Cli

जब ‘आशीर्वाद’ बंगले को खरीदने के लिए राजेश खन्ना ने अपना सब कुछ दाव पर लगा दिया?

Uncategorized

नमस्कार आप सुन रहे हैं द बॉलीवुड रेडियो और मैं हूं आपके साथ आकाश। दोस्तों आज के इस पॉडकास्ट में किस्सा है राजेश खन्ना की सुपरडुपर हिट फिल्म हाथी मेरे साथी का। साल 1971 में रिलीज हुई हाथी मेरे साथी सिर्फ एक सुपरहिट फिल्म नहीं थी बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास की उन फिल्मों में शामिल हो गई जिसने इंसान और जानवरों के रिश्ते को बहुत भावनात्मक तरीके से पर्दे पर पेश किया। उस दौर में राजेश खन्ना अपने करियर के गोल्डन पीरियड में थे। आराधना, दो रास्ते, सच्चा झूठा, आन मिलो सजना, कटी पतंग और आनंद जैसी फिल्मों ने उन्हें देश का पहला सुपरस्टार बना दिया था। निर्माता जानते थे कि अगर राजेश खन्ना किसी फिल्म में हैं तो दर्शक सिनेमाघरों तक जरूर आएंगे। लेकिन हाथी मेरे साथी की सफलता सिर्फ उनके स्टारडम की वजह से नहीं थी। बल्कि इसकी कहानी, भावनाएं और हाथियों के साथ दिखाया गया अद्भुत रिश्ता इसकी सबसे बड़ी ताकत थी। इस फिल्म की शुरुआत दक्षिण भारत के प्रसिद्ध निर्माता चिनप्पा देवर के दिमाग से शुरू होती है। देवर पशु प्रेमी थे और उनकी जो निर्माण संस्था थी देवर फिल्म्स जानवरों पर आधारित फिल्में बनाने के लिए मशहूर थी। उन्होंने पहले तमिल में फिल्म बनाई थी लेकिन

वह फिल्म सफल नहीं रही। लेकिन उन्हें लगा कि इसी मूल विचार को बड़े कैनवास और भावनात्मक विस्तार के साथ अगर हिंदी में मनाया जाए तो यह पूरे देश में पसंद की जा सकती है। उन्होंने अपने भाई निर्देशक एम ए तिरमुगम को निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी। उस समय हिंदी सिनेमा में लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही जोड़ी सलीम जावेद भी संघर्ष के दौर में थी। बाद में जावेद अख्तर ने कई इंटरव्यूज में बताया कि एक दिन राजेश खन्ना उनके पास आए और कहा कि निर्माता चिनप्पा देवर ने उन्हें बड़ी साइनिंग अमाउंट दे दी है। और वह अपना जो उनका बंगला आशीर्वाद जिसे उन्होंने बाद में खरीदा उसे खरीदने के लिए वह भुगतान पूरा कर सकते हैं। अगर यह फिल्म वो कर लें इतने पैसे उन्हें इस फिल्म से मिलने वाले हैं। लेकिन समस्या यह थी कि मूल तमिल फिल्म की जो पटकथा थी उन्हें संतुष्ट नहीं कर रही थी। राजेश खन्ना बिल्कुल खुश नहीं थे स्क्रिप्ट से। राजेश खन्ना ने सलीम जावेद से कहा कि यदि वह कहानी और स्क्रीनप्ले को नया रूप दे दें तो उन्हें भी उचित मेहनताना और क्रेडिट भी मिलेगा। यह प्रस्ताव सलीम जावेद ने स्वीकार किया और उन्होंने मूल कहानी को पूरी तरीके से हिंदी दर्शकों की संवेदनाओं के अनुसार ढाल दिया और एक इंटरव्यू में तो जावेद अख्तर बताते हैं कि उस पूरी कहानी को पटकथा को हमने इतना बदल दिया, इतना चेंज कर दिया कि उसमें हाथी के अलावा सारी कहानी बदल दी गई। और इस तरह से बदली गई कि बाद में चिनप्पा देवर ने इस पर एक और फिल्म तमिल में बनाई। सलीम जावेद ने सिर्फ कहानी का अनुवाद ही नहीं किया बल्कि उसमें भावनात्मक गहराई, पारिवारिक संघर्ष, रोमांस और बलिदान का ऐसा मिश्रण तैयार किया कि फिल्म बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को पसंद आई। और कहानी का केंद्र सिर्फ हाथी नहीं रहे बल्कि इंसान और जानवर के बीच विश्वास, दोस्ती और त्याग का रिश्ता बन गया।

