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ग्रीक गॉड और देश के पहले सुपरमॉडल मिलिन सोमन का आखिर क्यों नहीं चला बॉलीवुड में उनका जादू?

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जुलाई 1995 सिनेब्लिट्स और Zee मैगज़ीन के नए अंक बाजार में आए और उनमें एक तस्वीर छपी। तस्वीर जिसमें उस वक्त के सुपर मॉडल कपल मिलिन सोमन और मधु सपरे थे। तस्वीर में दोनों के शरीर पर कपड़े नहीं थे। इस फोटो में मिलिन सोमन और मधु सपरे के साथ एक अजगर भी लिपटा हुआ था। जाहिर है YouTube की गाइडलाइंस की वजह से वह पूरी तस्वीर हम भी दिखा नहीं सकते। यह फोटो शूट टफ शूज ब्रांड के विज्ञापन के लिए हुआ था। शूट हुआ था मुंबई में काशिद के एक बीच बंगलो में। सोमन के पूरे शरीर पर गीला प्लास्टर ऑफ पेरिस लगाया गया ताकि सूखने के बाद इंडिया का यह पहला सुपर मॉडल एक ग्रीक गॉड की तरह दिखे। कुछ घंटों तक वह धूप में उसी तरह खड़े रहे। फिर कैमरे के सामने वो तस्वीर बनी जिसने अगले 14 साल तक मिलिन सोमन का पीछा नहीं छोड़ा। तस्वीर का विरोध हुआ। पोस्टर्स फाड़े गए। पुलिस केस हुआ, ऑब्सिनिटी का मामला बैठा। अदालत तक पहुंचा। मधु सपरे के पिता को विरोध में साड़ियां तक भेजी गई। फिर यह मामला भारतीय अदालत की रफ्तार से चलने लगा। 14 साल बाद 2009 में दोनों बरी हुए। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 2020 में अपने 55वें बर्थडे पर सोमन ने गोवा के बीच पर अपनी एक नेकेड रनिंग की तस्वीर डाल दी। तस्वीर उनकी पत्नी अंकिता कोवर ने खींची थी। फिर वही हेडलाइंस, फिर वही आउटरेज, पुलिस केस। यानी जिस चीज के लिए 1995 में एक आदमी 14 साल तक अदालत में खड़ा रहा, उसी चीज को उसने 25 साल बाद कैमरे के सामने फिर किया। बिना किसी झिझक के। रफ कॉपी के इस एपिसोड में कहानी उन्हीं मिलिन सोमन की जिन्हें भारत का पहला मेल सुपर मॉडल कहा गया जो बाद में कैप्टन वम बना, फिटनेस आइकॉन बना और जिसने मॉडलिंग को सिर्फ कपड़ों के साथ नहीं अपने शरीर के साथ साझा किया। नमस्कार, मेरा नाम है अमन। आप देख रहे हैं खबरगांव। 1995 में ही एक और तस्वीर बन रही थी जो मिलिन सोमन को सिर्फ मॉडलिंग की दुनिया से निकालकर सीधे घर-घर पहुंचाने वाली थी। उस दौर में इंडिपेंडेंट पॉप म्यूजिक अभी बॉलीवुड के गानों के सामने अपनी जगह बना ही रहा था। तभी आलिशा चिनोए का गाना आता है। गाना मेड इन इंडिया। मिलनियल्स को याद आ गया होगा और गाने से ज्यादा जिस चीज ने लोगों का ध्यान खींचा वो था उसका हीरो। वीडियो के डायरेक्टर केन होश शुरू में एक सामान्य सा पॉप वीडियो बनाना चाहते थे। लेकिन अलीशा के दिमाग में कुछ और था। वह चाहती थी कि इस वीडियो में इंडिया को उसके अपने सिंबल्स के साथ दिखाया जाए।

जैसे हाथी, सांप, ज्योतिषी और वो पूरा एक विजुअल जिसमें देसी होने को लेकर किसी तरह की झिझक नहीं है, किसी तरह की शर्म नहीं। और हीरो के मामले में अलीशा को कोई कंफ्यूजन था ही नहीं। उन्हें चाहिए था मिलिन सोमन। किस्सा यह है कि उन्होंने केन घोष का कॉलर तक पकड़ लिया और कहा आई वांट मिलिन सोमन। लेकिन जिस आदमी को लेकर अलीशा इतनी श्योर थी मिलन खुद इस पूरे कांसेप्ट से उतने इंप्रेस नहीं थे। उन्हें ये आईडिया कुछ खास नहीं लगा। बनावटी लग रहा था। सस्ता लग रहा था। फिर वीडियो शूट हुआ और मिलिन सोमन को उसमें कुल मिलाकर करीब 53 से 55 सेकंड ही मिले। लेकिन उन 55 सेकंड में जो हुआ उसने अगले कई सालों के लिए उनकी इमेज तय कर दी। एक बड़ा सा लकड़ी का शिपिंग क्रेट उस पर एक्सपोर्ट के स्टैंप लगे हुए और उसी बॉक्स से एक शर्टलेस मिलिन सोमन बाहर आते हैं। बस इतनी सी एंट्री थी। लेकिन उस वक्त टेलीविजन पर यह चेहरा जैसे अचानक पूरे देश के सामने आ गया। 1995 का लिबरलाइजेशन वाला इंडिया था। बाहर की चीजें मॉडर्निटी और स्टेटस का हिस्सा मानी जा रही थी। और उसी वक्त मेड इन इंडिया नाम का एक गाना एक ऐसे आदमी को लेकर आया जो खुद उस दौर के बाकी हीरो से अलग दिखता था। ना बहुत भारी शरीर था ना उस समय के कन्वेंशनल हीरो जैसा रंग था। लीन बॉडी थी, सांवला रंग था और वो चेहरा था जिसे देखकर लोगों ने उसे ग्रीक, गॉड और एडोनिस्ट कहना शुरू कर दिया। वीडियो में उनकी मौजूदगी 55 सेकंड की थी। लेकिन [संगीत] 1995 के बाद मिलिन सोमन को याद करने के लिए लोगों को पूरा गाना देखने की जरूरत भी नहीं पड़ी। बस वो लकड़ी का बॉक्स याद रहा और उसमें से निकलता हुआ वो आदमी जिसके हिस्से आया इंडिया के पहले सुपर मॉडल का टैग। मगर 1995 में जिस मिलिन सोमन को लोग एक शूज के विज्ञापन की इमेज के जरिए जान रहे थे। मेडल इन इंडिया गाने के जरिए पहचान रहे थे। उस मिलन तक पहुंचने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। क्योंकि जिस शरीर ने बाद में कैमरे के सामने इतनी हलचल मचाई वो शरीर किसी जिम की चार दीवारी में नहीं बना।

उसकी शुरुआत हुई थी एक ऐसे बच्चे से जिसे लोगों के बीच रहने से ज्यादा अकेले रहना और जानवरों के साथ वक्त बिताना पसंद था। 4 नवंबर 1965 को मिलन का जन्म स्कॉटलैंड के ग्लासगो में हुआ। 7 साल की उम्र में परिवार भारत लौट आया और मुंबई के शिवाजी पार्क में आकर बस गया। एक तरफ ब्रिटेन में बीता बचपन था। दूसरी तरफ था दादर का वो माहौल जहां मिलिंद को अपनी ही उम्र के बच्चों के साथ फिर से जगह बनानी थी। लेकिन यह आसान नहीं हुआ। डॉक्टर एंटोनियो द सिलवा स्कूल में मिलिंद का ब्रिटिश एक्शन और मराठी ना बोल पाना उन्हें बाकी बच्चों से अलग करता था। द पॉलीमैथिक पाथ ऑफ मिलिन सोमन में दर्ज है कि उन्हें स्कूल में चिढ़ाया जाता था और वह धीरे-धीरे लोगों से दूर रहने लगे और इसी अकेलेपन में जानवर उनके साथी बन गए। शिवाजी पार्क में मिलिंद ने बिल्लियां, कुत्ते, खरगोश और कछुए तक पाल रखे थे। एक दिन दादर के महात्मा गांधी मेमोरियल स्विमिंग पूल से घर लौटते हुए उन्हें रास्ते में एक सांप दिखाई दिया। उन्होंने उसे उठाया। अपने बूट में रखा घर ले आए। लेकिन मिलिन के बचपन में जानवरों से भी ज्यादा बड़ी जगह धीरे-धीरे स्विमिंग ले रही थी। घर का माहौल बहुत आसान नहीं था। अपने पिता को मिलिन ने बाद में गुस्सैल और कड़वे मिजाज की तरह बताया और ऐसे में स्विमिंग उनके लिए सिर्फ खेल