हिंदी सिनेमा के पुराने दौर की कई ऐसी कलाकार हैं जिन्होंने फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं भले ही कम निभाई हो लेकिन अपने सहज अभिनय से दर्शकों के दिल में खास जगह बनाई। सुधा चोपड़ा भी ऐसे ही वरिष्ठ अभिनेत्री हैं। जिन्होंने हिंदी और पंजाबी फिल्मों के साथ-साथ रंगमंच, दूरदर्शन और टेलीविजन के क्षेत्र में भी काम किया। उनकी खासियत यह थी कि वह केवल अभिनेत्री ही नहीं थी बल्कि एक प्रशिक्षित रंगमंच कलाकार, टेलीविजन के निर्माता, निर्देशक और कार्यक्रम बनाने वाली रचनात्मक शख्सियत भी रही है। लेकिन आज की हमारी इस वीडियो में हम आपको इनके बारे में तो बताएंगे ही। साथ ही उनके परिवार के बारे में भी बताएंगे। तो आज बात इस गुमनाम अभिनेत्री के बारे में। लेकिन वीडियो शुरू होने से पहले आपको याद दिला दें अगर आप हमारे चैनल पर नए हैं तो चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें। सुधा चोपड़ा के जन्म की तारीख उपलब्ध फिल्मी रिकॉर्ड में 20 सितंबर 1936 बताई गई है। सुधा चोपड़ा की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दिल्ली में बीता। जहां उन्होंने पेशेवर थिएटर किया। रंगमंच ने उनके अभिनय को मजबूत आधार बना दिया। फिल्मों में आने से पहले ही वह अभिनय और मंचय प्रस्तुतियों से जुड़ चुकी थी। यही कारण है कि बाद में जब उन्होंने कैमरे के सामने काम किया तो छोटे और सहायक किरदारों में भी उनके अभिनय में स्वाभाविकता दिखाई दी। दूरदर्शन से जुड़ाव सुधा चोपड़ा की जिंदगी का शायद सबसे महत्वपूर्ण और कम चर्चित हिस्सा उनका दूरदर्शन से जुड़ाव है। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उन्होंने 1965 में दूरदर्शन जॉइ किया था। उस समय टेलीविजन का स्वरूप आज जैसा बड़ा और व्यवसायिक नहीं था। कार्यक्रम बनाने वाली टीम को एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती थी। सुधा चोपड़ा ने बताया कि उन दिनों निर्माता, निर्देशक, कार्यक्रम की योजना बनाने वाला व्यक्ति और प्रतिभाओं को तलाशने वाला व्यक्ति कई बार एक ही टीम का हिस्सा होता था। उन्होंने लगभग 10 वर्ष दिल्ली में काम किया और बाद में करीब 10 वर्ष पुणे और मुंबई के बीच काम करने का उल्लेख किया। दूरदर्शन के इसी दौर में उनकी मुलाकात और पेशेवर दोस्ती कई कलाकारों से हुई।
इनमें अभिनेता फारुख शेख भी शामिल थे। फारुख शेख के साथ उनका संबंध केवल फिल्मों तक सीमित नहीं था। 1970 के दशक में मुंबई दूरदर्शन पर फारुख शेख एक कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी और सुधा चोपड़ा उस कार्यक्रम के निर्माण से जुड़ी थी। उन्होंने बाद में फारुख शेख को याद करते हुए उनके काम और व्यक्तित्व के बारे में बात की थी। फिल्मों में प्रवेश। सुधा चोपड़ा ने फिल्मों में अपेक्षाकृत बाद में कदम रखा। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने स्वयं बताया था कि उनकी पहली फिल्म गुलजार की वीरा थी। इसके बाद उन्होंने ए भीमसेन की घरौदा और दूरियां जैसी फिल्मों में काम किया। कुछ रिकॉर्ड 1977 की पंजाबी फिल्म साल सोलवन चाडिया को उनकी शुरुआती फिल्म बताती है। जबकि उनके पुराने इंटरव्यू में उन्होंने मीरा को अपनी पहली फिल्म कहा था। इसीलिए उनकी फिल्मी शुरुआत लिखते समय इस अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। दूरियां और शुरुआती फिल्में भीमसेन की फिल्म दूरियां में सुधा चोपड़ा ने सहायक भूमिका निभाई थी। फिल्म में उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर मुख्य भूमिकाओं में थे। सुधा चोपड़ा ने इसमें कैलाश की भाभी का किरदार निभाया था। इसके बाद उन्होंने समानांतर और मुख्यधारा दोनों तरह के सिनेमा में काम किया। उनका करियर इस बात का उदाहरण है कि किसी कलाकार की पहचान केवल बढ़िया मुख्य भूमिका से नहीं बनती। कई बार छोटी भूमिकाएं भी फिल्म की कहानी में महत्वपूर्ण होती है और सुधा चोपड़ा ने ऐसे अनेक किरदार निभाए। स्पर्श और सई परांजपे के साथ काम। सुधा चोपड़ा का अभिनेत्री और निर्देशक सई परांजपे के साथ भी पुराना संबंध था। दोनों की पहचान दूरदर्शन के दिनों से थी। बाद में सुधा ने सई परांजबे की फिल्मों में भी काम किया। स्पर्श ऐसी ही चर्चित फिल्मों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने सई परांजबे की कथा में भी अभिनय किया। सुधा चोपड़ा ने स्वयं एक इंटरव्यू में बताया था कि वह सई को दूरदर्शन के समय से जानती थी और बाद में फिल्मों में भी उनके साथ काम किया। काला पत्थर और यश चोपड़ा के साथ काम। सुधा चोपड़ा की फिल्मी करियर की चर्चित फिल्मों में काला पत्थर 1979 भी शामिल है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, शत्रुघन सिन्हा, शबाना आजमी और राखी जैसे कलाकार थे। सुधा चोपड़ा ने फिल्म में विजय की मां की भूमिका निभाई थी। हालांकि काला पत्थर को उनके प्रमुख कामों में शामिल करता है।
यश चोपड़ा की फिल्म त्रिशूल 1978 भी उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में रही। बात के एक इंटरव्यू में सुधा चोपड़ा ने त्रिशूल में अपने किरदार को अपनी यादगार भूमिकाओं में गिना था। सिलसिला रॉकी और दास्ताना। 1980 के दशक की शुरुआत में सुधा चोपड़ा लगातार फिल्मों में नजर आती रही। उन्होंने यश चोपड़ा की सिलसिला 1981 में काम किया। इसके अलावा रॉकी 1981, दास्ताना 1980 और गृह प्रवेश 1980 जैसी फिल्मों में भी उनके अभिनय का रिकॉर्ड मिलता है। दास्ताना में उन्होंने टेरेसा की भूमिका निभाई थी। सिलसिला और स्पर्श जैसी फिल्मों ने उनके करियर को अलग-अलग तरह के सिनेमा से जोड़ा। प्रेमोक, कथा और साथ-साथ सुधा चोपड़ा ने 1980 के दशक में कई यादगार फिल्मों में सहायक भूमिकाएं निभाई। प्रेम लोक 1982, कथा 1983 और साथ-साथ 1982 उनके महत्वपूर्ण कामों में गिने जाते हैं। साथ-साथ में उन्होंने प्रोफेसर की भूमिका निभाई थी। फिल्म में फारुख शेख और दीप्ति नवल मुख्य भूमिकाओं में थे। फारुख शेख के साथ उनका जुड़ाव खास था। दोनों ने दूरदर्शन के समय से साथ काम किया और बाद में फिल्मों में भी नजर आए। कथा और साथ-साथ इस सहयोग के उदाहरण हैं पुकार साहिब और अन्य फिल्में। सुधा चोपड़ा ने अपने लंबे करियर में केवल एक ही प्रकार की फिल्मों तक खुद को सीमित नहीं रखा।
उन्होंने पुकार 1983, साहिब 1985, प्यार झुकता नहीं 1985, उल्टा सीधा 1985, लॉकेट 1986 और राही 1987 जैसी फिल्मों में भी काम किया। उनकी फिल्मोग्राफी में पंजाबी सिनेमा का भी महत्वपूर्ण स्थान है। लाल चूड़ा, जिगरीर, लाजो, जय माता चिंतपूर्ण और अन्य पंजाबी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया। राही में महत्वपूर्ण भूमिका। 1987 की फिल्म राही भी सुधा चोपड़ा की चर्चित फिल्मों में शामिल है। आईएमटीबी के अनुसार इस फिल्म में उन्होंने दुर्गा का किरदार निभाया था। राही, काला पत्थर और दास्ताना को उनके प्रमुख कामों में गिना जाता है। टेलीविजन और महाभारत से जुड़ाव सुधा चोपड़ा का काम फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने टेलीविजन और कार्यक्रम निर्माण के क्षेत्र में भी काम किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि बाद में उन्होंने एचटीए में लगभग 8 साल काम किया। जहां उनकी टीम ने लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत का निर्माण किया था। यह उनके करियर का वह पक्ष है जिसके बारे में आम दर्शकों को फिल्मों की तुलना में कम जानकारी है। उनके टेलीविजन से जुड़े कामों में चुन्नी 1987 और साहिल 1996 का उल्लेख मिलता है। निजी जीवन और परिवार पति सुधा चोपड़ा के