आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बशीर बद्र की किस तरह की केमिस्ट्री रही थी? क्यों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में बशीर बद्र के शेर को पढ़ा था? और किस शेर को पढ़ा था? पूरे देश में इसकी चर्चा अब हो रही है। जुल्फिकार भुट्टो इंदिरा गांधी का भी बताया जा रहा है कि बशीर बद्र से कनेक्शन था।
बशीर बद्र का जिक्र हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 91 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया और एक कहते हैं कि शायर की दुनिया में गमगीन माहौल है। नमस्कार आप देख रहे हैं न्यूज़ 18 का डिजिटल प्लेटफार्म। मैं हूं आपके साथ श्रुति श्रीवास्तव।
उर्दू अदब के आसमान का एक चमकदार सितारा हमेशा के लिए बुझ गया है। अपनी मखमली आवाज और बेहद आसान लफ्जों में जिंदगी का फलसफा बयां करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 साल की उम्र में निधन हो गया। बद साहब के चले जाने से ना सिर्फ साहित्य जगत में शोक की लहर है बल्कि देश के राजनीतिक गलियारे भी मायूस हैं। जहां उनके शेरों का इस्तेमाल पक्ष विपक्ष अपनी बातों को धार देने के लिए बरसों से करते आ रहे हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2018 में उनका एक शेर पढ़ा था। तो जानते हैं कि क्या कुछ है विस्तार से।
शायरी की दुनिया में अपनी सादगी और सीधे दिल में उतर जाने वाले लहजे के लिए मशहूर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। वे पिछले काफी लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उनके निधन की खबर आते ही पूरे देश के साहित्य प्रेमियों और प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई। बशीर बद्र साहब साहब ने उर्दू गजल को एक नया और बेहद सहज मिजाज दिया था। यही वजह थी कि उनकी लिखी लाइनें सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रही बल्कि देश की संसद से लेकर चाय की टपरियों तक हर आम और खास की जुबान पर गूंजती थी।
उनके इस दुनिया से जाने पर आज इस ऐतिहासिक वाक्य की चर्चा पूरे देश में दोबारा तेज हो गई है। जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के भीतर उनके एक मशहूर शेर को पढ़कर पूरे देश में सनसनी मचा दी थी। बशीर बदर साहब के जाने के इस गमगीन मौके पर हर किसी को साल 2018 को वो वाक्या याद आ रहा है जब लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन कांग्रेस नेता मलिकार्जुन खड़गी के बीच मशहूर शायर बशीर बद्री की शायरी को लेकर देखने को मिला था।
मौका था फरवरी 2018 राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लाए गए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का। 6 फरवरी को कांग्रेस की तरफ से मलिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर तीखा हमला बोला था। जिसका जवाब देने के लिए 7 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद सदन के सामने उपस्थित थे। चर्चा के पहले दिन यानी कि 6 फरवरी 2018 को कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़े ने मोदी सरकार की नीतियों पर कड़ा प्रहार किया था।
अपने भाषण के दरमियान भविष्य में राजनीतिक रिश्तों की संभावना और शालीनता का हवाला देते हुए उन्होंने बशीर बद्र का यह मशहूर शेर पढ़ा। दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा ना हो। अगले दिन बुधवार 7 फरवरी 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देना शुरू किया। उन्होंने खड़गे के भाषण का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए उन पर तंज कसा। पीएम मोदी ने कहा कि खड़गे जी ने बशीर बद्र की शायरी तो पढ़ी लेकिन अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उसके बाद की महत्वपूर्ण लाइनों को छोड़ दिया।
उसके बाद पीएम मोदी ने बशीर बद्र का ही एक और शेर पढ़कर विपक्ष की मंशा पर निशाना साधा। जी बहुत चाहता है सच बोले क्या करें हौसला नहीं होता। पीएम का यह अंदाज देखकर पूरी संसद ठहाकों से गूंज उठी थी और बद्र साहब का यह शेर रातोंरात पूरे देश में ट्रेंड करने लगा था। जिस समय यह ऐतिहासिक बहस चल रही थी, उस समय सदन का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के तत्कालीन घटक दल तेलुगु देशम पार्टी के सदस्य आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने की मांग को लेकर भारी नारे नारेबाजी कर रहे थे।
वे सदन के व्हेल में पहुंच चुके थे। जिसके कारण भारी शोरशराबे के बीच ही दोनों नेताओं को अपनी बात रखनी पड़ी थी। बशीर बद्र साहब की इसी गजल का इतिहास भारत और पाकिस्तान के कूटनीतिक रिश्तों से भी बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। बात साल 1972 के शिनवा समझौते की जब भारतपाक युद्ध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रीय पति जुल्फिकार अली भुट्टू के बीच वार्ता चल रही थी। तनाव बेहद चरम पर था और बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही थी। तब माहौल की गंभीरता को कम करने और भविष्य में शांति की उम्मीद जगाने के लिए भुट्टो ने इंदिरा गांधी के सामने यही शेर पढ़ा था कि दुश्मनी जमकर करो लेकिन यह गुंजाइश रहे।
डॉ. बशीर बद्र पिछले कई सालों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। बढ़ती उम्र और लंबी बीमारी के कारण वे सार्वजनिक जीवन और मुशायरों से पूरी तरह दूर हो गए थे। लेकिन सोशल मीडिया और किताबों के जरिए उनकी शायरी लगातार लोगों के दिलों को छूती रही। उनके निधन की खबर मिलते ही साहित्यकारों, कवियों और राजनेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया। लोगों का कहना है कि बशीर बद्र साहब का जाना उर्दू शायरी के एक सुनहरे युग का अंत है जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती। 15 फरवरी 1935 को जन्मे डॉ. बशीर बद्र का असली नाम सैयद मोहम्मद बशीर था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और बाद में मेरठ कॉलेज में प्रोफेसर भी रहे।
बद साहब को उनकी बेमिसाल शायरी के लिए साल 1999 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें उनके कविता संग्रह आज के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था।
बद्र साहब आज भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका लिखा गया शेर हमेशा अमर रहेगा। उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।