Cli

जब बिना इंटरनेट के दुनिया भर में गूंजा मोहम्मद रफी का सुर, 26 भाषाओं में गाए गाने

Uncategorized

आवाज के जादूगर और सुरों के सरताज मोहम्मद रफी के देश विदेश में करोड़ों प्रशंसक हैं। 1940 के दशक में अपने गायन सफर की शुरुआत करने वाले रफी साहब कई दशकों तक भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय पासर्व गायकों में शामिल रहे। कौवाली हो, भजन, रोमांटिक गीत, दर्द भरे नगमे या देशभक्ति गीत उन्होंने अपनी आवाज से हर भाव को जीवंत कर दिया। यही वजह है कि उनकी गायकी आज भी उतनी ही ताजा और लोकप्रिय है जितनी अपने दौर में थी। रफी साहब की गायकी सिर्फ हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने फिल्मी करियर में करीब 26 भाषाओं में गीत गाए। इनमें हिंदी, उर्दू, पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, भोजपुरी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया जैसी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी, फारसी, स्पेनिश, डच और क्रिओल जैसी विदेशी भाषाएं भी शामिल थी।

दिलचस्प बात यह है कि उनकी कुछ विदेशी भाषा की रिकॉर्डिंगस हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गीतों की धुनों पर आधारित थी। उदाहरण के लिए फिल्म गुमनाम के मशहूर गीत हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं की धुन पर उन्होंने अंग्रेजी गीत द सी आई लव इज रिकॉर्ड किया था। वहीं फिल्म सूरज के सदाबहार गीत बहारों फूल वर्षाओं की धुन पर उन्होंने अंग्रेजी गीत ऑलदो वी हेल्ड फ्रॉम डिफरेंट लैंड भी गाया। आज के दौर में यह सामान्य सी बात लग सकती है। लेकिन उस समय ना तो इंटरनेट था ना Google और ना ही सोशल मीडिया। ऐसे दौर में किसी भारतीय गायक का अलग-अलग देशों की भाषाओं में गीत रिकॉर्ड करना इस बात का प्रमाण है कि रफी साहब की लोकप्रियता और उनकी आवाज की पहुंच सीमाओं से कहीं आगे तक थी। रफी साहब के बारे में एक और दिलचस्प तथ्य बहुत कम लोगों को पता है। फिल्मों के अलावा उन्होंने कुछ विज्ञापनों और सरकारी परियोजनाओं के लिए भी अपनी आवाज दी थी।

इनमें सबसे चर्चित जिंगल [संगीत] वर्मा सेल ऑयल कंपनी के लिए गाया गया था। 1950 के दशक में रिकॉर्ड किए गए इस जिंगल को रेडियो पर प्रचार के लिए प्रसारित किया गया था। इसके गीतकार एस अथैया थे, जबकि संगीत मुकुल रॉय ने दिया था। मुकुल रॉय मशहूर गायिका [संगीत] गीता दत्त के भाई थे। इस जिंगल के बोल थे घर-घर में मुस्काए रोशनी और अंधेरा हाथ मले। गांव-गांव और नगर-नगर में वर्मा तेल का तेल जले। रफी साहब ने इसके अलावा भी कुछ सरकारी अभियानों और चुनिंदा ब्रांड्स के लिए जिंगल्स रिकॉर्ड किए थे। हालांकि उनकी पहचान हमेशा फिल्मों में गाए कालजई गीतों से ही बनी रही।

मोहम्मद रफी का संगीत सफर केवल हजारों गीतों तक सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने अपनी आवाज से भाषाओं, संस्कृतियों और सीमाओं के बीच भी एक सेतु बनाया। यही वजह है कि उनके गीत आज भी नई पीढ़ी उतनी ही रुचि से सुनते हैं जितनी उनके दौर के श्रोता सुनते थे। रफी साहब केवल एक गायक नहीं बल्कि भारतीय संगीत की एक ऐसी विरासत हैं जिनकी आवाज समय बीतने के साथ और भी अमर होती जा रही है। तो दोस्तों, आज का यह वीडियो यहीं समाप्त करते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। तब तक के लिए आप सभी को टाटा बाय-ब टेक केयर। [संगीत]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *