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मीना कुमारी ने अपने आखिरी वक्त में अधूरी फिल्म को पूरा करने के लिए अस्पताल में भी की शूटिंग?

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हमसफर को [संगीत] गर्व ले जिस मीना कुमारी को दुनिया भारतीय सिनेमा की ट्रेजडी क्वीन कहती क्या आप यकीन करेंगे कि उनकी जिंदगी की सबसे यादगार फिल्म पाकीजा उनकी जिंदगी के सबसे बुरे दौर में बनी चलते रहे तनहा [गाना गाने की आवाज़] तनहा जिस आदमी से मीना कुमारी का रिश्ता टूट चुका था उस कमाल अमरोही के साथ वो दोबारा एक ऐसी फिल्म पूरी करने पहुंची जिसे बनने में पूरे 14 साल लग गए थे पर दोस्तों कहानी में एक नाम और है नरगिस आखिर उन्होंने पाकीजा बनते समय ऐसा क्या देख लिया जिसे देखकर उन्होंने कमाल साहब से कह इस फिल्म को अधूरा मत छोड़िए। पर दोस्तों जिस अदाकारा की फीस कभी लाखों में हुआ करती थी वो मीना कुमारी अपने आखिरी दिनों में चंद रुपयों के लिए क्यों तरसती रही? एक काम तो कर देना। थोड़ी सी शराब ला दे। और अपनी मौत से कुछ दिन पहले अस्पताल के बिस्तर पर ही एक फिल्म का आखिरी सीन शूट किया था। लेकिन उससे बड़ा सवाल जिसे लोग आज तक कहते हैं। क्या पाकीजा में सच में मीना कुमारी थी ही नहीं? चलो [संगीत] चांद के पार चलो। हम भी तैयार चलो। जिस मीना कुमारी के पास लाखों रुपया भरा हुआ था। उस मीना कुमारी के लिए अस्पताल का बिल चुकाने के लिए पैसे तक नहीं थे। तो फिर अचानक कौन आया? किसने खामोशी से उनके अस्पताल के सारे बिल भर दिए? हुआ इस पिंजरे से तुम कहने लगे आजाद रहो। पर हां दोस्तों अगर मीना कुमारी की जिंदगी का आपने यह पहला पार्ट नहीं देखा तो पहले वो वीडियो जरूर देखिए क्योंकि वहीं से शुरू हुई थी मोहब्बत जिसने आगे चलकर उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। तो आइए दोस्तों आज चलते हैं मीना कुमारी की जिंदगी के उस पड़ाव पर जहां खुशियां जैसे रूठ चुकी थी और दर्द ने जैसे उनका हाथ थाम लिया था। पर्दे पर वो दूसरों के लिए रोती रहीं और पर्दा गिरने के बाद अपने हिस्से के आंसू अकेले पीती रहीं। मेरा श्रृंगार प्रीतम। तो आइए दोस्तों जानते हैं मीना कुमारी की जिंदगी के उस आखिरी और सबसे दर्दनाक सफर को।

ऐसा समझती है तो यहां से मुंह काला क्यों नहीं करती? तो नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आप सभी का आपके अपने फेवरेट YouTube चैनल ब्यूटीफुल बॉलीवुड में। [संगीत] जी हां दोस्तों, वीडियो के अंत में हम आपको यह भी बताएंगे कि आखिर मीना कुमारी को जब उस रात डकैत उठा ले गए, तो उनके साथ उन्होंने क्या किया। तो आइए दोस्तों, मीना कुमारी की जिंदगी के उस पड़ाव पर लौटते हैं, जहां उनकी जिंदगी में खुशियों की चौखट पर एक बार फिर गम ने दस्तक दे दी थी। मीना कुमारी और मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही दोनों पति-पत्नी उन दिनों साथ थे। दोनों की जिंदगी में मोहब्बत थी, शहरत थी और आने वाले कल के लिए ढेरों ख्वाब थे। चले जा रहे हैं किनारे किनारे। लेकिन कमाल अमरोही के दिल में एक ऐसा ख्वाब पल रहा था जो सिर्फ एक