क्या कोई 80 साल का बूढ़ा राजा अपनी ही सगी सुपरस्टार बेटी को भरे कैमरे के सामने झूठी मक्कार और लालची कह कर पूरे खानदान से बेदखल कर सकता है? झूठी मक्कार और लालची निकल जाओ मेरे घर से। क्या 1989 में पूरे हिंदुस्तान के दिलों पर राज करने वाली मासूम सुमन आज अपने ही बाप के राजमहल की चौखट पर सिर्फ एक-ए इंच जमीन के लिए भीख मांगने को मजबूर हो चुकी है। 1 इंच जमीन नहीं मिलेगी तुमको। आखिर 200 साल पुराने एक शाही मंदिर के गर्भ गृह में ऐसा क्या हुआ कि भगवान गणेश की आरती की थाल हाथों से छीन ली गई। पुजारियों के सामने गाली गलौज हुई और पुलिस को बीच-बचाव के लिए दौड़ना पड़ा। और सबसे बड़ा सवाल क्या इस पूरे शाही खानदान की बर्बादी के पीछे एक ऐसे दामाद का हाथ है जो कभी मुंबई के सट्टा बाजारों और हवाला रैकेट्स मेंंगे हाथों पकड़ा गया था। और जिसकी नियत सांगली की खरमों की जमीनों को निगल जाने की। दोस्तों, यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि माया नगरी मुंबई और महाराष्ट्र के सांगली राजघराने के बीच मचा वो खूनी बवंडर है जिसकी गूंज ने पूरे देश को सन्न कर दिया है। सोचिए जरा, एक तरफ वो मासूम चेहरा, जिसे देखकर कभी सिनेमाघरों में तालियां नहीं थमती थी, जिसने पहली ही फिल्म से शोहरत के वो झंडे गाड़े थे, कि बड़े-बड़े सितारे उनके आगे पानी भरते थे। और दूसरी तरफ हैं उनके अपने सगे पिता सांगली रियासत के 11 तोपों की सलामी वाले राजा विजय सिंह राजे पटवर्धन जो आज अपनी ही लाडली बेटी को अपने जीते और जी एक कौड़ी तक देने को तैयार नहीं है। यह जंग सिर्फ बाप-ब के टूटे हुए रिश्ते की नहीं है बल्कि इस ड्रामे के पीछे है 3000 करोड़ की वह बेशकीमती जमीनें जिन पर आज गिद्धों की तरह नजरें कड़ी हुई हैं। इस ड्रामे के हर एक राज को समझने के लिए हमें उस दौर के पन्नों को पलटना होगा, जब भाग्यश्री सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि सांगली के शाही राजवंश की सबसे चहेती राजकुमारी हुआ करती थी। महाराष्ट्र की कृष्णा नदी के किनारे बसे सांगली के पटवर्धन राजा विजय सिंह राजे पटवर्धन की शादी रानी राजक्ष्मी राजे से हुई और इस शाही महल में तीन बेटियों की किलकारियां गूंजी। इनमें सबसे बड़ी और सबसे लाडली थी राजकुमारी भाग्यश्री। भाग्यश्री का बचपन दो बिल्कुल जुदा दुनियाओं के बीच झूलता रहा। मुंबई के पौश इलाके में वो एक मॉडर्न कॉन्वेंट स्कूल की स्टाइलिश और इंग्लिश बोलने वाली लड़की थी। लेकिन जैसे ही उनकी गाड़ियां सांगली के राजमहल के फाटकों को पार करती थी। उन पर मर्यादाओं और शाही पाबंदियों का फौलादी पहरा बैठ जाता था। महज 13 साल की कच्ची उम्र में भाग्यश्री के बदन पर नौ गज की भारी नौवारी साड़ी लपेट दी जाती थी।
