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क्या बेटे का करियर बचाने के लिए सनी ने दांव पर लगा दी अपनी सुपरस्टार इमेज?

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यार एक बात समझ नहीं आ रही। सनी दिल ने बंटवारा 1947 फिल्म को ही क्यों चुना? सोचो एक एक्टर जिसने अभी-अभी कदर 2 से साबित किया था कि 60 की उम्र के बाद भी उसकी पुरानी इमेज करोड़ों लोगों को सिनेमाघरों तक ला सकती है। फिर बॉर्डर 2 भी आ गई। यानी सनी के पास इस वक्त वो करने का पूरा मौका था जो उन्होंने दशकों तक किया था। एक बड़ा एक्शन हीरो, एक देशभक्ति वाला हीरो और वो भी पाकिस्तान के बैक ड्रॉप में। वो सनी देओल जिसे देखते ही ऑडियंस को पता है कि अब कुछ होने वाला है। लेकिन सनी ने ठीक उसी वक्त एक अलग रास्ता चुना। सिर्फ इतना ही नहीं उन्होंने इस फिल्म के लिए आमिर को चुना, राजकुमार संतोषी को चुना और अपने बेटे करण देओल को भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाया। अब सवाल यह नहीं है कि फिल्म क्यों नहीं चली? सवाल यह है कि सनी देओल को इसमें इतना भरोसा कैसे आया? क्या उन्हें लगा कि आमिर खान और राजकुमार संतोषी के नाम मिलकर वो कर सकते हैं जो अकेले उनकी गदर वाली इमेज नहीं कर सकती? क्या यह उनके अपने करियर को लेकर फैसला था? या फिर क्या सनी देओल अपने बेटे करण देओल के लिए एक बड़ा मौका तलाश रहे थे? और अगर ऐसा था तो क्या सनी ने अपने बेटे के लिए अपनी सबसे सुरक्षित चीज पर ही दांव लगा दिया? अपनी खुद की सुपरस्टार इमेज पर। आज कहानी सिर्फ बंटवारा 1947 के फ्लॉप की नहीं है। आज कहानी उस फैसले की है जिसे लेकर सबके दिमाग में सवाल है कि सनी ने यह फैसला आखिर लिया ही क्यों? आग लगा दूंगा पूरे शहर को। हिंदू औरत के लिए आप हिंदू औरत सनी और आमिर के साथ का इतिहास लंबा है। यह पहली बार नहीं था जब दोनों साथ में आ रहे थे। 1990 में दिल और घायल। 1996 में राजा हिंदुस्तानी और घातक और 2001 में वो क्लैश जिसे आज भी बॉलीवुड के सबसे बड़े क्लैशेस में गिना जाता है। लगान और गदर। दोनों की अपनी ऑडियंस थी। दोनों का अपना स्टारडम था। दोनों की इमेज थी और शायद इसीलिए सनी और आमिर की राइवलरी में कभी वह दुश्मनी वाली बात नहीं थी। यह ज्यादा से ज्यादा एक हेल्दी कंपटीशन था। दोनों अपनी-अपनी जगह के सुपरस्टार थे। लेकिन पहली बार 2026 में कहानी बदल गई। अब दोनों एक दूसरे के सामने नहीं एक तरफ ही थे।

