बिखर कर संभलने की दास्तान: चमचमाती लाइमलाइट के पीछे जूही चावला का वह खामोश और दर्दनाक संघर्षखुशनुमा हंसी और चुलबुले अंदाज से 90 के दशक के सिनेमाप्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली जूही चावला की जिंदगी कैमरे के पीछे जितनी चमकदार दिखती है, हकीकत में वह उतनी ही संघर्षों
और गहरे आंसुओं से भरी रही है। जब पूरा देश उनकी एक झलक पर फिदा था, तब पर्दे के पीछे उनकी दुनिया एक के बाद एक लगे झटकों से उजड़ रही थी।साल 1998 में फिल्म ‘डुप्लीकेट’ की शूटिंग के दौरान आया वह फोन कॉल उनकी जिंदगी का सबसे डरावना मोड़ था, जब एक भीषण सड़क हादसे में उनकी मां मोना चावला का साया हमेशा के लिए उठ गया। मां के बेहद करीब होने की वजह से जूही भीतर तक टूट चुकी थीं।
इस असहनीय दर्द से वह उबर भी नहीं पाई थीं कि साल 2012 में उनकी बहन सोनिया चावला भी कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी की भेंट चढ़ गईं। अपनों को खोने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; इसके बाद उनके सगे भाई और शाहरुख खान की कंपनी ‘रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट’ के सीईओ बॉबी चावला अचानक दिल का दौरा पड़ने से कोमा में चले गए। लंबे समय तक अस्पताल के बिस्तर पर भाई को जिंदगी और मौत के बीच जूझते देखना किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं था, और आखिरकार 2014 में उन्होंने भी दुनिया को अलविदा कह दिया।
पारिवारिक त्रासदियों के इन गहरे जख्मों के अलावा, बिजनेसमैन जय मेहता से शादी के बाद उम्र के फासले को लेकर समाज और सोशल मीडिया की बेदर्द ट्रोलिंग ने उन्हें मानसिक तौर पर झकझोर कर रख दिया था। एक समय ऐसा भी आया जब वह डिप्रेशन और गहरे डर के साये में जीने लगी थीं।
लेकिन असली इंसान की पहचान मुश्किल वक्त में ही होती है। जूही ने टूट जाने के बजाय अपने पति और बच्चों के मजबूत सहारे से खुद को फिर से समेटा। मां, बहन और भाई के जाने का गम उनके दिल में हमेशा रहेगा, लेकिन जिस तरह उन्होंने जिंदगी की इन आंधियों का सामना किया और अपनी मुस्कान को धुंधला नहीं पड़ने दिया, वह उनके भीतर की असली ताकत और बेजोड़ जज्बे को बयां करता है। यह कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के आंसुओं की नहीं, बल्कि उस अटूट हौसले की है जो यह सिखाता है कि कितनी भी बड़ी त्रासदी क्यों न आ जाए, जिंदगी की गाड़ी को रोककर हार मानना कोई विकल्प नहीं है।