मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती मेरे देश की धरती मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती मेरे देश की धरती आपने मनोज कुमार की फिल्में भले ना देखी हो लेकिन बचपन से ही यह एक ऐसा गीत है जो हर हिंदुस्तानी की आत्मा में बसा हुआ है। एक ऐसा गीत जिसे सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वो मनोज कुमार ही थे जिन्होंने पर्दे पर इस गीत को मूर्त रूप दिया था। पाकिस्तान के एबटाबाद में 24 जुलाई 1937 को पैदा हुए मनोज कुमार का जन्म हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी के रूप में हुआ था। विभाजन के बाद वह अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक शरणार्थी शिविर में पले बढ़े। वह 1956 में मुंबई आ गए। आजादी के बाद भारतीय सिनेमा का दौर बदल रहा था। दारा सिंह जैसे कई अभिनेता एक्शन फिल्मों की तरफ आगे बढ़ रहे थे। तो दूसरी तरफ दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर जैसे कलाकारों ने रोमांटिक फिल्मों को वरीयता दी। प्यार हुआ इकरार हुआ है, प्यार से फिर इसके कुछ समय बाद बॉलीवुड में मनोज कुमार की एंट्री होती है। और हम भूल के हम जाए प्यार भरी हो जाए। उनकी पहली फिल्म फैशन 1957 में रिलीज हुई थी जिसमें उन्होंने एक 90 साल के भिखारी की भूमिका निभाई थी।
वैसे तो करियर के शुरुआती दौर में वो कौन थी? गुमनाम और हिमालय की गोद में जैसी उनकी कई हिट फिल्में थी। लग जा गले के फिर हसीना नाम है कोई बदनाम है चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा लेकिन उनके जहन में देशभक्ति फिल्मों का विचार आया और साल 1965 में आई शहीद उनकी पहली देशभक्ति फिल्म रही जिसमें उन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान की कुर्बानी देने वाले शहीद भगत सिंह का किरदार निभाया। वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम तेरी शहीद में उनके भगत सिंह के किरदार ने दर्शकों का दिल जीत लिया। उनके लिए सबसे यादगार पल वो रहा जब भगत सिंह की मां विद्यावती राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में शामिल हुई थी और तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने उनके पैर छुए थे। मनोज कुमार अपने करियर में यूं तो एक से बढ़कर एक हिट फिल्म दी थी। लेकिन उनकी सबसे सफल फिल्म के बारे में जिक्र किया जाए तो उसमें 1967 में आए उपकार का नाम जरूर शामिल होगा। वादे प्यार वफा सब बातें हैं इस फिल्म से मनोज की किस्मत रातोंरात बदल गई। उपकार की कहानी और गाने ऑडियंस को खूब पसंद आए।
आई घूम के बसंत घूमो संग संग में आई घूम के। इस फिल्म में भारत के किसान के संघर्ष को दिखाया गया था और इस मूवी के बाद से ही मनोज को सिनेमा का भारत कुमार कहा जाने लगा। इतना बुरा है तेरा बेटा कि कोई अपनी बेटी का रिश्ता ही लेकर नहीं आता। रिश्ते तो अनगिनत आते हैं। लेकिन बात तो यह है मुझे ही कोई पसंद नहीं आती। किसी की लड़की मोटी है, किसी की छोटी है, किसी की ऐसी है कोई। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान जय किसान नारे की तरह बतौर डायरेक्टर ये मनोज कुमार की डेब्यू फिल्म थी। वह लीड रोल में थे। जबकि उनके साथ आशा पारिक, प्रेम चोपड़ा, कामिनी कौशल, मदन पुरी और प्राण थे। उपकार को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। राजकुमार के पूरे करियर में उनकी सबसे पॉपुलर और सबसे खास फिल्म उपकार ही थी। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के अनुरोध और उनके जय जवान जय किसान के आह्वान पर बनाई थी।
