एक ऐसा कलाकार जिसने महज 4 साल की उम्र में कैमरे का सामना किया। 5 साल की उम्र में देश का सबसे बड़ा सम्मान अपने नाम किया और जिसे खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी गोद में बिठाकर अपने कुर्ते से गुलाब निकालकर तोहफे में दिया था। एक ऐसा अभिनेता जिसे शोले जैसी ऐतिहासिक फिल्म के लिए पैसे नहीं बल्कि एक फ्रिज मिला था और जिसने खुद रमेश सिप्पी की कुर्सी संभाली थी। एक ऐसा शख्स जिसे उर्दू पढ़ाने वाली और कोई नहीं बल्कि खुद मीना कुमारी थी। जी हां, [संगीत] आज हम बात करेंगे बॉलीवुड और मराठी सिनेमा के उस बहुमुखी कलाकार की जिसका नाम है सचिन पिलगावकर। यह कहानी सिर्फ एक एक्टर की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो पर्दे पर बड़ा होते-होते खुद इंडस्ट्री का महागुरु बन गया। तो चलिए शुरू करते हैं इस दिलचस्प सफर को। आखिर तक बने रहिएगा क्योंकि आगे जो किस्से आने वाले हैं वो शायद आपने पहले कभी नहीं सुने होंगे। कहानी शुरू होती है मुंबई शहर से 17 अगस्त 1957 के दिन। इस दिन एक ऐसे परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया जिसकी जड़े गोवा के पिलगांव नाम के एक छोटे से गांव से जुड़ी थी। यह परिवार सारस्वत ब्राह्मण परिवार था और यहीं से इस बच्चे को अपना उपनाम मिला पिलगांवकर। इस बच्चे के पिता का नाम था शरद पिलगांवकर जो खुद एक फिल्म निर्माता थे और साथ ही मुंबई में एक प्रिंटिंग का व्यवसाय भी संभालते थे। यानी इस बच्चे को घर से ही सिनेमा का माहौल विरासत में मिला। बचपन से ही इस बच्चे का नाम रखा गया सचिन और आगे चलकर यही नाम पूरे देश में एक पहचान बन गया।
अब यहां से शुरू होती है वह कहानी जो शायद बहुत कम लोग जानते हैं। सचिन की उम्र उस वक्त सिर्फ 4 साल थी जब मराठी सिनेमा के दिग्गज निर्देशक राजा परांजपे एक फिल्म बना रहे थे जिसका नाम था हामाझा मार्ग एकला। इस फिल्म के लिए एक मासूम बाल कलाकार की तलाश थी और यह मौका मिला नन्हे सचिन को। यह फिल्म साल 1962 में रिलीज हुई और इसी फिल्म ने सचिन की जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी। इस फिल्म में सचिन के अभिनय ने सबका दिल जीत लिया और नतीजा यह निकला कि सिर्फ 5 साल की उम्र में सचिन को भारत का सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया। लेकिन असली किस्सा यहीं छिपा है। इस अवार्ड समारोह में उस वक्त के भारत के राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मौजूद थे और उन्हीं के हाथों काले रंग के छोटे से कुर्ते में सजे नन्हे सचिन को यह सम्मान मिला। लेकिन स्टेज पर एक और बड़ी शख्सियत मौजूद थी। पंडित [संगीत] जवाहरलाल नेहरू जिन्हें बच्चे बड़े प्यार से चाचा नेहरू कहा करते थे। जैसे ही सचिन को अवार्ड मिला, चाचा नेहरू खुद आगे बढ़े। सचिन को अपनी गोद में बिठाया और अपने कुर्ते में लगा हुआ लाल गुलाब निकालकर उन्हें तोहफे में दे दिया। मानो देश के सबसे बड़े नेता खुद इस बच्चे के भविष्य को आशीर्वाद दे रहे हों। जरा सोचिए कितने कम कलाकार होंगे जिनकी शुरुआत ही देश के प्रधानमंत्री के हाथों मिले फूल से हुई हो। इस पहली सफलता के बाद सचिन का सफर रुका नहीं बल्कि और तेज हो गया। अगले कुछ सालों में सचिन ने बतौर बाल कलाकार लगभग 60 से 65 फिल्मों में काम किया। यह आंकड़ा खुद बताता है कि इस बच्चे में कुछ खास बात थी जो हर बड़े निर्देशक को अपनी तरफ खींच रही थी। इसी दौर में सचिन की मुलाकात हिंदी सिनेमा के एक ऐसे दिग्गज से हुई जिनका नाम सुनते ही आज भी सिने प्रेमियों की आंखें चमक उठती है। गुरुदत्त सचिन ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था
कि जब वे सिर्फ 7 साल के थे तब उन्होंने गुरुदत्त की मशहूर फिल्म कागज के फूल देखी थी और उसी वक्त उन्होंने मन ही मन ठान लिया था कि बड़े होकर वे एक निर्देशक बनेंगे। इस फैसले के करीब 2 साल बाद गुरुदत्त के दफ्तर से खुद सचिन के घर फोन आया। सचिन अपने पिता के साथ गुरुदत्त से मिलने पहुंचे, जहां गुरुदत्त ने उन्हें बताया कि वे चार्ल्स डिकेंस के मशहूर उपन्यास ओलिवर ट्विस्ट का हिंदी वर्जन बनाने की योजना बना रहे हैं और वे चाहते हैं कि इस फिल्म में ऑलिवर की भूमिका सचिन निभाएं। लेकिन एक दिक्कत थी। उस वक्त सचिन की उम्र सिर्फ 9 साल थी। जबकि किरदार की उम्र 11 साल की थी। गुरुदत्त ने कहा कि कोई बात नहीं वे 2 साल इंतजार करेंगे मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 1964 में अचानक गुरुदत्त का निधन हो गया और यह सपना अधूरा ही रह गया। हालांकि जब सचिन 11 साल के हुए तब गुरुदत्त के छोटे भाई आत्माराम ने उन्हें ऑलिव ट्विस्ट के हिंदी वर्जन की स्क्रिप्ट सौंपी ताकि उनके भाई का अधूरा सपना किसी तरह पूरा हो सके। अब बारी आती है एक और ऐसे किस्से की जो सचिन की जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ और जिसमें एक ऐसी अदाकारा का जिक्र आता है जिन्हें ट्रेजडी क्वीन के नाम से जाना जाता था मीना कुमारी। साल 1967 में एक फिल्म आई थी मजली दीदी जिसका निर्देशन किया था खुद ऋषिकेश मुखर्जी ने और जिसमें मीना कुमारी के साथ धर्मेंद्र भी थे। इस फिल्म के लिए एक बाल कलाकार की जरूरत थी जो मीना कुमारी के मुंह बोले भाई किशन का किरदार निभाए। दिलचस्प बात यह है कि सचिन इस भूमिका के लिए निर्देशक की पहली पसंद नहीं थे। लेकिन मीना कुमारी ने खुद सिफारिश की कि एक बार सचिन का ऑडिशन लिया जाए। जैसे ही सचिन ने पहला शॉट दिया, निर्देशक तुरंत समझ गए कि यही बच्चा इस किरदार के लिए सही है और उन्हें फॉरेन लीड रोल के लिए चुन लिया गया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी और सचिन के बीच एक खूबसूरत रिश्ता बन गया। मीना कुमारी को शायरी और उर्दू अदब से गहरा लगाव था और उन्होंने इसी दौरान नन्हे सचिन को उर्दू पढ़ाना शुरू किया। यह किस्सा आज भी बहुत कम लोगों को पता है कि हिंदी सिनेमा के इस बहुमुखी कलाकार ने अपनी उर्दू की तालीम खुद मीना कुमारी से हासिल की थी। बचपन के इन तमाम अनुभवों के साथ सचिन धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे और सिनेमा की दुनिया में उनकी पकड़ भी मजबूत होती जा रही थी। साल 1975 आते-आते सचिन एक ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके थे, जहां उन्हें बतौर मुख्य अभिनेता एक बड़ा मौका मिला। राजश्री प्रोडक्शन हाउस ने उन्हें अपनी फिल्म गीत गाता चल में लीड रोल दिया। जिसमें उनके साथ अभिनेत्री सारिका थी। यह फिल्म हिट रही और इसी के साथ सचिन का सफर बाल कलाकार से नायक की तरफ बढ़ना शुरू हो गया। लेकिन 1975 का साल सचिन के लिए एक और वजह से भी बेहद खास साबित हुआ क्योंकि इसी साल भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक रिलीज़ होने वाली थी शोले। इस फिल्म में सचिन ने ठाकुर के परिवार के एक सदस्य अहमद का किरदार निभाया जिसे फिल्म की शुरुआत में ही गब्बर सिंह बेहद बेरहमी से मार डालता है। यह किरदार भले ही स्क्रीन पर कुछ ही मिनटों का था लेकिन इस फिल्म से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो सचिन ने खुद 45 साल बाद एक टीवी शो में खुलासा किया था और यह किस्सा सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। सचिन ने बताया कि शोले की शूटिंग के दौरान वे अक्सर निर्देशक रमेश सिप्पी की कुर्सी के ठीक पीछे बैठा करते थे और ध्यान से देखते थे कि वे हर शॉट किस तरह लेते हैं और उसे किस तरह एडिट करते हैं।
एक दिन सचिन ने रमेश सिप्पी को बताया कि उन्होंने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से एडिटिंग की बारीकियां सीखी हैं। यह सुनकर रमेश सिप्पी ने सचिन से पूछा कि क्या वे एडिटिंग का काम संभालना चाहेंगे? दरअसल रमेश तिप्पी को फिल्म की शूटिंग के दौरान अपनी गैर मौजूदगी में एक्शन सीक्वेंस संभालने के लिए दो भरोसेमंद लोगों की जरूरत थी। सचिन ने हिचकिचाते हुए कहा कि वे तो सिर्फ 17 साल के हैं। क्या वे इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभाल पाएंगे? इस पर रमेश सिप्पी का जवाब था कि उम्र मायने नहीं रखती। उन्हें सचिन की काबिलियत पर पूरा भरोसा है और फिर सचिन ने इस जिम्मेदारी को निभाया वो भी खुद गब्बर सिंह यानी अमजद खान के साथ मिलकर। अमजद खान जिन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान ही डायरेक्शन और एक्शन में कई पुरस्कार जीते थे। उन्होंने सचिन की एडिटिंग में भरपूर मदद की। यहां तक कि अमजद खान सचिन को प्यार से मंजू भाई कहकर बुलाया करते थे। का सिर्फ शुरुआती हिस्सा रमेश सिप्पी ने खुद शूट किया था। बाकी पूरा एक्शन सीक्वेंस सचिन और अमजद खान ने मिलकर पूरा किया। सोचिए एक 17 साल का लड़का जो पर्दे पर सिर्फ एक छोटे से किरदार में नजर आया। असल में पर्दे के पीछे इतनी बड़ी फिल्म के एक हिस्से की कमान संभाल रहा था। प्यारे दोस्तों, सचिन पिलगांवकर कि वह कौन सी फिल्म है जिसे आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं? कमेंट में वह किरदार बताएं और फिल्म बताएं जिसमें आप सबसे ज्यादा पसंद करते हैं और अब वह किस्सा जो इस फिल्म से जुड़ी सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाली बातों में से एक है। शोले जैसी ऐतिहासिक और सुपरहिट फिल्म का हिस्सा होने के बावजूद सचिन को इस फिल्म के लिए फीस के तौर पर पैसे नहीं मिले बल्कि उन्हें गिफ्ट के तौर पर सिर्फ एक फ्रिज दिया गया था। आज के दौर में जहां एक छोटी सी भूमिका के लिए भी कलाकारों को लाखों करोड़ों की फीस मिलती है। वहीं उस दौर में एक ऐसी फिल्म का हिस्सा बनना जो आगे चलकर सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी क्लासिक फिल्मों