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इन 4 वजहों से दुनिया सोनम वांगचुक की फैन है?

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अगर मैं आपसे कहूं कि एक ऐसा शख्स है जिसने बिना किसी बड़ी फैक्ट्री, बिना किसी करोड़ों की मशीन के रेगिस्तान जैसे पहाड़ों में कृत्रिम [संगीत] ग्लेशियर बना दिए। ऐसा टेंट बनाया जिसमें -30° तापमान में भी सैनिक बिना हीटर के रात गुजार [संगीत] सकें। और ऐसा स्कूल बनाया जहां फेल हो चुके बच्चे आगे चलकर इंजीनियर, पत्रकार और उद्यमी बने [संगीत] तो शायद आपको यकीन ना हो। लेकिन यही काम किया है लद्दाख के इंजीनियर और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचूक ने। आज वही सोनम वांगचूक जंतरमंतर पर भूख हड़ताल कर रहे हैं और अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे [संगीत] हैं। लेकिन राजनीति और भाषणों से अलग अगर उनके कामों को देखा जाए तो उनके कई इनोवेशन दुनिया भर में चर्चा का विषय रहे हैं। इस वीडियो में जानते हैं सोनम वांगचूक [संगीत] के ऐसे शानदार इनोवेशन जिन्होंने लद्दाख की जिंदगी बदलने की कोशिश की। सबसे पहले बात करते हैं उस इनोवेशन की जिसने सोनम वांगचूक को पूरी दुनिया में पहचान [संगीत] दिलाई। आई स्तूप यानी कृत्रिम ग्लेशियर। लद्दाख में बारिश बेहद कम होती है। यहां सालाना और औसतन करीब 100 मि.मी. बारिश होती है।

खेती पूरी तरह बर्फ और ग्लेशियर्स के पिघलने वाले पानी पर [संगीत] निर्भर रहती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ वक्त से पहले पिघलने लगी और ग्लेशियर भी ऊंचाई की ओर खिसकने लगे। नतीजा यह हुआ कि अप्रैल और मई में जब किसानों को सबसे ज्यादा पानी चाहिए होता था तब पानी की भारी कमी होने लगी। [संगीत] इस समस्या का समाधान ढूंढते हुए सोनम बांगचुक ने साल 2013 में आई स्तूप [संगीत] का विचार पेश किया। इसी तकनीक में ऊंचाई पर मौजूद पानी को पाइप के जरिए नीचे लाया जाता है। गुरुत्वाकर्षण के दबाव से पानी फव्वारे की तरह ऊपर निकलता है। लद्दाख की कड़ाके की सर्दी में [संगीत] यह पानी हवा में ही जमने लगता है और धीरे-धीरे एक विशाल बर्फ के स्तूप का आकार ले लेता है। इसका आकार स्तूप जैसा इसीलिए रखा गया क्योंकि यह कम जगह घेरता [संगीत] है। ज्यादा बर्फ जमा करता है और धूप में धीरे-धीरे पिघलता है। गर्मियों की शुरुआत में यही बर्फ धीरे-धीरे [संगीत] पानी छोड़ती है जिससे खेतों की सिंचाई होती है और गांवों में पानी की कमी [संगीत] काफी हद तक दूर हो जाती है। सोनम वांगचुक का दावा है कि यह तकनीक उस पानी को बचा लेती है जो सर्दियों में बेकार बह जाता है। हालांकि [संगीत] कुछ एक्सपर्ट्स ने प्लास्टिक पाइप के इस्तेमाल और तापमान नियंत्रित रखने जैसी चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया था। फिर भी आज लद्दाख के कई गांवों में आई स्तूप [संगीत] बनाए जा चुके हैं। हजारों पेड़ इन्हीं पानी से लगाए भी गए हैं। सोनम वांगचूक का दूसरा बड़ा इनोवेशन भारतीय सेना के लिए बनाया गया सोलर हीटेड [संगीत] टेंट है। सियाचिन, गलवान और लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान कई बार -30° [संगीत] सेल्सियस से भी नीचे चला जाता है।

ऐसे में सैनिकों को गर्म रखने के लिए डीजल या दूसरे ईंधन पर निर्भर रहना पड़ता था। इस चुनौती को देखते हुए वांगशुक और उनकी टीम ने ऐसा टेंट तैयार किया जो दिन भर सूरज की गर्मी को अपने अंदर जमा करता [संगीत] है और रात में उसी गर्मी से सैनिकों के सोने वाले हिस्से को गर्म रखता है। इस टेंट में चार परतों वाला इंसुलेशन लगाया गया है। एक परीक्षण के दौरान जब बाहर का तापमान -14 डिग्री था तब टेंट [संगीत] के अंदर करीब 15 डिग्री तापमान बनाए रखा गया। सबसे खास बात यह है कि इसमें [संगीत] किसी तरह के जीवाश्म ईंधन की जरूरत नहीं पड़ती जिससे प्रदूषण भी कम होता है और ईंधन की लागत भी बचती है। यह टेंट पूरी तरह से पोर्टेबल है। इसे छोटे-छोटे [संगीत] हिस्सों में खोलकर आसानी से सेना के साथ ऊंचाई वाले इलाकों तक पहुंचाया [संगीत] जा सकता है। सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस इनोवेशन की काफी सराहना हुई थी। मैं आपको जरा सा बताऊं कि यह कैसे बना हुआ है। इस टेंट के दो हिस्से हैं। एक आगे का हिस्सा जो कि ग्रीन हाउस हिस्सा है जहां से सूरज की गर्मी जाती है और जो पीछे का हिस्सा है वो स्लीपिंग चेंबर है जहां कि सैनिक रात को सोते हैं और यह बहुत हाईली इंसुलेटेड है। बहुत जैसे रजाई होता है उस तरह का स्लीपिंग बैग की तरह है। और इस पर विंड शीटर वाटर प्रूफ कवर लगा हुआ है। और फिर ये जो आगे का हिस्सा है जो ग्रीन हाउस है इससे हम अंदर जाते हैं। तो ये है पैसिव सोलर हीटेड टेंट। इस टेंट या तंबू के दो खास हिस्से हैं। एक जोकि स्लीपिंग चेंबर है। एक सोलर लाउंज यानी कि शयन कक्ष और विश्राम कक्ष। यहां पर सैनिक दिन में आराम से खुले में बैठ के अपने काम कर सकते हैं।