जय जवान जय जवान जय किसान जय किसान उनकी फिल्म उपकार ब्लॉकबस्टर हुई थी। दीवानों से ये मत पूछो। कल्पना कीजिए कि 1967 में जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई होगी तो कैसा माहौल होगा। खासकर तब जब 1965 में भारत-पाकि युद्ध हुआ था और इसी पर यह फिल्म भी बनी थी। भारत में यह सोच रहा था आज का किसान कल का जवान क्या यह हो सकता है? सच में जैसा तो चलो मेरे साथ। वो मनोज कुमार ही थे जिन्होंने बॉलीवुड में देशभक्ति सिनेमा की एक नई शैली की शुरुआत की थी। भारत का रहने वाला हूं। भारत की बात सुनाता हूं। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म अच्छी चली और मनोज ने देशभक्ति फिल्मों की लीक को आगे बढ़ाने का फैसला लिया। समय बदलता गया लेकिन मनोज बैक टू बैक देशभक्ति की मिसाल कायम करने वाली फिल्मों के जरिए दर्शकों का मनोरंजन करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिसकी वजह से वह फिल्म इंडस्ट्री में भारत कुमार कहलाए। ए वतन हमको तेरी कसम तेरी राहों में उनकी फिल्में राष्ट्रवाद और सामाजिक मुद्दों पर होती थी। फिर चाहे पूरब और पश्चिम हो रोटी, कपड़ा और मकान या क्रांति बचा तो महंगाई मार गई। महंगाई मार गई।
लेकिन उनकी यह राह आसान नहीं थी। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें एक बार अपना घर तक बेचना पड़ा था। मनोज कुमार ने देशभक्ति फिल्में सिर्फ बनाई ही नहीं बल्कि ता उम्र उसे जीने का भी काम किया। फिर चाहे इसके लिए उन्हें अपनी जमीन और संपत्ति ही क्यों ना बेचनी पड़ी हो। उन्होंने एक बार टाइम्स ऑन ऑफ इंडिया से कहा था देशभक्ति मेरे खून में है। मुझे देशभक्ति की भावना और साहित्य के प्रति प्रेम अपने पिता से और सही धार्मिक और नैतिक मूल्य अपनी मां कृष्णा कुमारी गोस्वामी से विरासत में मिले हैं। मनोज कुमार ने दिलीप कुमार, शशि कपूर, शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी और परवीन बॉबी जैसे कलाकारों के साथ एक ऐसी ही देशभक्ति फिल्म क्रांति बनाई थी। बरस तुझे धरती की रानी कर देंगे। यह 19वीं सदी के ब्रिटिश भारत की कहानी पर बनी थी। इसमें 1825 और 1875 के बीच स्वतंत्रता के लिए संघर्ष को दिखाया गया है। जोर गरम बाबूला साल 1981 में रिलीज हुई क्रांति को उस दौर में ₹3 करोड़ भारी भरकम बजट में बनाया गया। हालांकि मनोज कुमार को तब झटका लगा था जब फाइनेंसर्स ने फिल्म से हाथ खींच लिए थे।
क्रांति मनोज कुमार के लिए उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था। वह इसे किसी भी हाल में बनाना चाहते थे। पैसों की कमी हुई तो उन्होंने इसके लिए दिल्ली में अपना बंगला बेच दिया। जब फिर भी पैसे नहीं मिले तो उन्होंने मुंबई के जूहू इलाके में अपना प्लॉट बेच दिया। खबर है कि उन्होंने रिटायरमेंट के बाद एक मूवी थिएटर खोलने की भी योजना बनाई थी। लेकिन फिर बाद में उन्होंने इस सपने को अधूरा छोड़ दिया। क्रांति जब सिनेमाघरों में आई तो धूम मचाने लगी। टूटे हर फिल्म समीक्षक ने इसकी खूब तारीफ की। दर्शकों ने मनोज कुमार की इस फिल्म को इतना प्यार दिया कि 1981 के उस दौर में इसने भारतीय बॉक्स ऑफिस पर ₹16 करोड़ का कलेक्शन किया। देश में जब इमरजेंसी का दौर आया, तो इंदिरा गांधी के साथ अच्छे संबंध रखने वाले मनोज कुमार सत्ता और शासन के मुखर आलोचक बन गए। आपातकाल के दौर में सरकार के काम का विरोध करने वाले एक्टर्स और उनकी फिल्मों पर बैन लगाया गया था। उस दौरान मनोज कुमार की 10 नंबरी और शोर के साथ भी ऐसा ही हुआ। मनोज को तब और झटका लगा जब उनकी कुछ फिल्मों को सिनेमाघरों में रिलीज से पहले ही दूरदर्शन पर प्रसारित कर दिया गया। उन्होंने इन सरकारी कारवाइयों को अदालत में चुनौती दी। एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और जीते भी।