में गिनी जानी थी। उसके बदले सिर्फ एक फ्रिज मिलना अपने आप में एक अनोखा और दिलचस्प किस्सा है। शोले के बाद सचिन का सफर और भी रफ्तार पकड़ गया। उन्होंने एक और मशहूर फिल्म सत्य पे सत्ता में काम किया जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन के सबसे छोटे भाई का किरदार निभाया लेकिन सचिन को असली स्टारडम और पहचान मिली साल 1976 में आई फिल्म बालिका वधू से। इस फिल्म का गाना बड़े अच्छे लगते हैं। इतना मशहूर हुआ कि आज लगभग 50 साल बाद भी
यह गाना लोगों की जुबान पर रहता है। इस फिल्म ने सचिन को रातोंरात एक रोमांटिक हीरो के तौर पर स्थापित कर दिया। इसके बाद उन्होंने अंखियों के झरोखों से और फिर 1982 में आई फिल्म नदिया के पार में काम किया, जिसमें उन्होंने गांव के एक सीधे-साधे लड़के चंदन का किरदार निभाया। यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग सचिन को असल जिंदगी में भी चंदन कहकर बुलाने लगे। दिलचस्प बात यह है कि इसी फिल्म नदिया के पार का साल 1994 में रीमेक बना जिसका नाम था हम आपके हैं कौन जो सलमान खान और माधुरी दीक्षित की सुपरहिट फिल्म साबित हुई। यानी एक तरह से सचिन की उस फिल्म ने आगे चलकर बॉलीवुड की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक की नीव रखी। अब बारी आती है सचिन की निजी जिंदगी के उस पहलू की जिसकी कहानी किसी फिल्मी लव स्टोरी से कम नहीं है। बात है साल 1984 की जब सचिन अपनी पहली मराठी निर्देशित फिल्म नवरी मिले नवरियाला बना रहे थे। इस फिल्म के लिए उन्हें एक नई अभिनेत्री की जरूरत थी और उनकी मां ने दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में एक युवा लड़की को परफॉर्म करते देखा। उस लड़की का नाम था सुप्रिया सबनीस। सचिन की मां ने अपने बेटे को सुझाव दिया कि वे इस लड़की को अपनी फिल्म में कास्ट करें। सचिन ने सुप्रिया से संपर्क किया और वे इस फिल्म के लिए राजी हो गई। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही सचिन का दिल सुप्रिया पर आ गया। हालांकि उस वक्त सुप्रिया की उम्र सिर्फ 17 साल थी और सचिन 27 साल के थे। यानी दोनों के बीच पूरे 10 साल का फासला था। लेकिन प्यार उम्र नहीं देखता। इस बार भी सचिन की मां ने अहम भूमिका निभाई। कहा जाता है कि सचिन की मां ने ही अपने बेटे को सुप्रिया के सामने अपने दिल की बात कहने और उन्हें शादी के लिए प्रपोज करने की सलाह दी। आखिरकार साल 1985 में सचिन और सुप्रिया ने शादी कर ली और इस जोड़ी [संगीत] की एक और खूबसूरत बात यह है कि दोनों का जन्मदिन लगभग एक ही समय पर आता है। सुप्रिया का जन्मदिन 16 अगस्त को होता है और सचिन का 17 अगस्त को। यानी हर साल यह जोड़ी लगातार 2 दिन तक अपना बर्थडे सेलिब्रेट करती है। शादी के कुछ सालों बाद सचिन और सुप्रिया के घर एक बेटी ने जन्म लिया जिसका नाम रखा गया श्रिया पिलगावकर। आज श्रिया खुद बॉलीवुड और ओटीटी की एक जानी मानी अभिनेत्री हैं। जिन्हें मशहूर वेब सीरीज मिर्जापुर में उनके काम के लिए खूब पहचान मिली।
