आज हम बात करने जा रहे हैं मध्य प्रदेश के धार जिले में मौजूद एक बेहद चर्चित और ऐतिहासिक स्थल भोजशाला के बारे में। सदियों पुराना यह स्थल अपनी बेहतरीन वस्तुकला, इतिहास और हालिया कानूनी और सामाजिक चर्चाओं की वजह से हमेशा से सुर्खियों में रहा है। आइए बेहद सरल शब्दों में इसके इतिहास और पूरी कहानी को समझते हैं। नमस्कार, मैं हूं आदित्य।
भारत फैक्ट्स के आज के एपिसोड में आपका स्वागत है। भोजशाला के इतिहास के तार सीधे तौर पर परमार वंश के सबसे बड़े और महान राजा राजा भोज से जुड़ते हैं। 11वीं शताब्दी की शुरुआत में राजा भोज ने मालवा की राजधानी धार को कला, साहित्य और शिक्षा का एक बहुत ही बड़ा केंद्र बनाया था। राजा भोज खुद एक महान विद्वान, कवि और आर्किटेक्ट थे। उन्होंने धार में एक भव्य कॉलेज और मंदिर की स्थापना करवाई थी। जिसे आज हम भोजशाला के नाम से जानते हैं। उस दौर में यह देश विदेश के विद्वानों, विद्यार्थियों और दार्शनिकों के लिए शिक्षा और ज्ञान का प्रमुख तीर्थ स्थल हुआ करता था।
साथियों, भोजशाला की दीवारों, खंभों और पत्थरों पर की गई नक्काशी आज भी उस दौर की बेजोड़ कारीगरी की गवाही देती है। यहां लगे पत्थरों पर संस्कृत के व्याकरण, श्लोक और ज्योतिष से जुड़ी कई बातें खुदी हुई है। इतिहासकारों का मानना है कि इस परिसर में मूल रूप से ज्ञान की देवी मां सरस्वती की एक बेहद सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई थी। यही वजह है इस जगह को वाग देवी का मंदिर भी कहा जाता है। साथियों, मौजूदा दौर में यह दुर्लभ प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है। जिसे वापस लाने की मांग समय-समय पर उठती रहती है। समय के पहहिए के साथ 13वीं और 14वीं शताब्दी के बाद मालवा क्षेत्र में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हुई। दिल्ली सल्तनत और बाद में मालवा के सुल्तानों के शासनकाल के दौरान इस पूरे परिसर के स्वरूप में बदलाव आए। इसी दौरान परिसर के एक हिस्से में कमाल मौलाना नाम के एक सूफी संत की मजार और एक मस्जिद का निर्माण कराया गया।
इतिहास के इस पड़ाव के बाद से ही इस स्थान पर दो अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों की मान्यताएं जुड़ गई। जिसके कारण यह जगह आगे चलकर विवादों का विषय भी बनी। साथियों, ब्रिटिश काल के दौरान भी इस जगह को लेकर सर्वे और खोजबीन शुरू हुई थी। अंग्रेजों के समय यहां मिले अवशेषों और शिलालेखों को इंदौर और लंदन के संग्रहालयों में भेजा गया। आजादी के बाद से ही भोजशाला को लेकर हिंदू और मुसलमान दोनों पक्षों के अपने-अपने दावे रहे हैं। हिंदू पक्ष इसे राजा भोज का प्राचीन सरस्वती मंदिर मानता है और वहां पूजा करने की मांग करता है। जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौलाना मस्जिद बताता है। जहां नमाज पढ़ी जाती रही है।
साझा इस्तेमाल और विवाद को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सालों पहले एक व्यवस्था बनाई थी। जिसके तहत दोनों पक्षों के लिए नियम तय किए गए थे। हाल के सालों में यह मामला देश के अदालतों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के वैज्ञानिक सर्वे के कारण फिर से सुर्खियों में आया है। ताकि इस ऐतिहासिक जगह के प्राचीन स्वरूप और वास्तविक इतिहास की पूरी तरह से वैज्ञानिक खुलासा हो सके। साथियों, भोजशाला सिर्फ पत्थरों और दीवारों की इमारत नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहती है जहां शिक्षा, कला और संस्कृति को सबसे ऊपर रखा जाता था। भले ही आज यह जगह अपनी ऐतिहासिक और कानूनी बहसों के लिए जानी जाती हो, लेकिन इतिहास के पन्नों में राजा भोज के समय का वो स्वर्णिम काल आज भी अमिट है। साथियों, इस मुद्दे पर आप क्या सोचते हैं? कमेंट करके हमें जरूर बताएं। बने रहिए इंडिया.com के साथ। शुक्रिया। [संगीत]