क्या आप जानते हैं कि झारखंड में एक ऐसा मंदिर है जहां का प्रसाद महिलाएं छू भी नहीं सकती। और सबसे हैरानी की बात यह नहीं है। हैरानी की बात यह है कि क्यों महिलाएं नहीं छू सकती हैं? इसकी वजह किसी को पता ही नहीं है। मंदिर के पुजारी से आप पूछेंगे तो जवाब मिलता है कि हमारे पूर्वजों ने नियम बना रखा है। महिलाएं यहां का प्रसाद नहीं खाएंगी। बस इतना। कोई ऐसी कथा नहीं, कोई ऐसा श्राप नहीं, कोई ऐसी किताब नहीं। सिर्फ एक मान्यता कि अगर महिला ने यह प्रसाद खाया तो बेइज्जत हो जाएगी। और करीब 300 सालों से इस नियम को कोई भी नहीं तोड़ रहा। हैरानी इस बात की भी कि इस मंदिर का प्रसाद आप घर नहीं ले जा सकते। जो चढ़ा वो वहीं का और उस मंदिर में कोई देवी देवता की मूर्ति नहीं है। पूजा होती है हाथी की। हां जी। मंदिर परिसर में चारों तरफ हाथियों की मूर्तियां हैं। भक्त मिट्टी के तांबे के, पीतल के, लोहे के, चांदी के हाथी और घोड़े चढ़ाते हैं। और सबसे अजीब बात कि मंदिर के चारों तरफ पक्का निर्माण हो गया है।
पर जहां देवता बैठते हैं, वहां आज भी सिर्फ एक पेड़ है। खुले आसमान के नीचे कोई छत नहीं। अब सवाल कि यहां पर हाथी को भगवान क्यों माना गया? 3 साल पहले क्यों शुरू हुआ? पेड़ पर नारियल बांधने और इसी मंदिर में भेड़ की बलि देने का रिश्ता क्या है? और क्यों ऐसा होता है कि इलाके का कोई भी नया काम हो, शुभ काम हो, शादी, नौकरी, चुनाव हर आदमी यहां पूजा करने आता है और महिलाओं को क्यों यहां पर प्रसाद खाने की इजाजत नहीं है। जबकि महिलाएं सिर झुकाती हैं। नमस्कार आपके साथ मैं हूं शुभांकर मिश्रा और आज भक्ति बुक के लिए एक नई कहानी है। दिलचस्प कहानी है कि कैसे एक मंदिर में महिलाओं को प्रसाद खाने की इजाजत नहीं है। हमारे यहां कई सारे मंदिर हैं। कई सारी मान्यताएं हैं। सभी मान्यताओं का हम सम्मान करते हैं। इस वीडियो की शुरुआत करें, उससे पहले हमारी आपसे गुजारिश है कि भक्ति चैनल को बड़ी संख्या में जुड़िएगा, सब्सक्राइब कीजिएगा। लिंक हमने डिस्क्रिप्शन में दे रखा है, WhatsApp का भी। अगर उससे आप जुड़ेंगे तो और अच्छा लगेगा। WhatsApp चैनल में डायरेक्टली आपको ये सारे वीडियोस मिल जाया करेंगे। तो डिस्क्रिप्शन में कमेंट सेक्शन में लिखें। अब शुरुआत करते हैं। झारखंड में एक जगह है जमशेदपुर से करीब 50 कि.मी. दूर बोड़ाम इलाका।
और वहां लावजोड़ा गांव। यहीं पर है हाथीखेड़ा मंदिर। नाम ध्यान दीजिएगा हाथी खेदा खेदा का मतलब होता है खदेड़ना भगाना यानी नाम में आधी कहानी छिपी है हाथी को भगाने वाले देवता लोग इन्हें बाबा हाथी खेदा ठाकुर कहते हैं वजह गांव के पूर्वज बताते हैं कि पुराने जमाने में यह पूरा इलाका दलमा के जंगल से घिरा हुआ था दलमा आज भी हाथियों के लिए जाना जाता है उस जमाने में जंगल में हाथियों के झुंड निकलते थे और खेतों में घुस जाया करते थे अब एक किसान के नजरिए सोचेंगे तो आपको समझ में आएगा पूरे साल मेहनत की जमीन जोती बीज डाला बारिश का इंतजार किया धान की बालियां लाई और हाथियों का झुंडाया रौंद कर चला गया। ना फसल ना मुआवजा ना कोई शिकायत सुनने वाला। बंदूक नहीं, बाढ़ नहीं, बिजली कतार नहीं, किसान के हाथ में कुछ नहीं था। तो किसान ने क्या किया? उसने डर के आगे हाथ जोड़े। मान्यता यह बनी कि हाथी खेदा देवता की पूजा कर दो तो हाथी खेत की तरफ नहीं आएगा। धान बच जाएगा। और लोग कहते हैं ऐसा होने लगा। किसी की फसल बची। अब कैसे बची? इसका कोई कागज नहीं है। लेकिन आस्था हम सब जानते हैं कागज से नहीं बनती।
भरोसा बैठा तो पीढ़ियों तक आता है। और यह बात भारत में बहुत सारी चीजों में है। हमारे यहां जो चीज सबसे ज्यादा डर देती है गांव में कई बार उसे भी देवता बनाते हैं। चेचक फैला तो शीतला माता बन गई। सांप का डर था तो नाग देवता बन गए। ऐसे ही हाथियों का डर था तो भगवान आए। यह मंदिर उस सोच का एक जिंदा उदाहरण है। अब ध्यान दीजिए। यहां पर गणेश जी की पूजा नहीं है। यहां गणेश जी की कोई मूर्ति भी नहीं है। यहां सिर्फ हाथी की पूजा है। उस असली जानवर की जो खेद रौंदता है। इसीलिए देवता का ठिकाना आज ही पेड़ के नीचे है। ये परंपरा की निशानी है। अब झारखंड में एक दिलचस्प बात होती है। यहां गांव के देवता का घर पेड़ ही होता है। खुला आसमान होता है। मंदिर से आने वाले पैसों से परिसर सुंदर बना। रास्ते पक्के हुए। पर देवता की जगह वैसी ही रखी गई। यानी लोगों ने सुविधा बदली। परंपरा नहीं। अब मन्नत के तरीके की बात कीजिए। यहां भक्त मंदिर परिसर में नारियल बांधते हैं। साथ में चुनरी और मांगते हैं परिवार के सुख की बात। बच्चे की नौकरी, बीमारी से छुटकारे की बात। जब मन्नत पूरी होती है तो वहीं भक्त लौट कर आते हैं और बंधा हुआ नारियल फोड़ देते हैं। अब आप सोचिए हजारों नारियल हैं। उम्मीद है जो टंगा है वो इंतजार में जो फूट गया वो किसी की दुआ है। मन्नत पूरी होने पर भी परंपरा है। एक भेड़ की बलि देना पड़ेगा। बलि के बाद उसका एक हिस्सा मंदिर में चढ़ता है। बाकी प्रसाद बन जाता है। और यही वो प्रसाद है जिसकी हम बात कर रहे हैं।
अब आप समझ पाएंगे इसका नियम का एक काम की बात करने वाला पहले हो सकता है। यहां प्रसाद कोई लड्डू पेड़ा मिश्री नहीं यह मांस है। पकाया जाता है, खाया जाता है। यहीं से घर ले जाने वाला नियम मना है। ऐसा प्रसाद घर लाकर रखना, बांटना, दूसरे दिन खाना इन दोनों बातों में गड़बड़ होने का डर होता है। जो चीज खुले में बनी वही खत्म हो जाए। यह भी समझदारी की बात। लेकिन क्या महिलाओं वाला नियम इसे जस्टिफाई हो सकता है। जवाब है नहीं। अगर बात सफाई की होती तो नियम सबके लिए होता। यहां नियम सिर्फ आधी आबादी के लिए है। यहां के पुजारी कहते हैं कि उनके परिवार में पीढ़ियों से पूजा हो रही है। उससे पहले पिताजी, दादाजी सब कर रहे थे और चलती आ रही है परंपरा। किसी ने सवाल नहीं उठाए। अब दो बातें हम कहेंगे फैसला आप कीजिएगा। एक तरफ की बात यह है कि भेदभाव है। एक ही देवता