सिर झुकाकर चलने का शाही प्रोटोकॉल सिखाया जाता था और आम रियाया से एक तय दूरी बनाए रखने का हुक्म दिया जाता था। उनके बचपन में खेलने के लिए राजमहल के बगीचों में निजी पालतू हाथी झूमते थे। शाही अस्तबल में अरबी नस्ल के घोड़े दौड़ते थे और दर्जनों खादिम उनकी एक आवाज पर हाथ बांधे खड़े रहते थे। लेकिन सोने के इस पिंजरे में अपनी मर्जी से खुलकर सांस लेने की आजादी उस राजमहल में किसी के पास नहीं थी। अंदर ही अंदर राजमहल की दीवारों में एक मायूसी भी सुलग रही थी। क्योंकि राजा के आंगन में कोई बेटा यानी कुल का नाम आगे बढ़ाने वाला कोई पुरुष वारिस नहीं जन्मा था। हालांकि फिल्मों की चमकीली दुनिया का चसका इस परिवार को पहले से लगा हुआ था। भाग्यश्री की मंजली बहन मधुवंती पटवर्धन ने भी 90 के दशक में सुपरस्टार गोविंदा के साथ फिल्म दो आंखें 12 हाथ से बड़े पर्दे पर कदम रखा था। लेकिन फिल्म के बुरी तरह फ्लॉप होते ही वो हमेशा के लिए विदेश जाकर गुमनाम हो गई। मगर बड़ी राजकुमारी भाग्यश्री की किस्मत के पन्नों पर कुदरत ने कुछ ऐसा लिखा था जो इस पूरे राजघराने की आन बान शान और तकदीर को हमेशा के लिए बदलने वाला था। साल 1987 में एक दिन भाग्यश्री के दोस्त और मशहूर डायरेक्टर अमोल पालेकर अपने दूरदर्शन धारावाहिक कच्ची धूप के लिए एक नए चेहरे की तलाश में उनके बंगले पर पहुंचे। सीरियल की मुख्य हीरोइन ने शूटिंग से ऐन पहले हाथ खड़े कर दिए थे और अमोल पालेकर ने भाग्यश्री से यह रोल करने की जिद पकड़ ली। भाग्यश्री ने भारी मन से सिर्फ मान रखने के लिए कैमरा फेस किया। लेकिन उनकी उस सादगी और मासूमियत ने दर्शकों को अपना दीवाना बना लिया। इसी सीरियल के एक एपिसोड को देखकर राजश्री प्रोडक्शनंस के युवा डायरेक्टर सूरज बड़जात्या के दिल में हलचल मच गई। जो उस वक्त अपनी एक पारिवारिक प्रेम कहानी मैंने प्यार किया के लिए एक ऐसी नई लड़की ढूंढ रहे थे जिसके चेहरे पर पवित्रता और हिंदुस्तानी तहजीब झलकती हो। जब सूरज बड़जात्या फिल्म का ऑफर लेकर पहुंचे तो आपको जानकर हैरानी होगी कि भाग्यश्री ने उस ऐतिहासिक फिल्म को एक या दो बार नहीं बल्कि पूरे सात बार ठुकरा दिया था। वो फिल्मों में काम करने के बजाय अमेरिका जाकर अपनी हायर स्टडीज पूरी करना चाहती थी। लेकिन सूरज बरजातिया की अटूट ज़िद और स्क्रिप्ट की पारिवारिक शुचिता को देखकर आखिरकार राजघराने ने अपनी इजाजत दे दी और भाग्यश्री बड़े पर्दे की दुनिया में दाखिल हो गई। दिसंबर 1989 की वो ठंडी सुबह भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नया इतिहास रचने जा रही थी। फिल्म मैंने प्यार किया। सिनेमाघरों में रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तूफान आया, जिसने हिंदी सिनेमा के सारे पुराने रिकॉर्ड्स की धज्जियां उड़ा दी। एक नया नवेला लड़का सलमान खान और सफेद सलवार कमीज़ में लिपटी राजघराने की राजकुमारी भाग्यश्री की जोड़ी ने पूरे मुल्क को अपनी मोहब्बत के जादू में कैद कर लिया। सुमन का वो किरदार घर-घर में पूजा जाने लगा। लड़के उनके पोस्टर अपने तकियों के नीचे रखकर सोने लगे और भाग्यश्री को उस साल के बेस्ट डेब्यू एक्ट्रेस के फिल्मफेयर अवार्ड से नवाजा गया। लेकिन इस बेपनाह शोहरत की चकाचौंध के पीछे शूटिंग सेट पर भाग्यश्री का
