एबीसीएल के दफ्तर में बेहुल कुमार अमिताभ से नजरें नहीं मिला पा रहे थे। लेकिन अमिताभ भांप गए कि उनके दिमाग में क्या कुछ चल रहा है। फिल्म मृत्युदाता के फ्लॉप होने के सदमे से दोनों उभर नहीं पाए थे। खासकर अमिताभ के लिए तो यह करो या मरो का प्रोजेक्ट था। उनकी कंपनी एबीसीएल की साखी नहीं अमिताभ बच्चन का भविष्य भी बहुत हद तक इसी फिल्म पर टिका था जो नाकाम हुई और उन्हें भारी कर्जे में डुबो गई।
फिल्म के डायरेक्टर मेहुल कुमार के लिए भी बड़ा झटका था क्योंकि तिरंगा और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों से उन्होंने जो शोहरत बटोरी थी उस पर अमिताभ को डुबोने का आखिरी धब्बा लग गया था। ऐसे में मेहुल कुमार हर हाल में कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे वह इस तोहमत से बरी हो जाएं और कुछ कमाई भी हो। वो ए वतन तेरे लिए नाम से एक फिल्म प्लान कर चुके थे जिसमें अमिताभ, डिंपल कपाड़िया, अर्षद वारसी, करिश्मा कपूर वगैरह थे। लेकिन कई मुश्किलों में घिरे अमिताभ अब इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे थे और खुद मेहुल को लगने लगा था कि इससे भी बड़ा कुछ होना चाहिए और आज वो इसी सिलसिले में अमिताभ से मिले थे। प्लांट टेररिज्म को लेकर एक एक्शन मूवी बनाने का था जिसमें अमिताभ एक आर्मी कर्नल की भूमिका में थे जो विषम हालात में पहचान बदलकर एक नए किरदार को भी जीता है। अमिताभ को कहानी अच्छी लगी लेकिन मृत्युदाता ने जो माली हालत बिगाड़ी थी
उसमें वह इस फिल्म को प्रोड्यूस करने की हालत में नहीं थे बल्कि उन्हें तो पैसे की दरकार थी। सो मेहुल कुमार के प्रोडक्शन में वह इस फिल्म को करने को तैयार हो गए। लेकिन असली बात जो मेहुल कुमार दबा रहे थे वो यह कि इस कहानी में एक और किरदार था जो अमिताभ के किरदार के बराबर तो नहीं लेकिन उनसे कम भी नहीं था। अमिताभ ने पूछा यह रोल कौन करेगा? तो मेहुल कुमार ने कहा कि नाना पाटेकर को लेने की सोच रहे हैं। नाना का नाम सुनते ही अमिताभ थोड़े सक्त में आ गए। इसलिए नहीं कि उन्हें किसी तरह के कंपटीशन का डर था बल्कि अब तक उन्होंने नाना के ऑफ स्क्रीन मूड के बारे में जो कुछ सुना था। उन्हें लगा कि शायद वह फिल्म के सेट पर ऐसे कोई स्टार का गुस्सा या सनक मिजाजी नहीं सह पाएंगे। उन्हें पता था कि नाना पाटेकर मेहुल कुमार के फेवरेट एक्टर ही नहीं। उन्हीं के निर्देशन में चमके थे।
ऊपर से तब तक नाना पाटेकर की मार्केट वैल्यू काफी चढ़ चुकी थी। ऐसे में कम से कम फिल्म की स्टार वैल्यू के लिए ही सही यह विकल्प बुरा नहीं था। अमिताभ ने कहा कि देखो मेहुल मैं यह फिल्म तो करूंगा और वो सिर्फ इसलिए कि तुम इसे बना रहे हो। लेकिन अगर फिल्म के सेट पर नाना ने मेरे साथ कुछ भी इंडीसेंट किया तो मैं यह फिल्म छोड़ दूंगा और जो भी वजह रही हो आईmdबी की मानें तो अमिताभ ने साइनिंग अमाउंट के तौर पर 1/3 यानी ₹1 करोड़ लिए थे और बाकी ₹ करोड़ फिल्म पूरा होने के बाद लेने का भरोसा दिलाया था। लेकिन हमेशा वह नहीं होता जो हम सोचते हैं। मेहुल कुमार ने नाना पाटेकर को जब यह रोल ऑफर किया तो वह खुद पीछे हट गए। इसके पीछे भी कई नैरेटिव हैं। नाना को शायद किसी ने बता दिया था कि मेहुल कुमार के प्रोडक्शन में आ रही इस फिल्म में एबीसीएल ने भी निवेश किया है। ऐसे में अमिताभ का दखल तो रहेगा ही। संभव है कि तू उनका पिछला गुरु बनकर रह जाए। इसमें कोई शक नहीं कि तिरंगा, क्रांतिवीर, अग्निशाक्षी जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देने के बाद नाना पाटेकर का कद तब अमिताभ जितना तो नहीं लेकिन उस दौर के किसी भी स्टार से कम नहीं था। यहां तक कि सलमान से लेकर ऋषि कपूर तक पर्दे पर उनके सपोर्टिंग नजर आने लगे थे। मेहुल को लगा कि कहीं सेट पर कोई ईगो क्लैश ना हो।
ऐसे में उन्होंने नाना पर जोर नहीं डाला और अब उनकी जगह जैकी श्रॉफ को लेने का फैसला कर लिया। लेकिन अब खुद अमिताभ बच्चन को यह प्रोजेक्ट थोड़ा हल्का लगने लगा। और मेहुल कुमार की मां ने तो अमिताभ ने ही इच्छा जताई कि नाना पाटेकर को ही फिल्म में लेकर आओ। आर एस के भैया ओ मेरे भैया जिसको भी अमिताभ बच्चन को भी उस वक्त हर हाल में एक हिट फिल्म की दरकार थी और उन्होंने मेहुल कुमार से यहां तक कहा था कि वह फिल्म हिट कराने के लिए जो भी इनोवेटिव करना चाहे करें।
