Cli

बिना किसी गलती के क्यों मोहम्मद रफी पर लग गए थे आरोप?

Uncategorized

मोहम्मद रफी साहब का नाम सुनते ही हमारे जहन में एक ऐसी आवाज गूंजने लगती है जिसमें मोहब्बत भी थी, दर्द भी था, शरारत भी थी और सुकून भी था। रफी साहब ने हजारों गीत गाए और हर गीत को अपनी आवाज से अमर बना दिया। लेकिन उनकी जिंदगी और उनके फिल्मी सफर में एक ऐसा किस्सा भी आया जिसने उस समय पूरी फिल्म इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। एक ऐसा गाना जिसे मोहम्मद रफी साहब ने अपनी आवाज दी थी। एक ऐसा गाना जिसके बोल सुनकर उस दौर के सेंसर बोर्ड ने आपत्ति जता दी थी। यह मामला इतना बढ़ गया था कि फिल्म निर्माताओं को गाने के बोल बदलने पड़े थे। गाने को दोबारा रिकॉर्ड करना पड़ा था और उसके कई दृश्य दोबारा शूट करने पड़े थे। लेकिन सवाल यह है कि आखिर उस गीत में ऐसा क्या था? क्या रफी साहब के गाए उस गीत में सचमुच कुछ अश्लील था? या फिर बदलते दौर और उस समय के सख्त सामाजिक नियमों की वजह से एक सामान्य सा फिल्मी गीत विवादों में फंस गया था। और सबसे बड़ी बात इस पूरे विवाद में मोहम्मद रफी साहब का नाम क्यों आया? जबकि फिल्म के बोल उन्होंने नहीं लिखे थे। दोस्तों आज के दौर में जब फिल्मों और गानों में बहुत कुछ आसानी से दिखाया और सुनाया जाता है। उस समय फिल्मों में कपड़ों, संवादों और गीतों में एक-एक शब्द पर सेंसर बोर्ड की कड़ी नजर रहा करती थी। ऐसे में रफी साहब की आवाज रिकॉर्ड हुई। यह गीत अचानक चर्चा का विषय बन गया। फिल्म की टीम को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और गाने में बदलाव करना पड़ा। लेकिन जब यही बदलाव हुआ, गीत पर्दे पर आया तो क्या लोगों को यह पसंद आया और आखिर वह कौन सा गीत था जिसके सिर्फ कुछ शब्दों ने इतना बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था

कि मोहम्मद रफी साहब को बदनाम कर दिया गया। आज हम आपको इसी दिलचस्प और अनसुने किस्से की पूरी कहानी बताने जा रहे हैं। तो अगर आप मोहम्मद रफी साहब की आवाज के दीवाने हैं और हिंदी सिनेमा के पुराने दौर के ऐसे किस्से जानते रहना चाहते हैं तो हमारे चैनल वारिधी मंथन को सब्सक्राइब कर लीजिएगा। मोहम्मद रफी साहब भारतीय उपमहाद्वीप के उन महान गायकों में गिने जाते हैं जिनकी आवाज आज भी करोड़ों दिलों में बसती है। उनके गाए हुए हजारों गीत आज भी बड़े प्यार से सुने जाते हैं और नई पीढ़ी भी उन्हें उतना ही पसंद करती है। खोया खोया चांद खुला आसमान। आज मौसम बड़ा बेईमान है। आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जुबान पर बहारों फूल बरसाओ। यह चांद सा रोशन चेहरा और लिखे जो खत तुझे जैसे अनगिनत गीत आज भी संगीत प्रेमियों की पहली पसंद हैं। अपने लगभग 40 साल के फिल्मी सफर में मोहम्मद रफी साहब ने हजारों गीत गाए। उन्होंने रोमांटिक गीतों से लेकर दर्द भरे नगमे, कवालियां, भजन, देशभक्ति गीत और लगभग हर तरह के गीत अपनी सुरीली आवाज में रिकॉर्ड किए थे। आमतौर पर रफी साहब को हमेशा इज्जत, प्यार और सराहना मिली। लेकिन एक ऐसा मौका भी आया जब उनके गाए हुए उस गीत पर लोगों ने आपत्ति जताई और मामला सेंसर बोर्ड तक चला गया था। मोहम्मद रफी साहब को बुरी तरह बदनाम कर दिया गया था। उनके करियर पर सवाल उठने लगे थे। आज हम उसी गाने की कहानी जानेंगे। आखिर वह कौन सा गीत था? उस पर आपत्ति क्यों हुई थी? और बाद में फिल्म वालों ने उसमें क्या बदलाव किए? साल 1966 में निर्देशक आर के नयर ने एक जिंदगी कितनी हसीन है नाम की फिल्म बनाई थी। इस फिल्म में जॉय मुखर्जी, सायरा बानू और अशोक कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। फिल्म का संगीत मशहूर संगीतकार रवि ने दिया था।

जबकि गीत राजेंद्र कृष्ण ने लिखे थे। फिल्म में कुछ सात गाने थे। जिनमें चार गाने आशा भोसले ने और तीन गाने मोहम्मद रफी साहब ने गाए थे। दुर्भाग्य से यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो सकी और इसके ज्यादातर गाने भी उस समय कोई खास लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाए। आर के नयर अभिनेत्री साधना के पति थे। दोनों की मुलाकात फिल्म लव इन शिमला के दौरान हुई थी। बाद में फिल्मों की लगातार नाकामी की वजह से आर के नयर को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा था। कहा जाता है कि एक समय ऐसा भी आया जब वह बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। हालांकि बाद में हालत तो कुछ बेहतर हुई लेकिन साल 1985 में उनका निधन हो गया। दूसरी ओर साधना ने भी अपने जीवन के आखिरी वर्षों में आंखों की बीमारी का सामना किया। लेकिन अब बात करते हैं उस गाने की जिसकी वजह से इतना बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। मोहम्मद रफी साहब ने इस फिल्म के लिए तीन गाने गाए थे। उन्हीं में से एक गाने की कुछ पंक्तियां उस समय के सेंसर बोर्ड को उचित नहीं लगी थी। सेंसर बोर्ड का मानना था कि गाने के कुछ शब्द और उसकी फिल्मांकन शैली उस दौर के सामाजिक मानकों के अनुरूप नहीं थी। इसीलिए यदि उसी तरह से फिल्म को रिलीज कर दिया जाता तो लोग आपत्ति जता सकते थे। इसी वजह से फिल्म निर्माताओं से कहा गया कि या तो गाने में बदलाव किया जाए या

उसके कुछ हिस्सों को बदल दिया जाए। असल गाने में एक पंक्ति थी नंगे बाजू नंगी टांगे हुस्न का यह मैयार नहीं। लेकिन बाद में गाने के अल्फाज बदले तो नहीं गए लेकिन उसकी पिक्चराइजेशन बदल दी गई क्योंकि इसमें इससे पहले साइरा बानो ने छोटे कपड़े पहन रखे थे। जिन कपड़ों को देखकर उस समय के सेंसर बोर्ड ने काफी ज्यादा आपत्ति जताई थी। हालांकि बाद में इसे दोबारा शूट किया गया। आज बहुत से लोग इसे सिर्फ एक फिल्मी गीत के रूप में सुनते हैं। जबकि उस दौर में यही गाना एक बड़ी बहस का विषय बन गया था। मोहम्मद रफी साहब हमेशा अपनी सादगी, शालीनता और उच्च संस्कार के लिए जाने जाते थे। उनकी पूरी जिंदगी इस बात की गवाह है कि उन्होंने अपनी आवाज से करोड़ों लोगों के दिलों को जीता है। हालांकि उनके कुछ गाने कभी कभार विवादों का हिस्सा बने। लेकिन इससे उनकी महान शख्सियत और बेमिसाल कला पर कभी कोई असर नहीं पड़ा। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इस घटना के बाद फिल्मी दुनिया में सेंसर बोर्ड की भूमिका को लेकर भी काफी बहस हुई। कुछ लोगों का ख्याल था कि बोर्ड ने सामाजिक और नैतिक मानकों की रक्षा के लिए सही फैसला किया। जबकि दूसरे लोगों के नजदीक यह सिर्फ एक फिल्मी गीत था जिसे जरूरत से ज्यादा विवादित बना दिया गया। उस दौर में फिल्मों में लिबास, संवाद और गानों पर काफी सख्त नजर रखी जाती थी। इसीलिए जरा सी बात भी बढ़ गई तो एक बहस का मुद्दा बन गई। बाद के वर्षों में यही नियम और मानक काफी हद तक बदले और नरम होते चले गए। आज इस घटना को भारतीय फिल्म इतिहास के एक दिलचस्प प्रसंग के तौर पर याद किया जाता है। इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोहम्मद रफी साहब का इस विवाद से प्रत्यक्ष रूप से कोई ताल्लुक ही नहीं था। वह सिर्फ इस गीत के गायक थे। ना उन्होंने इसके बोल लिखे थे और ना ही फिल्मांकन में उनका कोई किरदार था। इसके बावजूद कुछ लोगों ने उनका नाम भी इस मामले से जोड़ दिया। लेकिन रफी साहब ने हमेशा गरिमा, खामोशी और शालीनता को तरजीह दी।

उन्होंने कभी भी किसी विवाद का जवाब सख्त अल्फाज में नहीं दिया। उनकी यही सादगी और आला अखलाक उन्हें दूसरे लोगों से अलग बनाती थी। इसी वजह से आज भी दुनिया भर में उनका नाम बेहद एहतराम से लिया जाता है। निर्देशक आर के नयर और फिल्म की पूरी टीम ने हालात को समझते हुए गाने में तब्दीलियां करनी शुरू कर दी। उन्होंने सेंसर बोर्ड की हिदायत के मुताबिक कुछ बोल बदले और बाद में फिल्मांकन में भी बदलाव किया। इस फैसले का मकसद फिल्म की नुमाइश को मुमकिन बनाना और सेंसर बोर्ड की आपत्तियों को दूर करना था और शायद यही उस दौर के फिल्मी सफर की एक दिलचस्प सच्चाई थी। एक तरफ मोहम्मद रफी जैसी महान आवाज थी जो अपनी शालीनता और मिठास से लोगों के दिल जीता करती थी और दूसरी तरफ बदलते हुए सामाजिक नियम थे जो यह तय कर रहे थे

कि पर्दे पर क्या दिखाया जाएगा और क्या सुनाया जाएगा। आज जब हम पीछे मुड़कर उस दौर को देखते हैं तो यह पूरा किस्सा भारतीय सिनेमा के बदलते दौर, सेंसरशिप और फिल्मी गीतों के बदलती भाषा की एक दिलचस्प झलक देता है। मोहम्मद रफी साहब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उनकी आवाज आज भी हमारे बीच जिंदा है। उनका हर गीत हमें यही याद दिलाता है कि एक सच्चे कलाकार की पहचान सिर्फ उनके दोस्त से नहीं बल्कि उसकी कला आने वाली पीढ़ियों के दिलों में कितनी जगह बनाती है। इससे होती है। रफी साहब ने यही किया। उन्होंने अपनी आवाज में एक ऐसा इतिहास बनाया जिसे समय कभी मिटा नहीं सकता। अगर आपको मोहम्मद रफी साहब की जिंदगी से जुड़े ऐसे ही अनसुने और दिलचस्प किस्से पसंद हैं तो वीडियो को लाइक जरूर करें। इसे अपने दोस्तों और रफी साहब के चाहने वालों के साथ शेयर जरूर करें। चैनल को सब्सक्राइब कर लें ताकि ऐसी ही अनसुनी कहानियां हम आपके लिए हमेशा लाते रहें। वीडियो पसंद आई हो तो इसे लाइक करें। आपको मोहम्मद रफी का कौन सा गाना पसंद है? हमें कमेंट्स में लिखना बिल्कुल ना भूलें। वीडियो में अब तक बने रहने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *