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सबसे बदनसीब हिरोइन जिसे पति ने 8 साल तक कै!द करके पी!टा और सौतेली बेटी ने न!र्क बनाई जिंदगी ?

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कल सुबह ही सुबह हमें दौरे पर जाना है। नहाने के लिए ठीक 5:00 बजे गर्म पानी मिल जाना चाहिए। वरना क्या? [चीखने की आवाज़] वरना मैं ठंडे पानी से नहा के चला जाऊंगा। रजनी गंधा फूल तुम्हारी। आज हम बात करेंगे एक ऐसी हीरोइन की जिसकी सादगी का हर एक्टर दीवाना हुआ। वो हीरोइन जिसने सीधी साधी भारतीय नारी को पर्दे पर ऐसे उतारा कि उसके आगे हॉट और बोल्ड हीरोइन भी फीकी पड़ गई। मेरे हाथों में लगे तो रंग लाल मेहंदी तेरे एक समय था जब हर बड़ा एक्टर इस हीरोइन के साथ काम करना चाहता था। और मासूमियत ऐसी कि लोगों ने उसका नाम ही रजनीगंधा रख दिया था। तो हम बात कर रहे हैं गुजरे जमाने की बेहतरीन हीरोइनों में से एक रही विद्या सिन्हा की। [संगीत] कैसे विद्या सिन्हा पैदा होते ही अनाथ हो गई थी। क्यों जिस पति के लिए उन्होंने जमाने भर से दुश्मनी ली वही उन्हें मजधार में छोड़कर चले गए? क्यों विद्या सिन्हा के दूसरे पति ने उनकी जिंदगी नर्क से भी बदतर बना दी थी। क्यों यह हीरोइन कभी मां नहीं बन पाई? लेकिन फिर भी सौतेली बेटी के लिए यातनाएं सहती रही। इस हीरोइन की कहानी किसी मूवी से कम नहीं है। तो चलिए जानते हैं विद्या सिन्हा की अनसुनी और रोचक कहानी। वेलकम टू फिल्मी। विद्या सिन्हा का जन्म 15 नवंबर 1947 को बंबई में हुआ था। लेकिन विद्या सिन्हा अपनी मां का चेहरा नहीं देख पाई। उन्हें जन्म देते समय उनकी मां वो पीड़ा सहन नहीं कर पाई और उनका निधन हो गया। मतलब विद्या सिन्हा के जन्म लेते ही मां चल बसी और वह अपनी बेटी का चेहरा भी नहीं देख पाई। विद्या सिन्हा के पिता का नाम था राणा प्रताप सिंह जो एक फिल्म मेकर थे। विद्या सिन्हा की मां की मौत के बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली और दूध पीती बच्ची की सौतेली मां घर में आ गई। सौतेली मां ने आते ही विद्या सिन्हा को अपनाने से मना कर दिया और उसने कहा कि मेरे रहते यह बच्ची इस घर में नहीं रह सकती। विद्या सिन्हा के पिता भी किसी जालिम से कम नहीं निकले और उन्होंने भी अपनी नई पत्नी के लिए

अपनी दूध पीती बच्ची को नकार दिया। मेरा जीवन कुछ काम में आया। इसके बाद विद्या सिन्हा के नाना मोहन सिन्हा उस छोटी सी बच्ची को अपने साथ ले गए और इस तरह विद्या सिन्हा का पालन पोषण उसके नाना नानी के घर पर हुआ। विद्या सिन्हा नाम भी उनके नाना नानी ने ही दिया था। बड़ी बात यह भी रही कि विद्या सिन्हा को मां वाला प्यार उनकी मौसी से मिला जो खुद एक बच्ची थी और उसी ने एक मां की तरह विद्या का ख्याल रखा। अगर देखा जाए तो विद्या सिन्हा बिना मां की गोद के ही बड़ी हुई और रोते-बिलखते ही उनका पूरा बचपन बीता। विद्या सिन्हा जैसे ही बड़ी हुई तो वह दिखने में बहुत खूबसूरत लगने लगी और उनकी मौसी उन्हें हीरोइन बनाने के सपने देखने लगी। हालांकि विद्या सिन्हा का हीरोइन बनने का कोई सपना नहीं था। लेकिन फिर भी जब वो केवल 16 साल की हुई तभी उनकी मौसी ने ब्यूटी कॉन्टेस्ट में उनका नाम लिखवा दिया और विद्या सिन्हा बिना मन के ही इस कंपटीशन में भाग लेने के लिए बंबई आ गई और किस्मत ऐसी कि वो ना सिर्फ इस कंपटीशन की विनर बनी बल्कि उन्हें मिस बॉम्बे के खिताब से भी नवाजा गया। विद्या सिन्हा वो लड़की बनी जो 16 साल की उम्र में ही मिस बॉम्बे बन चुकी थी। मेरे दो [संगीत] नयन जो नहीं सजन तुमसे ही खोया होगा सके तुम्हारा मंज इसके बाद विद्या सिन्हा की जिंदगी बदल गई और वह साधारण सी जिंदगी छोड़कर ग्लैमर की दुनिया में प्रवेश कर गई और उनके सामने छोटे-बड़े विज्ञापनों की लाइन लग गई। मैगजीन में उनकी फोटो छपने लगी और बड़े-बड़े पोस्टर पर वह दिखने लगी और फिल्म मेकर भी उनके सहारे अपनी रोटियां सेकने की फिराक में घूमने लगी। विद्या सिन्हा ने अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत 1974 में आई मूवी राजा काका से की थी। हालांकि यह मूवी कुछ खास नहीं चली और विद्या को भी इससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ। इसके बाद इसी साल उन्होंने एक और मूवी में काम किया जिसका नाम था रजनीगंधा और इस मूवी से विद्या सिन्हा ने बॉलीवुड में ऐसी छाप छोड़ी कि इसे ही उनकी एंट्री मान लिया गया। रजनीगंधा फूल [संगीत] तुम्हारे महके लोग इस मूवी को देखकर उनकी सादगी के कायल हो गए। यह मूवी बड़ी हिट हुई और विद्या सिन्हा इस मूवी से आम आदमी की पहली पसंद बन गई। मूवी में उनके हीरो थे अमोल पालेकर और उनकी भी यह शुरुआती मूवी थी और उन्हें भी सही मायनों में पहचान इसी मूवी से मिली। जानेमन जानेमन तेरे रो नयन चोरी चोरी [संगीत] लेके गए देखो मेरा मन। इसके बाद आई हवस जिसकी मेन हीरोइन थी रणबीर कपूर की मां नीतू सिंह और बिंदु इसमें आइटम गर्ल थी।

इसमें विद्या सिन्हा एक सपोर्टिंग किरदार में नजर आई। इसके बाद आई मेरा जीवन। यह मूवी भी अच्छी थी लेकिन लोगों को यह तब समझ में आया जब यह फ्लॉप हो गई। इस मूवी का सबसे चर्चित रहा यह गाना। मेरा जीवन [संगीत] कुछ काम ना आया। जय जिसे गाने के बाद किशोर कुमार इतने दुखी हो गए थे कि उन्होंने खुद को 3 दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया था। इसके बाद विद्या एक बार फिर से अमोल पालकर की हीरोइन बनी। मूवी आई छोटी सी बात और इस मूवी को भी कोई नहीं भूल सकता। मतलब यह उन मूवीज में से एक रही जिनकी साधारण कहानी और लाजवाब एक्टिंग लोगों के दिलों में घर कर लेती थी। जाने क्यों होता है तो इसमें भी अमोल पालकर और विद्या सिन्हा ने अपनी सादगी से महफिल लूट ली। इसके बाद ममता, जीवन मुक्त और मुक्ति जैसी मूवीज भी आई। मुक्ति में विद्या सिन्हा शशि कपूर की