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नाना पाटेकर और वो 12 लड़कियाँ… आखिर क्या था राज़?

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नाना पाटेकर तो चले गए लेकिन उनके जाने के बाद अब जब उनकी बनाई वसीयत उनके परिवार के सामने आई तो सबके होश उड़ [संगीत] गए। जी हां दोस्तों जिस पत्नी नीलकंती ने 35 साल तक बिना अपना मुंह खोले हर दुख दर्द सहा। आज जब वही वसीयत की सील खुली तो हर किसी की आंखें फटी की फटी रह गई। क्योंकि इस कागज पर सिर्फ करोड़ों के बंगलों और जमीनों का ही हिसाब किताब नहीं था बल्कि नाना अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी और कीमती कमाई सीधे 12 लड़कियों के नाम कर गए। हर कोई दंग रह गया कि जिस इंसान ने अपने 50 साल के लंबे करियर में दुनिया से अपने सारे फैसले छुपा कर रखे।

उसने अपनी इस आखिरी लिखावट में ऐसा खेल कैसे कर दिया? आखिर कौन है 12 लड़कियां? नाना ने अपने परिवार को और अपने इकलौते बेटे को छोड़कर इन लड़कियों के नाम क्या-क्या लिख दिया? और इस पूरे सच के पीछे ऐसी कौन सी कहानी थी जिसने बड़े-बड़े वकीलों के भी पसीने छुड़ा दिए। आइए जानते हैं आज के इस वीडियो में जहां हर एक बात की सच्चाई आपके सामने खुलकर आने वाली है। वसीयत का यह मामला कोई आम कागजी कारवाही नहीं था। जब मुंबई के एक पुराने ऑफिस के बंद कमरे में नाना पाटेकर के पुराने फैमिली लॉयर ने वो सील बंद लिफाफा बाहर निकाला तो कैमरे में मौजूद हर शख्स की आंखें [संगीत] जैसे थम गई थी। वहां नीलकंती बैठी थी। उन्होंने अपने जिंदगी के 35 साल से भी ज्यादा साल नाना से अलग रहकर बिना किसी शिकायत के बिल्कुल खामोशी के साथ गुजारे [संगीत] थे। उनके चेहरे पर कोई लालच नहीं था। लेकिन उस कागज को देखने की एक बेचैनी जरूर थी।

जिस इंसान के साथ उन्होंने अपनी जवानी के सबसे मुश्किल दिन देखे [संगीत] थे, वह आखिर जाते-जाते अपने पीछे छोड़ क्या-क्या गए थे। पास ही उनका बेटा मल्हार बैठा था जो अपने पिता के जाने के गम से अभी तक पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया था। लेकिन जैसे ही वकील ने वसीयत की पहली लाइन पढ़ना शुरू किया, कमरे का सन्नाटा एकदम भारी हो गया। वकील ने जब उन 12 नामों का जिक्र किया और बताया कि नाना की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन 12 बेटियों के नाम ट्रांसफर करने का आर्डर खुद नाना पाटेकर ने साइन किया है। तो वहां मौजूद लोग एक दूसरे का मुंह ताकने लगे। किसी को अंदाजा तक नहीं था कि जिस इंसान को दुनिया सिर्फ कड़क बेबाक और अपने उसूलों का जीने वाला एक्टर समझती थी उसके दिमाग में अपने जाने से पहले इतना बड़ा और हैरान करने वाला प्लान कैसे चल रहा था? अब सवाल यह उठता है कि आखिर वो कौन सी दौलत थी जिसके लिए यह सारा सस्पेंस खड़ा हुआ? नाना पाटेकर ने अपने 50 साल के फिल्मी करियर में जो कुछ भी कमाया था, वह सिर्फ नाम और शोहरत नहीं बल्कि वह एक बहुत बड़ा एंपायर था। फिल्म इंडस्ट्री के अंदर नाना का एक ऐसा रुतबा था कि अगर वह किसी फिल्म को करने के लिए हां बोल देते थे तो [संगीत] प्रोड्यूसर्स उन्हें मुंह मांगी फीस देने को तैयार हो जाते थे। अपने आखिरी दिनों में भी नाना हर फिल्म के लिए कम से कम 2 से ₹.5 करोड़ चार्ज करते थे।