यही कारण है कि फिल्म को कई समीक्षकों ने उस दौर की भारतीय शैली की डिज्नी जैसी पारिवारिक फिल्म भी कहा। राजेश खन्ना को जब पूरी स्क्रिप्ट सुनाई गई तो वह तुरंत तैयार हो गए। उन्हें लगा कि लगातार रोमांटिक भूमिकाओं के बीच यह फिल्म उनके लिए बिल्कुल अलग होगी। इसमें उनका किरदार राजू बचपन से हाथियों के साथ बड़ा होता है और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानता है। यह भूमिका अभिनय के साथ-साथ जानवरों के साथ सहज व्यवहार की भी मांग करती थी। राजेश खन्ना ने चुनौती स्वीकार की और शूटिंग शुरू होने से पहले हाथियों के साथ वक्त बिताया ताकि कैमरे के सामने उनका रिश्ता स्वाभाविक लगे। नायिका के रूप में तनुजा को चुना गया। तनुजा उस दौर की बड़ी एक्ट्रेस थी और उनके अलावा फिल्म में मदन पुरी, सुजीत कुमार, के एन सिंह, डेविड, अब्राहम नाज और बाकी कलाकार भी थे। चिनप्पा देवर ने स्वयं फिल्म में एक छोटी सी झलक दी। अगर आपने यह फिल्म देखी हो तो आप गौर कर सकते हैं। फिल्म का संगीत उस समय की सबसे सफल जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने तैयार किया। गीत आनंद बक्शी ने लिखे और गायक थे किशोर कुमार, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी। फिल्म में अधिकांश गीत तो किशोर कुमार ने गाए लेकिन नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में मोहम्मद रफी की आवाज में रिकॉर्ड हुआ और आज भी उनके यादगार प्रेरणादायक गीतों में गिना जाता है। इसके अलावा चल चल चल मेरे साथी और मेरे मेरे हाथी इस तरीके से करके जो एक गाना है और या फिर दुनिया में रहना है तो या सुन जा आ ठंडी हवा दिलबर जानी चली हवा मस्तानी यह गीत भी बहुत मशहूर हुए थे। फिल्म की शूटिंग का एक बड़ा हिस्सा मद्रास जिसे अब हम चेन्नई कहते हैं कि वाहिनी स्टूडियो और प्रशिक्षित हाथियों के साथ विशेष रूप से तैयार किए गए सेटों पर फिल्माया गया। चिनपा देवर जानवरों के साथ काम करने में माहिर माने जाते थे और उनके पास प्रशिक्षित हाथियों की एक बड़ी टीम थी और यही वजह रही कि फिल्म में हाथियों के सीन इतने स्वाभाविक लगे और दर्शकों का दिल जीत लिया। हाथी मेरे साथी की सबसे बड़ी ताकत इसकी कहानी है। यह सिर्फ एक इंसान और पालतू हाथियों की कहानी नहीं बल्कि दोस्ती, विश्वास, प्रेम, परिवार और त्याग की ऐसी दास्तान है जिसने 1971 में करोड़ों दर्शकों की आंखें नम कर दी। सलीम जावेद ने मूल दक्षिण भारतीय कहानी को हिंदी दर्शकों की भावनाओं के अनुसार इस तरह ढाला कि फिल्म बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर वर्ग को पसंद आई। कहानी शुरू होती है राजू यानी जिसके किरदार में राजेश खन्ना हैं। राजू से जो बचपन में ही अनाथ हो जाता है। जीवन के सबसे कठिन दिनों में उसका साथ इंसानों ने नहीं बल्कि हाथियों ने दिया। एक हाथी उसकी जान बचाता है और धीरे-धीरे वही हाथी उसका परिवार बन जाता है। राजू बड़ा होकर सर्कस और पशु प्रदर्शन की दुनिया से जुड़ जाता है। उसके पास चार हाथी होते हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों की तरह नहीं बल्कि अपने परिवार के सदस्यों की तरह मानता है। वो उनसे बात करता है।

