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निधन के बाद व्यक्ति की आँखें तुरंत बंद क्यों कर देनी चाहिए?

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हे मेघनाथ आज मैं तुम्हें मृत्यु से जुड़ा एक ऐसा रहस्य बताऊंगा जिसे जानकर मनुष्य मृत्यु को केवल शरीर का अंत नहीं समझेगा। जब किसी मनुष्य के प्राण शरीर का साथ छोड़ देते हैं तब उसके आसपास केवल शोक नहीं होता। उस समय एक ऐसी सीमा बनती है जिसे जीवित मनुष्य अपनी आंखों से नहीं देख सकता। पुरानी लोकमान्यताओं में कहा जाता है कि मृत्यु के तुरंत बाद चेतना कुछ समय तक अपने शरीर और आसपास के वातावरण से जुड़ी हुई मानी जाती है। इसी कारण मृत व्यक्ति की आंखों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। हे मेघनाथ तुम सोचोगे कि आंखें बंद करने से ऐसा क्या बदल जाएगा? तो सुनो आंखें केवल देखने का माध्यम नहीं है।

अनेक लोक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं में इन्हें जीव और संसार के बीच अंतिम द्वार के रूप में भी देखा गया है। जब शरीर निष्प्राण हो जाता है तब उसकी दृष्टि समाप्त हो जाती है। लेकिन लोक विश्वासों में यह धारणा मिलती है कि यदि मृत व्यक्ति की आंखें खुली रह जाए तो उसकी आत्मा या सूक्ष्म अस्तित्व अपने आसपास के संसार से जुड़ा हुआ महसूस कर सकता है।

इसलिए हे इंद्रजीत मृत्यु के बाद आंखों को शांतिपूक बंद कर देना चाहिए। यह केवल एक परंपरा नहीं बल्कि मृत व्यक्ति के प्रति अंतिम सम्मान भी माना जाता है। लेकिन हे मेघनाथ यहीं से एक और रहस्यमय मान्यता शुरू होती है। कहा जाता है कि जहां मृत्यु होती है वहां कुछ समय के लिए वातावरण अत्यंत संवेदनशील हो जाता है।

और इसी समय प्रेत पिशाच और भटकती आत्माओं की कथाएं जन्म लेती हैं। मनुष्य जब मृत्यु के रहस्य को समझ नहीं पाता तो वह उस अज्ञात शक्ति को अनेक नाम देता है। कहीं उसे प्रेत कहा गया कहीं भटकती आत्मा, कहीं पिशाच और कहीं ऐसी आत्मा की कल्पना की गई जो अपने अधूरे कर्मों के कारण संसार में भटक रही हो। पुरानी लोक कथाएं तो यहां तक कहती हैं कि कुछ दुष्ट आत्मिक शक्तियां जिन्हें कहीं डायन या चुड़ैल के रूप में वर्णित किया गया है। मृत शरीर के आसपास की अशांत ऊर्जा का लाभ उठा सकती हैं। लेकिन हे मेघनाथ इन बातों को शास्त्रीय या वैज्ञानिक सत्य समझने की भूल मत करना।

यह मुख्यतः लोक विश्वास धार्मिक कथाओं और प्राचीन परंपराओं में मिलने वाली धारणाएं हैं। फिर भी इन मान्यताओं के भीतर एक गहरा संदेश छिपा है। मृत्यु के समय भय नहीं शांति आवश्यक है। इसीलिए जब कोई व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो उसके शरीर के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। उसे झकझोरना नहीं चाहिए। उसकी आंखों को लगातार घूरते नहीं रहना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण उसके शरीर के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए। हे इंद्रजीत कल्पना करो रात्रि का समय है। एक सुनसान कक्ष है। दीपक की लौ धीरे-धीरे कांप रही है और कमरे के बीचोंबीच एक मृत शरीर पड़ा है। उसकी आंखें खुली है। चारों ओर सन्नाटा है। बाहर हवा चल रही है। दरवाजा हल्का सा हिलता है।

और अचानक किसी को ऐसा प्रतीत होता है। जैसे मृत व्यक्ति की आंखें उसी की ओर देख रही हो। यही वह क्षण है जब मनुष्य का भय उसकी कल्पना को वास्तविकता का रूप देने लगता है। उसे लगता है कि शायद आत्मा अभी गई नहीं। शायद मृत व्यक्ति उसे देख रहा है। शायद कोई प्रेत उसी कमरे में उपस्थित है। और यदि वही भय अंधेरी रात में बढ़ता जाए तो वही स्थान मनुष्य को भूत, चुड़ैल और आत्माओं का निवास प्रतीत होने लगता है। इसलिए मृत व्यक्ति की आंखें बंद करना एक ऐसी परंपरा है जो जीवित लोगों को भी मानसिक रूप से यह स्वीकार करने में सहायता करती है कि अब उस व्यक्ति की सांसारिक यात्रा समाप्त हो चुकी है।

अब उसे विश्राम देना चाहिए। हे इंद्रजीत एक बात और याद रखना मृत्यु के बाद शरीर को अकेला छोड़कर उसके आसपास भयावह कहानियां गढ़ना उचित नहीं क्योंकि भय कभी-कभी भूत से भी अधिक शक्तिशाली होता है। एक मनुष्य अंधेरे कमरे में अकेला हो तो हवा की आवाज भी उसे किसी आत्मा की फुसफुसाहट लग सकती है। लेकिन यदि मन शांत हो, तो वही आवाज केवल हवा होती है।

इसीलिए मृत्यु के समय सबसे पहले भय को शांत करो। मृत व्यक्ति की आंखों को सम्मान पूर्वक बंद करो। उसके शरीर को उचित सम्मान दो। और उसकी अंतिम यात्रा को गरिमा के साथ पूरा होने दो। जहां तक प्रेत, आत्मा, पिशाच और चुड़ैलों की बात है, उनके बारे में संसार की अलग-अलग संस्कृतियों में असंख्य कथाएं और लोक विश्वास मिलते हैं। लेकिन हर रहस्यमय घटना को आत्मा या प्रेत मान लेना उचित नहीं। मृत्यु स्वयं एक रहस्य है और रहस्य के सामने मनुष्य की कल्पना सबसे अधिक सक्रिय हो जाती है। इसलिए मैंने कहा था मृत व्यक्ति की आंखें तुरंत और शांतिपूर्वक बंद कर देनी चाहिए ताकि अंतिम दृश्य भय का नहीं शांति का हो। और याद रखना जिस शरीर ने जीवन भर संसार को देखा मृत्यु के बाद उसकी आंखों को संसार से विदा दे देना उसके प्रति अंतिम सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यही मृत्यु की मर्यादा है। यही अंतिम संस्कार की गरिमा है। और यही वह सीमा है जहां जीवितों का संसार समाप्त होता है और अज्ञात का रहस्य आरंभ होता है।

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