लेकिन सबसे बड़ा झटका लोगों को तब लगा जब उनकी टोटल नेटवर्थ की ऑफिशियल और वैल्यू सामने आई। वह वैल्यू करीब 50 करोड़ से लेकर 80 करोड़ के बीच आंकी गई थी। हर कोई यह सोच कर परेशान था कि जिस इंसान को कभी किसी ने बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमते नहीं देखा जो कभी किसी फाइव स्टार पार्टी में नहीं गया जो हमेशा सफेद कुर्ते पायजामे और कोल्हापुरी चप्पलों में नजर आता था। उसके पास इतना बड़ा बैंक बैलेंस और इतनी भारी भरकम प्रॉपर्टीज कहां से आ गई? लेकिन नाना का असली खेल उनके बैंक अकाउंट्स में नहीं बल्कि उन जमीनों और मकानों में छुपा हुआ था जिसे उन्होंने अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई से एक-एक ईंट करके जोड़कर खड़ा किया था। उनकी संपत्ति की लिस्ट जब वसीयत में पढ़ी गई तो सबसे पहला नाम आया मुंबई के अंधेरी वाले उस वन बीएचके फ्लैट। यह वही 750 स्क्वायर फीट का छोटा सा घर था जहां नाना ने अपनी जिंदगी के सबसे लंबे साल बिताए थे।

आज के दौर में जब कोई नया एक्टर एक सुपरस्टार बनता है और सुपरहिट फिल्म देता है तो वह सीधे बांद्रा या जूहू में 40-50 करोड़ का लग्जरी फ्लैट खरीद लेता है। लेकिन नाना पाटेकर ने कभी वह चकाचौंध नहीं चुनी। उन्होंने कई दशक पहले अपने स्ट्रगल के दिनों में यह फ्लैट सिर्फ ₹1,10,000 में खरीदा था। आज उसी एक छोटे से फ्लैट की मार्केट वैल्यू करीब 3 करोड़ के पार पहुंच चुकी है। नाना अपनी मां निर्मला पाटेकर के साथ इसी घर में रहा करते थे। मां के जाने के बाद भी उन्होंने कभी इस फ्लैट को छोड़ने का नहीं सोचा क्योंकि उनका कहना था कि इस घर की दीवारों में उनकी मां की खुशबू बसी है और उनका वो पुराना वक्त कैद है जब उनके पास दो वक्त की रोटी के लिए भी पैसे नहीं हुआ करते थे। वसीयत में इस फ्लैट का जिक्र आते ही माहौल बेहद इमोशनल हो गया क्योंकि इस छोटे से आशियाना के साथ नाना की आत्मा जुड़ी हुई थी। लेकिन अंधेरी के इस छोटे फ्लैट के बाद जब वसीयत के पन्ने आगे पलटे तो सामने आई उनकी सबसे बड़ी सबसे चर्चित और सबसे बेशकीमती प्रॉपर्टी पुणे के खड़क वासला के पास डोंजे गांव में फैला हुआ उनका 27 एकड़ का विशाल फार्म हाउस जिसे पूरा महाराष्ट्र बड़े आदर से नाना जीवाड़ी के नाम से जानता है। पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसी यह 27 एकड़ की जमीन कोई आम वीकेंड विलान नहीं थी। कि यहां नाना ने कोई स्विमिंग पूल या डीजे फ्लोर नहीं बनवाया था। बल्कि वहां एक सादगी भरा सात [संगीत] कमरों का घर और एक बड़ा सा हॉल था। जहां से दूर-दूर तक सिर्फ लहलहाती फसलें दिखाई देती थी। नाना ने इस 27 एकड़ में खुद