उनके साथ खेलता है। उनके साथ खाता है और उनकी खुशी दुख को समझता है। फिल्म का सबसे बड़ा संदेश यहीं से शुरू होता है कि प्रेम सिर्फ इंसानों के बीच नहीं जानवरों के बीच भी उतना ही गहरा हो सकता है। राजू की जिंदगी में तब नया मोड़ आता है जब उसकी मुलाकात तनु यानी तनुजा से होती है। दोनों के बीच प्यार होता है और फिर शादी हो जाती है। शुरुआत में तनु को भी राजू का जानवरों के प्रति प्रेम अच्छा लगता है। लेकिन शादी के बाद उसे महसूस होने लगता है कि राजू अपने हाथियों को पत्नी और परिवार से भी ज्यादा महत्व देता है और यहीं से कहानी भावनात्मक संघर्ष में बदल जाती है। एक तरफ पत्नी चाहती है कि उसका पति अब अपने घर परिवार को प्राथमिकता दे। दूसरी तरफ राजू अपने उन हाथियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता जिन्होंने बचपन से ही उसका साथ दिया है। धीरे-धीरे पति-पत्नी के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं। तनु को लगता है कि वह अपने ही घर में अकेली हो गई है। कई बार वह राजू से कहती है कि अब समय बदल गया है। लेकिन राजू का जवाब हमेशा यही होता है कि जिन साथियों ने कठिन समय में उसका साथ दिया उन्हें वह कभी नहीं छोड़ सकता। यही टकराव फिल्म की आत्मा बन जाता है। दर्शक किसी एक पक्ष को गलत नहीं मानते लेकिन दोनों की भावनाएं अपनी-अपनी जगह सही होती हैं। कहानी का सबसे मार्मिक मोड़ तब आता है जब परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि राजू को अपने हाथियों से अलग होना पड़ता है। पत्नी की खुशी और परिवार बचाने के लिए वह अपने सबसे प्यारे साथियों को छोड़ने का कठिन फैसला करता है। यह सीन फिल्म के सबसे भावुक सींस में गिना जाता है। हाथियों का अपने मालिक से बिछड़ना और उसका दर्द उस दौर के दर्शकों को रुला देता है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। फिल्म में एक बड़ा खलनायक भी है जिसकी नजर राजू और उसके हाथियों पर होती है। परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि राजू की जान खतरे में पड़ जाती है और जब इंसान उसका साथ छोड़ने लगते हैं तब वही हाथी जिन्हें उसने कभी अपना परिवार कहा था उसकी रक्षा के लिए वापस आते हैं। और फिल्म का क्लाइमेक्स रोमांच और भावनाओं का अद्भुत मिश्रण है। हाथी अपने मालिक को बचाने के लिए जान की बाजी लगा देते हैं और यह साबित कर देते हैं कि सच्चा प्यार और वफादारी किसी भाषा की मोहताज नहीं होती। यही वजह है कि फिल्म देखते समय सिनेमाघरों में बैठे दर्शक कई जगह तालियां बजाते हैं और अंतिम सीन में भावुक हो जाते हैं। बच्चों के बीच तो यह फिल्म असाधारण रूप से लोकप्रिय हुई। कई परिवार अपने बच्चों को सिर्फ हाथियों को देखने के लिए यह फिल्म बार-बार दिखाने ले जाते। फिल्म की सफलता में संगीत का भी बहुत बड़ा योगदान था। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत और आनंद बखशी के गीत कहानी के साथ पूरी तरह घुलमिल जाते हैं। चल चल चल मेरे साथी ओ मेरे हाथी हाथियों और राजू की दोस्ती का प्रतीक बन गया। जबकि मोहम्मद रफी की आवाज में नफरत की दुनिया को छोड़ के प्यार की दुनिया में फिल्म [नाक से की जाने वाली आवाज़] का सबसे प्रेरणादाय गीत बनकर उभरा। जब एक हाथी की मौत हो जाती है और वहीं किशोर कुमार की आवाज में रिकॉर्ड हुए गीतों ने भी फिल्म के हल्के-फुल्के और रोमांटिक हिस्सों को यादगार बना दिया। हाथी मेरे साथी की कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही था कि जानवर सिर्फ पालतू जीव नहीं होते। वह भावनाओं को समझते हैं। प्यार का जवाब प्यार से देते हैं और जरूरत पड़ने पर इंसानों से भी ज्यादा वफादार साबित होते हैं। यही संदेश फिल्म को साधारण मनोरंजन से उठाकर एक कालजई पारिवारिक फिल्म बना देते हैं।

