एक ऐसी मशहूर अदाकारा जिनका जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ। जिनका रिश्ता टैगोर परिवार से था। जिन्होंने बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन फिर उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जब उन्होंने एक मुस्लिम शख्स से शादी की और इस्लाम कबूल कर लिया और फिर इसके बाद उनके घर का माहौल किस तरह का था?
क्या उनके घर में मंदिर था? क्या देवी देवताओं की मूर्तियां रखी जाती थी? और उनके बच्चों की परवरिश किस तरह हुई? इन सवालों का जवाब खुद उनकी बेटी ने एक इंटरव्यू में दिया और यकीन मानिए शर्मिला टैगोर की इस कहानी का यह हिस्सा शायद बहुत कम लोग जानते हैं। शर्मिला टैगोर का जन्म एक मशहूर बंगाली हिंदू परिवार में हुआ था। उनका रिश्ता रविंद्रनाथ टैगोर के परिवार से जुड़ा हुआ है। उन्होंने फिल्मों में काम किया और देखते ही देखते हिंदी सिनेमा की बड़ी अदाकाराओं में उनका नाम शामिल हो गया। लेकिन साल 1969 में उनकी जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आया।
उन्होंने मशहूर क्रिकेटर और पटौदी के नवाब मंसूर अली खान पटौदी से शादी की। यह शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं थी बल्कि दो अलग-अलग मजहब और अलग-अलग परिवारों को जोड़ने वाली थी। शादी के बाद शर्मिला टैगोर ने इस्लाम कबूल किया और अपना नाम आयशा सुल्ताना रख लिया। अब बात करते हैं इस्लाम कबूल करने के बाद उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश किस माहौल में की। इस बारे में उनकी बेटी सबा अली खान पटौदी ने बताया। सबा के मुताबिक उनकी मां शर्मिला टैगोर ने बच्चों को इस्लाम की बुनियादी बातें सिखाई। यानी घर में बच्चों को अपने मजहब की बुनियादी समझ दी जाती थी और इस्लामी माहौल का असर साफ दिखाई देता था।
लेकिन सबा ने अपने घर के माहौल को लेकर एक और बात बताई जो सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में आई। उन्होंने बताया कि उनके घर में कोई मंदिर नहीं था और देवी देवताओं की मूर्तियां भी नहीं थी। अब जरा इस बात को समझिए। शर्मिला टैगोर का जन्म जिस परिवार में हुआ था, वहां से लेकर उनकी शादी और फिर इस्लाम कबूल करने तक का सफर अपने आप में काफी दिलचस्प है। एक तरफ उनका जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ।
दूसरी तरफ उन्होंने एक मुस्लिम परिवार में शादी की और फिर उन्होंने खुद इस्लाम को अपना मजहब बनाया। इसके बाद अपने बच्चों की परवरिश भी उन्होंने अपने नए मजहबी माहौल के मुताबिक की। यही वजह है कि आज जब शर्मिला टैगोर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं और वंदे मातरम को लेकर अपनी बात रखती हैं तो उनकी निजी जिंदगी का यह पहलू भी लोगों के लिए दिलचस्प बन जाता है। हाल ही में वंदे मातरम को लेकर शर्मिला टैगोर ने कहा कि भारत में अलग-अलग मजहब के लोग रहते हैं। इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत की जाती है और वंदे मातरम के कुछ हिस्सों में देवी देवताओं की वंदना का जिक्र आता है। इसलिए मुसलमानों के लिए इसके कुछ हिस्सों को लेकर धार्मिक परेशानियां हो सकती हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अगर सभी मजहब के लोगों को साथ लेकर चलना है तो वंदे मातरम के शुरुआती दो हिस्सों को ही इस्तेमाल करना बेहतर होगा| अब यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है|
शर्मिला टैगोर ने यह नहीं कहा कि देश से वंदे मातरम खत्म कर दिया जाए| उन्होंने यह भी नहीं कहा कि जो इसे गाता है वह गलत है। उनकी बात सिर्फ इतनी थी कि एक लोकतांत्रिक मुल्क में अलग-अलग मजहब के लोगों की धार्मिक भावनाओं को भी समझा जाना चाहिए और शायद यही वजह है कि उनका बयान इतना चर्चा में आ गया क्योंकि यह बात किसी आम शख्स ने नहीं कही थी। यह बात एक ऐसी अदाकारा ने कही जो खुद एक हिंदू परिवार में पैदा हुई। एक मुस्लिम परिवार में शादी की और फिर इस्लाम को अपना मजहब बनाया और उनकी बेटी के मुताबिक इस्लाम कबूल करने के बाद उनके घर में मंदिर और देवी देवताओं की मूर्तियां भी नहीं थी। यहां एक और बात ध्यान देने वाली है।
शर्मिला टैगोर की कहानी हमें यह भी बताती है कि किसी इंसान के मजहबी पहचान सिर्फ उसके जन्म से तय नहीं होती। इंसान अपनी जिंदगी में फैसले लेता है। अपने विश्वास को समझता है और फिर अपनी राह चुनता है। शर्मिला टैगोर ने भी अपनी जिंदगी में ऐसा ही एक फैसला लिया। उन्होंने मंसूर अली खान पटौदी से शादी की और इस्लाम कबूल किया। इसके बाद उनके बच्चों को भी इस्लाम की बुनियादी बातें सिखाई गई। आज वही शर्मिला टैगोर जब मुसलमानों की धार्मिक संवेदनशीलता की बात करती हैं तो उनके बयान को सिर्फ एक राजनीतिक बयान मानकर छोड़ देना शायद पूरी कहानी नहीं है क्योंकि इसके पीछे उनकी अपनी जिंदगी का तजुर्बा भी है। एक ऐसी जिंदगी जिसमें उन्होंने खुद दो अलग मजहबी माहौल को करीब से देखा। एक तरफ जन्म से मिला हुआ माहौल और दूसरी तरफ वो मजहब जिसे उन्होंने अपनी जिंदगी में खुद चुना। इसलिए वंदे मातरम पर उनकी बात को समझने के लिए सिर्फ उनका बयान सुनना काफी नहीं है।
उनकी जिंदगी की कहानी को भी समझना जरूरी है और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा पहलू है कि शर्मिला टैगोर ने सिर्फ एक मुस्लिम परिवार में शादी नहीं की थी बल्कि उन्होंने इस्लाम को खुद कुबूल किया था। अपने बच्चों को इस्लाम की बुनियादी बातें सिखाई और अपने घर के माहौल को भी उसी के मुताबिक रखा।