तो देश में बढ़ती महंगाई और चीनी की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। भारत सरकार ने बुधवार को तत्काल प्रभाव से चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है।
सरकार का यह फैसला घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने की कीमतों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से लिया गया है। यह प्रतिबंध 30 सितंबर तक या अगले आदेश जारी होने तक लागू रहेंगे। सरकार के इस कदम का असर ना सिर्फ भारतीय बाजार पर पड़ेगा बल्कि वैश्विक चीनी बाजार में भी हलचल देखने को मिल सकती है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विदेश व्यापार महानिदेशालय यानी डीजीएफटी की ओर से इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई है।
अधिसूचना के मुताबिक यह प्रतिबंध कच्ची चीनी, सफेद चीनी और परिष्कृत चीनी यानी रिफाइंड शुगर पर लागू होगा। सरकार ने चीन की निर्यात नीति में बदलाव करते हुए इसे निषिद्ध श्रेणी में डाल दिया है। जिसका मतलब अब यह है कि अब सामान्य परिस्थितियों में भारत से चीनी का निर्यात नहीं किया जा सकता है। हालांकि सरकार ने कुछ देशों के लिए छूट भी दी है।
अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यूरोपीय संघ और अमेरिका को टेरिफ दर कोटा और विशेष व्यवस्थाओं के तहत होने वाली चीनी निर्यात पर यह प्रतिबंध लागू नहीं होगा। यानी पहले से तय विषय समझौते और कोटा व्यवस्था के अंतर्गत इन देशों को सीमित मात्रा में चीनी भेजी जा सकेगी। सरकार का यह फैसला [संगीत] ऐसे समय पर आया है जब देश में चीनी उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। लगातार दूसरे साल चीनी उत्पादन खपत में कम रहने की आशंका जताई जा रही है। अब प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में इस बार गन्ने की पैदावार कमजोर रही है।
इसके अलावा अलनीनो जैसी मौसमी परिस्थितियों के कारण मानसून प्रभावित होने की संभावना भी जताई जा रही है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहा तो अगले सीजन में गन्ने का उत्पादन और घट सकता है। यही वजह है कि सरकार अभी से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करना चाहती है। अब मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो भारत सरकार के इस कदम का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी देखने को मिला है। प्रतिबंध की घोषणा के बाद न्यूयॉर्क में कच्ची चीनी के वायदा भाव में 2% से अधिक की तेजी दर्ज की गई है।
जबकि लंदन में सफेद चीनी के वायदा भाव करीब 3% तक उछल गए। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है और इसके निर्यात पर रोक लगाने से वैश्विक बाजार में आपूर्ति प्रभावित होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में और तेजी आने की संभावना भी बढ़ गई है। अब भारत के इस फैसले से ब्राजील और थाईलैंड जैसे बड़े चीनी उत्पादक देशों को फायदा हो सकता है।
माना जा रहा है कि अब एशियाई और अफ्रीकी देशों के खरीदार इन देशों की ओर रुख कर सकते हैं। इससे ब्राजील और थाईलैंड को अतिरिक्त निर्यात के अवसर मिलने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की मजबूत मौजूदगी के कारण उसके फैसले का सीधा असर वैश्विक व्यापार पर पड़ता है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने इससे पहले चीनी मिलों को 1.59 मिलियन टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। व्यापारियों और निर्यातकों ने इस कोटे के तहत लगभग 8 लाख टन चीनी के निर्यात अनुबंध भी कर लिए थे। इनमें से 6 लाख टन से ज्यादा चीनी पहले ही विदेश भेजी जा चुकी है। लेकिन अब सरकार द्वारा अचानक प्रतिबंध लगाए जाने के बाद निर्यातकों और व्यापारों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। कई कंपनियों को अपने मौजूदा अनुबंध पूरे करने में परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है।
हालांकि सरकार ने उन शिपमेंट्स को कुछ शर्तों के साथ अनुमति देने की बात कही है जो पहले से निर्यात प्रक्रिया में शामिल थे। अब अधिसूचना की माने तो यदि आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित होने से पहले चीनी की लोडिंग शुरू हो चुकी थी तो ऐसी खेपों की [संगीत] निर्यात को अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा यदि शिपिंग बिल पहले ही दाखिल किया जा चुका है और जहाज भारतीय बंदरगाह पर पहुंच चुका था तब भी निर्यात जारी रह सकेगा। वहीं यदि चीनी की अधिसूचना जारी होने से पहले सीमा शुल्क विभाग या संरक्षक के हवाले कर दिया गया था तो ऐसी खेपों को भी यहां मंजूरी दी जाएगी।
अब मुंबई के एक चीनी व्यापारी ने बताया कि फरवरी में सरकार द्वारा अतिरिक्त निर्यात कोटा दिए जाने के बाद व्यापारियों ने बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से समझौते किए। लेकिन अब अचानक प्रतिबंध लगने से इन ऑर्डर्स को पूरा करने में मुश्किल होगी। इससे व्यापारियों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। कई निर्यातकों का कहना है कि उन्हें पहले से तय अनुबंधों को पूरा करने के लिए अधिक समय या विशेष अनुमति दी जानी चाहिए।
अब विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह कदम घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। पिछले कुछ महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसे में यदि चीनी का निर्यात जारी रहता है तो घरेलू बाजार में इसकी कमी हो सकती है और कीमतें तेजी से बढ़ भी सकती थी। सरकार नहीं चाहती है कि त्योहारों के मौसम से पहले चीनी महंगी हो जाए क्योंकि इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं और खाद्य उद्योग पर पड़ता है। अब भारत में चीनी सिर्फ घरेलू खपत के लिए महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि लाखों किसानों और चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था भी इसी से जुड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने की खेती पर निर्भर है।ऐसे में सरकार को एक तरफ किसानों और मिलों के हितों को ध्यान में रखना होता है। वहीं दूसरी तरफ आम जनता को महंगाई से राहत देना भी यहां बेहद जरूरी है। फिलहाल सरकार के इस फैसले से ही घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने में मदद जरूर मिलने की उम्मीद है।
हालांकि आने वाले महीनों में मानसून और गन्ने के उत्पादन की स्थिति पर काफी कुछ निर्भर करेगा। यदि मौसम अनुकूल रहा और उत्पादन बेहतर हुआ तो सरकार भविष्य में निर्यात नीति पर दोबारा विचार कर सकती है। फिलहाल देश में चीन की कीमतों को स्थिर रखने और आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए यह प्रतिबंध एक अहम कदम माना जा रहा है।