जरूरत पड़ी तो मेरी कंपनी एबीसीएल भी बोझ में हिस्सेदार बनेगी। मेहुल कुमार दोबारा नाना पाटेकर के पास गए। स्क्रिप्ट पहले ही सुना चुके थे। बताया कि अमिताभ का किरदार उनके ऊपर उतना एज नहीं ले रहा जितना तिरंगा में राजकुमार ने लिया था और तिरंगा तो दोनों के हिस्से में बड़ी कामयाबी दे गई थी। खैर नाना पाटेकर ने इस बार ना नहीं किया और अगले हफ्ते अखबारों और पत्रिकाओं के कवर इस सनसनी से पट गए कि अमिताभ बच्चन और नाना पाटेकर एक साथ आ रहे हैं। खोले मनवा डोले जाने तेरे दीवाने तेरे दीवाने। और जब यह दोनों सितारे पहली बार कैमरे के सामने एक साथ आए तो नाना पाटेकर अमिताभ से बड़े अदब से पेश आए और यह सिलसिला आखिरी सीन तक चला। इकबाल दुरानी की कहानी और दिलीप सेन समीर सेन के संगीत के साथ फिल्म में एक्शन, डायलॉग, डांस, ड्रामा आइटम के जरिए हर वो मसाला डालने की कोशिश की गई थी। जिसे पर्दे पर इन दो बड़े सितारों की उपस्थिति को भुना ले।
हम है बनारसके भैया ओ मेरे भैया अमिताभ के अगेंस्ट जयपर्दा और नाना के लिए तब्बू हीरोइन थी। फिल्म को मसाला मिक्स बनाने पर आमादा मेहुल ने उनकी उम्र को नजरअंदाज कर जो भी तड़के बन पड़े डाले। जैकी श्रॉफ गेस्ट अपीयरेंस में थे। जबकि डेनी, मुकुलदेव, मुकेश ऋषि, कबीर बेदी और आयशा जुल्का ने भी स्टार कास्ट की रिचनेस बढ़ाई थी। कहानी वैसे तो सेना के कर्नल बलबीर सिंह सो यानी अमिताभ बच्चन के इर्द-गिर्द घूमती है जो कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए ऐसे हालात में फंस जाते हैं कि पहचान बदलकर दादा भाई नाम से रहना पड़ता है। दूसरी ओर मेजर अजीत आर्य यानी नाना पाटेकर को उन पर शक होता है और वह उनकी असलियत जानने की कोशिश करता है। इस टकराव के बीच कहानी में देशभक्ति आतंकवाद राष्ट्रीय मसले उभरते हैं और निजी जिंदगी के खट्टे मिट्टे किस्से तो है ही। फिर यह दोनों अपने साझा लक्ष्य देश के दुश्मनों से टकराते हैं। कथानक की दृष्टि से कुछ खास या नया नहीं था जो दर्शकों को बांधे रखे। वो यह सब देखते ही आ रहे थे और शायद यही उस दौर की ज्यादातर एक्शन फिल्मों की प्रॉब्लम थी। 13 अगस्त 1999 को रिलीज हुई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हुई।
उसके बाद यह जोड़ी दोबारा कभी पर्दे पर नजर नहीं आई। लेकिन मीडिया में उन्हें लेकर बहुत कुछ आया। खासकर यह कि दोनों दोबारा साथ क्यों नहीं आए? लेकिन उससे पहले जान लें कि आज हम अमिताभ बच्चन संग नाना पाटेकर को क्यों याद कर रहे हैं। यह उम्दा कलाकार इतनी जल्दी दुनिया से विदा ले लेगा किसी ने सोचा नहीं था और खुद अमिताभ ने उन्हें श्रद्धांजलि दी तो उनकी आंखें नम नजर आई। कई रिपोर्टों में कहा गया था कि कोहराम के सेट पर दोनों के बीच अनबन हुई थी जिसके चलते ये जोड़ी फिर पर्दे पर साथ नहीं आई। लेकिन खुद मेहुल कुमार ने कई इंटरव्यूज में साफ किया है कि ऐसा कभी कुछ नहीं हुआ था। और फिल्म शुरू होने से आखिरी शॉट तक दोनों एक दूसरे के प्रति बेहद सम्मानजनक रहे थे। हालांकि इसके तुरंत बाद अमिताभ ने मोहब्बतें और केबीसी से बाउंस बैक किया था। लेकिन नाना पाटेकर शायद अपने पीक से नीचे ढलते चले गए। ऐसे में अगर कोई स्क्रिप्ट आई भी होगी तो अब दोनों के बीच बैलेंस बनाना मुश्किल रहा होगा। और आपको जानकर हैरानी होगी कि 2013 में रामगोपाल वर्मा के निर्देशन में बनी यह फिल्म जो मुंबई अटैक पर आधारित थी।
इसमें नाना पाटेकर की एक्टिंग देख अमिताभ बच्चन ने उन्हें फोन करके बधाई दी थी और खुद नाना पाटेकर ने पब्लिकली हमेशा अमिताभ बच्चन का सम्मान किया था। तेरे दीवाने हम तेरे दीवाने हम हर बनारस [संगीत] के। खैर उम्दा कलाकार को हम सब की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि के साथ आज बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो करें ही। अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वह भी करते चलिए। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार।हम है बनारस के भैया ओ [संगीत] मेरे भैया। आप जहां जा रहे हो ना वहां ऐसा आदर सत्कार किया जाता है कि गंगे भी गजल ठुमरी गाना शुरू कर देते