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धर्मेंद्र के सगे भाई के साथ ऐसा होगा किसी ने सोचा भी नहीं था!

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दोस्तों, अभी ज्यादा समय नहीं बीता है। कुछ समय पहले की ही बात है जब धर्मेंद्र हमें और इस दुनिया को छोड़कर चले गए। लेकिन उनके कुछ किस्से, उनकी कुछ कहानियां ऐसी हैं जो हमारे दिलों में आज भी जिंदा हैं। हम आज इस वीडियो में आपको कुछ ऐसे किस्से सुनाने वाले हैं जो धर्मेंद्र की जिंदगी से जुड़े हुए हैं और उन किस्सों के बारे में मैं यकीन से कह सकता हूं कि कुछ किस्से ऐसे होंगे जो आपने आज तक नहीं सुने होंगे जिनके बारे में आज आप इस वीडियो में जानेंगे। आइए शुरू करते हैं धर्मेंद्र और उनसे जुड़े हुए बचपन और जवानी के किस्से। दोस्तों धर्मेंद्र की अक्सर कुछ वीडियोस वायरल हुआ करती थी जिनमें वह अपने खेत में काम करते हुए नजर आया करते थे। यह खेत में काम करना कोई दिखावा नहीं था बल्कि यह उनका जुड़ाव था उनके बचपन से क्योंकि धर्मेंद्र जी की जड़े इन्हीं खेतों से जुड़ी हुई हैं।

इनके बचपन और जवानी की शुरुआती दिनों का खेतों से बड़ा गहरा संबंध है। इन बातों को और गहराई से समझने के लिए आइए एक नजर डालते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ खास पहलुओं पर जो कि बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणादायक है। दोस्तों धर्मेंद्र सिंह देओल यानी सुपरस्टार धर्मेंद्र ही मैन का जन्म 8 दिसंबर 1945 को पंजाब के नर्सरी गांव में हुआ था जो कि लुधियाना जिले में पड़ता है। उनके पिताजी केवल किशन सिंह देओल पेशे से एक अध्यापक थे और उनका तबादला समय-समय पर अलग-अलग जगहों पर होता रहता था। लेकिन एक बार वह साइन वाला गांव पहुंचे और वहां पर उनका मन लग गया और इसके बाद वह वहीं के होकर रह गए। दोस्तों धर्मेंद्र जी को भी इसी गांव के नाम से पहचाना जाता है क्योंकि धर्मेंद्र ने अपनी बचपन से लेकर जवानी तक का समय इसी गांव में बिताया था। दोस्तों धर्मेंद्र के बचपन की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनका मन पढ़ाई लिखाई में नहीं लगता था। ऊपर से उनके पिताजी उसी स्कूल में शिक्षक थे जिस स्कूल में धर्मेंद्र पढ़ा करते थे। वह अक्सर अपनी मां से आकर कहा करते थे कि पिताजी को बोलो कि किसी और स्कूल में पढ़ाएं या फिर मेरा दाखिला किसी और स्कूल में करा दो।

इसके पीछे का कारण था कि स्कूल में पिताजी का ध्यान हमेशा धर्मेंद्र पर लगा रहता था कि धर्मेंद्र ठीक से पढ़ाई कर रहे हैं या नहीं। कहीं अपने दोस्तों के साथ मस्ती में तो बिजी नहीं हो गए हैं। हमेशा उनका ध्यान धर्मेंद्र पर ही लगा रहता था। धर्मेंद्र जी की मां का नाम है सतवंत कौर। बचपन में ही धर्मेंद्र जी ने वह दर्द सहा था जो उस समय भारत के लिए सबसे बड़ा दर्द था और वह था बंटवारे का दर्द। उस दौरान धर्मेंद्र जी ने अपने कई सारे शिक्षकों को और कई सारे दोस्तों को खो दिया क्योंकि वह भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे। धर्मेंद्र ने अपने पिताजी के स्कूल से आठवीं तक की पढ़ाई पूरी की और उसके आगे की पढ़ाई करने के लिए वह अपनी बुआ के गांव में जाकर रहने लगे। फगवाड़ा में स्थित इस गांव में रामगढ़ी कॉलेज से मैट्रिक यानी हाई स्कूल करने के बाद वह एक रेलवे स्टेशन पर क्लर्क की जॉब करने लगे। धर्मेंद्र की फिल्मों के प्रति गजब की दीवानगी थी। किशोरावस्था में फिल्में देखने के लिए बहुत दूर-दूर तक निकल जाया करते थे। फिल्मों के प्रति अपनी दीवानगी को लेकर उन्होंने एक बड़ी मजेदार घटना बताई हुई है। एक बार धर्मेंद्र कोई फिल्म देखने अपनी बुआ के घर फगवाड़ा से दूर जालंधर में एक सिनेमा हॉल में गए। जहां वह हमेशा जाया करते थे क्योंकि वहीं सिनेमा हॉल सबसे नजदीक था और समय पर पहुंचने के लिए बस की सुविधा भी थी। बस निकलने का समय ऐसा था कि फिल्म खत्म होने से पहले ही उन्हें निकलना पड़ता था।

एक बार आधी अधूरी फिल्म देखने के बाद बस का समय हो गया और धर्मेंद्र को उस फिल्म को छोड़कर बस के पास जाना पड़ा। जब वह बस स्टैंड पहुंचे तो उनके गांव की आखिरी बस निकलने वाली थी और बस कंडक्टर उनके गांव की सवारी बिाने के बाद अब अगले गांव की सवारी बिठा रहा था और उन्हें जगह नहीं मिल पाई। ऐसे में धर्मेंद्र ने एक पैतरा आजमाया। उन्होंने पीछे से सीढ़ियों के सहारे छत पर चढ़ने का फैसला किया और छत पर जाकर बैठ गए। जब उनका गांव आया तो वहां पर वह उतरे और तब बस कंडक्टर ने उन्हें देखा और गालियां देना शुरू कर दिया। ऐसे में धर्मेंद्र ने भी अपना आपा खो दिया और बस कंडक्टर को गालियां देने लगे। बस कंडक्टर को गुस्सा आया और वह दौड़कर धर्मेंद्र को पकड़ना चाहता था। लेकिन धर्मेंद्र उसी दौरान 9 दो 11 हो लिए। धर्मेंद्र भागने के लिए पहले से ही तैयार थे और वह इतनी तेज भागे कि सीधा अपने घर पर जाकर ही रुके। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सुरैया और श्याम अभिनीत 1949 की फिल्म दिलगी को करीब 40 बार देखा था और ऐसे ही फिल्में देखते-देखते और मस्ती करते-करते ना जाने कब उनके मन में हीरो बनने का ख्याल आ गया। उन्होंने अपने मन की बात अपनी मां से भी बताई थी। लेकिन उनकी मां उन्हें बार-बार यही समझाती थी कि अगर तुम्हारे पिताजी को पता चल गया तो वह तुम्हें बहुत पीटेंगे और उनकी मां आगे यह भी कहा करती थी कि तू इतना सुंदर भी नहीं है कि हीरो बन जाए।