राजसी अंतर्द्वंद हर दिन एक नई जंग लड़ रहा था। उन्होंने पहले ही दिन फिल्म मेकर्स के सामने साफ शर्त रख दी थी कि वो ना तो कभी छोटे या बोल्ड कपड़े पहनेंगी, और ना ही पर्दे पर कोई इंटिमेट किस्सिंग सीन देंगी। यही वजह थी, कि फिल्म के एक बेहद रोमांटिक और मशहूर सीन में, जब सलमान और भाग्यश्री के होठ मिलने वाले थे, तो डायरेक्टर को दोनों के बीच एक पारदर्शी कांच की दीवार, यानी ग्लास बैरियर रखना पड़ा था। ताकि होठों का सीधा मिलन ना हो सके। उसी दौर में फिल्म के प्रमोशन के लिए एक ऐसा वाक्या हुआ, जिसने भाग्यश्री के दिलो दिमाग में पूरी फिल्म इंडस्ट्री को लेकर एक गहरी नफरत और डर भर दिया। एक मशहूर और बेहद शातिर बॉलीवुड फोटोग्राफर ने सलमान खान को कोने में ले जाकर फुसफुसाते हुए एक बेहद घटिया सुझाव दिया। उस फोटोग्राफर ने सलमान से कहा कि जैसे ही कैमरा ऑन हो वो भाग्यश्री को बिना बताए अचानक अपनी बाहों में खींच लें और उन्हें जबरन होठों पर चूम कर लें ताकि मैगजीन के कवर के लिए एक सेंसेशनल और हॉट तस्वीर मिल सके। उस वक्त भाग्यश्री वहीं कुछ ही दूरी पर खड़ी थी और उन्होंने अपने कानों से उस फोटोग्राफर की यह गंदी साजिश सुन ली। उनका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वो कांप उठी और उन्हें लगा कि उनका मान सम्मान अब तार-तार हो जाएगा। लेकिन उसी पल सलमान खान ने उस फोटोग्राफर को जो करारा और तीखा जवाब दिया। उसने भाग्यश्री की नजरों में सलमान के लिए हमेशा हमेशा के लिए एक सच्चा सम्मान पैदा कर दिया। सलमान ने उस फोटोग्राफर को बुरी तरह डांटते हुए साफ कह दिया कि वह किसी भी शरीफ लड़की की मर्जी और इजाजत के बिना ऐसी घटिया हरकत अपने पूरे करियर में कभी नहीं करेंगे। सलमान की शराफत ने उस दिन भाग्यश्री को बचा तो लिया लेकिन माया नगरी की इस गिद्ध जैसी सोच ने भाग्यश्री के मन में यह खौफ पक्का कर दिया कि यह चकाचौंध भरी दुनिया उनके जैसी राजसी लड़की के लिए नहीं बनी है। इधर पूरा हिंदुस्तान भाग्यश्री के हुस्न और अदाकारी पर अपना दिल लुटा रहा था। तो उधर उनके दिल में किसी और ही शख्स की हुकूमत चल रही थी। उस शख्स का नाम था हिमालय दासानी। दोनों की पहली मुलाकात मुंबई के एक स्कूल में आठवीं क्लास में हुई थी। जहां भाग्यश्री बेहद शांत और क्लास मॉनिटर थी। और हिमालय क्लास के सबसे बिगड़े और बैक बेंचर लड़कों में गिने जाते थे। स्कूल की बेंच से शुरू हुई यह नोकझोंक कब बेपनाह मोहब्बत में बदल गई दोनों को पता ही नहीं चला। हिमालय एक अमीर सिंधी मारवाड़ी कपड़ा कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते थे। जैसे ही सांगली के राजमहल में यह खबर पहुंची कि उनकी ज्येष्ठ राजकुमारी एक गैर राजसी सिंधी लड़के से विवाह करना चाहती है। सांगली के महलों में जैसे भूकंप आ गया। राजा विजय सिंह राजे और रानी राजक्ष्मी राजे ने इसे अपनी सदियों पुरानी मराठा ब्राह्मण कुलीनता और राजसी मान मर्यादा पर सीधा हमला माना। महलों के दरवाजे सख्त कर दिए गए। भाग्यश्री के फोन छीन लिए गए और हिमालय से उनका हर राबता हमेशा के लिए खत्म करने का फरमान जारी कर दिया गया। मामले को दबाने के लिए हिमालय को पढ़ाई के बहाने अमेरिका भेज दिया गया। लेकिन समंदर पार की यह दूरियां भी उन दोनों के दरमियान बहती मोहब्बत की आग को बुझा नहीं पाई। साल 1989 के आखिर में जब हिमालय अमेरिका से वापस लौटे और मैंने प्यार किया। अपनी रिलीज़ के मुहाने पर खड़ी थी। तब भाग्यश्री ने अपने माता-पिता के सामने घुटनों पर बैठकर अपने प्यार की भीख मांगी। लेकिन राजसी हट के आगे उनकी आंसुओं की कोई कीमत नहीं थी। जब पाबंदियां हद से ज्यादा बढ़ गई तो 23 फरवरी 1969 को जन्मी उस नाजुक राजकुमारी ने एक ऐसा खतरनाक कदम उठाया जिसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी। भाग्यश्री ने अपने कमरे से हिमालय को एक खौफनाक और आखिरी फोन मिलाया। उन्होंने कहा कि आज मेरी जिंदगी का फैसला होने जा रहा है। या तो हम हमेशा के लिए एक होंगे या कभी नहीं। मैं अपने घर की चौखट लांग कर बाहर आ रही हूं। अगर सच में मुझसे प्यार करते हो तो ठीक 15 मिनट के अंदर मुझे लेने पहुंच जाओ। हिमालय अपनी गाड़ी लेकर भागे-भागे पहुंचे। और भाग्यश्री अपने पुरखों का अरबों का राजसी वैभव, सोने चांदी के बर्तन और अपनी करोड़ों की विरासत को एक झटके में लात मारकर अपने प्रेमी के साथ फरार हो गई। मुंबई के एक छोटे से मंदिर में मंत्रोचार के बीच भाग्यश्री और हिमालय दासानी ने गुपचुप फेरे ले लिए। सांगली राजघराने से कोई भी इस शादी में शरीक नहीं हुआ। उनके माता-पिता ने अपनी बड़ी बेटी को कुल की मर्यादा तार-तार करने के जुर्म में हमेशा के लिए मरा हुआ घोषित कर दिया, और उससे हर रिश्ता तोड़ लिया। उस गुमनाम मंदिर में अगर कोई भाग्यश्री की तरफ से खड़ा था, तो वह थे उनके डायरेक्टर सूरज बडजात्या और उनके को-स्टार सलमान खान। जिस वक्त पूरा देश भाग्यश्री के कदमों में बिछा था, उस वक्त वो एक छोटे से कमरे में अपने प्यार की खातिर सब कुछ लुटा कर खड़ी थी। लेकिन इस बगावत के बाद भाग्यश्री ने अपने फिल्मी करियर के साथ जो किया उसे बॉलीवुड के इतिहास की सबसे बड़ी खुदकुशी कहा जाता है। मैंने प्यार किया कि ऐतिहासिक कामयाबी के बाद यश चोपड़ा, सुभाष खई और मनमोहन देसाई जैसे उस दौर के सबसे बड़े फिल्म मेकर भाग्यश्री के दरवाजे पर मुंह मांगी रकम के चेक लेकर कतार लगाए खड़े थे। अमिताभ बच्चन, आमिर खान और अनिल कपूर जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम करने के ऑफर्स की झड़ी लगी थी। लेकिन शादी के खुमार में डूबी भाग्यश्री ने बॉलीवुड के सामने एक ऐसी बेतुकी और जिद भरी शर्त रख दी जिसने पूरी इंडस्ट्री के होश उड़ा दिए। उन्होंने ऐलान कर दिया कि वह भविष्य में सिर्फ और सिर्फ उसी फिल्म में काम करेंगी जिसमें उनके पति हिमालय दासानी को ही मेन हीरो बनाया जाएगा। इस बचकानी शर्त ने टॉप डायरेक्टर्स के पसीने छुड़ा दिए। क्योंकि हिमालय दासानी ना तो एक्टिंग का कंघरा जानते थे और ना ही दर्शकों के बीच उनकी कोई पूछ थी। फिर भी भाग्यश्री के उस दौर के जबरदस्त स्टारडम को भुनाने के लालच में कुछ छोटे निर्माताओं ने यह कड़वा घूंट पिया।
साल 1992 में इस पति-पत्नी की जोड़ी की लगातार तीन फिल्में रिलीज हुई। कैद में है बुलबुल, त्यागी और पायल। इन तीनों फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर जो हश्र हुआ उसने इतिहास रच दिया। दर्शकों ने हिमालय दासानी की अनाड़ी और बेजान एक्टिंग को सिरे से नकार दिया और तीनों ही फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मुंह गिर कर तबाह हो गई। बड़े पर्दे पर हिमालय की मौजूदगी ने भाग्यश्री के उस जादुई आकर्षण की भी बेइज्जती कर दी जो सुमन के रूप में लोगों के दिलों में बसा था। साल 1993 में फिल्म घर आया मेरा परदेसी के बाद बॉलीवुड ने भाग्यश्री के लिए अपने दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर लिए और वह मजबूरन कुछ दोयम दर्जे की तेलुगु, कन्नड़ और भोजपुरी फिल्मों तक सिमट कर रह गई। इधर करियर तबाह हो चुका था और उधर भाग्यश्री की निजी जिंदगी में भी एक के बाद एक ऐसे काले पन्ने जुड़ते जा रहे थे जिन्होंने उनकी रूह तक को छलनी कर दिया। जब उनके पहले बेटे अभिमन्यु का जन्म हुआ और वह अस्पताल के बिस्तर पर दर्द से करा रही थी। तभी एक मशहूर फिल्मी मैगजीन की लेडी रिपोर्टर ने वार्ड में घुसकर उनसे एक ऐसा जहरीला सवाल पूछ लिया जिसने भाग्यश्री के पैरों तले से जमीन खिसका दी। उस रिपोर्टर ने बेहद बेशर्मी से पूछा कि क्या इस बच्चे के असली बाप सलमान खान है? और क्या उनका सलमान के साथ नाजायज रिश्ता चल रहा था? उस घिनौने सवाल ने भाग्यश्री को अंदर से तोड़ कर रख दिया और उन्होंने मीडिया की दुनिया से अपने आप को हमेशा के लिए एक अंधेरे कमरे में बंद कर लिया। वक्त का पहिया आगे घूमता रहा लेकिन दासानी परिवार की मुश्किलें कम होने के बजाय कानूनी दलदल में तब्दील होती चली गई। साल 2016 में मुंबई के सेंटाक्रूज इलाके में भाग्यश्री की गाड़ी से एक गरीब दोपहिया सवार मोहम्मद तौसीफ शेख बुरी तरह कुचल गया। कोर्ट के समन को नजरअंदाज करने के बाद पुलिस ने भाग्यश्री के खिलाफ सख्त एफआईआर दर्ज की और उन्हें कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते हुए जमानत लेनी पड़ी। लेकिन इस घटना से भी बड़ा और शर्मनाक झटका साल 2019 के जुलाई महीने में लगा। जब मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जोगेश्वरी में चल रहे एक बेहद हाई प्रोफाइल क्रिकेट सट्टेबाजी और जुआ रैकेट का भंडाफोड़ किया। पकड़े गए सट्टेबाजों के मोबाइल रिकॉर्ड्स और हवाला के लेनदेन के तार सीधे हिमालय दासानी के साथ जुड़े पाए गए। 2 जुलाई 2019 को पुलिस ने लोखंडवाला स्थित उनके आलीशान फ्लैट पर छापा मारकर हिमालय दासानी कोंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। हालांकि भाग्यश्री ने इसे उगाही का झूठा केस बताकर अपने पति का बचाव किया। लेकिन इस गिरफ्तारी ने सांगली के राजमहल से लेकर मुंबई के समाज में दासानी परिवार की बची कुची इज्जत की भी धज्जियां उड़ा दी। यही वो दौर था जब सांगली राजघराने और दासानी परिवार के बीच उस सबसे बड़ी जंग की नींव पड़ी जिसने आज एक भयानक बगावत का रूप ले लिया है। इस पूरे विवाद का असली केंद्र बिंदु है सांगली में कृष्णा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक श्रीमंत गणपति पंचायतन संस्थान। लगभग 200 साल पुराना यह वही मंदिर है जिसकी स्थापना पटवर्धन राजाओं ने की थी। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है बल्कि इस ट्रस्ट के पास सांगली, पुणे और कोल्हापुर के प्राइम लोकेशनेशंस में फैली अरबोंखरबों रुपए की जमीनें और संपत्तियां मौजूद हैं। इस संस्थान की गद्दी को संभालने के लिए अंग्रेजों के जमाने में 25 नवंबर 1940 को एक शाही कानून पास किया गया था। जिसके मुताबिक इस संस्थान की गद्दी, पूजा का अधिकार और पूरी जायदाद वाले सिर्फ और सिर्फ पटवर्धन राज परिवार का कोई जीवित हिंदू पुरुष वारिस ही हो सकता था। साल 1990 में जब भाग्यश्री ने अपने बेटे को जन्म दिया तो बेटी के मुंह में राजा विजय सिंह राजे का दिल कुछ पसीजा था और रिश्तों में थोड़ी नरमी आई थी। इसी सुलह के चलते साल 2013 में राजा विजय सिंह राजे ने मंदिर और ट्रस्ट की गिरती व्यवस्था को संभालने के लिए अपने दामाद हिमालय दासानी पर भरोसा जताया और उन्हें ट्रस्ट की पावर ऑफ अटॉर्नी सौंप दी। लेकिन यह फैसला उस राजघराने के लिए सबसे बड़ी गलती साबित हुआ। आरोप है कि 2013 से 2016 के बीच हिमालय दासानी ने अपने रसूख का गलत इस्तेमाल करते हुए भगवान गणेश के संस्थान की बेशकीमती जमीनों के अनऑथोराइज सौदे करने शुरू कर दिए और ट्रस्ट के करोड़ों रुपए के फंड में भारी हेराफेरी की। खुद रानी राजलक्ष्मी राजे ने बाद में सरेआम यह इल्जाम लगाया कि उनके दामाद ने भगवान के घर को भी नहीं बख्शा और कई संदिग्ध सौदे किए जिन्हें उस वक्त परिवार की बदनामी के डर से दबा दिया गया था। पानी जब सिर से ऊपर गुजर गया तो साल 2016 में राजा विजय सिंह राजे ने एक सख्त फरमान जारी करते हुए हिमालय दासानी के सभी अधिकार तुरंत प्रभाव से छीन लिए।
उन्हें ट्रस्ट से दूध में से मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया और सांगली में उनके कदम रखने पर भी सख्त पाबंदी लगा दी। इस घटना के बाद राजमहल के भीतर एक अजीब सी दहशत फैल गई। राजा और रानी बूढ़े हो रहे थे। उनकी कोई सगी नर औलाद नहीं थी और उन्हें यह साफ अंदेशा हो गया था कि उनके मरते ही भाग्यश्री और उनके पति हिमालय दासानी पूरी रियासत और मंदिर की संपत्तियों पर कब्जा कर लेंगे। इसी खौफ और 1940 के पुरुष उत्तराधिकार के उस पुराने कानून को बचाने के लिए जनवरी 2024 में सांगली