दोस्तों जिंदगी के आखिरी दिनों में जब राजेश खन्ना ने लगभग सबसे मिलनाजुलना बंद कर दिया था। जब वह गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और बहुत कम लोगों से बात करते थे। तभी एक दिन उनके घर में एक ऐसे शख्सियत पहुंचा जिसने देखते ही उनके चेहरे पर मुस्कान ला दी और वह थी मुमताज। बताया जाता है कि मुलाकात ने दोनों के घंटों तक पुरानी बातें की और पुरानी यादों को दोहराया और कुछ देर के लिए जैसे बीमारी का दर्द भी पीछे छूट गया हो। आखिर क्या था इस दोस्ती का राज? आइए जानते हैं। नमस्कार आप सुन रहे हैं बॉलीवुड किस्से और मैं हूं आपके साथ अंशु वर्मा।
1960 और 70 के दशक में अगर किसी जोड़ी ने दर्शकों के दिल पर सबसे ज्यादा राज किया तो उनमें राजेश खन्ना और मुमताज का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। इन दोनों की फिल्मों का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार रहता। सिर्फ रोमांस ही नहीं इनकी सहज केमिस्ट्री, भावनात्मक अभिनय और एक दूसरे के साथ स्क्रीन पर दिखने वाली आत्मीयता लोगों को बेहद पसंद आती थी। फिल्म दो रास्ते, रोटी, दुश्मन, प्रेम, कहानी, आपकी कसम ऐसी कई फिल्मों ने इस जोड़ी को हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार जोड़ियों में शामिल कर दिया। मैं तो एक पत्थर थी। दरअसल, मुमताज ने कई मौके पर राजेश खन्ना के बारे में बेहद सम्मान के साथ बात की। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, मैं तो एक पत्थर थी।
मुझे तराश कर हीरा काका ने बनाया। इस एक वाक्य ने साफ समझा जा सकता है कि मुमताज राजेश खन्ना को सिर्फ सह कलाकार नहीं बल्कि अपने करियर के सबसे महत्वपूर्ण साथियों में मानती हैं। राजेश खन्ना भी मुमताज की मेहनत और सहज अभिनय की हमेशा सहना करते। दोनों के बीच एक ऐसा भरोसा था जो कैमरे के सामने भी साफ दिखाई देता। फिल्म इंडस्ट्री में उनकी दोस्ती के किस्से अक्सर सुनाई जाते थे और यहां तक कि एक बार डिंपल कपाडिया ने भी मजाके अंदाज में कहा था काका को तो मुमताज से ही शादी करनी चाहिए। इसे अक्सर उनकी दोस्ती की गहराई को लेकर किए जाने एक हल्के-फुल्के मजाक के रूप में याद किया जाता है। हालांकि राजेश खन्ना और मुमताज ने हमेशा एक दूसरे के लिए सम्मान और अपनापन ही दिखाया। समय बीतता गया। राजेश खन्ना की तबीयत बिगड़ने लगी और बताया जाता है
कि अपने अंतिम दिनों में राजेश खन्ना से बिल्कुल लगभग उन्होंने मिलनाजुलना सबसे बंद कर दिया था और वह बहुत कम लोगों से बात करते और ज्यादातर समय अपने घर पर ही रहते थे। इसी दौरान मुमताज उनसे मिलने पहुंची। उनकी इस मुलाकात का जिक्र कई मीडिया रिपोर्ट्स और फिल्में संस्मरणों में मिलता है और कहा जाता है कि जैसे ही राजेश खन्ना ने मुमताज को देखा तो उनके चेहरे पर लंबे समय के बाद मुस्कान लौट आई। दोनों ने पुराने दिनों को याद किया। फिल्मों की बातें की। शूटिंग के मजेदार किस्से पर हंसे और कुछ घंटों के लिए ऐसा लगा जैसे समय फिर से पीछे लौट गया हो। जो लोग उस दौर को जानते थे उनके लिए यह मुलाकात सिर्फ दो कलाकारों की नहीं बल्कि दो पुराने दोस्तों के बीच फिर से जुड़ने का भावुक पल था। फिल्मी दुनिया के रिश्ते अक्सर काम के साथ बदल जाते हैं।
लेकिन राजेश खन्ना और मुमताज की दोस्ती उन रिश्तों में गिनी जाती है जिसमें समय कभी दीवार नहीं बन सकता। दोनों ने अपने-अपने जीवन में अलग-अलग रास्ते चुने लेकिन सम्मान और अपनापन हमेशा बना रहा और शायद यही वजह थी कि जीवन के सबसे कठिन दौर में भी राजेश खन्ना मुमताज से मिलकर भावुक हो गए। राजेश खन्ना और मुमताज की जोड़ी सिर्फ सुपरहिट फिल्मों की वजह से याद नहीं की जाती बल्कि उस सच्ची दोस्ती की वजह से भी याद की जाती है जो शोहरत, समय और परिस्थितियों से कई बड़ी थी। आज भी जब उनकी फिल्में देखी जाती हैं तो लगता है कि पर्दे पर सिर्फ दो कलाकार नहीं बल्कि दो ऐसे दोस्त नजर आ रहे हैं जिनकी आपसी समझ ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। दोस्तों फिलहाल इस पडकास्ट में इतना ही। ऐसी और भी पॉडकास्ट के लिए बने रह हमारे चैनल के साथ।