हथियारों का सफाई वगैरह और दिन में बहुत यह गर्म रहता है मगर रात में नहीं। [गला साफ़ करने की आवाज़] और फिर रात में यह कक्ष जो इसका उत्तर का हिस्सा है वो गर्म होके गर्म रहता है तो वो यहां उनका सोने का हिस्सा है। तीसरा इनोवेशन है एसईसीएमओएल यानी स्टूडेंट्स एजुकेशन [संगीत] एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख। 1988 में शुरू हुई यह पहल सिर्फ एक स्कूल नहीं बल्कि शिक्षा का एक बिल्कुल अलग मॉडल रहा है। लद्दाख के कई बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में फेल हो जाते थे क्योंकि [संगीत] उनकी पढ़ाई स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों से मेल नहीं खाती थी। वांगचुक ने ऐसे ही बच्चों को दोबारा मौका देने का फैसला [संगीत] किया। एसईसी एमओएल में बच्चों को सिर्फ किताबें नहीं पढ़ाई जाती। यहां खेती करना, सौर [संगीत] ऊर्जा का इस्तेमाल, मकान बनाना, मशीनें तैयार करना, पत्रकारिता, उद्यमिता और पर्यावरण संरक्षण जैसी व्यवहारिक चीजें सिखाई जाती हैं। यह पूरा कैंपस सौर ऊर्जा से चलता है। यहां बिजली के लिए सरकारी ग्रिड पर निर्भरता नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्राकृतिक तरीके से सब्जियां भी उगाई जाती [संगीत] हैं और सोलर किचन है, अंडरग्राउंड प्राकृतिक फ्रीजर है। कचरे को अलग-अलग रिसाइकल किया जाता है और छात्र खुद इस पूरे कैंपस को [संगीत] चलाने में हिस्सा लेते हैं। यही वजह है कि यहां पढ़ने वाले कई [संगीत] छात्र आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी, पत्रकार, उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता बने हैं। फिल्म थ्री इडियट्स [संगीत] का मशहूर किरदार फुसुक वांगड़ू भी काफी हद तक सोनम वांगचूक के जीवन से ही प्रेरित माना [संगीत] जाता है। चौथा और शायद सबसे महत्वाकांक्षी सपना है एचआईएल यानी हिमालयन इंस्टट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख। [संगीत] इस संस्थान का मकसद सिर्फ डिग्री देना नहीं बल्कि हिमालय क्षेत्रों की समस्याओं के लिए स्थानीय समाधान तैयार करना है। [संगीत] यहां छात्र इंजीनियरिंग, डिजाइन, जल संरक्षण, टिकाऊ निर्माण, कृषि और जलवायु परिवर्तन जैसे [संगीत] विषयों पर काम करते रहे हैं।

पढ़ाई सीधे जमीन से जुड़ी समस्याओं को हल करने पर आधारित रही है ताकि युवा अपने इलाके के लिए तकनीक विकसित कर सके [संगीत] ना कि सिर्फ नौकरी की तलाश करें। हालांकि पिछले कुछ वक्त में अगर देखा जाए तो एसईसीएमओएल [संगीत] और एचआईएल दोनों ही विवादों में रहे हैं। सरकारी एजेंसियों की [संगीत] जांच विदेशी फंडिंग और एफसीआरए लाइसेंस को लेकर कई बार विवाद हुआ। सवाल उठते रहे। वहीं सोनम वांगचुक और उनकी टीम इन आरोपों से इनकार करते हुए इन्हें गलतफहमी और अलग तरीके से की गई [संगीत] व्याख्या बताते रहे हैं। लेकिन इन विवादों से अलग अगर सिर्फ इनोवेशन की बात करें तो यह कहना गलत नहीं होगा कि सोनम वांगचुक ने लद्दाख की सबसे बड़ी समस्याओं, [संगीत] पानी, शिक्षा, ऊर्जा और कठिन मौसम के लिए ऐसे समाधान खोजने की कोशिश की जिन्हें आज दुनिया में एक मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा है। और इनकी सराहना [संगीत] सरकार ने भी की। यही वजह है कि आज जब सोनम वांगचुक फिर से सुर्खियों में है तो [संगीत] उनके आंदोलन के साथ-साथ उनके इनोवेशन की चर्चा भी एक बार फिर से तेज हो [संगीत] गई है। फिलहाल के लिए इस वीडियो में इतना ही।

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