जरा सोचिए एक ऐसी जमीन के बारे में जो साल में दो बार तबाह होती है। बारिश के मौसम में वही जमीन पानी में इतनी डूब जाती है कि किसान अपने ही खेत में नाव चलाने की सोचने लगे और बाकी 10 महीने वही जमीन इतनी सूखी और खारी हो जाए कि उस पर घास का एक तिनका तक ना उगे। एक ऐसी जमीन जहां किसान हर साल दोहरी मार झेलते हैं। पहले बाढ़ की मार फिर सूखे की मार। अब सोचिए कि इसी जमीन को किसी ने बिना कोई नई नहर बनाए, बिना कोई बड़ा बांध खड़ा किए सिर्फ एक छोटे से गड्ढे और एक पाइप की मदद से हमेशा के लिए हराभरा बना दिया। यकीन नहीं होता ना? लेकिन यह कोई कल्पना नहीं है। यह गुजरात के एक इलाके की सच्ची कहानी है जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को हैरान कर दिया। इस वीडियो के अंत तक बने रहिएगा क्योंकि जो तरीका आज हम आपको बताने वाले हैं, वह इतना अनोखा है कि सुनने के बाद आप भी यही सोचेंगे कि आखिर यह आईडिया किसी के दिमाग में आया कैसे? लेकिन वीडियो में आगे बढ़ने से पहले हमारी आपसे एक रिक्वेस्ट है कि अगर आप हमारे चैनल पर पहली बार आए हैं तो प्लीज इसे सब्सक्राइब जरूर कर लीजिएगा और अगर वीडियो पसंद आए तो लाइक करना मत भूलिएगा। समस्या की जड़ जब एक ही जमीन दो अलग मुसीबतों में फंसी थी। बात है उत्तर गुजरात के पाटन जिले की। खासतौर पर सामी तालुका के इलाके की। यहां सालाना बारिश बहुत कम होती है। लेकिन जो थोड़ी बहुत बारिश होती भी है, वह कुछ ही दिनों में इतनी तेज बरस जाती है कि पूरा इलाका पानी में डूब जाता है। समस्या यह थी कि यहां की मिट्टी के नीचे खारे पानी की एक मोटी परत है जो बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने ही नहीं देती।
नतीजा यह होता कि बारिश का पानी खेतों में ही जमा रहता। फसलें सड़ जाती और किसान का पूरा साल बर्बाद हो जाता। बारिश खत्म होते ही वही इलाका बिल्कुल उल्टी समस्या में फंस जाता। जमीन के अंदर मौजूद खारा पानी ऊपर की सतह तक पहुंच जाता। मिट्टी में नमक जमा हो जाता और जमीन इतनी बंजर हो जाती कि साधारण फसल उगाना नामुमकिन हो जाता। यानी एक ही जमीन एक तरफ बाढ़ से तबाह और दूसरी तरफ सूखे और खारेपन से तबाह। किसान परिवार गरीबी में डूबते चले गए। कई लोगों ने खेती छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर लिया और कुछ किसान तो कर्ज के बोझ तले इतने दब गए कि हालात बहुत ही निराशाजनक हो गए। सरकार और कई संस्थाओं ने इस समस्या को सुलझाने के लिए पहले भी कई कोशिशें की। कहीं बड़े बांध बनाए गए तो कहीं नहरे खोदी गई। लेकिन ज्यादातर योजनाएं बहुत महंगी थी और छोटे तथा गरीब किसानों तक उनका फायदा पहुंच ही नहीं पाता था। बोरवेल खोदने की भी कोशिश हुई। लेकिन जमीन के अंदर पहले से मौजूद खारे पानी की वजह से बोरवेल का पानी भी खेती के काम का नहीं रहता था। ऐसा लगने लगा था कि यह समस्या शायद हमेशा के लिए इस इलाके की तकदीर बन चुकी है और यहां के लोग इसी हाल में जीने को मजबूर रहेंगे। एक इंजीनियर की सोच जब आपदा में ही छुपा था समाधान। साल 2001 में गुजरात में एक भयानक भूकंप आया था जिसने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया। इसी भूकंप के बाद राहत और पुनर्वास के काम में जुटे एक इंजीनियर थे विप्लव केतन पॉल। वे महिलाओं के समूहों के साथ मिलकर पानी से जुड़ी समस्याओं पर काम कर रहे थे। इसी दौरान उन्होंने एक बहुत दिलचस्प पैटर्न देखा।