हीरोइन बनी। पुरानी हो मुलाकात हमें सो। इस मूवी में भी विद्या सिन्हा ने बेहतरीन काम किया। मूवी के गाने भी बड़े हिट हुए। फिर चाहे बच्चों की लोरी वाला यह गाना हो। लल्ला लोरी दूध की कटोरी [संगीत] दूध या फिर यह गाना कुछ ना कुछ फिर भी याद रहता है। इसके बाद आई कर्म और विद्या सिन्हा राजेश खन्ना की हीरोइन बनी जो पहले राजेश खन्ना से यह कह रही थी समय तू जल्दीज जल्दी [संगीत] चल समय तू जल्दी जल्दी चल और जब समय जल्दी-जल्दी चलने लगा तो फिर वो यह कहने लगी समय तू धीरे धीरे चल समय [संगीत] तू धीरे धीरे चल ये मूवी भी बहुत अच्छी थी और काका की हीरोइन बनकर भी विद्या सिन्हा सिन्हा ने सबका दिल जीता और विद्या की खूबसूरती की विद्या सब पर चलने लगी थी। इसके बाद विद्या विनोद खन्ना की हीरोइन बनी। मूवी आई इंकार और इसमें भी विद्या ने बेहतरीन काम किया। दिल से हो जब दिल की बातें यारा [संगीत] दिल इस मूवी के गाने भी बड़े हिट हुए और खासकर मूवी का यह आइटम सॉन्ग मैं गुड़ के गली [संगीत] मंगता है इसके बाद भी किताब चालू मेरा नाम त्यागपत्र सोने का दिल लोहे के हाथ और बहादुर जिसका नाम जैसी एक से बढ़कर एक मूवीज में विद्या सिन्हा ने काम किया। 1978 में आई एक ऐसी मूवी जिसके लिए विद्या को आज भी याद किया जाता है। मूवी का नाम था पतिप और वो और इस मूवी में विद्या सिन्हा शोले के ठाकुर यानी कि संजीव कुमार की बीवी बनी थी। आदम और हव्वा अब इस दुनिया में रहते हैं। आ लड़की साइकिल वाली दे गई रस्ते में। इस मूवी ने वो धमाल मचाया कि लोगों का दिल खुश हो गया और संजीव कुमार ने भी इस मूवी में ऐसा काम किया कि लोगों ने उन्हें बेस्ट एक्टर का खिताब दे दिया। ओ ठंडेठंडे पानी से नहाना चाहिए। यह एक कॉमेडी मूवी थी जिसका हर सीन यादगार बना और खासकर पतिप्नी की नोकझोंक वाला यह सीन। बेबी जी सरकार सुबह उठते ही हमें गरमा गरम चाय चाहिए वरना वरना वरना सुबह-सुबह चाय हासिल करूंगी जिसे आपने कभी ना कभी जरूर देखा होगा। जब मैं बाथरूम से नहा के निकलूं तो कपड़े हैंगर पे टंगे हुए मिलने चाहिए। वरना वरना दूंगी। हां, ठीक है। और संजीव कुमार के साथ विद्या सिन्हा की जोड़ी लोगों की पहली पसंद बन गई। मतलब लोगों ने इस जोड़ी को इतना पसंद किया कि अगली मूवी में फिर से दोनों एक साथ दिखाई दिए और मूवी आई तेरे लिए। इस मूवी में संजीव कुमार एक सन्यासी के किरदार में थे।

तुम ही देखती हो तो लगता है ऐसे। और विद्या सिन्हा उनकी दीवानी के जैसे युगों से तुम्हें जानती हूं। इस मूवी की कहानी भी बहुत अच्छी थी और सीधी साधी भारतीय नारी के किरदार में विद्या सिन्हा ने लोगों का खूब दिल जीता। इसके बाद भी मुकद्दर, अतिथि, जीना यहां, आत्माराम, मगरूर, मीरा और सबूत जैसी एक से बढ़कर एक मूवीज में विद्या सिन्हा लगातार काम करती रही और अब वो एक जानीमानी हीरोइन बन चुकी थी। जिसके साथ काम करने को हर बड़ा एक्टर तैयार रहता था और हर फिल्म