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मछलियां अंतरिक्ष में,इंसानों को दे गई ये वोर्निंग।

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मछलियां पानी में रहती हैं। लेकिन यह मछलियां गई थी स्पेस में। क्यों गई थी और फिर उन्होंने ह्यूमनबीइंग्स के लिए वार्निंग क्या दे दी? आज बात इसी पर। नासा ने एक बार बेबी जेलीफिशेसको स्पेस भेजा था।

सुनने में यह बहुत अजीब सा लगता है। लेकिन इसके पीछे है एक सीरियससाइंटिफिक एक्सपेरिमेंट। साइंटिस्ट यह समझना चाहते थे कि अगर कोई लिविंग ऑर्गेनिज्म ग्रेविटी के बिना ग्रो कर जाए तो उसका डेवलपमेंट कैसे बदलता है। यह एक्सपेरिमेंट 1991 में नासा के एसटीएस40 मिशन के दौरान हुआ था।

स्पेस शटल कोलंबिया के साथ थाउजेंड्स एंड थाउजेंड्स ऑफ जेली फिश पोलप्स को ऑर्बिट में भेजा [संगीत] गया था। इसका मेन पर्पस था माइक्रोग्रेविटी का लिविंग क्रिएचर्स पर इफेक्ट स्टडी करना।

अब सवाल यह है कि जेलीफिशेस को ही क्यों भेजा गया? क्योंकि जेलीफिश में ग्रेविटी सेंसिंग सिस्टम होता है जो उन्हें बताता है कि ऊपर क्या है और नीचे क्या है।

ह्यूमंस में भी ऐसा ही सिमिलरएक बैलेंस सिस्टम होता है जो मेनली इनर इयर यानी अंदरूनी कान में काम करता है। [संगीत] इसीलिए साइंटिस्ट ने जेलीफिश को एक मॉडल ऑर्गेनिज्म की तरह यूज किया। साइंटिस्ट यह समझना चाहते थे कि स्पेस में ग्रोथ कैसे होतीहै और स्पेस में ग्रोथ अफेक्ट होती है या नहीं।

जब जेलीफिश स्पेस में ग्रो कर रही थी तब वो माइक्रो ग्रेविटी एनवायरमेंट में डेवलप हुई। मिशन के बाद जब उन्हें धरती पर वापस लाया गया तो रिसर्चर्स ने देखा कि कई जेली फिशेस को प्रॉपर्ली तैरने में प्रॉब्लम हो रही थी। उनके पल्सिंग बिहेवियर में भी एब्नॉर्मलिटीज देखी गई। इससे यह आईडिया मिला कि ग्रेविटी के बिना अगर डेवलपमेंट होती है तो वो नॉर्मल नहीं रहती। अब सबसे जरूरी पॉइंट यह है कि साइंटिस्ट ने यह कभी नहीं कहा कि ह्यूमन बेबीज डेफिनेटली धरती पर एडजस्ट नहीं कर पाएंगे। लेकिन उन्होंने यह जरूर माना कि माइक्रो ग्रेविटी बैलेंस और ओरिएंटेशन सिस्टम को डिस्टर्ब कर सकती है। अगर फ्यूचर में कोई ह्यूमन बेबी स्पेस में पैदा हो या ग्रोकरे तो उसे धरती की ग्रेविटी के साथ एडजस्ट करने में मुश्किल जरूर हो सकती है।

यानी यह एक डायरेक्ट प्रूफ नहीं था लेकिन श्योर शॉट वार्निंग सिग्नल जरूर था। यह एक्सपेरिमेंट हमें दिखाता कि ग्रेविटी सिर्फ हमें जमीन पर नहीं रखती बल्कि डेवलपमेंट में भी बड़ा रोल निभाती है। जिंदगी को शेप करने में ग्रेविटीकितनी जरूरी है यह जेलीफिश एक्सपेरिमेंट से साफ हुआ।

इसीलिए साइंटिस्ट फ्यूचर स्पेस मिशनंस और ह्यूमन [संगीत] सेटलमेंट को लेकर ऐसे एक्सपेरिमेंट्स अक्सर करते रहते हैं। अगर शॉर्ट में समझें तो नासा ने बेबी जेलीफिशेस को स्पेस में इसलिएभेजा था ताकि ग्रेविटी के बिना जिंदगी कैसे डेवलप करती है।

यह समझा जा सके। और इस छोटे से एक्सपेरिमेंट ने ह्यूमन स्पेस फ्यूचरको लेकर एक बहुत बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि ह्यूमन कॉलोनीज बनाने से पहलेक्या इंसान वहां पैदा हो पाएंगे और अगर हो गए तो क्या वापस धरतीपर लौट कर ईजीली मैनेज कर पाएंगे या एडजस्ट

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