ट्रैक्टर चलाकर गेहूं और धान की खेती करवाई थी। आज के रियलस्टेट मार्केट के हिसाब से इस जमीन की कीमत कई करोड़ में है। लेकिन नाना ने जीते जी यह तय कर रखा था कि इस खेती से जितनी भी फसल बिकेगी उसका एक भी पैसा उनके पर्सनल अकाउंट में नहीं जाएगा बल्कि वह सारा पैसा वहां पसीना बहाने वाले मजदूरों और गांव के जरूरतमंदों में सीधे बांट दिया जाएगा। वसीयत में इस 27 एकड़ की नानाची वाड़ी को लेकर जो क्लॉज़ लिखा गया था,

उसने वकीलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या कोई इंसान अपनी इतनी बड़ी जायदाद के साथ ऐसा फैसला भी ले सकता है, जायदाद का सिलसिला यहीं नहीं थमा। इसके बाद वसीयत में पुणे के सबसे महंगे और पौश इलाके लॉ कॉलेज रोड वाले मकान का ब्यौरा आया। इस घर की अपनी एक अलग ही डिग्निटी थी। अक्सर अपनी पर्सनल राइटिंग, किताबों और खास दोस्तों के साथ वक्त बिताने के लिए नाना यहां पर आया करते थे। [संगीत] इसके ठीक बाद गोवा के डोना पावला में ओशियन पार्क वाले इस मॉडर्न और आलीशान विला का नाम सामने आया जहां समंदर की लहरों की आवाज के बीच नाना ने अपनी जिंदगी के आखिरी लम्हे गुजारे थे। उस गोवा वाले घर की कीमत भी करोड़ों में थी। इसके अलावा जब उनके बैंक डिपॉजिट्स, फिक्स डिपॉजिट, शेयर इन्वेस्टमेंट्स और उनकी तीन चुनंदा गाड़ियां उनकी विंटेज Mahindra GP CJ4 वो भरोसेमंद Scorpio और लग्जरी Audi Q7 का जिक्र हुआ तो कुल मिलाकर यह पूरी दौलत 80 करोड़ के आंकड़े को छू रही। कमरा पूरी तरह खामोश था और हर कोई यही इंतजार कर रहा था कि कानून के मुताबिक इस 80 करोड़ के पूरे साम्राज्य का असली मालिक किसे बनाया गया है। तभी वकील ने वसीयत के उस सबसे टेक्निकल और कानूनी हिस्से को समझना शुरू किया जिसने पूरे केस को एक नया मोड़ दे दिया। भारतीय कानून और हिंदू सेक्शन एक्ट के नियम बिल्कुल साफ कहते हैं कि अगर किसी इंसान ने अपने खून पसीने से कोई प्रॉपर्टी बनाई है जिसे कानूनी भाषा में सेल्फ एक्वायर्ड प्रॉपर्टी कहा जाता है तो उस पर उस इंसान का पूरा हक होता है और वह जीते जी उसे जिसे चाहे दे सकता है। लेकिन अगर वह कोई लिखित वसीयत ना छोड़ जाए तो उसकी पूरी संपत्ति सीधे उसके क्लास वन लीगल हेयर्स यानी उसकी पत्नी और बच्चों में बराबर-बराबर बांट दी जाती है। यहां सबसे बड़ा पेच यही था कि नीलकंती पाटीकर और नाना पाटेकर पिछले 35 सालों से एक दूसरे से बिल्कुल अलग रह रहे थे। उनके बीच कोई रोजमर्रा का रिश्ता नहीं था। लेकिन दोनों ने कभी भी कोर्ट में जाकर कानूनी तलाक के कागजों पर साइन नहीं किए थे। कानून की किताबों में नीलकंती आज भी नाना की लीगल पत्नी थी। इसीलिए बाहर की दुनिया और कई जानकारों को यह लग रहा था कि नाना के जाने के बाद यह पूरी 80 करोड़ की प्रॉपर्टी सीधे तौर पर नीलकंती और बेटे मल्हार के नाम हो जाएगी। लेकिन नाना पाटेकर तो नाना पाटेकर थे। वह अपनी जिंदगी में भी कभी सीधे रास्ते पर नहीं चले और अपने जाने के बाद भी उन्होंने