मेकर उन्हें अपनी मूवी में लेना चाहता था। नारी कुछ ऐसन आगे निकल रही है मर्दन के पांव तल धरती 1980 में आई एक मल्टीस्टारर मूवी स्वयंवर जिसमें एक तरफ थे शशि कपूर और मौसमी चटर्जी और दूसरी तरफ थे संजीव कुमार और विद्या सिन्हा और इस मूवी में भी विद्या सिन्हा एक सीधी साधी घरेलू महिला ही बनी थी। एक महल मा छमम छमम करती रहती हुई शहजादी। इसके बाद प्यारा दुश्मन में विद्या सिन्हा अमजद खान के साथ रोमांस करती हुई नजर आई और शोले के गब्बर सिंह की होली यहां जाकर रंगीन हुई। मैं हूं तेरी दीवानी तू है मेरा दीवाना सारा जमाना जाने तेरा मेरा याराना तेरा। इसके बाद भी विद्या सिन्हा लगातार काम करती रही। उनकी मूवीज भी आती रही। कुछ हिट हुई और कुछ फ्लॉप। जिनमें उनकी कुछ सबसे चर्चित मूवीज रही। अधूरा आदमी, राख और चिंगारी, लव स्टोरी, नई इमारत, कैदी, धोखेबाज और किराएदार। लेकिन अब धीरे-धीरे विद्या सिन्हा मेन लीड से हटने लगी थी। उनकी उम्र भी ढलने लगी थी और दूसरी तरफ अंग प्रदर्शन का दौर भी शुरू हो गया था। जहां हीरोइन हिट होने के लिए अपने कपड़े तक उतार देती थी। तो इन सबके चलते विद्या को काम मिलना थोड़ा कम होने लगा था और उन्हें सपोर्टिंग किरदार मिलने लगे थे। सया आए ना आए ना ना आए हो सैया आए ना विद्या सिन्हा ने भी सपोर्टिंग किरदार निभाना सही समझा लेकिन कभी भी अंग प्रदर्शन नहीं किया और अब वह छोटे-मोटे किरदार निभाने लगी जैसे संजय दत्त की जीवा में वह एक सपोर्टिंग किरदार में नजर आई थी। फिर ग्रेट टारगेट जैसी मूवीज में भी उन्होंने काम किया। 1986 में आई थी एक धार्मिक मूवी कृष्णा कृष्णा जिसमें उन्होंने रानी रुक्मणी का किरदार निभाया था। यह मूवी भी बड़ी हिट हुई थी और इसमें एक रानी के किरदार में विद्या सिन्हा को खूब पसंद किया गया। कहीं तुम्हें मन से बुलाया ना करना। [संगीत] सलमान खान की बॉडीगार्ड में भी वह नजर आ चुकी हैं। विद्या सिन्हा आखिरी बार सल्लू भाई की बॉडीगार्ड में ही दिखाई दी थी और इस मूवी से पहले उन्होंने लगभग 10 सालों का लंबा ब्रेक लिया था और उस समय उन्होंने एक्टिंग से पूरी तरह से दूरी बना ली थी और यही वो समय था जब उन्होंने जीते जी नर्क देखा तो अब हम बात करेंगे विद्या सिन्हा की पर्सनल लाइफ की और साथ ही जानेंगे कि आखिर उनकी जिंदगी नर्क कैसे बनी थी। विद्या सिन्हा बॉलीवुड की वो हीरोइन रही जिसने बिना बोल्डनेस दिखाए, बिना बोल्ड सीन दिए सफलता हासिल की और ना ही कभी अंग प्रदर्शन किया। लेकिन फिर भी लाखों लोग उनके दीवाने थे। जाना चाहिए नहाए या नहाए जाना चाहिए। और यह उनकी एक्टिंग का भी कमाल था। हालांकि यह बात कुछ फिल्म मेकर्स को खटकने लगी थी। जिनमें सबसे आगे थे नग्नता के दीवाने रहे राज कपूर। राज कपूर विद्या सिन्हा को सत्यम शिवम सुंदरम की हीरोइन बनाना चाहते थे और उनसे जीनत अमान वाला किरदार करवाना चाहते थे। लेकिन विद्या सिन्हा ने यह किरदार