नमस्कार दोस्तों, एक बार फिर आप सभी का स्वागत है मनोज फिल्मी पडकास्ट में। 70 का दशक बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना के लिए एक सपने जैसा था। लेकिन अमिताभ बच्चन की लगातार 20 सफल फिल्मों ने इसे एक डरावनी सच्चाई में बदल दिया। 1973 की जंजीर से शुरू हुआ यह ट्रेंड 1978 की मुकद्दर का सिकंदर तक बॉलीवुड को पूरी तरह से बदल चुका था। इन फिल्मों की सफलता ने राजेश खन्ना के मन में स्टारडम खोने का डर पैदा कर दिया था। आइए जानते हैं अमिताभ बच्चन की उन 20 फिल्मों के बारे में जिनकी मदद से अमिताभ बने सदी के महानायक। दोस्तों वीडियो में आगे बढ़ने से पहले प्लीज मेरे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन को जरूर प्रेस कर दीजिएगा।
तो चलिए दोस्तों वीडियो को शुरू करते हैं। 70 का दशक बॉलीवुड के इतिहास में किसी रोमांचक फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं था। एक तरफ बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का जादू था। जिनके आगे बड़े-बड़े सेलिब्रिटी भी सिर झुकाते थे। तो दूसरी तरफ वो लंबा चौड़ा नौजवान था। जिसने अपने शुरुआती दिनों में 12 फ्लॉप फिल्में झेली थी। लेकिन 1973 और 1978 के बीच कुछ ऐसा हुआ कि राजेश खन्ना को सच में अपना स्टारडम खोने का डर सताने लगा था।
अमिताभ बच्चन की उन 20 लैंडमार्क फिल्मों ने ना सिर्फ बॉक्स ऑफिस के समीकरण बदले बल्कि राजेश खन्ना के चॉकलेटी रोमांस के दौर को भी खत्म कर दिया और एंग्री यंग मैन के सुनहरे दौर की शुरुआत की। आइए जानते हैं उस दौर के बारे में जब बॉलीवुड का पूरा का पूरा खेल ही बदल गया। कहानी शुरू होती है 1973 से जब राजेश खन्ना बॉक्स ऑफिस पर छाए हुए थे। लेकिन फिर जंजीर से पुलिस की वर्दी पहने एक एंग्री यंग मैन ने ऐसी धूम मचाई कि पूरा सिस्टम हिल गया। इसके तुरंत बाद ऋषिकेश मुखर्जी की नमक हराम आई। जिसमें राजेश खन्ना के सामने खड़े अमिताभ ने शो चुरा लिया और कहा जाता है कि तभी पहली बार काका को अपना स्टारडम खोने का डर सताने लगा। उसी साल अमिताभ ने अभिमान में एक कलाकार के ईगो की कहानी कहकर दर्शकों के दिलों में गहरी जगह बनाई।
अगले 2 सालों में अमिताभ बच्चन ने थ्रिलर और ड्रामा का कॉकटेल पेश किया। जिससे वह मजबूर, कसौटी और बेनाम जैसी फिल्मों से घर-घर में मशहूर हो गए। 1975 वह साल था जिसने बॉलीवुड के इतिहास को बांट दिया। एक तरफ दीवार में अमिताभ बच्चन के आज खुश तो बहुत होगे तुमने राजेश खन्ना के चॉकलेट रोमांस के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। तो दूसरी तरफ शोले की सुनामी ने उन्हें सिक्का उछालने के तौर पर स्थापित कर दिया। उसी साल उसी साल जमीर और मिली जैसी फिल्मों ने उनकी एक्टिंग की विविधता को दिखाया। 1970 के दशक के आगे बढ़ने के साथ राजेश खन्ना को सोलो फिल्में पाने के लिए संघर्ष करना पड़ा। जबकि अमिताभ बच्चन ने मल्टीस्टारर फिल्मों के साथ बॉक्स ऑफिस पर राज किया। दो अनजाने में बदले की आग और हेराफेरी की मस्ती ने उन्हें युवाओं का पसंदीदा बना दिया। फिर 1977 में अमर अकबर एंथनी ने कॉमेडी और कमर्शियल सिनेमा के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसने परवरिश, खून पसीना और अदालत जैसी बैक टू बैक हिट फिल्मों के साथ राजेश खन्ना को एहसास दिलाया कि वह दौर जब सिर्फ गर्दन टेढ़ी करके मुस्कुराने से फिल्में बन जाती थी।
अब खत्म हो गया है। आखिरकार 1978 वो गोल्डन ईयर बन गया जिसने पूरी तरह से खेल बदल दिया। डॉन के रूप में उन्होंने अंडरवर्ल्ड का ऐसा अकड़ दिखाया कि दुनिया दीवानी हो गई। जबकि त्रिशूल में अपने पिता के खिलाफ खड़े एक बागी बेटे के रूप में उनकी दहाड़ ने राजेश खन्ना की बची कुची हिम्मत को चकनाचूर कर दिया। उसी साल कसमे वादे में अमिताभ बच्चन के डबल रोल और मुकद्दर का सिकंदर में उनके बलिदान जिसमें सिकंदर जोहराबाई के कोठे पर मर जाता है ने अमिताभ को बॉलीवुड का बेताज बादशाह बना दिया। इन 20 फिल्मों के सफर ने राजेश खन्ना को
एहसास दिलाया कि किंग ऑफ रोमांस का दौर खत्म हो गया है और वन मैन इंडस्ट्री का दौर शुरू हो गया है। इन 20 फिल्मों की लगातार सफलता ने राजेश खन्ना को दिमागी तौर पर हिला दिया था। 1978 के बाद काका को एहसास हुआ कि उनका नाम अब थिएटर में नहीं दिखाया जा रहा है। राजेश खन्ना की हार का सबसे बड़ा कारण बदलाव को अपनाने की उनकी अनच्छा थी। 1978 तक सिनेमाई सोच बदल चुका था। महंगाई, बेरोजगारी और इमरजेंसी के बाद का गुस्सा हर जगह था। राजेश खन्ना अभी भी बावर्ची और आनंद की सादगी में डूबे हुए थे। जबकि अमिताभ सिस्टम के खिलाफ बागी बन गए थे। तो दोस्तों, आज का यह वीडियो यहीं समाप्त करते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। तब तक के लिए आप सभी को टाटा बाय-ब टेक केयर।