सबको चौंका दिया। वकील ने जब वसीयत की दो लाइनें पढ़कर सुनाई जिसमें लिखा था कि इस कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा कई फिक्स डिपॉजिट और जमीन का एक खास टुकड़ा परिवार के बजाय उन 12 लड़कियों के नाम किया जाता है। इसे सुनकर वहां बैठे कानूनी सलाहकारों के भी कान खड़े हो गए। यह फैसला कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं था। नाना ने अपनी पूरी होशोहवाश में कानूनी गवाहों की मौजूदगी में इस वसीयत को रजिस्टर्ड करवाया था ताकि उनके जाने के बाद कोई भी अदालत में जाकर इसे चैलेंज ना कर सके। उन्होंने एक-एक पाई का ऐसा हिसाब लिखा था कि कोई चाहकर भी उन 12 लड़कियों के हक पर उंगली नहीं उठा सकता था। कमरे में मौजूद हर शख्स के मन में सिर्फ एक ही सवाल गूंज रहा था कि आखिर यह 12 लड़कियां हैं कौन? क्या यह किसी बहुत बड़े बिजनेसमैन की बेटियां हैं? क्या यह फिल्म इंडस्ट्री के किसी पुराने दोस्त का परिवार है? या फिर यह वो चेहरे हैं जिन्हें नाना ने दुनिया की नजरों से हमेशा छुपा कर रखा था।

नाना ने अपनी पत्नी को जिसने उसके स्ट्रगल के दिनों में 2500 की नौकरी करके उनका साथ दिया था और अपने इकलौते बेटे मल्हार जो कि उनकी आंखों का तारा था उन्हें पीछे रखकर इन 12 अनजान नामों पर इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया? क्या उन 12 लड़कियों को खुद पता था कि उनके नाम पर 80 करोड़ के साम्राज्य में से इतनी बड़ी हिस्सेदारी लिख दी गई है या उनके लिए भी यह खबर किसी बहुत बड़े झटके की तरह आने वाली थी। वकील ने जब कागज समेटते हुए उन 12 लड़कियों के पते और उनके बैकग्राउंड के जुड़े दस्तावेजों की तरफ इशारा किया तो एक बात बिल्कुल साफ हो गई कि यह कहानी सिर्फ पैसे और जमीन के बंटवारे की नहीं है। यह कहानी एक ऐसे गहरे राज की है जो नाना पाटेकर के सीने में पिछले कई सालों से दफन था। एक ऐसा राज जो महाराष्ट्र के सूखे खेतों से लेकर देश की बर्फीली सरहदों तक फैला हुआ था। उन 12 लड़कियों के पीछे का ये सच इतना बड़ा और चौंकाने वाला था कि जिसने भी इसके बारे में पहली बार सुना उसकी रूह कांप गई। इस वसीहत के पीछे छिपे सबसे बड़े सच को समझने के लिए हमें नाना की जिंदगी के उस दौर में जाना होगा जहां से उनके सोचने, [संगीत] जीने और दुनिया को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल गया था। एक जमाना था जब नाना सिर्फ अपनी फिल्मों और थिएटर के किरदारों और अपनी कला की दुनिया में पूरी तरह डूबे रहते थे। मुंबई के जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में कमर्शियल आर्ट की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग पेंट करने और पोस्टर बनाने जैसी छोटी-मोटी दिहाड़ी का काम करते थे तब थिएटर के उन्हीं रिहर्सल हॉल में उनकी मुलाकात नीलकंती से हुई थी। नीलकंती खुद एक कमाल की नेशनल अवार्ड विनर एक्ट्रेस थी और उस दौर में एक बैंक में परमानेंट ऑफिसर की जॉब कर रही जब