करने से साफ मना कर दिया और कहा कि मैं इतने बोल्ड सीन नहीं दे सकती। बस फिर क्या राज कपूर की सुलग गई कि एक साधारण सी हीरोइन उन्हें मना करने की हिम्मत कैसे कर सकती है? वो राज कपूर की मूवी ठुकरा रही है और इसके बाद उन्होंने विद्या सिन्हा को अपना दुश्मन बना लिया और कभी भी उनके साथ काम ना करने की घोषणा कर दी और साथ ही यह भी कहा कि उनका कोई भी साथी विद्या सिन्हा को लेकर मूवी ना बनाए। राज कपूर के नकारने से विद्या सिन्हा को बहुत नुकसान हुआ क्योंकि उस समय राज कपूर बहुत बड़ा नाम हुआ करता था। तो दूसरे फिल्म मेकर्स भी उनसे किनारा करने लगे। मैं हूं ऐसी दुल्हन किसका बिखर गया। अब विद्या सिन्हा के पास दो रास्ते थे। या तो वह दूसरी हीरोइन की तरह बोल्ड हो जाए और अर्धनग्न होकर सीन देने लगे या फिर एक्टिंग छोड़ दे। विद्या सिन्हा ने भी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया और उन्होंने लीड रोल करना ही कम कर दिया। मतलब उसने अपने मानसम्मान को पहले चुना। काम करना कम कर दिया और वो मेन लीड से हटकर सपोर्टिंग किरदार निभाने लगी। कोई मेरे हाथों [संगीत] में मेहंदी लगा दे हाथ बोले लगा।

लेकिन अपने इमेज पर हमेशा टिकी रहीं। यही कारण रहा कि उन्हें काम मिलना भी कम हो गया था और फिर उनका करियर सिमटने लगा। विद्या सिन्हा की जहां प्रोफेशनल लाइफ उतार-चढ़ाव वाली रही, तो वहीं उनकी पर्सनल लाइफ भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी। जब वह बालिक भी नहीं हुई थी तभी उन्हें अपने पड़ोस में रहने वाले एक साउथ इंडियन से प्यार हो गया था जिसका नाम था वेंकटेश्वरन अय्यर। दोनों का प्यार इस तरह परवान चढ़ा कि 1968 में दोनों ने शादी कर ली। बड़ी बात यह थी कि इस समय तक विद्या सिन्हा ने फिल्मों में कदम भी नहीं रखा था। वो केवल मॉडलिंग करती थी और शादी के बाद ही उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग करना शुरू किया था। जीना भी [संगीत] कोई देना है जब तक तेरा साथ नहीं। जैसे ही वह फिल्मों में नाम कमाने लगी और करियर रफ्तार पकड़ने लगा तो उसी समय उनकी पर्सनल लाइफ डामाडोल होने लगी। उनका पति उन्हें फोर्स करने लगा कि हर हाल में मुझे बच्चे पैदा करके दो और उनकी देखभाल करो और घर संभालो। एक तरफ विद्या का करियर था और दूसरी तरफ पति उन्हें कैद करना चाहता था। जब पति के अत्याचार बढ़ने लगे तो उनका काम पर ध्यान भी कम हो गया। विद्या सिन्हा चाहकर भी काम में मन नहीं लगा पाई और यही कारण रहा कि उनका चमकता हुआ फिल्मी सफर अचानक से रुक सा गया था। कई बार यूं भी देखा है। यह जो मन की सीमा रेखा। पति हर हाल में उनसे बच्चा चाहता था। विद्या सिन्हा भी मां बनना चाहती थी। लेकिन यहां भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया और डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए और उन्हें बताया कि वह कभी भी मां नहीं बन सकती। विद्या सिन्हा के लिए यह खबर किसी सदमे से कम नहीं थी। वह अपना बच्चा चाहती थी। मां बनकर उसके साथ अपनी जिंदगी जीना चाहती थी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और विद्या सिन्हा दुखी रहने लगी। इसी समय उन्हें एक उपाय सूझा और उन्होंने एक बच्ची को गोद ले लिया। यह सोचकर कि इसे ही अपनी बच्ची समझकर पा लूंगी और मां बनने का सुख भी भोगूंगी। उन्होंने अनाथाला से एक बच्ची को गोद ले लिया जिसका नाम जानवी रखा गया और अब वो खुशी-खुशी उस बच्ची को अपनी जिंदगी समझकर पालने लगी। लल्ला लल्ला डोरी दूध की [संगीत] कटोरी और उसके साथ अपनी आने वाली जिंदगी के सपने देखने लगी। लेकिन उन्हें यह खुशियां ज्यादा समय तक नसीब नहीं हुई और अचानक से उनके पति का निधन हो गया। मतलब उन्हें मां बनने की खुशी मिली तो पत्नी बनने की खुशी छीन गई। जिस पति के लिए उन्होंने अपना करियर दांव पर लगाकर परिवार संभाला, बेटी गोद ली अब वही उन्हें छोड़कर चला गया था। कुछ समय तक विद्या सिन्हा अपनी बेटी के साथ अपनी मायूस जिंदगी को काटती रही। लेकिन अब उनके लिए यहां कुछ नहीं बचा था। वह उदास रहती थी और दिन रात पति की याद में डूबी रहती थी और जब वह ज्यादा दुखी रहने लगी तो फिर उन्होंने भारत ही छोड़ दिया। तुम्हारे बिन गुजारे हैं कई दिन अब ना गुजरे। विद्या सिन्हा अपनी बेटी को लेकर ऑस्ट्रेलिया चली गई और एक गुमनाम जिंदगी जीने लगी। लेकिन विदेशी जमीन पर जिंदगी काटना और भी मुश्किल था। समय बीता और उनकी मुलाकात एक भारतीय मूल के डॉक्टर से हुई जिसका नाम था भीमराव सालुंके। उन्होंने विद्या का भरोसा जीता और विद्या सिन्हा को भी उनमें अपनी जिंदगी का सहारा नजर आने लगा। तो फिर विद्या सिन्हा ने 2001 में सालुंके से शादी कर ली। बड़ी बात यह थी कि दूसरी शादी के समय विद्या सिन्हा 54 साल की हो चुकी थी और उनकी एक गोद ली हुई बेटी भी थी। लेकिन फिर भी उन्होंने उस डॉक्टर से दूसरी शादी कर ली और फिर से अपना गृहस्थ जीवन जीने लगी। हम [संगीत] मोहब्बत ना जाने क्या कर जाते। विद्या को लगा कि अब शायद उन्हें वह सुख मिलेगा जिसके लिए वह इतने सालों से भटक रही थी और अब जाकर उनकी जिंदगी में सुकून आएगा। हालांकि उन्हें नहीं पता था कि अब उनकी जिंदगी और भी ज्यादा बदतर होने वाली थी। शादी के कुछ ही महीनों बाद उनके दूसरे पति ने अपना असली रंग दिखाना शुरू किया। उसकी नजर हमेशा से विद्या सिन्हा की संपत्ति पर थी। विद्या की जायदाद देखकर ही उसने विद्या को एक बच्ची के साथ अपनाया था। लेकिन अब उसे विद्या की सारी संपत्ति चाहिए थी। वो आए दिन विद्या सिन्हा से बहस करने लगा। उससे पैसे मांगता और जब विद्या सिन्हा मना करती तो वह विद्या सिन्हा को बंद कमरे में जाकर जानवरों की तरह पीटता। उसने विद्या को वो दिन दिखाए जिसके बारे में कभी विद्या ने सपने में भी नहीं सोचा था।