नहीं रही। पूल में घंटों की ट्रेनिंग उन्हें घर के टॉक्सिक माहौल से दूर रखती थी। स्विंग में मिलें का प्रदर्शन बढ़ता जा रहा था। उन्हें दादर के पुल से बांद्रा के ओर्स क्लब में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। लेकिन यहां एक अजीब उलटफेर हुआ। दादर में अपने ब्रिटिश एक्सेंट की वजह से जो लड़का इंग्लिश बॉय था उसी बांद्रा के अमीर और एलट क्लब में अब वो मराठी बॉय बन गया। अपनी किताब कीप मूविंग में मिलिन ने इस उल्टे कल्चरल शौक का जिक्र किया। लेकिन तब तक स्विमिंग उनकी जिंदगी का इतना बड़ा हिस्सा बन चुकी थी कि परिवार के साथ भी एक समझौता करना पड़ा। परिवार चाहता था कि वो कोई सुरक्षित करियर चुने। उनके दादा स्पोर्ट्स को करियर बनाने के फैसले से खुश नहीं थे। इसलिए मिलिंद को बाय कला के एमएच साबू सिद्दीकी पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा शुरू करने के लिए कहा गया और बदले में उन्हें स्विमिंग की आजादी मिल गई। अगले 2 साल तक मिलिंद रोज करीब 12 कि.मी. तैरते रहे। यही वो ट्रेनिंग थी जिसने उनके शरीर को वो शेप दी जिसे कुछ साल बाद लोग ग्रीक गॉड कहने वाले थे। लेकिन उस वक्त मिलन के लिए किसी ग्लैमर की तैयारी नहीं थी। उनका एक ही लक्ष्य था भारत के लिए तैरना। 1984 में मिलिन ने काठमांडू में हुए पहले साउथ एशियन गेम्स में भारत को रिप्रेजेंट किया और सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद 84 से 87 तक लगातार 4 साल वो 100 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक में सीनियर नेशनल स्विमिंग चैंपियन रहे। अब अगला पड़ाव था 1986 का सेओल एशियन गेम्स। नेशनल कैंप में ऑस्ट्रेलियन कोच ने मिलन का शरीर देखकर कहा वी कैन डू समथिंग विद दिस। मिलन क्वालीफाई कर चुके थे। उन्हें लगा कि अब भारत की टीम में जगह पक्की है। लेकिन फाइनल कंटिंजेंट की लिस्ट आई और उसमें उनका नाम था ही नहीं। बाद में फोब्स इंडिया को दिए गए इंटरव्यू में मिलिंद ने बताया कि उन्हें लगा कि फेडरेशन पॉलिटिक्स और रीजनल फेवरेटिज्म ने उनके सिलेक्शन को प्रभावित किया है। बात इतनी बड़ी कि पूल साइड पर उनकी अपने नेशनल कोच से तीखी बहस हो गई। मिलन के लिए यह सिर्फ एक टूर्नामेंट छूटने की बात नहीं थी। उन्हें लगा कि जिस खेल में उन्होंने सालों अपना शरीर और वक्त लगाया वहां फैसला उनकी परफॉर्मेंस से बाहर की चीजें कर रही थी। 1988 में सिर्फ 23 साल की उम्र में उन्होंने कंपिटिटिव स्विमिंग छोड़ दी।

एक ऐसा आदमी जो 4 साल तक नेशनल चैंपियन था, इंटरनेशनल मेडल जीत चुका था और भारत के लिए बड़े टूर्नामेंट खेलने वाला था। उसने स्विमिंग छोड़ने के बाद कोई बड़ा प्लान नहीं बनाया। मुंबई के एक होटल में नौकरी करने लगा। एनडीt को दिए एक इंटरव्यू में मिलन ने बताया कि उस वक्त वो एक बिल्कुल शान जिंदगी के बारे में सोच रहे थे। शायद वेटर बनते शायद कुक बनते। मॉडलिंग उनकी योजना में कहीं नहीं था। लेकिन जिस चीज से मिलिंद का पूरा करियर खत्म हुआ था उसी स्विमिंग ने उन्हें एक ऐसी चीज दे दी थी जिसका इस्तेमाल अब एक बिल्कुल अलग दुनिया