बहरहाल वक्त गुजरता रहा। धर्मेंद्र रेलवे की नौकरी करते रहे और 19 साल की उम्र में साल 1954 में उनकी शादी प्रकाश कौर जी से हो गई। अपने सपनों को अपने सीने में दबाकर वह खेतों में काम किया करते थे। वह रेलवे की नौकरी किया करते थे। लेकिन उनके दिल में दिन रात बस एक ही बात खटकती रहती थी कि उन्हें हीरो बनना है और वह उसके लिए प्रयास करना चाहते थे। वह अक्सर शाहीनवाल स्टेशन पर बैठकर बंबई जाने वाली ट्रेन को देखा करते थे और खुद भी सपना संजोते थे कि एक दिन मैं भी इसी ट्रेन से बंबई जाऊंगा। इसी दौरान उन्होंने दिलीप कुमार साहब की बहुत सारी फिल्में देखी और अक्सर वह अपने घर में आईने के सामने दिलीप कुमार जी की तरह अपने बालों को अपने माथे पर लाकर और स्टाइल मारा करते थे। 1958 के आसपास की बात है। एक बार फिर धर्मेंद्र ने अपनी मां से कहा कि मुझे हीरो बनना है। मुझे बंबई जाना है। इस पर उनकी मां ने एक मासूम सा सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि तू फिल्म वालों को अपनी अर्ज़ क्यों नहीं लिखकर देता? अगर उन्हें तेरी अर्जी पसंद आ जाती है तो वह तुझे बुला लेंगे और अगर वह बुलाते हैं तो तेरे पिताजी भी मना नहीं कर पाएंगे। धर्मेंद्र को अपनी मां का यह सुझाव काफी ज्यादा पसंद आया। लेकिन उनके मन में एक ख्याल और एक सवाल आ गया कि अगर वह पत्र लिखते भी हैं तो वह किसे लिखेंगे? यही सोचते-सचते एक लंबा समय बीत गया। लेकिन इसे मां की दुआएं कहिए या फिर संयोग। दरअसल, अखबार में उन दिनों फिल्म फेयर मैगजीीन में एक टैलेंट हंट शो के बारे में छपा था। जिसमें दो बड़े नाम थे। एक तो विमल राय और दूसरे गुरुदत्त। बस फिर क्या था? धर्मेंद्र ने उस विज्ञापन के मुताबिक तस्वीरें खिंचवाई। अपना रंग, अपनी ऊंचाई और अपने बारे में सब कुछ एक पत्र में लिखकर उस पते पर भेज दिया जो पता वहां लिखा हुआ था। ऐसा लगा मानो वह विज्ञापन उनकी किस्मत ने उनके लिए छपवाया हो। और फिर क्या था। जब उनकी तस्वीरें और उनके डिटेल्स डायरेक्टर्स के पास पहुंचे तो उन्हें बुलावा आ गया और पिताजी से भी उन्हें परमिशन मिल गई। फिर क्या था? धर्मेंद्र अपनी पत्नी और बच्चों को अपने माता-पिता के पास छोड़कर उसी ट्रेन से बंबई की ओर रवाना हो गए। बंबई पहुंचकर वह सबसे मिले और सब ने उन्हें पसंद भी कर लिया। उन्हें बंदिनी फिल्म के लिए साइन भी कर लिया गया। लेकिन इस फिल्म को बनने में अभी काफी समय था और तब तक उन्हें काम तलाशना ही था। फिर क्या था? उनका असली संघर्ष शुरू हो गया। धर्मेंद्र ने खुद अपने इंटरव्यू में बताया था कि उनका वह एक साल काफी ज्यादा कठिन गुजरा था। उन्होंने जूहू के पास एक कमरा लिया था और रोज लोगों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया था। इस संघर्ष में उनके साथ थे हरिशन गिरी गोस्वामी जिन्हें हम महान एक्टर मनोज कुमार के नाम से जानते हैं। लेकिन संघर्ष की यह राह इतनी ज्यादा आसान नहीं थी। कभी-कभी तो भूखे रहने की भी नौबत आ जाती और उनका वजन तेजी से गिरने लगा था। एक बार तो वह इतने ज्यादा भूखे थे कि उन्होंने पाचन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली इस गोल की पूरी की पूरी डब्बी ही खा ली। इसके बाद उन्हें फौरन डॉक्टर के पास ले जाया गया और डॉक्टर ने जब उनका चेकअप किया तो बताया कि इन्हें मेडिसिन की नहीं बल्कि खाने की जरूरत है। इन्हें भर पेट खाना खिलाइए। धर्मेंद्र धीरे-धीरे हिम्मत हारने लगे और उन्होंने अब मन बनाना शुरू कर दिया। गांव डॉट नेका लेकिन उनके दोस्तों ने उन्हें बार-बार समझाया कि कुछ दिन और देख लो शायद काम मिल जाए। दोस्तों ने बताया कि अर्जुन हिंगोरानी एक फिल्म बनाने वाले हैं। शायद उस फिल्म में तुम्हें कुछ काम मिल जाए। धर्मेंद्र को भी हिंंगो रानी पे काफी भरोसा था क्योंकि वह उसी टाइम से उन्हें पसंद करते थे जब वह पंजाब से बंबई आए थे और जब वह हिंगो रानी जी से मिले तो उन्हें एक फिल्म के लिए साइन भी कर लिया गया। इस फिल्म का नाम था दिल भी तेरा हम भी तेरे। इस फिल्म में उनके साथ थी उस जमाने की सबसे मशहूर अभिनेत्री कुमकुम और यह फिल्म 1960 में रिलीज़ हुई थी। हालांकि यह फिल्म ज्यादा चल नहीं पाई लेकिन इस फिल्म के बाद उनका हौसला जरूर बढ़ गया था क्योंकि उन्होंने अपना पहला काम कर लिया था। संघर्ष तो अब भी करना ही था लेकिन पहले काम पाने का संघर्ष था और अब अच्छा काम पाने का संघर्ष। इसके बाद उनकी कुछ और एक फिल्में आई जिनमें विमल राय की बंदनी भी शामिल थी। कुछ फिल्में चली और कुछ फिल्में नहीं चली। हालांकि इस दौर की बहुत सी फिल्में ऐसी भी हैं जिनमें धर्मेंद्र जी ने उम्दा एक्टिंग की है और इन फिल्मों में इनकी एक्टिंग को आज भी याद किया जाता है। जैसे अनपढ़, बंदिनी, पूजा के फूल, अनुपमा और बहारें फिर भी आएंगी जैसी फिल्में। जिस फिल्म ने धर्मेंद्र जी के करियर को एक जबरदस्त उछाल दिया था, एक जबरदस्त मोड़ दिया था, वह फिल्म थी फूल और पत्थर। इस फिल्म ने धर्मेंद्र जी की छवि को रोमांटिक हीरो से निकालकर एक एक्शन हीरो वाला बना दिया था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान का एक बहुत जबरदस्त किस्सा है जिसमें धर्मेंद्र जी फिल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर ही थोड़ी सी झपकियां ले रहे थे। ऐसे में डायरेक्टर की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने धर्मेंद्र जी से कह दिया कि पता नहीं कहां-कहां से पियक्काड़ आ जाते हैं फिल्म का हीरो बनने के लिए। जबकि धर्मेंद्र ने उस वक्त शराब नहीं पी थी। इस बात से धर्मेंद्र काफी ज्यादा नाराज और परेशान हो गए थे और इस गुस्से में उन्होंने पूरी रात शराब पी थी और इसके बाद तो उन्हें इसकी आदत ही लग गई थी लेकिन स्वास्थ्य के प्रति वह बहुत ज्यादा जागरूक थे। धीरे-धीरे अपने दृढ़ निश्चय और परिवार की मदद से वह इस शराब की लत से बाहर भी आ गए। इसके बाद वह दौर भी आया जब धर्मेंद्र जी की एक के बाद एक बहुत सारी फिल्में सफल हुई। उनकी सफल फिल्मों की लिस्ट इतनी ज्यादा लंबी है कि इस एक वीडियो में उन सभी फिल्मों का नाम ले पाना बड़ा ही मुश्किल है। धर्मेंद्र जी ने हर तरह के किरदार किए। शुरुआत में रोमांटिक इसके बाद एक्शन और आई मिलन की बेला फिल्म में उन्होंने एक ग्रे शेड का किरदार भी किया था। हालांकि यह रोल पूरी तरह से नेगेटिव नहीं था। लेकिन यह उनकी छवि से एक अलग रोल था। फिल्म शोले में सबसे बड़ा रोल धर्मेंद्र का ही था। हालांकि यह बात भी अलग है कि इस फिल्म से सभी को बहुत ज्यादा फायदा हुआ। धर्मेंद्र जी ने कुल 300 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है। धर्मेंद्र जी ने अपने दौर की बहुत बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों के साथ भी काम किया और हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने काफी ज्यादा पसंद भी किया और आगे चलकर पर्दे की यह सफल जोड़ी असल जीवन में भी एक सफल जोड़ी बनी। इन दोनों की शादी कैसे हुई और क्या-क्या मुसीबतों का सामना करना पड़ा इस पर हमने एक वीडियो बनाई है। आप चाहे तो उस वीडियो को भी देख सकते हैं।