नाना के पास अगले दिन के खाने और बस के किराए तक के पैसे नहीं हुआ करते थे तब नीलकात्त ने अपनी 2500 के पगार से घर का पूरा राशन और नाना का हर एक खर्च अपने कंधों पर उठाया था। दोनों ने समाज के बड़े-बड़े तमाशे और फिजूल खर्ची से दूर रहकर साल 1978 में सिर्फ 750 के मामूली खर्च में सादगी से शादी कर ली थी। लेकिन जिंदगी के इस जोड़े के सामने सबसे दर्दनाक इतिहास तब खड़ा कर दिया गया जब उनके बेटे दुर्वासा का जन्म हुआ। वो नन्हा बच्चा एक बहुत ही गंभीर शारीरिक बीमारी के साथ पैदा हुआ था जिसके होंठ और तालू कटे हुए थे और आंख की रोशनी में भी गंभीर दिक्कत थी। नाना ने खुद एक पुराने इंटरव्यू में भारी मन से कबूल किया कि इस दौर में अपने बीमार बच्चे को लेकर उनके मन में एक बेहद स्वार्थी ख्याल आ गया था कि दुनिया क्या कहेगी कि नाना का बेटा ऐसा दिखता है। नाना अपनी ही इस छोटी सोच की वजह से अंदर ही अंदर खुद से नफरत करने लगे थे। और जब वो मासूम बच्चा महज ढाई साल की उम्र में इस तूफानी दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गया तो नाना पूरी तरह से टूट कर बिखर गए थे। उस असहनीय सदमे को भुलाने के लिए वह दिन भर में 60-60 सिगरेट फूंकने लगे थे। यहां तक कि बाथरूम में शावर के नीचे नहाते वक्त भी जलती हुई सिगरेट उनके होठों पर चिपकी रहती थी। बाद में उनके दूसरे बेटे मल्हार के जन्म ने घर के सन्नाटे को तोड़ा। लेकिन 90 के दशक में अफेयर की खबरों और नाना के अपने सख्त मिजाज के चलते नीलकंती और उनके बीच की दूरियां इतनी बढ़ गई थी कि दोनों अलग-अलग रहने लगे थे। फिर भी नीलकंती ने 35 साल तक कभी तलाक के कागजों पर दस्तखत नहीं किए और अपनी गरिमा व रिश्तों की मर्यादा को खामोशी से संभाले रखा। अपने घरेलू जीवन की इस उथल-पुथल के बीच नाना फिल्मों में लगातार शोहरत और करोड़ों की दौलत बटोरते जा रहे थे। लेकिन साल 2015 में एक ऐसी घटना घटी जिसने नाना के दिल में बची खुची दुनियादारी को भी एक झटके में खत्म कर दिया। उस साल नाना ने अपने काफी पुराने शौक को पूरा करने के लिए एक 1.5 करोड़ की बेहद लग्जरी और मॉडर्न कार खरीदने की पूरी तैयारी कर ली थी और अपने बैंक अकाउंट से पैसे भी निकालकर अलग रख दिए थे। लेकिन तभी एक रात अपने घर में टीवी देखते हुए उनकी नजर न्यूज़ चैनल पर चल रही उन तस्वीरों पर पड़ी जहां मराठवाड़ा के भयंकर सूखे और कर्ज के जाल में फंसकर तबाह हो चुके गरीब किसान परिवारों की रोती बिलखती विधवाएं और उनके भूखे प्यासे बच्चे नजर आ रहे थे। उन औरतों के आंसुओं और बच्चों की सुनी आंखों ने नाना के सीने में ऐसा खंजर घोंपा कि वह पूरी रात सो नहीं पाए। अगली ही सुबह नाना ने उस 1.5 करोड़ की लग्जरी गाड़ी का प्लान हमेशा हमेशा के लिए कैंसिल कर दिया। उन्होंने तुरंत अपने बेहद करीबी दोस्त और मराठी सिनेमा के जानेमाने एक्टर मकरंद अनाज पुरी को फोन मिलाया और कहा कि इन पैसों से गाड़ी नहीं आएगी बल्कि इन पैसों से हम उन टूटे हुए परिवारों के