पति मेजर मनमोहन चोपड़ा जो भारतीय सेना में ऑफिसर थे। दुर्भाग्यवश 1965 के भारतपाकिस्तान युद्ध के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए और कुछ ही दिनों बाद उनका निधन हो गया था। उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था। बच्चे उनके तीन बेटे हैं। नकुल चोपड़ा जो भारत की प्रसिद्ध मीडिया रिसर्च कंपनी बीएआरसी इंडिया के चेयरमैन और एएआई के अध्यक्ष रह चुके हैं। मुकुल चोपड़ा और टुक चोपड़ा। पति के निधन के बाद सुधा जी ने अकेले ही अपने बच्चों को पाला और उन्हें बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाया। उम्र सुधा चोपड़ा का जन्म 20 सितंबर 1936 को हुआ था। इस समय साल 2026 में उनकी उम्र 90 वर्ष है। आज वह कहां है? सुधा चोपड़ा अब अभिनय और ग्लैमर की दुनिया से पूरी तरह दूर होकर अपने परिवार के साथ अलेक्जेंड्रिया वर्जनिया अमेरिका में रहती है। उनके बेटे भी अमेरिका और भारत में बड़े पदों पर कार्यरत है।
फिल्मी सफर का अंतिम दौर सुधा चोपड़ा 1980 और 1990 के दशक में भी फिल्मों और टेलीविजन से जुड़ी रही। उपलब्ध फिल्मोग्राफी में अनमोल 1993 और तेरी ज्योत जले दिनरा 1995 जैसी फिल्मों का उल्लेख मिलता है। 1993 की फिल्म अनमोल में उन्होंने मनीषा कोराला के किरदार की सौतेली मां की भूमिका निभाई थी। उनकी फिल्मोग्राफी में 1995 के बाद फिल्मों का सिलसिला काफी कम दिखाई देता है। इसीलिए उनका मुख्य फिल्मी दौर 1970 के दशक के उत्तरार्ध से 1990 के दशक के मध्य तक माना जा सकता है। सुधा चोपड़ा की खास पहचान सुधा चोपड़ा को केवल एक पुरानी फिल्म अभिनेत्री कहना उनके पूरे करियर को छोटा करके देखने जैसा होगा। उनके करियर में रंगमंच, दूरदर्शन, कार्यक्रम निर्माण, निर्देशन और अभिनय शामिल रहे। उन्होंने उस दौर में काम किया जब कलाकारों को आज की तरह सोशल मीडिया या बड़े प्रचार तंत्र का सहारा नहीं मिलता था। फिर भी उन्होंने अलग-अलग माध्यमों में लगातार काम किया। उनकी सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने मुख्य अभिनेत्री बनने की दौड़ के बजाय अपने किरदारों को महत्व दिया।
काला पत्थर, सिलसिला, स्पर्श, साथ-साथ कथा, दास्ताना, राही और पुकार जैसी फिल्मों में उनकी उपस्थिति ने उन्हें उस दौर के भरोसेमंद सहायक कलाकारों में जगह दिलाई। सुधा चोपड़ा की कहानी हिंदी सिनेमा के उस दौर की कहानी है जब कई कलाकार फिल्मों के साथ-साथ थिएटर और दूरदर्शन से भी जुड़े रहते थे। 1965 में दूरदर्शन से शुरुआत, दिल्ली का पेशेवर थिएटर, मुंबई और पुणे में टेलीविजन का काम और फिर फिल्मों में प्रवेश। उनका सफर कई चरणों से होकर गुजरा। उन्होंने मीरा से फिल्मी सफर शुरू करने की बात स्वयं बताई और आगे चलकर दूरियां, स्पर्श, काला पत्थर, दास्ताना, सिलसिला, प्रेम रोग, कथा, साथ-साथ पुकार, राही और कई पंजाबी फिल्मों में अभिनय किया। सुधा चोपड़ा का नाम शायद आज के दर्शकों के लिए उतना परिचित ना हो लेकिन पुराने हिंदी सिनेमा और भारतीय टेलीविजन के इतिहास को समझने वालों के लिए उनका योगदान महत्वपूर्ण है। वो उन कलाकारों में से हैं जिन्होंने पर्दे के सामने अभिनय करने के साथ-साथ पर्दे के पीछे कार्यक्रम निर्माण और निर्देशन में भी अपनी पहचान बनाई। उनके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि उनका करियर केवल फिल्मों की संख्या से नहीं बल्कि थिएटर, दूरदर्शन, टेलीविजन और सिनेमा चारों माध्यमों में लंबे समय तक सक्रिय रहने से पहचाना जाता है। यही वजह है कि सुधा चोपड़ा पुराने दौर के उन कलाकारों में शामिल है जिन्हें याद करना भारतीय मनोरंजन जगत के एक महत्वपूर्ण अध्याय को याद करना है। तो दोस्तों, अभी के लिए बस इतना ही। मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक आप अपना ध्यान रखिए।