लेकिन इससे पहले सचिन और सुप्रिया की जिंदगी में एक और भावुक और कम जाना पहचाना अध्याय जुड़ा है। इस जोड़े ने एक बेटी को गोद लिया था जिसका नाम था करिश्मा माखनी। हालांकि यह अध्याय काफी विवादों में घिर गया। कुछ समय बाद करिश्मा वापस अपने असली पिता कुलदीप माखनी के पास इंग्लैंड चली गई और इस पर कई तरह की खबरें और आरोप भी सामने आए। लेकिन बाद में जब करिश्मा खुद मीडिया के सामने आई तो उन्होंने एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश की। करिश्मा के मुताबिक उस वक्त उनके असली पिता को कुछ आपराधिक गुटों से गंभीर धमकियां मिल रही थी और इसी वजह से सचिन को लगा कि करिश्मा के लिए अपने परिवार के साथ ब्रिटेन चले जाना ही बेहतर और सुरक्षित रहेगा। यह किस्सा दिखाता है कि पर्दे के पीछे की जिंदगी में भी कई बार ऐसे मुश्किल और भावुक फैसले लेने पड़ते हैं जिनकी पूरी सच्चाई सालों बाद सामने आती है। सचिन की प्रतिभा सिर्फ अभिनय तक सीमित नहीं रही। यह वह कलाकार हैं जिन्होंने खुद को एक साथ कई भूमिकाओं में ढाला। अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, लेखक, गायक, संगीतकार, कोरियोग्राफर और यहां तक कि एडिटर के तौर पर भी मराठी सिनेमा में सचिन ने निर्देशन के क्षेत्र में भी एक अलग मुकाम हासिल किया। साल 1988 में आई उनकी फिल्म आशी ही बनवा बनवी मराठी सिनेमा की एक क्लासिक कॉमेडी फिल्म मानी जाती है जिसमें उन्होंने खुद मराठी सिनेमा के दो बड़े सितारों अशोक सराफ और लक्ष्मीकांत बेरडे के साथ अभिनय भी किया। अपने पूरे करियर में सचिन ने बतौर अभिनेता 200 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया और बतौर निर्देशक 23 से भी ज्यादा फिल्मों की कमान संभाली।
छोटे पर्दे पर भी उनका जादू कम नहीं रहा। उन्होंने टीवी सीरियल 2 में मैं का निर्देशन किया जो एक जबरदस्त हिट साबित हुआ और साथ ही कड़वी खट्टी मीठी जैसे कॉमेडी शोज़ में भी अभिनय निर्माण और निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो सचिन पिलगांवकर की कहानी किसी परिकथा से कम नहीं लगती। एक ऐसा बच्चा जिसे 4 साल की उम्र में कैमरे का सामना करना पड़ा। जिसे 5 साल की उम्र में देश के प्रधानमंत्री ने खुद गुलाब देकर आशीर्वाद दिया। जिसे उर्दू की तालीम मीना कुमारी जैसी दिग्गज अभिनेत्री से मिली। जिसने शोले जैसी ऐतिहासिक फिल्म में सिर्फ अभिनय ही नहीं बल्कि एडिटिंग की जिम्मेदारी भी संभाली और जिसने आगे चलकर खुद को एक संपूर्ण फिल्म मेकर के तौर पर स्थापित किया। यह सफर वाकई किसी प्रेरणा से कम नहीं है। सचिन पिलगांवकर आज भी उतनी ही सक्रियता के साथ मराठी और हिंदी सिनेमा में काम कर रहे हैं और नई पीढ़ी के कलाकारों को अपने अनुभव से मार्गदर्शन देते रहते हैं। उनकी बेटी श्रिया आज उनकी विरासत को आगे बढ़ा रही हैं और उनकी पत्नी सुप्रिया आज भी उनके साथ हर कदम पर खड़ी नजर आते हैं। आती हैं। यही वजह है कि इंडस्ट्री के लोग सचिन को प्यार और सम्मान से महागुरु कह कर बुलाते हैं क्योंकि उन्होंने न सिर्फ खुद एक लंबा और शानदार सफर तय किया बल्कि इस पूरे सफर में अपनी सादगी, मेहनत और जुनून को कभी कम नहीं होने दिया। दोस्तों, आपको यह वीडियो कैसी लगी कमेंट में जरूर बताएं। हमारे YouTube चैनल माय मेमोरी से जुड़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। मिलेंगे अगली वीडियो के साथ। धन्यवाद।