करने वाली थी। एक ऐसा शरीर जिसे कैमरा पहली नजर में पहचान सकता था। और फिर एक दिन एक मॉडलिंग एजेंसी की नजर उन पर पड़ी। मिलिन सोमन की तीसरी जिंदगी यहीं से शुरू हो जाती है। स्वयं छोड़कर होटल में नौकरी करने वाले मिलिन सोमन अब मॉडलिंग में आ चुके थे। लेकिन यह भी कोई ऐसा करियर नहीं था जिसे उन्होंने बैठकर चुना हो। मॉडलिंग उनके पास आई थी और शुरुआत भी ऐसी हुई थी कि पहली बार में उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। 1989 में मिलिंद के दोस्त और साथ ही स्विमर बिजॉय जैन को ग्रेवी एरा शूटिंग्स के एक प्रिंट कैंपेन के लिए ऑडिशन देना था। बिजॉय जा नहीं पाए। तो उन्होंने मिलिंद को कहा कि उनकी जगह वो चले जाए। मिलिन चले भी गए। लेकिन वहां उन्होंने देखा कि कास्टिंग वालों ने साफ कह दिया कि वो बहुत ज्यादा कम उम्र के और लड़कों जैसे लगते हैं। बाकी लड़कों जैसे लगते हैं। एक वुलन सूट को जिस तरह का सख्त और सधा हुआ लुक चाहिए था मिलन उस तस्वीर में उसके उलट लग रहे थे। यानी मॉडलिंग की दुनिया में पहला कदम रखा और वहीं से बाहर कर दिए गए। लेकिन करीब तीन हफ्ते बाद उसी कोऑर्डिनेटर रचना बहल को फोन आया। इस बार एक शूटिंग कैंपेन के लिए मॉडल चाहिए था और उन्होंने मिलिंद को बुलाया। मिलिन खुद मॉडलिंग को लेकर इतना झिझकते थे कि उन्हें मनाना पड़ा। फिर उन्हें बताया गया कि सिर्फ एक घंटे के काम के लिए उन्हें ₹00 मिलेंगे। उन्हें लगा कि यह लोग पागल हैं। लेकिन वह शूट करने चले गए। मिलिंद अपनी किताब में लिखते हैं कि पहला चेक लेकर जब वो घर पहुंचे और अपनी मां उषा सोमन को दिखाया तो वह काफी देर तक चेक ही देखती रही। फिर उन्होंने बेटे से पूछा इतने पैसे क्यों दे रहे हैं? पागल है क्या? पैसे के लिए शुरू हुई मॉडलिंग। अब धीरे-धीरे ऐसी दुनिया बनती जा रही थी, जहां मिलिंद अपनी मर्जी से भी तय कर रहे थे कि किस काम का हिस्सा उन्हें बनना है। लेकिन कैमरे के सामने उनका अगला पड़ाव फैशन नहीं था, सिनेमा था। 1991 में मिलिंद को जो जीता वही सिकंदर आमिर खानवाली में शेखर मल्होत्रा का किरदार मिला। बाद में यही किरदार दीपक तिजोरी ने निभाया था। लेकिन शूटिंग के दौरान मिलिंद ने फिल्म छोड़ दी थी। वजह थी सेट पर काम देर से चालू होना और उन्हें समय पर नाश्ता ना मिलना। बस अब यह नाश्ता ना मिलना छोटी सी बात लग सकती है। मगर मिलिन सेट से निकल गए। फिर आया साल 1995 और यह साल मिलिंद की जिंदगी में एक साथ बहुत कुछ लेकर आया। जनवरी 1995 में उनके पिता प्रभाकर सोमन की मौत हो गई। पिता के साथ मिलिंद का रिश्ता पहले से ही तनावपूर्ण था। अपनी किताब में उन्होंने पिता को गुस्सैल और कड़वे मिजाज का बताया ही था। जब उनके पिता परिवार से अलग हुए थे तब मिलिंद को दुख से ज्यादा राहत महसूस हुई थी। पिता को अस्पताल ले जाते वक्त मिलिंद एंबुलेंस में उनके पास बैठे थे। वो खुद से किसी गर्म एहसास किसी आंसू को निकालने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन कुछ भी नहीं आया और उसी साल कुछ महीनों बाद मिलिंद अलीशा चिनोई के मेड इन इंडिया गाने में नजर आए। जिसका जिक्र हमने शुरुआत में किया। इसी दौरान टफ शूज के विज्ञापन वाला वाक्या भी हुआ जब क्रिएटिव टीम ने मिलिंद और उनकी उस वक्त की गर्लफ्रेंड सुपर मॉडर्न मधु सपरे को चुना। किस्सा आपने सुना ही है मगर इस कहानी का एक और पहलू है। मिलिंद की मां ने तस्वीर देखी तो उसे देखकर उसे अश्लील नहीं कहा।