भूकंप के कुछ महीनों बाद जब भयंकर गर्मी पड़ी तो पानी की भारी कमी हो गई। लेकिन उसके ठीक बाद जब मानसून आया तो वही इलाका भारी बारिश और जलजमाव से जूझने लगा। विप्लव ने महसूस किया कि यह दोनों समस्याएं असल में एक दूसरे का हल हो सकती हैं जो पानी ऊपर बाढ़ बनकर तबाही मचाता है। अगर उसी पानी को जमीन के अंदर गहराई में सुरक्षित तरीके से उतार दिया जाए तो वही पानी सूखे के मौसम में किसानों की सबसे बड़ी जरूरत बन सकता है। यह सोच सुनने में जितनी आसान लगती है, इसे हकीकत में बदलना उतना ही मुश्किल था। लेकिन विप्लव ने हार नहीं मानी और स्थानीय इंजीनियरों तथा गांव की महिलाओं के साथ मिलकर एक नई तकनीक तैयार की [संगीत] जिसे उन्होंने नाम दिया घुंगरू। गुजराती भाषा में घुंघरू का मतलब होता है खोखली नली या पुवाल जैसी नली। शुरुआती दिनों में उन्हें कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। एक तरफ यह पक्का करना था कि पानी सही गहराई तक पहुंचे और दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना था कि जमीन के अंदर मौजूद खारे पानी के साथ मीठा पानी सही अनुपात में मिले। साथ ही हर इलाके की मिट्टी अलग होने की वजह से एक ही डिजाइन हर जगह काम नहीं कर सकता था। विप्लव और उनकी टीम ने महीनों तक अलग-अलग प्रयोग किए। कई बार असफलता भी मिली। लेकिन हर असफलता से कुछ नया सीखकर वे आगे बढ़ते रहे। जब तक कि उन्हें वह सही तरीका नहीं मिल गया जो भरोसे के साथ काम कर सके। घुंघरू तकनीक, गड्ढा और पाइप का अनोखा जादू। अब बात करते हैं कि आखिर यह भुंघरू तकनीक काम कैसे करती है।
खेत में एक खास तरह का गड्ढा खोदा जाता है और उसके अंदर एक फिल्टर लगा पाइप बिठाया जाता है। यह पाइप सीधे जमीन के नीचे मौजूद उन परतों तक पहुंचता है जहां भारी मात्रा में पानी जमा किया जा सकता है। कभी-कभी यह गहराई 100 मीटर से भी ज्यादा होती है। मानसून के दौरान जब खेतों में पानी भर जाता तो उसी पानी को इस पाइप के जरिए छानते हुए जमीन के अंदर गहराई में इंजेक्ट कर दिया जाता। यह प्रक्रिया साल में सिर्फ 10 दिन के आसपास चलती है। लेकिन इतने कम समय में जमा किया गया पानी अगले 7 महीने तक किसानों के काम आता है। एक घुंघरू में 4 लाख लीटर से लेकर 4 करोड़ लीटर तक पानी जमा किया जा सकता है। वह भी सिर्फ 1 वर्ग मीटर जितनी छोटी सी जगह में। सबसे कमाल की बात यह है कि जो मीठा बारिश का पानी जमीन के अंदर उतरता है, वह वहां पहले से मौजूद खारे पानी में घुलकर उसकी खारापन को भी धीरे-धीरे कम कर देता है। यानी एक ही तकनीक से तीन समस्याएं हल हो जाती। बाढ़ का पानी निकल जाता। सूखे के मौसम के लिए पानी सुरक्षित हो जाता और जमीन का खारापन भी कम होने लगता। जब जरूरत पड़ती तो किसान उसी गड्ढे से पानी वापस बाहर निकालकर अपने खेतों की सिंचाई करते। पहला प्रयोग मुबारकपुरा गांव