के दरबार में मर्द को प्रसाद औरत को नहीं। इसकी कोई वजह नहीं होनी चाहिए। समझ नहीं आता। इस देश में मंदिर महिलाओं के सवाल पर बड़ी बहस हो चुकी है। कुछ मामले अदालत तक भी गए हैं। उनका सारासार यही रहा कि आस्था के नाम पर शिवलिंग देखकर रोकना ठीक नहीं है। यह तर्क कहता है कि जो नियम अपनी वजह नहीं बता पाता वो परंपरा नहीं आदत है। दूसरी बात यह भी जरूरी है इस मंदिर में महिलाओं के आने पर कोई रोक नहीं है। वो अंदर आती हैं, पूजा करती हैं, मन्नत मांगती हैं।
पेड़ पर नारियल बांधती हैं। रोक प्रसाद पर है। खुद इलाके की महिलाएं भी मानती हैं। कोई आंदोलन नहीं चल रहा, कोई मुकदमा नहीं चल रहा, कोई मांग नहीं है। तो जो लोग परंपरा के साथ खुश हैं, नियम मान रही हैं, उन पर भी सवाल उठाना ठीक नहीं है। बाकी हम आप पर छोड़ते हैं। कई बार हमें पता ही नहीं होता कि हमारे साथ गलत हो रहा है। ये भी एक थ्योरी होती है। तो सच ये है किसी ने 300 साल पहले नियम बनाया वजह साथ ले गया। नियम रह गया। बदलेगा नहीं। उस गांव की महिलाओं को तय करना है। उनका काम है। हमारा नहीं। अब मंदिर की बात जो कम जगह आती है। इस मंदिर में साल के 365 दिन में 363 दिन पूजा होती है। दो दिन बंद होता है। मई के पहले हफ्ते में जब लावजोड़ा गांव के शिव मंदिर में पूजा होती है। उन दो दिनों में यहां पूजा बलि दोनों बंद होती है। यानी गांव का पूरा धार्मिक कैलेंडर एक दूसरे से बंधा हुआ है। रविवार बुधवार को यहां ज्यादा भीड़ होती है और भीड़ सिर्फ झारखंड से नहीं आती। बंगाल से आती है, उड़ीसा से आती है। बिहार से लोग पहुंचते हैं। लोग इन्हें जागृत देवता कहते हैं। यानी वो देवता जो सुनते हैं। मान्यता है कि जो भक्त उपवास रखकर सच्चे मन से मन्नत मांगते हैं, उसकी मुराद पूरी होती है। और इसका सबसे मजेदार सबूत यहां की एक और परंपरा है। आसपास के गांव में कोई भी शुभ काम हो। पहले हाथी खेदा मंदिर में पूजा, चाहे शादी, बेटे की नौकरी, सामाजिक काम, राजनीति का मामला, मत्थ टेकेगा इंसान। एक ऐसा देवता जिसकी शुरुआत खेत बचाने से हुई थी। आज इलाके के लोग हर बड़े फैसले में उसकी मंजूरी लेते हैं। भी दिलचस्प है लेकिन यही हिंदुस्तान है। हमें लगा इस दिलचस्प मंदिर के बारे में आपको बताएं और समझें। भारत के हजारों गांव में कई ऐसे देवस्थान की कहानियां हैं। कई सारी असली कहानियां हैं। मान्यता है और आस्था मैंने फिर कहा आस्था सब कुछ सबूतों पर थोड़ी चलती है। विश्वास में भी चलती है। कई चीजें किताबों में नहीं आती। कई चीजों पर सवाल भी होता है। बाकी हमें लगा हम आपसे पूछते हैं कि इस मंदिर के बारे में आप क्या सोचते हैं और महिलाओं को प्रसाद से रोकने वाला यह तीन साल पुराना जो नियम है या आस्था है या आदत जो भूल की वजह से हुआ और चलता चला आया और अगर गांव की महिलाएं खुद इसे मान रही हैं तो क्या इस पर सवाल करना चाहिए? कमेंट सेक्शन आपका इंतजार कर रहा है। हम WhatsApp पर आपका इंतजार कर रहे हैं। नमस्कार।