फिल्म का ख्वाब नहीं था। वो अपनी मीना के लिए कुछ ऐसा बनाना चाहते थे जो वक्त की गर्द में दबे नहीं बल्कि वक्त गुजर जाने के बाद भी जिंदा रहे और फिर साल था 1958। एक फिल्म का ऐलान हुआ। नाम था पाकीजा। कहानी थी साहिब जान की। एक ऐसी औरत जिसके हिस्से में मोहब्बत कम और समाज की बंदिशें ज्यादा थी और वह साहिब जान बनी मीना कुमारी। कहीं मेरे मुंह से निकल गया था कि हमारी साहिबजान को चूड़ियों का बहुत शौक है। चुरा के भेज दी। कमाल अमरोही खुद एक बेहतरीन लेखक थे। और जिस शख्स की कलम ने मुगले आजम जैसी फिल्म की कहानी को आकार दिया था। वो पाकीजा को सिर्फ फिल्म कैसे रहने देता? और फिर क्या था? कागज पर लब्ज उतरने लगे। सेट तैयार होने लगे। कैमरा चलने लगा और पाकीजा फिल्म बनने लगी। लेकिन शायद किस्मत को यह मंजूर नहीं था कि यह फिल्म इतनी आसानी से पूरी हो। फिल्म का कुछ हिस्सा ब्लैक एंड वाइट में शूट हो चुका था। [चीखने की आवाज़] तभी हिंदी सिनेमा का दौर बदलने लगा। रंगीन फिल्मों का जमाना आ रहा था। कमाल अमरोही ने चाहा कि उनकी पाकीजा भी रंगों में सांस ले। अब कहते तो यह भी हैं कि फिल्म लगभग आधी शूट हो चुकी थी। मगर कमाल अमरोही ने सब कुछ वहीं रोक दिया। विदेश से लेंस मंगवाए गए। भारी खर्चा हुआ पर अचानक लेंस में खराबी निकली। शूटिंग रुक गई। मगर कमाल अमरोही रुकने वाले नहीं थे। उन्होंने इसकी शिकायत कैलिफोर्निया में की। एमजीएम स्टूडियो ने अपनी गलती मानी और नए लेंस बिना किसी अतिरिक्त कीमत के उन्हें भेज दिए। पर सवाल तो यह था क्या सिर्फ लेंस की खराबी पाकीजा की राह का रोड़ा बनी? नहीं। है कि [संगीत] हम जख्म जिगर देख। वक्त गुजर रहा था। हीरो का किरदार अशोक कुमार साहब को मिला था। मगर इन दिनों जब फिल्म रुकी रही दादा मुनि पहले जैसे नहीं दिख रहे थे।

इसलिए उनकी जगह अब धर्मेंद्र को लाने की बात होने लगी। कमाल अमरोही साहब धर्मेंद्र को लेने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे और उधर मीना कुमारी का करियर लगातार बुलंदियों पर था। शायद यही बढ़ती हुई शहरत अब उनके रिश्ते में खलिस्त पैदा करने लगी थी। कमाल अमरोही की बंदिशें अब मीना पर बढ़ने लगी थी। मीना के आसपास कौन आएगा? कौन-कौन उनसे मिलेगा? वह किससे बात करेंगी? इन छोटी-छोटी पाबंदियों ने धीरे-धीरे मोहब्बत की सांसे घोटनी शुरू कर दी थी। दर्द जहां है यहां इंसाफ कहां और फिर एक दिन वो हुआ जिसका असर दो जिंदगियों पर नहीं पड़ा बल्कि पाकीजा की पूरी किस्मत पर पड़ा। दोनों के बीच में अलगाव हो गया। बुझ रहे हैं मेरे [संगीत] साथ। मीरा कुमारी और कमाल अमरोही अलग हो गए और यहीं से शुरू हुई पाकीजा की वह दास्तान जिसे बनने में शायद इतना वक्त लगा कि एक पूरी जिंदगी उसी में सिमट कर कहीं खो गई। कमाल अमरोही और मीना कुमारी में तलाक नहीं हुआ था। लेकिन अब दोनों एक दूसरे से अलग रहते थे और शायद सबसे बड़ा दर्द यही था। रिश्ता कागज पर अब भी बाकी था। मगर जिंदगी में दोनों के रास्ते अलग हो चुके थे। उधर पाकीजा का काम ठहर गया। फिल्म डिब्बे में बंद हो गई। और दोस्तों शायद यही होना लाजमी भी था। क्योंकि जिस फिल्म की बुनियाद मोहब्बत पर रखी गई थी। जब वही मोहब्बत टूट गई तो कैमरा भी जैसे खामोश हो गया। कहते हैं एक दिन नरगिस और सुनील दत्त साहब पाकीजा के कुछ शूट किए हुए सीन देख लेते हैं। दोनों उन रील्स को देखते ही रह गए। उन्हें शायद उस वक्त अंदाजा हो गया कि यह सिर्फ एक अधूरी फिल्म नहीं भारतीय सिनेमा की आने वाली विरासत है। दोनों ने अपने अजीज दोस्त कमाल अमरोही साहब से गुजारिश की सर इसे अधूरा मत छोड़िए लेकिन कमाल अमरोही के लिए फिल्म को दोबारा शूट करना आसान नहीं था। हर फ्रेम में उन्हें अपनी मीना दिखाई देती थी और हर दृश्य के पीछे अपनी टूटी हुई मोहब्बत हो जाए [संगीत] फिर भी नरगिस की बात उनके दिल में उतर गई क्योंकि इस फिल्म से सिर्फ कमाल और मीना की जिंदगी नहीं जुड़ी थी। कितने कलाकारों की उम्मीदें और कितने अरमान इस फिल्म से जुड़े हुए थे। फिर आया 24 अगस्त 1968। कमाल अमरोही ने मीना कुमारी के नाम एक खत लिखा।

उस खत में उन्होंने अपनी अधूरी फिल्म की जिंदगी मांगी। उन्होंने लिखा अगर मीना आप तलाक चाहती हैं तो इसके लिए मैं तैयार हूं। लेकिन एक गुजारिश है पाकीजा पूरी कर दो। कुछ दिनों बाद जवाब आया। मीना ने लिखा पाकीजा उनके भी दिल के बहुत करीब है और वह पाकीजा फिल्म पूरी करने के लिए तैयार हैं। हां वो मेहनताना लेंगी लेकिन सिर्फ एक सिक्का मगर इस बार पाकीजा पहले वाली पाकीजा नहीं थी। बहुत कुछ बदल चुका था। अबकी बार राजकुमार साहब को इस कहानी का हिस्सा बनाया गया। कहानी में और भी बहुत बदलाव हुए। राजकुमार का किरदार पहले एक बिजनेसमैन का था। मगर राजकुमार की कद काठी को देखते हुए उन्हें एक फॉरेस्ट ऑफिसर का किरदार दिया गया। कौन हो तुम? कौन हो? मैं बेकसूर हूं। लेकिन दोस्तों सबसे बड़ा बदलाव मीना कुमारी के अंदर आया था। अब वो पहले वाली मीना नहीं थी जो 10 साल पहले इस फिल्म सेट पर आई थी। शराब ने उनके शरीर को अंदर तक खोखला कर दिया था। उन्हें आज लीवर सिरोसिस की बीमारी हो चुकी थी और इस बीमारी के चलते उनका पेट मोटा हो चुका था। पाकीजा फिल्म की शूटिंग शुरू हो गई और एक दिन शूटिंग के दौरान मीना कुमारी अचानक बेहोश होकर गिर पड़ी और फिर यह अक्सर होता मीना कुमारी कभी गिर पड़ती। कभी-कभी उनकी हालत इतनी बिगड़ जाती कि उन्हें खून की उल्टियां होने लगती। अब लंबे डांस स्टेप करना उनके लिए नामुमकिन था। लेकिन कैमरे के सामने साहब जान को चलना पड़ता था, नाचना पड़ता था और उस दर्द में मुस्कुराना पड़ता था। लेकिन इन सबके लिए मीना कुमारी का शरीर जवाब दे चुका था। तब मशहूर कत्थक नर्तकी और अभिनेत्री पद्मा खन्ना को उनके बॉडी डबल के रूप में चुना गया। मीना कुमारी जी ने खुद पद्मा खन्ना को अपनी चाल ढाल और अदाओं की ट्रेनिंग दी थी। कैमरे के एंगल, लॉन्ग शॉट्स और चेहरे पर घूंघट या चुन्नी का उपयोग करके यह भ्रम पैदा किया गया कि पर्दे पर डांस करती हुई खुद मीना कुमारी हैं। कैमरा चलता रहा। फिल्म आगे बढ़ती रही। लेकिन कैमरे के पीछे एक सवाल हर किसी के दिल में था। क्या मीना कुमारी अपने शरीर की आखिरी हद तक जाकर फिल्म को पूरा कर पाएंगी? नरगिस [संगीत] अपनी बेनूरी परोती है। बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर। दवाइयों से जिस्म को थोड़ा संभालती और फिर उसी जिस्म को कैमरे के सामने ले जाकर खड़ा कर देती। क्योंकि दर्द चाहे जितना हो अधूरा काम मीना कुमारी को पसंद नहीं था। इसी दर्द के बीच आपको हम एक मनोरंजक किस्सा सुनाते हैं। लगभग पाकीजा फिल्म की शूटिंग अपने आखिरी दौर में पहुंच चुकी थी और इन्हीं अंतिम पड़ाव की शूटिंग के सिलसिले में कमाल अमरोही और मीना कुमारी मध्य प्रदेश गए हुए थे। मध्य प्रदेश में शूटिंग खत्म हुई। शाम ढलने लगी और दोनों वापस लौटने के लिए कार में बैठ गए। लेकिन रास्ते में अचानक कार का पेट्रोल खत्म हो गया। चारों तरफ सन्नाटा था। रात कहरी होती जा रही थी। तभी किसी ने उन्हें बताया यह शिवपुरी का इलाका है।

यहां डाकुओं का खतरा हमेशा रहता है। आधी रात गुजर चुकी थी। अंधेरे को चीरती हुई अचानक कुछ परछाइयां सामने नजर आने लगी। एक दो फिर न जाने कितने आदमियों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया। कहते हैं तभी उन लोगों को पता लगा कि कार में बैठी हुई औरत कोई और नहीं मीना कुमारी है और फिर जो हुआ वो शायद किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं था। जिन चेहरों को देखकर कुछ पल पहले मौत का डर सताने लगा था। उन्हीं चेहरों की शक्ति अचानक नरमी में बदल गई। हां दोस्तों जिस रात को मीना ने शायद अपनी जिंदगी की आखिरी रात समझ लिया था। उस रात को उनकी मेहमान नवाजी होने लगी। अब डर की जगह अदब ने ले ली थी। उन्हें सभी [संगीत] लोग अपने ठिकाने पर ले गए। खाने-पीने का लाजवाब इंतजाम हुआ। कुछ ही पलों बाद सुबह हुई। पर मीना वापस जाने के लिए अभी कार में बैठी ही थी कि अचानक उन डाकुओं का सरदार उनके [संगीत] पास आया। उसकी आवाज में अब बंदूक की शक्ति नहीं थी। बल्कि एक अजीब सी मोहब्बत और अदब था। उसने कहा मैं आपका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। मेरी एक फरमाइश पूरी कर देंगी आप। अगले ही पल उस शख्स ने अपना हाथ आगे कर दिया और अपनी हथेली पर एक धारदार चक्कू रख दिया। फिर मीना कुमारी की तरफ देखते हुए बोला, “इस चक्कू [संगीत] से मेरी हथेली पर अपना ऑटोग्राफ दे दीजिए।” कुछ देर बाद मीना कुमारी वहां से रवाना हो गई। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। वापस पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि जिस शख्स के साथ उन्होंने आज रात गुजारी है वह था सबसे खतरनाक डकैत अमृतलाल। बहरहाल वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा। बीमारी जिस्म को अंदर से खा रही थी मगर शराब की गिरफ्त इतनी मजबूत हो चुकी थी कि मीना चाहकर भी उससे आजाद नहीं हो पा रही और हालात यहां तक पहुंच गए। जहां जिन रिश्तेदारों को उन्होंने अपनी कमाई से उनकी जिंदगी को सवारा था। आज वही रिश्तेदार उनके लिए घर पहुंचने पर एक रोटी भी बनाने के लिए [संगीत] तैयार नहीं थे। लेकिन इस तन्हाई के बीच एक शख्स था जो उनकी फिक्र करता वो थे धर्मेंद्र [संगीत] साहब। धर्मेंद्र और मीना कुमारी के बीच क्या था? दोस्ती, मोहब्बत या सिर्फ एक गहरा अपनापन। अब आप खाना ववाना खा सकती हैं। आपकी दवाई खत्म हो चुकी है। मैं वैदरा से दवाई ले आता हूं। शायद इसका जवाब दोनों ने कभी नहीं दिया। लेकिन यह बेरहम दुनिया जवाब चाहती थी। अखबारों और फिल्मी मैगजीनंस में दोनों के रिश्तों के किस्से छपने लगे। एक मुलाकात खबर बनती। एक बातचीत अफसाना बन जाती। हो तुम की आवा। फिर एक दिन एक पार्टी में धर्मेंद्र ने शराब कुछ ज्यादा पी ली। उन्हें दिल्ली से मुंबई वापस आना था। लेकिन फ्लाइट कैंसिल हो गई और बेहद नशे में धर्मेंद्र साहब बेचैन होकर बार-बार कहने लगे मुझे मुंबई जाना है। मीना वहां मेरा इंतजार कर रही है। कहते हैं एक बार मीना कुमारी और धर्मेंद्र के कुछ दोस्त एक साथ पिकनिक बनाने गए। वापसी में दोनों अलग-अलग गाड़ियों में इत्तेफाक वश बैठ गए। मीना कुमारी उस दिन खूब नशे में थी। कुछ देर बाद जब मीना ने अपने अगल-बगल धर्मेंद्र को नहीं देखा तो उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी रुकवाई और गाड़ी से निकलकर वो बीच सड़क पर बैठ गई और जोर-जोर से बैठकर रोने लगी और उनकी आवाज शायद उस रात की खामोशी को चीरते हुए निकली। मेरा धर्म कहां है? शायद यह उस औरत की पुकार नहीं थी जिसकी जिंदगी में अपने तो बहुत थे मगर अपना कोई नहीं था। हो मलाल [संगीत] तो हम क्या जवाब देंगे। उधर धर्मेंद्र का करियर अब रफ्तार पकड़ने लगा था। फिल्में बढ़ रही थी, काम बढ़ रहा था और इसी के साथ मीना से उनकी दूरी भी बढ़ती चली जा रही थी और शायद यही कारण था मीना की जिंदगी शराब में और डूबती चली गई या यह कह लें मीना अब शराब नहीं पी रही थी। शराब मीना की जिंदगी को पी रही थी। लीवर सिरोसिस की वजह से उनका पेट इतना फूल चुका था कि पाकीजा के मशहूर गीत मौसम में आस्काना की शूटिंग के दौरान उन्हें ऐसा पहनावा पहनाया गया जिससे उनका पेट छिप सके और शायद यह पहनावा मजबूरी की वजह से पहनाया गया मगर मीना कुमारी का वो ओरा था कि यह फैशन बन गया चेहरा में रुक जा रहे और ये मीना कुमारी का ओरा ही था कि राजकुमार जैसे मजे हुए कलाकार भी कभी-कभी मीना कुमारी के सामने संवाद बोलना भूल जाते थे। तुम्हें होश आएगा मेरी आंखें तुम्हें देख रही होंगी।

लेकिन अब मीना ने हालातों को देखते हुए फिल्में करना कम कर दी थी। तभी उनके दोस्त गुलजार साहब उनके पास एक फिल्म का प्रस्ताव लेकर आए। हां, इस फिल्म में यह उनकी मुख्य भूमिका नहीं थी। यह एक चरित्र भूमिका थी और अपनी बिगड़ती सेहत के बावजूद उन्होंने इस फिल्म को पूरा किया। [संगीत] 1971 में मेरे अपने फिल्म रिलीज हुई। रिश्ते नाती, प्यार, ममता सबके भाव पड़ गए भगवान। दिन पर दिन मीना के हालात और बिगड़ते जा रहे थे। उधर कमाल अमरोही अपनी पाकीजा को हर हाल में पूरा करना चाहते थे। कपड़ों से लेकर गहनों तक हर छोटी-छोटी चीज का बारीकी से ख्याल रखा जा रहा था। सिर्फ एक चीज को छोड़कर जिस चीज का सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाना था। जी हां, मीना कुमारी की सेहत का जैसे-जैसे फिल्म पूरी हो रही थी, मीना वैसे-वैसे टूट रही थी। मीना का जिस्म जवाब दे चुका था। हालात तो यह आ गए थे कि मीना काम करती जा रही थी। एक शॉट पूरा होता और तुरंत स्क्वाड बॉय एक कुर्सी लेकर पीछे खड़ा हो जाता। यह जििद [संगीत] है कि हम जख्म जिगर एक दृश्य में उन्हें पहाड़ी से नीचे की तरफ दौड़ना था। मगर बीमार शरीर के लिए यह काम करना नामुमकिन था। लेकिन मीना ने कोशिश की। एक बार, दो बार और बार-बार कोशिश की। कहा जाता है इस दृश्य के लिए कमाल अमरोही ने 26 रीटेक लिए। अब कुछ लोग इसे कमाल अमरोही का परफेक्शन कहते हैं और कुछ लोग इन दोनों टूटे हुए रिश्तों की बेरुखी का सच कहते हैं। जो कहीं गई मुझसे वो जमाना कह रहा। शायद यह राज हमेशा के लिए उन दोनों के बीच में दफन हो गया। क्योंकि अब उनके बीच शायद मोहब्बत का रिश्ता बचा ही नहीं था। बस एक अधूरी फिल्म थी और उस अधूरी फिल्म को पूरा करने की जिद दोनों को आखिरी हद तक ले जा रही थी। आखिरकार वो दिन भी आया 4 फरवरी 1972 पाकीजा पर्दे पर उतरने के लिए तैयार थी। मुंबई के मराठा मंदिर में फिल्म का प्रीमियर रखा गया और फिर सफेद साड़ी में मीना कुमारी वहां पहुंची। चेहरे पर नूर था। लेकिन उस नूर के पीछे बरसों का दर्द छिपा था। सामने उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी फिल्मों में से एक फिल्म एक ऐसी फिल्म जिसके लिए उन्होंने अपनी मोहब्बत खोई, अपना सुकून खोया, अपनी सेहत खोई और शायद अब अपनी जिंदगी भी खोने वाली थी। फिल्म ऐसी चली कि पर्दे पर साहिबा जान जिंदा हो उठी। पाकीजा ने शानदार सफलता हासिल की। लेकिन मीना अब बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी। जिस शरीर ने इतने साल कैमरा का बोझ उठाया था। अब वो शरीर हर सांस के साथ जवाब दे रहा था। और फिर एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा आपा शायद अब सही वक्त आ गया है। मेरे पास कोई काम अधूरा नहीं बचा। अब कोई यह नहीं कहेगा मीना अपना काम अधूरा छोड़कर चली गई। फिर आया मार्च 1972। मीना की हालत लगातार बिगड़ रही थी। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर इलाज कर रहे थे और मीना अब भी एक काम को लेकर चिंतित थी। बताया जाता है कि दुश्मन फिल्म का एक दृश्य अभी बाकी था। तभी फिल्म से जुड़े लोग उनसे मिलने पहुंचे। मीना के हालचाल लिए। फिल्म के प्रोड्यूसर से उन्होंने तुरंत कहा अस्पताल में ही क्यों ना इस फिल्म की शूटिंग कर ली जाए। सब ने मना किया पर मीना नहीं मानी। अब अस्पताल का कमरा एक बीमार अभिनेत्री और कैमरे के सामने आखिरी बार अभिनय करती हुई मीना कुमारी। अम्मा जी भीख मांग कर खाने से तो अच्छा है कि मेहनत मजदूरी करके खाएं। जैसे वो कैमरे से कह रही हो मेरी कहानी अभी पूरी नहीं हुई लेकिन शायद कहानी पूरी हो चुकी थी। अगले दिन 31 मार्च 1972 गुड फ्राइडे का दिन।

अस्पताल के कमरे में मीना कुमारी अपनी जिंदगी और मौत के बीच आखिरी सांसे ले रही थी। उन्होंने एक बार अपनी आंखें खोली। वहां मौजूद सभी शख्स को एक-एक बार देखा और फिर आंखें बंद कर ली। मीना कुमारी चली गई थी। सिर्फ 39 साल की उम्र में पार्टी नहीं जाती। खुले छोड़ दी जाती है। लेकिन उनकी कहानी का सबसे दर्दनाक अध्याय शायद इसके बाद शुरू हुआ। कहते हैं कि उनके इलाज का अंतिम बिल भी चुकाने के लिए परिवार के पास पैसे नहीं बचे थे। मीना कुमारी ने सख्त हिदायत भी दे रखी थी कि एक भी पैसा कमाल अमरोही से ना लिया जाए। बहरहाल उन्हीं के डॉक्टर ने उनके अस्पताल का सारा बिल चुका दिया और फिर उनका पार्थिव शरीर घर लाया गया। हजारों नहीं लाखों लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए घर के बाहर खड़े थे। जिस मीना को कभी कैमरे की रोशनी ने घेरा था। आज वो मीना सफेद कफ़न में लिपटी हुई थी। फिर उन्हें सुपुर्दे खाक कर दिया गया। मीना कुमारी की मौत के बाद उनकी दोस्त नरगिस की ओर से एक मार्मिक लेख की कुछ पंक्तियां आई। मीना मौत मुबारक हो। यह उस औरत के लिए एक दर्द भरी बंधाई थी जिसने जिंदगी भर दुनिया के लिए जिया और बदले में दुनिया से सिर्फ थोड़ा सा सुकून चाहा था। नरगिस ने लिखा शायद यह दुनिया मीना जैसे लोगों के लिए बनी ही नहीं थी और शायद मीना कुमारी की पूरी कहानी का सबसे बड़ा सच यही था। एक बच्ची जिसे गरीबी ने फिल्मों में धकेल दिया था। एक बेटी जिसे अपने परिवार के लिए अपना बचपन खो दिया। एक पत्नी जिसने मोहब्बत को बचाने के लिए अपना घर छोड़ दिया। एक औरत जिसने रिश्तों में बार-बार अपना दिल रखा और बार-बार उसे टूटते देखा और आखिर में एक ऐसी कलाकार जिसने अपनी

आखिरी सांस तक अपने काम को अधूरा नहीं छोड़ा। मीरा कुमारी मर गई थी। लेकिन उनकी आंखों में बसा वह दर्द अभी भी जिंदा है क्योंकि कुछ कलाकार पर्दे पर अभिनय नहीं करते। वह अपनी पूरी जिंदगी एक किरदार की तरह ही जीते हैं और मीना कुमारी शायद उन्हीं में से एक साल नरगिस अपनी बेनूरी परोती है। बड़ी मुश्किल से होता है यमन में दीदावर। उनकी फिल्में खत्म हो गई। उनकी आवाज खामोश हो गई। लेकिन उनकी कहानी आज भी चल रही है। तो दोस्तों अगर आपको इस वीडियो ने सिर्फ मीना कुमारी की जिंदगी से जुड़ी कहानी नहीं सुनाई अगर उनके दर्द को महसूस कराया है तो प्लीज लाइक जरूर करिए क्योंकि आपका एक लाइक इन दोनों 50 से 60 मिनट की वीडियो में की गई हमारी लगभग डेढ़ से 2 महीने की मेहनत को साकार कर देता है। वैसे दोस्तों मीना कुमारी का नाम लेते ही आपकी आंखों के सामने उनकी कौन सी फिल्म सामने धुंधली सी आ जाती है? वह कौन सा गाना है जो आपके कानों में गुनगुनाने लगता है? मीना कुमारी जी की आपकी फेवरेट फिल्म कौन सी है? और हां दोस्तों एक सवाल जो मैं सिर्फ आपके लिए छोड़ के जा रहा हूं। आप बताइएगा मीना कुमारी की जोड़ी किस हीरो के साथ आपको सबसे ज्यादा अच्छी लगती है और पाकीजा फिल्म में उनकी किरदार का क्या नाम था? कमेंट बॉक्स में उत्तर जरूर दीजिए। दोस्तों, मैं आपका हमेशा आभारी रहूंगा क्योंकि आपने इस वीडियो को अंत तक देखा और आपका ही तो एक-एक व्यू है जो मेरे और मेरे परिवार को किसी न किसी रूप में आर्थिक मदद करता है। आपको मैं एक मनोरंजक वीडियो के साथ छोड़ कर जा रहा हूं। वो फिल्म जिसको आपने न जाने कितने बार देखा होगा। मगर बहुत कुछ आप इस वीडियो में जानेंगे जो आपने कभी देखा और सुना भी नहीं होगा। तो चलिए मिलते हैं किसी अगले वीडियो में। जय हिंद। जय भारत।

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