[संगीत] वो किसी भी समय विद्या के साथ जबरदस्ती करता था। कभी भी उसे पीट देता था। उसे घसीटता था और बंद कमरे में रखता था और पूरी हैवानियत करता था। विद्या सिन्हा कानूनन उसकी पत्नी थी। उसकी उम्र भी ढल चुकी थी और वह विदेश में रहती थी और सबसे बड़ी बात उन्हें अपनी बेटी की चिंता थी और यही सब कारण थे कि वो ना चाहते हुए भी यह सब सहन करने को मजबूर थी। मेरा जीवन कुछ था ना आया। मतलब एक गोद ली हुई बच्ची का भविष्य खराब ना हो जाए। इसके लिए वह खुद नर्क जैसी जिंदगी जीती रही। सोचने वाली बात यह है कि विद्या सिन्हा यह जिंदगी लगभग 8 सालों तक जीती रही। वह रोज यातनाएं सहती रहीं, दुखी रही और सब कुछ चुपचाप सह रही थी। उन्हें लगा कि कहीं उनकी बेटी की जिंदगी बर्बाद ना हो जाए। उनका पति भीमराव सालुंके इतना हैवान बन गया था कि वह अपना गुस्सा निकालने के लिए ही विद्या सिन्हा को पीटता था। वह सनकी बन चुका था और जब उसे शराब की तलब लगती तो वह विद्या सिन्हा के हाथ सिगरेट से भी जला देता था। [संगीत] नहीं नहीं नहीं [संगीत] विद्या सिन्हा चिल्लाती रहती और चीखती रहती और वह हैवान बनकर उसे तड़पाता रहता लेकिन हर बात की एक सीमा होती है और बर्दाश्त करने की भी। एक समय ऐसा आया जब विद्या सिन्हा की हिम्मत की भी सीमा टूट गई और उसे अपनी आंखों के सामने मौत नजर आने लगी। अब उनकी बेटी भी समझदार हो चुकी थी। वह अपनी मां के साथ हो रही इस हैवानियत को देख रही थी तो फिर उसने अपनी मां का साथ दिया और अपने सौतेले बाप के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई। 2009 में विद्या सिन्हा ने अपने पति पर प्रताड़ना का केस किया और उनके पति को गिरफ्तार कर लिया गया और तब जाकर विद्या सिन्हा को उस नर्क भरी जिंदगी से आजादी मिली। इसके बाद विद्या सिन्हा अपनी बेटी के साथ भारत लौट आई। लेकिन अब उनके पास कुछ भी नहीं था। ना तो वह खूबसूरती बची थी और ना ही अब उन्हें काम मिलने वाला था। उन्हें चिंता सताने लगी कि अब उनका और उनकी बेटी का क्या होगा। वह परेशान रहने लगी। लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और उन्हें दोबारा से फिल्मों में छोटे-मोटे किरदार मिलने लगे। इस [संगीत] जीवन में सच कहूं मेरे बेटे दुनिया के सबसे हसीन कृष्ण थी। कहिए मम्मी उनकी बेटी ने भी उनका पूरा साथ दिया और उनका सहारा बनी। विद्या सिन्हा ने छोटे पर्दे का भी रुख किया और छोटे पर्दे पर काम करना शुरू किया। वह टीवी सीरियल में काम करने लगी। उन्होंने काव्यांजलि, नीम नीम शहद-सहद, इश्क का रंग सफेद, चंद्र नंदिनी, बहू रानी, कबूल और फुलकी कुमार बाजेवाला जैसे टीवी सीरियल में काम किया और धीरे-धीरे उनकी जिंदगी पटरी पर आ गई और वो अपनी बेटी के साथ खुशी-खुशी रहने लगी। अरे प्रतिभा, आज हमारे लिए नाश्ता नहीं बनाना। आज हमने व्रत रखा है हमारे बेटे महेंद्र के लिए। लेकिन खुशियों का तो मानो विद्या सिन्हा के साथ 36 का आंकड़ा था। तो जैसे ही उन्होंने खुश रहना शुरू किया तो उनकी किस्मत ने फिर से करवट ली और अब विद्या सिन्हा गंभीर बीमारी की चपेट में आ गई। उनकी तबीयत खराब होने लगी और वह ज्यादातर समय बीमार ही रहने लगी।

जब उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया तो डॉक्टर्स ने खुलासा किया कि विद्या सिन्हा को फेफड़ों और दिल की पुरानी बीमारी है। वह लंबे समय से इससे जूझ रही थी। लेकिन उन्होंने कभी इलाज नहीं करवाया। इससे यह भी पता चलता है कि वह जानती थी कि वह मौत के करीब जा रही हैं। उन्हें अपनी बीमारी का पहले से पता था लेकिन फिर भी उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया और अपनी बेटी का जीवन सवारना ज्यादा जरूरी समझा क्योंकि वह इस दुख भरे जीवन से थक चुकी थी और यही कारण था कि अब वो बीमारी के उस स्टेज पर पहुंच चुकी थी जहां डॉक्टर्स भी हार मान जाए। बिखर गया काजल पल पल [संगीत] उन्हें कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रखा गया। डॉक्टर्स ने बहुत कोशिश की लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और लगातार छ दिनों तक ऑक्सीजन में रखने के बाद भी उन्हें नहीं बचाया जा सका। विद्या सिन्हा पहले ही जिंदगी से हार मान चुकी थी। लेकिन वह बस अपनी बेटी को खुद के पैरों पर खड़ा करना चाहती थी और इसीलिए अब तक जिंदा थी। अब उनकी आखिरी इच्छा पूरी हो चुकी थी। उनकी बेटी खुद के पैरों पर खड़ी हो चुकी थी और अपनी जिंदगी जीने लगी थी। तो उनके जीने का मकसद भी पूरा हो गया था और फिर 15 सितंबर 2019 को विद्या सिन्हा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। विद्या सिन्हा की पूरी जिंदगी दुख तकलीफों से भरी रही। जन्म देते ही मां चल बसी तो कभी मां का प्यार नहीं मिल पाया। पिता ने दूसरी शादी कर ली तो पिता का प्यार भी नहीं मिला। जिससे शादी की वो भी उन्हें बीच मजधार में ही छोड़कर चला गया। वो कभी मां भी नहीं बन पाई और जिस बेटी को गोद लिया उसके लिए भी दुख तकलीफें झेलती रही। दूसरी शादी की तो पति ने जीते जीवन नर्क दिखाया और अब जब बुढ़ापे में बेटी का सुख मिलना था तो बीमारी ने शरीर में घर कर लिया। मतलब बाहर से हिरोइन वाली जिंदगी और अंदर से वो सबसे बदनसीब औरत रही। मेरा [संगीत] जीवन कुछ काम आया। आज विद्या सिन्हा भले ही लोगों के बीच में नहीं है लेकिन उनका अभिनय और उनकी सादगी हमेशा लोगों के दिलों में रहेंगी। वह चाहती तो बिना बच्चे के अपनी शर्तों पर अपनी जिंदगी जी सकती थी। बहुत अच्छी हीरोइन बन सकती थी और अपने करियर में टॉप पर पहुंच सकती थी। लेकिन उन्होंने सच्ची मां का धर्म निभाया और उस गोद ली हुई बेटी के लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी। सच में आज के समय ऐसी औरत होना अपने आप में बहुत बड़ी बात है और ऐसी महिला को हमारा दिल से सैल्यूट है। सजनी गंधा [संगीत] फूल तुम्हारी

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