धर्मेंद्र जी फिल्मों के साथ-साथ राजनीति में भी सफल रहे थे। धर्मेंद्र के एक फुफेरे भाई भी थे जिनका नाम वीरेंद्र सिंह था। वह भी फिल्मों से जुड़े हुए थे। पंजाब में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान आतंकवादियों से मुठभेड़ में उनकी जान चली गई थी। वह आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गए थे। धर्मेंद्र ने दो शादियां की। पहली पत्नी प्रकाश कौर से उन्हें चार बच्चे हैं। दो बेटों से तो आप परिचित ही हैं। बड़ा बेटा अजय सिंह देओल यानी सनी देओल और छोटा बेटा विजय सिंह देओल यानी बॉबी देओल। प्रकाश कौर से उन्हें दो बेटियां भी थी। अजीता और विजेता। इन दोनों का फिल्मों से कोई लेना देना नहीं है। दोस्तों हेमा मालिनी से भी इनकी दो बेटियां हैं। ईशा देओल और अहाना देओल। आपको धर्मेंद्र कैसे लगते हैं? हमें कमेंट्स में जरूर बताइएगा। साथ ही साथ अगर यह वीडियो आपको पसंद आई हो तो इसे लाइक करिएगा और अगर आपको धर्मेंद्र पर फिल्माया कोई गाना या उनकी कोई फिल्म पसंद हो तो वह भी कमेंट में लिखना बिल्कुल मत भूलिएगा। वीडियो में अब तक बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

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