:कैसे ऋषि कपूर ने बचा लिया पिता राज कपूर को बॉलीवुड का गलियारा। 18 दिसंबर 1970 का दिन। आर.के. स्टूडियो का मुख्य गेट। राज कपूर अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के रिलीज़ होने का इंतज़ार कर रहे थे। वो फिल्म जिसे बनाने में उन्होंने अपने 6 साल झोंक दिए थे, अपनी गाढ़ी कमाई लगा दी थी, और जिसके हर एक फ्रेम में उनका खुद का दिल और उनकी अपनी अधूरी प्रेम कहानियां धड़क रही थीं।राज कपूर को पूरा यकीन था कि यह फिल्म हिंदुस्तान का सिनेमा बदल देगी।
उन्हें अपनी ऑडियंस की नब्ज़ पर पूरा भरोसा था—वही नब्ज़ जिसने उन्हें ‘आवारा’, ‘श्री 420’ और ‘संगम’ का ‘शोमैन’ बनाया था। लेकिन जब पर्दा उठा और थियेटर्स की लाइट जलीं, तो वहां सन्नाटा था।ऑडियंस ने उस जोकर के आंसुओं को देखने से साफ इनकार कर दिया। फिल्म इतनी लंबी थी, उसका दर्द इतना गहरा और व्यक्तिगत था कि लोग उससे जुड़ ही नहीं पाए। ‘मेरा नाम जोकर’ बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह औंधे मुंह गिर गई।यह सिर्फ एक फिल्म का फ्लॉप होना नहीं था। यह राज कपूर के बैंक बैलेंस, उनके आत्मसम्मान और आर.के. बैनर के वजूद पर एक बहुत बड़ा आघात था। हालात यहाँ तक आ गए कि जिस स्टूडियो को इंडस्ट्री की सबसे पवित्र जगह माना जाता था
, उसे और राज कपूर के आशियाने को गिरवी रखने की नौबत आ गई। शोमैन का साम्राज्य ढह रहा था।लेकिन असली कहानी तब शुरू होती है जब राज कपूर ने खुद से वही सवाल पूछा जो उनकी फिल्म का जोकर दुनिया से पूछता था— “शो बंद करोगे, या अगला शो शुरू करोगे?”राज कपूर ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गलती से एक कड़वा सबक सीखा। उन्हें समझ आ गया कि जिस यूथ इंडिया के सामने वे अपनी मिडिल-एज फिलॉसफी लेकर आए थे, उसे उस वक्त के हिसाब से कुछ बिल्कुल नया, ताजा और अपनी ही उम्र का चाहिए था। और यहीं से जन्म हुआ एक मास्टरस्ट्रोक का।राज कपूर ने इस बार खुद को कैमरे के पीछे धकेल लिया। हीरो की कुर्सी से खुद को हटाया और आगे किया एक 21 साल के नए लड़के को—
वही लड़का जिसे ऑडियंस ने ‘मेरा नाम जोकर’ में यंग राजू यानी ऋषि कपूर के रूप में पहली बार देखा था।लेकिन इस बार ऋषि कपूर राज कपूर का छोटा वर्जन नहीं थे। वे अपने दौर के एक नए, एनर्जेटिक और रोमांटिक हीरो थे। उनके साथ उतरीं 16 साल की मासूम सी डिंपल कपाड़िया। फिल्म की कहानी किसी जोकर के टूटे हुए दिल की नहीं, बल्कि दो युवा दिलों की बगावती प्रेम कहानी थी।1973 में जब ‘बॉबी’ रिलीज़ हुई, तो सिनेमाघरों के बाहर जो सैलाब उमड़ा, उसने इतिहास रच दिया। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। ऋषि कपूर रातों-रात देश के सबसे बड़े क्रश बन गए
और डिंपल कपाड़िया ओवरनाइट सेंसेशन।और सबसे बड़ी बात? इस एक छोटी सी, प्यारी सी लव स्टोरी ने आर.के. बैनर की डूबती हुई नैया को सिर्फ बचाया ही नहीं, बल्कि उसे एक बार फिर बॉलीवुड के शिखर पर ला खड़ा किया।जरा सोचिए, जिस बेटे को राज कपूर ने अपनी सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म में एक चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर लॉन्च किया था, महज 3 साल बाद उसी बेटे ने अपनी पहली सोलो फिल्म से अपने पिता के पूरे साम्राज्य, उनकी साख और उनके सपनों को बचा लिया।यही वजह है कि राज कपूर को असली ‘शोमैन’ कहा जाता है—क्योंकि वे जानते थे कि अगर जोकर गिर भी जाए, तो पर्दा हमेशा के लिए नहीं गिरता… अगला शो हमेशा शुरू होता है।