आमिर खान प्रोड्यूसर सनी देओल एक्टर राजकुमार संतोषी डायरेक्टर और ऊपर से करण देओल का कास्ट का हिस्सा होना। कागज पर देखो तो यह कोई छोटा-मोटा कॉम्बिनेशन नहीं लगता। सनी और संतोषी की जोड़ी पहले ही घायल दामिनी और घातक जैसी फिल्में दे चुकी है। सनी को उन पर बहुत भरोसा होगा। आमिर खान का नाम अपने आप में भरोसे का नाम है और सनी उस वक्त अपने करियर के फेज में थे जहां उनकी पॉपुलैरिटी फिर से आसमान पर थी। तो यह सिर्फ गलत फिल्म चुनाव कैसे हो सकती है? शायद यही हमें सनी के फैसले को समझना पड़ेगा क्योंकि अगर सिर्फ बॉक्स ऑफिस देखकर फैसला करेंगे तो लगेगा कि सनी ने अपनी इमेज नहीं समझी। लेकिन उस वक्त जब यह फिल्म बन रही थी। सनी को शायद यह एक गैंबल बिल्कुल गैंबल जैसा तो नहीं लग रहा होगा। उनके सामने तीन चीजें थी। एक तरफ उनकी अपनी सुपरस्टार इमेज, दूसरी तरफ राजकुमार संतोषी के साथ पुराना भरोसा और तीसरी तरफ आमिर खान का बैकिंग और फिर था करन। यार करण देओल का नाम सुनते ही बहुत इंपॉर्टेंट हो जाता है क्योंकि एक पिता के तौर पर सनी शायद अपनी अगली हिट नहीं देख रहे थे। वो अपने बेटे के करियर के लिए कुछ बड़ा करना चाहते थे। करन को पहले भी लॉन्च किया जा चुका था। लेकिन बॉलीवुड में किसी स्टार का बेटा होना, अपने दम पर जगह बनाना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। और अगर आपके पास एक ऐसी फिल्म हो जिसमें सनी खुद हो, आमिर खान प्रोड्यूसर हो, राजकुमार संतोषी डायरेक्टर हो तो एक पिता को यह मौका बड़ा क्यों ना लगे और शायद बंटवारा 1947 की सबसे दिलचस्प चीज यही है। सनी ने शायद सिर्फ अपने लिए फैसला नहीं लिया था और यही आकर फिल्म की कहानी और कॉम्प्लिकेटेड हो जाती है। क्योंकि सनी उस वक्त अपने करियर में पीछे नहीं जा रहे थे। वह तो अभी वापस आ रहे थे। गदर 2 ने उन्हें फिर से नेशनल सुपरस्टार बनाया था। और वही सनी, वही अग्रेशन, वही आवाज, वही डायलॉग, वही लार्जर देन लाइफ वाला इमेज। लोगों ने सिर्फ फिल्म को नहीं अपनाया था। लोगों ने सनी को सिर्फ और सिर्फ सनी को अपनाया था। फिर बॉर्डर 2 में भी उन्हें एक ऐसी ही दुनिया मिली। जहां ऑडियंस पहले से जानती थी कि सनी से क्या उम्मीद करनी है। और ऑडियंस ने वो उम्मीद को पूरे होते हुए भी देखा। लेकिन बंटवारा 1947 में सनी ने कुछ अलग करने की कोशिश की।

यह वो सनी नहीं था जो हर समस्या का जवाब ताकत से देता था। यह ज्यादा रिस्ट्रेंट कैरेक्टर था। ज्यादा सीरियस यानी सनी ने अपनी ऑडियंस को वो नहीं दिया जो पिछले 2 सालों से उन्हें टिकट खरीद कर देखने आ रहे थे। वो चीज मिसिंग थी। अब यहां एक बात जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि सनी को वो अलग रोल नहीं करने चाहिए। अगर कोई एक्टर 60 की उम्र में भी सिर्फ 25 साल पुरानी इमेज दोहराता रहेगा तो हम खुद कहेंगे कि कुछ नया करो तो क्रिएटिव रिस्क लेना गलत नहीं था। सवाल टाइमिंग का है क्योंकि आपने ऑडियंस को 2 साल में दो बार सनी देओल की सबसे बड़ी ताकत का एहसास दिलाया और उनकी ताकत क्या है? वो खुद हैं। उनका अग्रेशन है और तीसरी बार आपने ऑडियंस से कहा कि अब बिल्कुल कुछ अलग देखो। शायद ऑडियंस इसके लिए तैयार नहीं थी। और शायद यही वजह है कि पहले वीकेंड के बाद जो सवाल था कि फिल्म क्यों नहीं चली? दूसरे वीकेंड के बाद वह सवाल थोड़ा बदल गया क्योंकि अगर सिर्फ ओपनिंग की बात होती तो हम कह सकते थे कि मार्केटिंग कमजोर थी। रिलीज़ के टाइम पे कंपटीशन था। फिल्म की अवेयरनेस कम थी। लेकिन जब दूसरे वीकेंड में फिल्म उस तरह से नहीं पकड़ पाती तो सवाल फिल्म के साथ ऑडियंस के कनेक्शन का भी हो जाता है। क्योंकि यही एक मजेदार चीज होती है। उसी समय आवारापन 2 चल रही थी। एक 19 साल पुरानी फिल्म का सीक्वल, एक ऐसा एक्टर जिसके करियर की स्टोरी भी काफी हद तक नस्टेल्जिया से जुड़ी है। और ऑडियंस वहां जाकर टिकट खरीद कर क्यों देख रही है? सिर्फ नई कहानी के लिए नहीं एक पुरानी फीलिंग के लिए। यानी ऑडियंस नस्टाल्जिया से परेशान नहीं है। वो पुरानी चीजों को रिजेक्ट नहीं कर रही है। वो उन्हें आज भी खरीद रही है। लेकिन शायद कंडीशन यह है कि उसे वो फीलिंग वैसी चाहिए जैसी शायद उसे याद करके पहली बार आई हो। और यही सनी देओल के लिए सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि सनी पिछले दो सालों में जो कमबैक करके उन्होंने बनाया था वो भी नस्टेल्जिया पर ही टिका हुआ था बहुत हद तक। ऑडियंस ने तारा सिंह को याद किया। फिर सनी के पेट्रियोटिक इमेज को याद किया और फिर आवाज को याद किया।

उनके पुराने डायलॉग्स और उनके पुराने अंदाज को याद किया। लेकिन बंटवारा 1947 में सनी ने ऑडियंस को यादों से बाहर निकालने की कोशिश की। और शायद ऑडियंस ने कहा, नहीं। हमें उसी सनी के साथ रहना है जिसे हमने वापस बुलाया था। अब सोचो अगर सनी ने यह फिल्म सिर्फ अपने लिए की होती तो शायद सवाल आसान होता। उन्होंने रिस्क लिया, रिस्क नहीं चला। आगे बढ़ गए। लेकिन अगर इसमें करन का फ्यूचर भी जुड़ा था तो कहानी थोड़ी बदल जाती है। क्योंकि तब सनी एक एक्टर नहीं रहे। वो एक पिता की तरह भी फैसला कर रहे थे और शायद आमिर खान और राजकुमार संतोषी के साथ इस डिसीजन को और भरोसेमंद बना रहा था क्योंकि सनी अकेले कोई रैंडम एक्सपेरिमेंट नहीं कर रहे थे। उनके साथ वो डायरेक्टर थे जिसने उनके करियर की सबसे बड़ी फिल्मों में से उनका साथ दिया। उनके साथ वो सुपरस्टार था जो खुद फिल्म मेकिंग और कंटेंट को लेकर बेहद सोच समझकर फैसले लेने के लिए जाना जाता है। उनके साथ उनका बेटा था तो शायद सनी को लगा कि ये वो फिल्म है जिसमें मैं सिर्फ अपनी अगली हिट नहीं बना रहा। मैं कुछ और बना रहा हूं। करण के लिए एक प्लेटफार्म, अपने पुराने डायरेक्टर के साथ रीयनियन, आमिर खान के साथ पहली बड़ी पार्टनरशिप और खुद के लिए एक अलग तरीके का रोल। कागज पर यह फैसला गलत नहीं था। लेकिन सिनेमा में सबसे मुश्किल चीज यही है। कागज पर सही दिखने वाले फैसले अक्सर दिलों में ऑडियंस के दिलों में बैठे जरूरी नहीं है।

और शायद बंटवारा 1947 की सबसे बड़ी कहानी यही है। सनी देओल ने अपनी इमेज नहीं तोड़ी क्योंकि उन्हें अपनी इमेज से नफरत थी। शायद उन्होंने उसे तोड़ने की कोशिश की क्योंकि उन्हें लगा कि अब मैं सिर्फ सनी नहीं दे सकता। जो ऑडियंस मुझे देखना मुझे बनाना चाहती है। लेकिन ऑडियंस ने पिछले 2 सालों में कुछ और ही साबित किया था। उन्होंने दिखा दिया था कि वह सनी को सिर्फ एक्टर की तरह नहीं एक इमोशन की तरीके से देखते हैं और इमोशन को बदलना कैरेक्टर बदलने से कहीं ज्यादा मुश्किल होता है। इसीलिए मुझे लगता है कि बंटवारा 1947 का सवाल सिर्फ यह नहीं कि सनी देओल ने गलत फिल्म चुन ली? सवाल यह है कि क्या सनी ने अपनी ऑडियंस को बहुत जल्दी बदलने की कोशिश कर दी? और क्या करण के लिए एक बड़ा मौका बनाने की कोशिश में उन्होंने अपने करियर की सबसे बड़ी ताकत को ही दांव पर लगा दिया। क्योंकि दो दुश्मनों का एक साथ आना अपने आप में कोई गारंटी नहीं है। आमिर और सनी दशकों तक एक दूसरे के सामने खड़े रहे हैं और फिर एक दिन दोनों साथ में आ गए। लेकिन ऑडियंस को दोनों का साथ उतना इंटरेस्टिंग नहीं लगा जितना इन दोनों को अपनी-अपनी दुनिया में देखना था और यही इस कहानी की सबसे बड़ी दिक्कत है। सनी और आमिर ने कंपटीशन खत्म कर दिया। लेकिन बॉक्स ऑफिस ने नहीं किया। अब सवाल आपके लिए है। अगर आप सनी की जगह होते तो गदर 2, बॉर्डर 2 जैसी दो बड़ी कामयाब फिल्मों के बाद वही पुराना सनी करते या आमिर राजकुमार संतोषी और करण देओल के साथ रिस्क लेते। क्योंकि सनी का फैसला गलत था या सही यह आज भी पूरे तरीके से तय नहीं हुआ। लेकिन एक बात जरूर तय हो गई। सुपरस्टार बनना मुश्किल है। लेकिन सुपरस्टार बनने के बाद ऑडियंस को समझना और भी ज्यादा मुश्किल है। अब इस पर तुम्हारा क्या कहना है? मुझे कमेंट करके जरूर बताना। मैं तुम्हें नेक्स्ट वीडियो में मिलूंगी।

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