के माल बंगले में एक बेहद रणनीतिक खेल खेला गया। राजा विजय सिंह राजे और रानी राजक्ष्मी राजे ने पूरे हिंदू रीति-रिवाज से एक 16 साल के लड़के आदित्य अभ्यंकर को अपना गोद लिया हुआ बेटा बना लिया। ये आदित्य कोई और नहीं बल्कि मंदिर के मैनेजर जयदीप अभ्यंकर का बेटा था। जो रिश्ते में रानी का सगा भांजा और खुद भाग्यश्री का ममेरे भाई लगता था। गोद लेने के बाद उस लड़के का शाही नामकरण किया गया युवराज आदित्य राजे पटवर्धन और राजा ने एक वसीयत के जरिए ऐलान कर दिया कि सांगली रियासत राजमहल और गणपति संस्थान का एकमात्र कानूनी वारिस सिर्फ और सिर्फ युवराज आदित्य राजे होगा। इस एक मास्टर स्ट्रोक ने भाग्यश्री और उनकी दोनों बहनों को अपनी ही जायदाद से पूरी तरह बेदखल और पराया कर दिया। अंदर ही अंदर सुलग रही इस चिंगारी को शोला बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा और यह ज्वालामुखी फटा सितंबर 2026 के पावन गणेशोत्सव के दौरान। पूरे 4 साल के लंबे बहिष्कार के बाद गणेश चतुर्थी के पावन मौके पर भाग्यश्री अचानक अपने पति हिमालय दासानी के साथ सांगली के गणपति मंदिर में आ धमकी। सांगली की 200 साल पुरानी परंपरा रही है कि उत्सव की पहली महाारती और गणपति बाप्पा की स्थापना सिर्फ और सिर्फ संस्थान का राजा या रानी ही कर सकते हैं या फिर उनके द्वारा घोषित युवराज। उस सुबह राजा विजय सिंह राजे मंदिर में मौजूद नहीं थे। इसी मौके का फायदा उठाते हुए भाग्यश्री ने नए बने युवराज आदित्य राजे को पूरी तरह नजरअंदाज किया और सीधे मंदिर के पवित्र गर्भगृह में घुस गई। वहां उन्होंने पुरोहितों को दरकिनार करते हुए आरती की थाल उठाई और खुद पहली महा आरती शुरू कर दी। जैसे ही मंदिर के मैनेजर जयदीप अभ्यंकर यानी युवराज के सगे पिता ने भाग्यश्री को रोकने की कोशिश की। मंदिर के गर्ग गृह में ही दोनों तरफ से तीखी गाली गलौज और धक्कामुक्की शुरू हो गई। वहां मौजूद सैकड़ों श्रद्धालुओं के सामने राजघराने की मर्यादा तार-तार हो गई। लोगों ने अपने मोबाइल से इस खौफनाक झगड़े के वीडियो रिकॉर्ड कर लिए और देखते ही देखते यह वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। पूरे महाराष्ट्र में हड़कंप मच गया कि आखिर बॉलीवुड एक्ट्रेस अपने ही कुल देवता के मंदिर में इस तरह जबरन क्यों घुसाईं? विवाद को तड़ पकड़ता देख भाग्यश्री ने फौरन मराठी न्यूज़ चैनलों पर आकर अपनी सफाई पेश की। उन्होंने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उनके पिता राजा विजय सिंह राजे की तबीयत काफी समय से बहुत खराब चल रही थी। वह बिस्तर पर थे और क्योंकि राजघराने में तीन बेटियां हैं इसलिए सबसे बड़ी बेटी होने के नाते कुल की परंपरा को निभाने और पिता के स्वास्थ्य की खातिर उन्होंने आगे बढ़कर बाप्पा की आरती की थी।