की महिलाओं की हिम्मत। साल 2006 में सबसे पहला भुंगरूपाटन जिले के मुबारकपुरा गांव में लगाया गया। इसकी शुरुआत सिर्फ पांच महिला किसानों के साथ हुई जिनके पास खुद की जमीन तो थी लेकिन वह जमीन इतनी बंजर और बेकार पड़ी थी कि उससे परिवार का पेट भरना भी मुश्किल था। इनमें से एक महिला किसान थी शंखुबेन जो अपनी दो हेक्टेयर जमीन पर मुश्किल से कोई फसल उगा पाती थी। गांव की महिलाओं को साथ लेकर विप्लव और उनकी संस्था नैरीता सर्विज ने घुंघरू लगाने का काम शुरू किया। शुरुआत में यह बहुत चुनौतीपूर्ण था क्योंकि यह तकनीक बिल्कुल नई थी और किसी को यकीन नहीं था कि यह वाकई काम करेगी।
लेकिन जब मानसून आया और घुंघरू ने पानी को जमीन के अंदर सुरक्षित करना शुरू किया तो नतीजे देखकर सबकी आंखें खुली रह गई। धीरे-धीरे यह तकनीक पूरे इलाके में फैलने लगी। खास बात यह रही कि इस पूरे काम का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में रखा गया। महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण दिया गया और गरीब तथा भूमिहीन महिला किसानों को प्राथमिकता दी गई ताकि वे भी अपनी जमीन पर आत्मनिर्भर बन सकें। इस प्रक्रिया में सबसे पहले उन महिलाओं की पहचान की जाती जिनके पास अपनी जमीन तो होती लेकिन आर्थिक हालत बहुत कमजोर होती। उसके बाद जमीन के मालिकाना हक की जांच की जाती और फिर उन्हीं महिलाओं को घुंघरू तकनीक से जोड़ा जाता। इस तरीके से सिर्फ जमीन ही हरी-भरी नहीं हुई बल्कि गांव की महिलाओं को भी एक नई पहचान मिली। जो महिलाएं पहले सिर्फ घर के काम तक सीमित थी, वे अब अपनी जमीन की मालकिन के साथ-साथ एक जलवायु नेता के रूप में भी पहचानी जाने लगी। उन्होंने ना सिर्फ अपने परिवार की आमदनी बढ़ाई बल्कि आसपास के गांवों की दूसरी महिलाओं को भी यह तकनीक सिखाने लगी। जिससे यह मुहिम धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन का रूप लेने लगी। नतीजा जब बंजर जमीन में लौटी हरियाली। आज जब कोई मुबारकपुरा गांव से गुजरता है तो यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि यही वह जमीन थी जो कभी सर्दियों में बंजर पड़ी रहती थी और मानसून में पूरी तरह पानी में डूब जाती थी। आज उसी जमीन पर गेहूं, जीरा और डिल जैसी फसलें लहलहा रही हैं। शंखुबेन जैसी महिलाएं जो कभी मुश्किल से गुजारा कर पाती थी। आज अपने ट्रैक्टर की मालिक बन चुकी हैं। भुंघरू तकनीक की मदद से किसान अब साल में दो से तीन फसलें उगा पा रहे हैं। जहां पहले एक फसल उगाना भी मुश्किल था। इस तकनीक ने अब तक 14,000 से ज्यादा किसान परिवारों की जिंदगी बदली है और 400 एकड़ से ज्यादा बंजर, खारी और आपदा प्रभावित जमीन को दोबारा खेती लायक बनाया है। यह तकनीक अब सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं रही बल्कि आंध्र प्रदेश सहित देश के कई और हिस्सों में और यहां तक कि बांग्लादेश तथा अफ्रीका के कुछ देशों में भी अपनाई जा रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि हर इलाके की मिट्टी और भूगोल अलग होने की वजह से घुंघरू का डिजाइन भी बदलता रहता है। आज तक इंजीनियरों ने अलग-अलग