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हाजी मस्तान की आख़िरी वसीयत सिर्फ़ 7 लाइनों की थी? जिसे पढ़ते ही कोर्ट में हर वकील रो पड़ा!

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वसीयत में सिर्फ सात लाइनें थी। लेकिन पढ़ते ही हर वकील की आंख भर आई। मस्तान की उस ऐतिहासिक वसीयत में किसी आलीशान मकान, गाड़ी या तिजोरी के पैसों का कोई जिक्र नहीं था। उस वसीयत में मस्तान की हाथ की लिखावट में बहुत भावुक शब्दों में सिर्फ सात पंक्तियां लिखी हुई थी। उसने लिखा था, ना मुझे अपने नाम का कोई मकान चाहिए, ना मेरी कब्र पर कोई संगमरमर की बड़ी इमारत बनवाना। मेरे कमाए पैसों में से हर एक पाई निकालकर इस शहर की गरीब और लाचार बेटियों की शादी में लगा देना ताकि किसी गरीब बाप को अपनी बेटी के

हाथ पीले करने के लिए किसी बड़े सेठ के आगे सिर ना झुकाना पड़े। मस्तान की यह बात सुनकर वहां मौजूद कड़े दिल वाले कानून विदों और जजों की आंखें भी श्रद्धा से भर आई। मस्तान खुद को कभी कोई डॉन या बाहुबली नहीं मानता था। वह तो खुद को एक साधारण बिजनेसमैन और गरीबों का हमदर्द समझता था। उसकी वसीयत पर तुरंत अमल करते हुए उसी शाम मुंबई की तीन बेबस और अनाथ बेटियों का विवाह बड़े धूमधाम से कराया गया। जिन गरीब परिवारों के पास मंडप सजाने तक के पैसे नहीं थे, मस्तान की उस वसीयत ने उनकी जिंदगी में खुशियां भर दी। शहर के लोग भले ही मस्तान के बारे में कई तरह की बातें करते थे, लेकिन गरीबों के लिए वह हमेशा मसीहा ही रहा। उसने अपनी आखिरी वसीयत से भी यही साबित किया कि इंसान अपनी दौलत से नहीं बल्कि अपने बड़े दिल से महान बनता है।

उन तीनों बेटियों ने जब दुल्हन के लिबास में मस्तान की तस्वीर के आगे हाथ जोड़े तो पूरा माहौल भावुक हो उठा। मस्तान का यह फैसला आज भी माया नगरी के पुराने गलियारों में बहुत आदर और गर्व के साथ याद किया जाता है। लेकिन उन तीन बेटियों की शादी संपन्न होने के ठीक अगले दिन उसी वकील के दफ्तर में एक बूढ़ा डाकिया पहुंचा। उस डाकिए के हाथ में एक बहुत पुराना और फट्टा हुआ चमड़े का बैग था जो सालों से मस्तान की हिफाजत में था। उस बैग के अंदर कोई जेवरात या पैसे नहीं थे बल्कि 80 ऐसी पुरानी रसीदें और चिट्ठियां सहेज कर रखी हुई थी। वे रसीदें मुंबई के उन अनाथालयों और अस्पतालों की थी जहां मस्तान बरसों से गुप्त रूप से राशन और दवाइयां पहुंचाता था।

उन चिट्ठियों में उन सैकड़ों माताओं की दुआएं दर्ज थी जिनके बच्चों का इलाज मस्तान ने चुपचाप कराया था। वकील ने जब उन रसीदों को देखा तो उसे एहसास हुआ कि मस्तान का असली खजाना बैंक में नहीं लोगों के दिलों में था। उसने हमेशा अपनी दरियादिली को खामोशी के पर्दे में रखा और कभी अपने एहसानों का ढिंढोरा नहीं पीटा। लेकिन उस पुराने चमड़े के बैग की सबसे निचली जेब से एक और छोटा सा सीक्रेट लिफाफा बरामद हुआ। उस लिफाफे पर लिखा था मेरी इस आखिरी ख्वाहिश का सच केवल उस बेबस मां को बताना जिसने मुझे मुंबई आना सिखाया था। उस अनाम लिफाफे में छिपी मस्तान के शुरुआती दिनों की सबसे भावुक सच्चाई जानने के लिए तैयार हो जाइए हमारी अगली खास पेशकश में। अगर आप इस ऐतिहासिक और भावुक किस्से का अगला सबसे दिलचस्प मोड़ जानना चाहते हैं तो अभी कमेंट में टाइप करें वसीयत। इस वीडियो को लाइक करें। अपने दोस्तों और परिवार के साथ अपनी प्रोफाइल पर शेयर करें। हमारे साथ हमेशा ऐसे ही जुड़े रहने और अगला भाग सबसे पहले देखने के लिए चैनल को फॉलो स्लश सब्सक्राइब करें।

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