दिलीप कुमार और पाकिस्तानी जासूस (या देशद्रोह) से जुड़ी यह बात भारतीय सिनेमा इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित दौर में से एक मानी जाती है। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान और उसके ठीक बाद दिलीप कुमार के जीवन में यह गंभीर मोड़ आया था।इस पूरे वाकये और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई की पूरी कहानी इस प्रकार है
. 1965 का युद्ध और घर पर पुलिस की छापेमारीसितंबर 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, उस समय देश का माहौल बेहद संवेदनशील था। सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया विभाग हर संदिग्ध व्यक्ति या खबर पर पैनी नजर बनाए हुए थे। इसी दौरान अफवाहें और कुछ तथाकथित राजनीतिक रिपोर्टें उड़ीं कि मुंबई में मौजूद कुछ नामी हस्तियों के तार सीमा पार जुड़े हो सकते हैं।इसी आधार पर मुंबई पुलिस और खुफिया विभाग ने दिलीप कुमार के मुंबई स्थित घर पर अचानक छापेमारी (Raid) की थी।2. छापेमारी में असल में क्या मिला था
?उस समय दिलीप कुमार के विरोधियों और कुछ समाचार पत्रों ने इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर उछाला कि “दिलीप कुमार के घर से पाकिस्तानी जासूस होने के सबूत, कोड वर्ड्स या कोई गुप्त ट्रांसमीटर (रेडियो) मिला है।”लेकिन सच्चाई यह है कि पुलिस और खुफिया एजेंसियों को उनके घर से ऐसा कोई भी सबूत या कोई आपत्तिजनक दस्तावेज नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि वे जासूसी में शामिल थे या देशद्रोही थे। जांच अधिकारियों ने छानबीन के बाद उन्हें पूरी तरह क्लीन चिट (Clean Chit) दी थी।. यह विवाद क्यों बढ़ा था?
दिलीप कुमार पर इस तरह के आरोप लगने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण थे: * उनका जन्म और मूल पहचान: दिलीप कुमार (मोहम्मद यूसुफ खान) का जन्म पेशावर में हुआ था और विभाजन के समय उनके कई रिश्तेदार पाकिस्तान में ही रह गए थे। युद्ध के माहौल में इस पृष्ठभूमि को लेकर कुछ लोगों ने उन पर आसानी से शक करना शुरू कर दिया। * राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता: दिलीप कुमार नेहरूवादी विचारधारा के समर्थक थे और कांग्रेस पार्टी के काफी करीब थे। तत्कालीन राजनीति में कुछ विरोधी धड़े और दक्षिणपंथी संगठन उन्हें अक्सर निशाना बनाते थे। *
पाकिस्तानी पुरस्कार ‘निशान-ए-इम्तियाज’ (1998): आगे चलकर जब 1998 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ देने की घोषणा की, तब यह विवाद एक बार फिर गर्मा गया। शिवसेना (विशेषकर बालासाहेब ठाकरे) ने उनका कड़ा विरोध किया और मांग की कि दिलीप कुमार यह सम्मान लौटा दें। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिलीप कुमार को सलाह दी थी कि यह पुरस्कार कला और दो देशों के सांस्कृतिक रिश्तों के सम्मान में है, इसलिए इसे लौटाने की आवश्यकता नहीं है।
दिलीप कुमार का रुखदिलीप कुमार को इस छापेमारी और अपने ही देश में देशभक्ति का सबूत मांगने वाली बात से गहरा सदमा पहुंचा था। उन्होंने अपनी आत्मकथा (The Substance and the Shadow) में भी इसका दर्द बयां किया है कि कैसे एक सच्चे देशभक्त नागरिक को सिर्फ उसके नाम, जन्मस्थान और धर्म के आधार पर संदेहास्पद नजरों से देखा गया, जबकि उन्होंने भारत की कला और समाज के लिए अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी थी।निष्कर्ष:दिलीप कुमार के घर से पाकिस्तानी जासूस होने के कोई सबूत कभी नहीं मिले। यह उस दौर की सांप्रदायिक और राजनीतिक खींचतान से उपजी एक ऐसी अफवाह थी, जिसने एक महान अभिनेता को अंदर तक दुखी किया था।