जलवायु और मिट्टी के हिसाब से घुंघरू के 17 अलग-अलग डिजाइन तैयार कर लिए हैं ताकि यह तकनीक देश के हर कोने में चाहे वहां की मिट्टी जैसी भी हो उतनी ही असरदार तरीके से काम कर सके। यही वजह है कि यह तकनीक अब सिर्फ एक स्थानीय समाधान नहीं बल्कि एक ऐसा मॉडल बन चुकी है जिसे दुनिया भर के जलवायु परिवर्तन से जूझते इलाकों में अपनाया जा सकता है। सम्मान और पहचान दुनिया ने भी माना इस आईडिया को। भुंगरू तकनीक और विप्लव केतन पॉल के इस काम को देश और दुनिया दोनों जगह भरपूर सराहना मिली। साल 2012 में उन्हें अनिल शाह ग्राम विकास पितोषिक से सम्मानित किया गया।
इसके बाद साल 2017 में भुंगरू को प्रतिष्ठित बकमिस्टर फुलर चैलेंज पुरस्कार मिला जो दुनिया भर की सबसे प्रभावशाली सामाजिक और पर्यावरणीय तकनीकों को दिया जाता है। इसके अलावा इस तकनीक को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की तरफ से मोमेंटम फॉर चेंज सम्मान भी मिला और अमेरिका की संस्था यूएसएड ने भी इसे खाद्य सुरक्षा के लिए पानी बचाने वाली सबसे बेहतरीन तकनीकों में गिना। विप्ल केतन पॉल आज एक जानेमाने सामाजिक उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं और वे भारत सरकार तथा गुजरात राज्य की पारिस्थितिकी से जुड़ी संस्थाओं के साथ भी मिलकर काम कर रहे हैं। मुसीबत को मौके में बदलने की सोच घुंघरू की यह पूरी कहानी हमें एक बहुत गहरी सीख देती है। हम अक्सर किसी समस्या को सिर्फ समस्या की तरह देखते हैं और उसे किसी तरह दूर भगाने की कोशिश करते हैं। लेकिन विप्लव केतन पॉल ने बाढ़ के पानी को दुश्मन नहीं बल्कि एक छुपा हुआ मौका माना। उन्होंने वही पानी जो तबाही की वजह बनता था उसे ही सूखे के मौसम का सहारा बना दिया। यह कहानी सिर्फ पानी बचाने की कहानी नहीं है बल्कि यह सोचने के नजरिए को बदलने की कहानी है। कई बार हमारी सबसे बड़ी मुसीबत में ही हमारे सबसे बड़े समाधान की चाबी छुपी होती है।
बस उसे सही नजरिए से देखने की जरूरत होती है। अंत में तो दोस्तों, यह थी घुंघरू की वह अनोखी कहानी जिसने गुजरात के एक भूले-बिसरे इलाके को दोबारा हराभरा बना दिया। अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक जरूर पहुंचाइए ताकि ऐसी अनोखी सोच रखने वाले और भी लोग सामने आ सके। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की वजह से कभी भयंकर बाढ़ तो कभी भयंकर सूखे का सामना कर रही है तब घुंघरू जैसी सोच और भी जरूरी हो जाती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि समाधान के लिए हमेशा बहुत बड़ा बजट या बहुत बड़ी तकनीक जरूरी नहीं होती। बल्कि कई बार एक साधारण सा गड्ढा और एक पाइप भी हजारों परिवारों की जिंदगी बदल सकता है। बशर्ते सोच सही दिशा में हो। अगर आपको ऐसी ही और प्रेरणादायक और अनोखी कहानियां पसंद है तो हमारे चैनल से जुड़े रहिए क्योंकि आगे भी हम आपके लिए ऐसे ही अनोखे आईडिया और अनसुनी कहानियां लेकर आते रहेंगे। इस सफर में हमारे साथ बने रहने के लिए शुक्रिया। अगर यह वीडियो आपको पसंद आया हो तो इसे लाइक करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लें।