उनकी किताब के मुताबिक वो अफ्रीका में थी। जब उन्होंने किसी इंटरनेशनल पब्लिकेशन में यह तस्वीर देखी। उन्होंने मिलिंद को फोन किया और तस्वीर की कंपोजिशन और खूबसूरती की तारीफ की। जिस तस्वीर पर बाद भारत में 14 साल तक नैतिकता की बहस चलने वाली थी, उसे उनकी मां ने सबसे पहले एक तस्वीर की तरह ही देखा और इस पूरे बवाल के बीच मिलिंद की एक और जिंदगी बन रही थी। 1995 में ही मिलिंद ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। मिलिंद सोनू शर्मा को दिए गए एक इंटरव्यू में बताते हैं कि उनके पास उस वक्त टेलीविज़ से काफी ऑफर आते थे। मगर क्योंकि उनकी हिंदी इतनी अच्छी नहीं थी। इसलिए वह बार-बार प्रोड्यूसर को नकारते रहे। आखिर में जब दूरदर्शन पर पहले अंग्रेजी ड्रामे को बनाने का विचार आया तो मिलिन ने अ माउथफुल ऑफ स्काई में आकाश भंडारकर का किरदार निभाया। इसे भारत का पहला इंग्लिश लैंग्वेज टेलीविज़ शो माना जाता है। इसके बाद सी हॉक्स और दूसरे टेलीविज़न शोज़ आए जिसमें वो दिखे। यानी कुछ ही सालों में वो स्विमिंग पूल से मॉडलिंग रैंप तक और फिर वहां से टीवी तक पहुंच चुके थे। फिर 1998 में दूरदर्शन पर एक शो आया। शो था कैप्टन वम। उस समय इंडियन टेलीविजन पर शक्तिमान जैसे सुपर हीरो शो थे जो लगभग एक साल पहले आया था। पौराणिक सीरियल थे। पारिवारिक ड्रामे थे। लेकिन कैप्टन व्यम ने दुनिया ही दूसरी बना दी। कहानी साल 2220 की थी। बृहस्पति के एक चांद आयु पर बने एक हाई सिक्योरिटी जेल से 12 खतरनाक इंटर गैलेक्टिक क्रिमिनल्स एक उल्कापिंड के टकराने के बाद भाग निकलते हैं। है ना गाने इंटरेस्टिंग? अब पूरी दुनिया के सामने एक खतरा है और उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी मिलती है कैप्टन वयोम को यानी वॉरियर ऑफ द स्काई को। लेकिन इस किरदार की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उसकी ताकत किसी एलियन पावर से नहीं आई थी। कैप्टन वयोम ने योग और कठोर ट्रेनिंग के जरिए अपनी फिजिकल और मेंटल क्षमताएं विकसित की थी। यानी 90 के दशक का इंडियन सुपर हीरो स्पेस में घूमता था। इंटर गैलेक्टिक क्रिमिनल्स यानी दूसरी दुनिया के अपराधियों से लड़ता था। लेकिन उसकी सुपर पावर योगा में थी। शो से जुड़ी एक और दिलचस्प बात है उसकी कास्ट मिलन सोमन, मधु सप्रे, डिनोमोरिया, नेत्र रघुरामन, राहुल बोस और टॉम ऑल्टर साहब उस दौर की फैशन और मॉडलिंग इंडस्ट्री के कई जाने पहचाने चेहरे एक ही शो में थे। ध्यान दीजिए यह वो दौर था जब मिलिंद की शक्ल सिर्फ एक मॉडल की पहचान नहीं रही। मेड इन इंडिया के बाद उनका चेहरा पॉप कल्चर का हिस्सा बन चुका था और कैप्टन वेम में वही चेहरा अब एक सुपर हीरो की बॉडी और कॉस्ट्यूम में था। मिलिन [गला साफ़ करने