हाथी मेरे साथी की शूटिंग शुरू होने से पहले ही निर्माता एम चिनप्पा देवर ने पूरी यूनिट को एक बात साफ कर दी थी कि इस फिल्म के असली सितारे सिर्फ राजेश खन्ना नहीं हैं। यह बात चिनप्पा देवर ने शूटिंग के शुरुआत में ही सबसे कह दी थी। बल्कि राजेश खन्ना के साथ-साथ हाथी भी इस फिल्म के सितारे हैं। और राजेश खन्ना के लिए अनुभव बिल्कुल नया था। रोमांटिक फिल्मों के सुपरस्टार काका अब ऐसे कलाकार बनने जा रहे थे जिन्हें अपने सह कलाकारों के रूप में हाथियों के साथ अभिनय करना था। शूटिंग शुरू होने से पहले उन्होंने कई दिनों तक हाथियों के साथ वक्त बिताया। वह उन्हें अपने हाथ से केले और गन्ने खिलाते, उनके साथ टहलते और घंटों उनके महावतों से उनके स्वभाव के बारे में बात करते। धीरे-धीरे यूनिट के लोग बताते थे कि कैमरा बंद होने के बाद भी हाथी अक्सर राजेश खन्ना के पास आकर खड़े हो जाते। जैसे ही उन्हें अपना साथी मानने लगे हो। और यही वजह थी कि फिल्म में दोनों के बीच का जो रिश्ता था वह बिल्कुल बनावटी नहीं बिल्कुल स्वाभाविक दिखाई देता है। फिल्म में दिखाई देने वाले हाथी प्रशिक्षित थे लेकिन इतने विशाल जानवरों के साथ शूटिंग करना आसान नहीं था। कई सीन में दर्जनों हाथियों को एक साथ चलना, रुकना या एक निश्चित दिशा में दौड़ना होता था और ऐसे हर सीन की तैयारी घंटों चलती थी। कई बार सिर्फ एक शॉट लेने में ही पूरा दिन निकल जाता था और अगर किसी एक हाथी का मूड बदल जाता तो पूरी शूटिंग रोकनी पड़ती थी औरकि वो जो फिल्म के निर्देशक थे वो जानवरों के साथ जबरदस्ती के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे और वो कहते थे कि यदि हाथी सहज नहीं है तो शूटिंग बाद में होगी लेकिन जानवर को परेशान नहीं किया जाएगा और यही वजह है कि फिल्म में हाथियों का व्यवहार इतना स्वाभाविक लगता है। राजेश खन्ना के बारे में एक दिलचस्प बात कही जाती है कि शुरुआत में उन्हें हाथियों के इतने करीब जाकर काम करने में थोड़ा संकोच होता था। लेकिन कुछ ही दिनों में यह डर खत्म हो गया। एक हाथी तो ऐसा था जो कैमरा बंद होने के बाद भी राजेश खन्ना के पीछेछे चलता था। यूनिट के सदस्य मजाक में कहते थे कि फिल्म का नाम सिर्फ हाथी मेरे साथी नहीं बल्कि हाथी और राजेश खन्ना की दोस्ती होना चाहिए। फिल्म का संगीत भी इसकी सफलता का एक बड़ा आधार बना।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने ऐसी धुनें तैयार की जो कहानी का हिस्सा बन गई। गीतकार आनंद बख्शी ने सरल लेकिन दिल को छू लेने वाले बोल लिखे और फिल्म के लगभग सभी गीत लोकप्रिय हुए। सबसे ज्यादा चर्चा मोहम्मद रफी के गाए गीत नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में इस गीत की हुई। यह गीत सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं रहा बल्कि इंसानियत और प्रेम का संदेश देने वाला एक कालजई गीत बन गया। मोहम्मद रफी की भावपूर्ण आवाज और आनंद बखशी के शब्दों ने इस गीत को अमर कर दिया। इसके अलावा किशोर कुमार की आवाज में चल चल चल मेरे साथी या दुनिया में रहना है तो काम कर प्यारे जैसे गीत भी काफी लोकप्रिय हुए। 1971 में यह फिल्म रिलीज हुई जो बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच गई। यह उस साल भारत की सबसे अधिक कमाई करने वाली हिंदी फिल्म बनी। कई शहरों में फिल्म ने सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाई। बच्चों और परिवारों के लिए तो यह पहली पसंद बन गई। उस दौर में सिनेमाघरों के बाहर हाथियों के पोस्टर और राजेश खन्ना की तस्वीर लोगों को आकर्षित करती थी। कई दर्शक सिर्फ हाथियों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए इस फिल्म को बार-बार देखते। यह फिल्म कई मायनों में बहुत दिलचस्प रही और खासकर राजेश खन्ना जिन्होंने एक अलग तरीके का प्रयोग किया हाथियों के साथ फिल्में करके। यह फिल्म आपको कैसी लगी कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताइएगा इस फिल्म के गीत आपको कैसे लगे और कौन सा गीत आपके दिल के सबसे करीब रहा। सुनते रहिए द बॉलीवुड रेडियो। सुनता है सारा इंडिया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *