिए था। धीरे-धीरे माहौल शांत होने लगा। धर्मेंद्र अब भी परिवार के बीच हैं। उम्र का असर तो है.

लेकिन लड़ने का जज्बा आज भी वही है। संघर्ष, विवाद, दो परिवारों का बोझ, करियर का उतार-चढ़ाव इन सब ने मिलकर धर्मेंद्र की जिंदगी को एक असली कहानी बना दिया।

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