आंसू पोछेंगे। उन दोनों ने मिलकर उन पैसों से 15-15,000 के चेक बनवाए और किसी भी सरकारी काफिले के बिना सीधे लातूर भीड़ और उस्मानाबाद के सबसे पिछड़े गांव की धूल फाकने निकल पड़े। लातूर के एक पुराने समुदाय हॉल में जब सैकड़ों बेसहारा परिवारों के बीच नाना खुद अपने हाथों से चेक बांट रहे थे, तभी अचानक जोरदार आंधी आई और पूरे इलाके की बिजली गुल हो गई। उसल में धुंध अंधेरा छा गया और लोग घबराने लगे लेकिन तभी वहां मौजूद ग्रामीणों ने अपने-अपने टूटे फूटे मोबाइल फोन की टॉर्च ऑन कर दी। मोबाइल की उस नन्ही सी रोशनी में नाना ने भीगी हुई आंखों से माइक पर कहा था कि आज इस अंधेरे में मुझे अपनी बची हुई जिंदगी का असली मकसद मिल गया है। उसी भीड़ में से एक बेहद कमजोर महिला खड़ी हुई और कांपती हुई आवाज में बोली कि नाना साहब आपकी यह 15,000 की मदद तो हमारे 4 महीने का चूल्हा जला देगी लेकिन इसके बाद हम क्या करेंगे? हमें भीख या टुकड़ों पर पलने का सहारा नहीं चाहिए। हमें अपने पैरों पर इज्जत से खड़े होने की हिम्मत चाहिए। वह महिला अपनी पूरी बात भी नहीं कर पाई थी कि चक्कर खाकर वहीं जमीन पर गिर पड़ी। उस औरत के कहे उन चंद शब्दों ने नाना की आत्मा को पूरी तरह झकझोर दिया और उसी मिट्टी से जन्म हुआ नाम फाउंडेशन का। नाना की बेदाग साख का जादू ऐसा था कि जैसे ही उन्होंने अपने मकरंद से इस मिशन का ऐलान किया। पहले ही दिन आम लोगों ने 80 लाख से ज्यादा का चंदा उनके हाथों में थमा दिया और देखते ही देखते यह चंदा करोड़ों से भी आगे निकल गया जिससे सैकड़ों गांव में नदियां गहरी की गई चेक डैम बने और तालाबों में फिर से पानी लौट आया| किसानों के इस दर्द को अपना बनाने के साथ-साथ नाना का दिल हमेशा भारतीय सेना के लिए भी एक अलग ही जुनून के साथ धड़कता था। साल 1991 में जब उन्होंने अपनी आइकॉनिक फिल्म प्रहार डायरेक्ट की थी तब उस रोल में उतरने के लिए उन्होंने इंडियन आर्मी मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ बाकायदा हफ्तों तक कड़ी मिलिट्री ट्रेनिंग भी ली थी और उन्हें मानक कैप्टन के रैंक से भी नवाजा गया था। साल 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान जब तोफों के गोले बरस रहे थे, तब नाना अपनी जान की परवाह किए बिना सीधे माइनस टेंपरेचर वाले फॉरवर्ड बंकरों में अपनी फौजी भाइयों का हौसला बढ़ाने पहुंच गए थे। उन्होंने अपने माता-पिता की स्मृति में निर्मला गजानन फाउंडेशन की नींव रखी जो सीधे सीमा पर तैनात जवानों और उनके आश्रितों के कल्याण के लिए काम करती रही। अभी हाल ही में सितंबर 2025 में जब सीमा पार से हुई भारी गोलाबारी के बाद जम्मू कश्मीर के राजौरी और कुछ के सीमावर्ती इलाके पूरी तरह तबाह हो गए थे तब भी 74 साल की ढलती उम्र और सीने तकलीफ के बावजूद नाना खुद फ्लाइट पकड़ कर जम्मू पहुंचे और वहां से सड़क मार्ग से सीधे राजौरी के बॉर्डर विलेज तक गए। उन्होंने वाइट नाइट कोर के आर्मी ऑफिसर्स के साथ बैठकर 117 तबाह हो चुके परिवारों को लाखों का रिलीफ पैकेज सौंपा। दर्जनों आर्मी गुडविल स्कूलों के बच्चों की पूरी पढ़ाई का खर्च अपने जिम्मे लिया और वहीं एक स्थानीय लंगर में बैठकर आम सेवादार की तरह खुद अपने हाथों से झूठे बर्तन तक मांझे। अब आते हैं उस सबसे बड़े हमेशा खामोश और सबसे हैरान कर देने वाले सवाल पर कि आखिर वो 12 लड़कियां कौन है जिनके नाम पर नाना अपनी 80 करोड़ की कुल संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपनी आखिरी वसीयत में लिखकर पूरी दुनिया को दंग कर गए। जब वकील ने उन 12 लड़कियों से जुड़े कानूनी एफिडेविट्स बैंक फिक्स डिपॉजिट और जमीन के अलॉटमेंट पेपर्स को टेबल पर रखा तो हर शख्स की आंखें नम हो गई। वे 12 लड़कियां किसी अमीर घराने या फिल्मी खानदान के वारिस नहीं थी बल्कि वे उन लाचार किसानों और देश की हिफाजत करते हुए बर्फीली चोटियों पर अपने प्राण न्योछार करने वाले जांबाज शहीदों की व मासूम अनाथ बेटियां थी जिनके सिर से उनके मां-बाप का साया हमेशा के लिए उठ चुका था। लातूर, भीड़ और राजौरी के दौरे के दौरान जब नाना ने इन बच्चियों को बेसहारा और तन्हा देखा था, तो उन्होंने अपनी बंद आंखों से यह कसम खाई थी कि जब तक उनके शरीर में सांस बाकी है इन बच्चियों को कभी अनाथ महसूस नहीं होने देंगे। नाना ने बिना किसी मीडिया कवरेज के, बिना कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस किए और बिना किसी सोशल मीडिया पोस्ट के गुपचुप तरीके से इन 12 बच्चियों की कानूनी तौर पर लीगल गार्डियनशिप ले रखी थी। नाना खुद हर महीने उनके स्कूल की फीस, हॉस्टल का खर्च, किताबों और कपड़ों के पैसे भेजा करते थे। वसीयत में नाना ने बहुत ही साफ शब्दों में यह दर्ज करवाया था कि उनकी सेल्फ एक्वायर्ड संपत्ति में से करोड़ों के फैक्स डिपॉजिट्स और डोंजे व पूरे की प्राइम जमीन का एक खास हिस्सा इन 12 बेटियों के नाम पर ट्रस्ट फंड के रूप में सीधे ट्रांसफर किए जाए। क्योंकि जब वह अपनी हायर स्टडीज पूरी कर सकें और उनकी शादियों का वक्त आए तो उन्हें कभी किसी के आगे हाथ फैलाने की मजबूरी झेलनी ना पड़े। नाना ने साबित कर दिया कि एक पिता बनने के लिए सिर्फ उन का रिश्ता होना जरूरी नहीं होता है बल्कि सीने में वह फौलादी और दरियादिली कलेजा होना चाहिए जो दूसरों के बच्चों को अपना बना सके। इस वसीयत के सामने आने के बाद जब मीडिया के कैमरे नाना के बेटे मल्हार की तरफ घूमे तो मल्हार ने बड़े ही गर्व और संजीदगी के साथ अपने पिता की इस विरासत पर अपनी मुहर लगा दी। मल्हार ने साफ तौर पर कहा कि नाना साहब जो कुछ भी करके गए उस पर पूरे परिवार को फक्र है। उन्होंने बताया कि अपने जाने से कुछ हफ्ते पहले ही नाना ने नाम फाउंडेशन और उर्मिला गजानन फाउंडेशन दोनों का पूरा कानूनी हैंडओवर अगली पीढ़ी यानी मल्हार और उनकी युवा सोशल वर्कर की कोर टीम को आधिकारिक तौर पर सौंप दिया था। नाना ने जाते-जाते अपने बेटे से सिर्फ एक वादा किया था कि इस संस्था की तिजोरी में जमा हुआ एक-एक रुपया सिर्फ और सिर्फ देश के जवानों और किसानों के पसीने की हिफाजत में खर्च होगा। उसमें से एक नया पैसा भी कोई अपने निजी ऐशो आराम के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा। मल्हार ने कहा कि नाना साहब का मानना था कि इंसान को अपनी कमाई का 90% समाज को लौटाना ही चाहिए क्योंकि हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाना है। खुद नाना अपनी बाकी की निजी संपत्ति और अपनी मौत के बारे में क्या राय रखते थे? इसका सबसे सटीक जवाब उनका वह पुराना इंटरव्यू है जिसमें उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था कि इंसान जिंदगी भर करोड़ों के बंगले, जमीनें और गाड़ियां बटोरता रहता है लेकिन आखिरी वक्त में उसे अपने जिस्म को खाक में मिलाने के लिए सिर्फ 12 मन सूखी लकड़ी की जरूरत होती है और असल में वही 12 मन की लकड़ी इंसान की फाइनल प्रॉपर्टी होती है। नाना ने अपने जीते जी अपने फार्म हाउस पर बबूल और आम की वह 12 मन सूखी लकड़ियां खुद अपने सामने कटवाकर एक शेड में रखवा दी थी और अपने परिवार से कड़ाई से कहा था कि मेरे जाने के बाद मेरी चिता में कोई गीली लकड़ी मत डालना क्योंकि अगर गीली लकड़ी से धुआं उठा और तुम्हारी आंखों में पानी आ गया तो जाते-जाते मुझे यह गलतफहमी हो जाएगी कि तुम लोग मेरे लिए रो रहे हो। जब नाना के पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदा दी जा रही थी, तब आधी रात को पुणे के उस फार्म हाउस पर हजारों गरीब किसानों, दिहाड़ी मजदूरों और फौजी जवानों का हुजूम अपनी आंखों में सैलाब लिए हुए खड़ा था। जबकि चकाचौंध भरी बॉलीवुड इंडस्ट्री के तमाम बड़े-बड़े सितारे उस अंतिम यात्रा से नदारद रहे। इस बेखुदी पर मराठी सिनेमा के कई जानेमाने कलाकारों ने अपना कड़ाक गुस्सा भी जाहिर किया। लेकिन नाना के जाने के बाद इन सब चर्चाओं का कोई मोल नहीं रह गया क्योंकि नाना पाटेकर किसी बॉलीवुड खेमे या किसी अवार्ड फंक्शन के मोहताज कभी नहीं थे। उन्होंने 80 करोड़ के अपने पूरे एंपायर के बीच अपनी वसीयत में उन 12 बेसहारा बेटियों के नाम अपनी दौलत लिखकर और लाखों किसानों को जीने की उम्मीद देकर यह दिखा दिया कि एक सच्चा इंसान अपनी जिंदगी कैसे जीता है। आज भले ही नाना हमारे बीच नहीं है लेकिन उन 12 बेटियों की आंखों के सुनहरे भविष्य में और महाराष्ट्र के लहराते खेतों [संगीत] की इस एक बूंद में नाना साहेब की यह बेमिसाल वसीयत हमेशा हमेशा के लिए जिंदा रहेगी। दोस्तों, नाना पाटेकर के इस दरियादिली फैसले और उनकी इस अनोखी वसीयत पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। सिनेमा और देश की दुनिया की ऐसी ही अनसुनी और सच्ची कहानियों के लिए चैनल को तुरंत सब्सक्राइब करें और बेल आइकन दबाना ना भूलें। मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक आप अपना ख्याल रखें। धन्यवाद।

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