की आवाज़] खुद बचपन से स्टार ट्रैक के फैन थे और बैटमैन जैसे डार्क हीरो का किरदार निभाने का सपना देखते थे। इसलिए कैप्टन वयोम उनके लिए सिर्फ एक और एक्टिंग असाइनमेंट नहीं था। उससे कई ज्यादा था। आज पीछे मुड़कर देखें तो कैप्टन व्यंग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने अपने समय की टेक्नोलॉजी की सीमा के बावजूद बहुत बड़ा सपना देखा। डायरेक्टर केतन मेहता 1990 के दशक की शुरुआत से ही स्पेशल इफेक्ट्स के साथ कुछ प्रयोग करना चाहते थे। माया मेम साहब में भी उन्होंने सीजीआई के साथ कुछ करने की कोशिश की थी। लेकिन उस समय उपलब्ध टेक्नोलॉजी से वह संतुष्ट नहीं थे या फिर उससे काम नहीं बना। 5 साल बाद कैप्टन वयोम में उन्होंने टेलीविजन पर उससे कहीं बड़ा प्रयोग किया। शो का बजट उस समय के एक सामान्य टीवी प्रोडक्शन से करीब तीन गुना था। इसलिए इसे रोज-रोज़ खींचने वाले टीवी सीरियल्स की तरह नहीं बनाया गया। कहानी को सिर्फ 54 एपिसोड का किया गया। हर एपिसोड में बस 20 ही मिनट थे। और यही इसकी सबसे खूबसूरत बात भी थी। उसमें हर दूसरे एपिसोड में किसी की शादी नहीं थी। घर तोड़ू क्लेश नहीं था। कोई नया एंगल नहीं था। वहां स्पेस था।

क्रिमिनल्स थे। अजीब-अजीब विलंस थे। पेरिस, मोहिनी, छलासुर, काइनीटो और सामने कैप्टन वम। लेकिन कैप्टन वम के पीछे का मिलिन सोमन कैप्टन वम से बिल्कुल अलग था। शूटिंग के दौरान लंबे लाइटिंग सेटअप और घंटों के इंतजार के बीच मिलिन सोमन ने सेट पर सिगरेट पीना शुरू कर दिया। उन्होंने बाद में बताया कि इसकी शुरुआत पीियर प्रेशर से हुई थी और फिर वही चीज आदत बन गई। वह रोज 20 से 30 मिनट तक सिगरेट पीने लगे। मिलिंद आज इसे अपनी जिंदगी की सबसे बेवकूफियों में से एक गिनते हैं। कैप्टन विम के बाद मिलिन के सामने सबसे आसान रास्ता था हीरो बनकर वही चेहरा और वही बॉडी लेकर रोमांटिक फिल्मों में आ जाना। लेकिन उनकी फिल्मोग्राफी को देखें तो कभी सस्पेंस, कभी कॉमेडी, कभी विलेन, कभी हिस्टोरिकल किरदार, कभी इंटरनेशनल आर्ट, सिनेमा लगातार अलग-अलग तरह की फिल्मों में वो जाते रहे। 2000 में तरकीब से लेकर रूल्स द प्यार का सुपरहिट फार्मूला वैली ऑफ़ फ्लावर्स भेजा फ्राई ऑन द नाइट टेंपलर तमिल फिल्म पहिया और फिर बाजीराव मस्तानी तक उनकी फिल्मोग्राफी काफी वर्सटाइल रही। दुल्हन की विदाई का वक्त बदलना है। अब जजीस के लिए डायलॉग बहुत नया है। मगर यह डायलॉग जब 90ज किड्स सुनते हैं तो उनके दिमाग में एक फिल्म का नाम अपने आप आ जाता है। फिल्म है 16 दिसंबर। 2002 में आई इस फिल्म में मिलिन सोमन ने एजेंट विक्रम का किरदार निभाया था। कहानी शुरू होती है एक ऐसे खतरे से जिसमें दिल्ली को परमाणु हमले से उड़ाने की साजिश रची जा रही थी। इसके पीछे है डॉट्स खान जिसका किरदार गुलशन ग्रोवर ने निभाया था और उसे रोकने की जिम्मेदारी मिलती है एक स्पेशल इंटेलिजेंस टीम को। फिल्म को सबसे दिलचस्प हिस्सा यह था कि यह सिर्फ बंदूक लेकर आतंकवादियों के पीछे भागने वाली नॉर्मल बॉलीवुड फिल्म नहीं थी। इसमें हवाला नेटवर्क, पासवर्ड क्रैकिंग, थर्मल इमेजिंग, वॉइस सिंथेसिस और इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस जैसी चीजें कहानी का हिस्सा थी। आज यह सब सुनने में सामान्य लगता है। लेकिन 2002 में जब भारत में इंटरनेट और मोबाइल टेक्नोलॉजी अपने आम जिंदगी का हिस्सा नहीं बनी थी। तब 16 दिसंबर का यह टेक्निकल संसार काफी कूल महसूस होता था।

और फिल्म का सबसे याद रह जाने वाला हिस्सा आता है क्लाइमेक्स में। परमाणु बम को रोकने के लिए एक ऐसे पासवर्ड चाहिए था जो पासवर्ड किसी कंप्यूटर स्क्रीन पर लिखा हुआ नहीं था। उसे एक इंसान की आवाज में छुपाया गया है। यहीं से आता है दुल्हन की विदाई का वक्त बदलना है। एक ऐसी लाइन जब पहली बार सुनने पर किसी शादी के डायलॉग जैसी लगती है। लेकिन फिल्म एक सही न्यूक्लियर डीआर्मिंग कोड बन जाती है। उस समय इस सीन की टेक्नोलॉजी और जिस तरह की आवाज को सिंथेसिस करके कोड में बदला गया था, वह दर्शकों के लिए काफी नया था और फिर फिल्म टीवी पर बार-बार दिखाई जाने लगी। धीरे-धीरे 16 दिसंबर की थिएट्रिकल रिलीज़ से ज्यादा उसकी टीवी वाली जिंदगी ज्यादा बड़ी हो गई और अपने लॉन्ग रन में यह एक कल्ट बनी। 16 दिसंबर के बाद मिलिन सोमन ने एक ही तरह के किरदार को दोहराने से बजाय अलग-अलग दिशाओं में जाना जारी रखा। रूल्स प्यार का सुपरहिट फार्मूला में वो रोमांटिक दुनिया के करीब दिखाई दिए और फिल्म के साथ-साथ छोड़ दो आंचल जैसे गाने को लेकर भी उनकी स्क्रीन इमेज अलग-अलग तरह से सामने आई। वैली ऑफ़ फ्लावर्स में डायरेक्टर पेन नलिन के साथ वो एक इंटरनेशनल आर्ट हाउस सिनेमा का हिस्सा बने। फिर भेजा फ्राय जैसी फिल्म आई जहां उनकी कॉमेडी टाइमिंग टेस्ट हुई। ग्लैमर की बजाय कॉमेडी के अंदाज में उन्हें पहली बार देखा गया। दूसरी तरफ स्वीडिश फिल्म ऑन द नाइट टेंपलर में उन्होंने सलादीन का किरदार निभाया। [संगीत] 2010 की तमिल फिल्म पहिया में उन्होंने एक स्टाइलिश और खतरनाक एंटगनिस्ट यानी विलेन का किरदार निभाया। 2015 में संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव बस्तानी में वह अंबाजी पंत बने। अब मिलिन सोमन को इमेजिन करिए। एक ऐसा आदमी जिसे 90ज में इंडियन सेक्स आइकॉन की तरह पेश किया गया। जो सुपर मॉडल था, एक्टर था, फिटनेस का चेहरा था। जिसकी तस्वीरें मैगज़ीन के कवर से लेकर विज्ञापनों तक हर जगह थी। ऐसे आदमी की लव लाइफ में पब्लिक की दिलचस्पी होना लाजमी है। देखिए, मिलिंद के रिलेशनशिप की कहानी सिर्फ इस वजह से दिलचस्प नहीं है क्योंकि वह किसके साथ है। दिलचस्प यह है कि उनके रिश्ते बार-बार उन चीजों से टकराते रहे। जिन्हें उस वक्त भारतीय समाज रिश्ते की तय शर्तें मानता था। शादी साथ रहना, उम्र का फर्क और रिश्तों को लेकर लोगों की राय। 