इसमें कोई गलत नियत नहीं थी। लेकिन भाग्यश्री का यह इमोशनल कार्ड ज्यादा देर नहीं चल सका। अपनी बेटी के इस बयान के चंद घंटों के भीतर राजा विजय सिंह राजे ने सांगली में एक तूफानी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुला ली। राजा के चेहरे पर गुस्सा साफ नजर आ रहा था। उन्होंने भरी मीडिया के सामने गरजते हुए कहा कि वह पूरी तरह स्वस्थ और अपने पैरों पर खड़े हैं और उनकी बीमारी का बहाना बनाकर उनकी बेटी ने सफेद झूठ बोला है। राजा ने बेहद कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि भाग्यश्री ने मंदिर के पवित्र नियमों को रौंदते हुए गर्भगृह पर जबरन कब्जा किया। राजा ने दो टूक लहजे में कहा कि किसी को भी यह घमंड नहीं होना चाहिए कि वह बेटी है तो परंपराओं और कानून से ऊपर हो गई। सांगली की जनता और यह रियासत इस मनमानी को कभी कबूल नहीं करेगी। उन्होंने साफ ऐलान किया कि आदित्य राजे ही उनके एकमात्र कानूनी वारिस हैं और वही इस गद्दी को संभालेंगे। पास बैठी रानी राजक्ष्मी राजे ने भी अपनी सगी बेटी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए जनता से हाथ जोड़कर अपील की कि वह भगवान गणेश की जमीनों को नोच खाने वाले भूमाफियाओं और मौका परस्त रिश्तेदारों के बहकावे में बिल्कुल ना आए। अब यह जंग मंदिर की चौखट से निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालतों के दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है। इस पूरे विवाद के पीछे एक बेहद पेचीदा कानूनी पेंच फंसा हुआ है। एक तरफ है देश का कानून यानी हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 जो साफ कहता है कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी का भी बेटे के बराबर जन्मसिद्ध अधिकार होता है। इस कानून के दम पर भाग्यश्री और उनकी बहनें सांगली के महलों, निजी जमीनों और बैंक खातों पर अपना 50% से ज्यादा हक जता सकती हैं।
लेकिन दूसरी तरफ खड़ा है 1940 का वो पुराना सांगली संस्थान कानून जो कहता है कि इस ऐतिहासिक धार्मिक ट्रस्ट की गद्दी पर सिर्फ कोई पुरुष वारिस ही बैठ सकता है। इसके अलावा हिंदू कानून यह भी कहता है कि 15 साल से बड़े बच्चे को केवल तभी गोद लिया जा सकता है जब परिवार में ऐसी कोई पुख्ता और पुरानी परंपरा रही हो। और आदित्य राजे को 16 साल की उम्र में गोद लिया गया था। आज हालात यह हैं कि सांगली का वो राजमहल जो कभी अपनी आन बान शान के लिए जाना जाता था। आज पारिवारिक मुकदमों और गंदी सियासत का अखाड़ा बन चुका है। जिस भाग्यश्री ने कभी अपनी मोहब्बत को पाने के लिए एक झटके में राजघराने के ऐशो आराम और बॉलीवुड की नंबर वन कुर्सी को ठोकर मार दी थी। आज वही भाग्यश्री अपने ही मां-बाप की नजरों में एक बेदखल बेटी बनकर अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं। यह दास्तान इस कड़वे सच का सबसे बड़ा सबूत है कि जब महलों के भीतर दौलत, जमीन और अविश्वास का जहर घुलता है तो ना तो कोई बेटी सुमन रह जाती है और ना ही कोई पिता राजा। रह जाती है तो सिर्फ कोर्ट की तारीखें और कभी ना खत्म होने वाली नफरत।