90ज की शुरुआत में मिलन की मुलाकात मॉडल मधु सपरे से हुई। मधु 1992 की मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में सेकंड रनर अप रह चुकी थी और दोनों जल्द ही रिलेशनशिप में आ भी गए थे। उस दौर में दोनों सिर्फ एक मॉडल कपल नहीं थे बल्कि मुंबई में साथ रहने वाले ऐसे कपल भी थे जिसके रिश्ते को शादी के नाम की जरूरत नहीं थी। फिर साल 1995 आया और वो नेक तस्वीर आई जिसका हमने जिक्र किया लेकिन केस और रिश्ते दो अलग-अलग कहानियां थी। उसी साल मिलिंद और मधु अलग भी हो गए। मधु के बाद मिलिंद की अगली बड़ी रिलेशनशिप 2006 में हुई। वैली ऑफ़ द फ्लावर्स की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात फ्रेंच चाइनीस एक्ट्रेस मायली जामपनोई से हुई। 6 महीने के भीतर दोनों ने शादी कर ली और जुलाई 2006 में गोवा में यह शादी हुई। लेकिन इस रिश्ते में समस्या कोई उम्र परिवार या समाज नहीं था। समस्या थी दूरी। मिलिन मुंबई में और मलिन पेरिस में दो अलग-अलग शहर अलग काम और लगातार ट्रैवल। कुछ समय बाद दोनों अलग हो गए। 2009 में तलाक हो गया।

मिलिन ने इसके बाद इस रिश्ते के बारे में बात करते हुए कहा कि दूरी शुरू से ही एक समस्या थी। तलाक के बाद मिलिंद की रिलेशनशिप एक्ट्रेस शाहाना गोस्वामी के साथ भी रही। दोनों 2010 में साथ आए और इस बार चर्चा का कारण था दोनों के बीच 21 साल की उम्र का फर्क। मीडिया और लोगों के लिए उम्र का यह अंतर एक मुद्दा था लेकिन दोनों का रिश्ता लगभग 4 साल चला। आखिरकार 2013 में दोनों अलग हो गए और फिर मिलिंद की जिंदगी में अंकिता कोवर आई। 2013 में चेन्नई के एक होटल में मिलिंद की मुलाकात अंकिता से हुई। कुछ दिन बाद उसी होटल के नाइट क्लब में फिर मिले। दोनों डांस कर रहे थे। म्यूजिक तेज था और उस वक्त मिलिंद ने रोमांटिक होने के बजाय अंकिता से सवाल जवाब शुरू कर दिया। तुम्हारे कितने भाई बहन हैं? तुम्हारे पापा क्या करते हैं? अंकिता के लिए यह पूरा अनुभव इतना अजीब था कि पहली मुलाकात में उन्हें मिलिंद कुछ ज्यादा ही अजीब आदमी लगे। लेकिन रिश्ता आगे बढ़ा और उनकी पहली डिनर डेट पर ही दोनों ने शादी को लेकर एक दिलचस्प बात तय कर ली। शादी नहीं करनी। दोनों का मानना था कि शादी की संस्था ही कुछ हद तक बेकार है और उन्हें इसकी कोई जरूरत भी नहीं है। फिर वही हुआ जो ऐसे फैसलों के साथ अक्सर होता है। कुछ साल बाद दोनों ने शादी कर ली। 26 साल का उम्र में फासला जब मिलिंद और अंकिता का रिश्ता पब्लिक हुआ सबसे बड़ा सवाल फिर उम्र को लेकर आया। दोनों के बीच 26 साल का अंतर था। जब वह मिले अंकिता 21 साल की थी और मिलिंद 47 की। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग हुई और अंकिता के परिवार को भी शुरुआत में इस रिश्ते को लेकर चिंता हुई। लेकिन दोनों ने रिश्ता जारी रखा और 2018 में शादी की और इस शादी की भी एक नहीं तीन रस्में हुई। पहले अलीबाग में महाराष्ट्रियन शादी फिर स्पेन में एक वाइट वेडिंग और उसके बाद स्पेन में ही एक बेयर फुट वेडिंग मतलब कि नंगे पैर वाली शादी। शादी से पहले जिस जोड़े ने कहा था कि उन्हें शादी की कोई जरूरत नहीं है। वही जोड़ा आखिरकार तीन बार शादी कर रहा था। और फिर उम्र के फर्क पर होने वाली ट्रोलिंग का जवाब भी दोनों ने अपने ही अंदाज में दिया। एक ऐड कैंपेन के दौरान मिलिंद ने एक ट्रोल का कमेंट पढ़ा जिसमें कहा गया कि अंकिता को उन्हें डैडी क

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