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चीनी सैनिक क्यों सुनते थे मोहम्मद रफी के गाने?

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क्या आप सोच सकते हैं कि किसी युद्ध के मैदान में दुश्मन देश की फौज हमारे ही सैनिकों का मनोबल तोड़ने के लिए गोलियों की जगह बॉलीवुड के किसी सुपरहिट गाने का इस्तेमाल कर रही हो? क्या आपने कभी सुना है कि देश के सबसे महान और सुरीले गायक की आवाज सरहद के बर्फीले तूफानों के बीच हमेशा के लिए खामोश हो गई हो और तब बॉलीवुड के एक बहुत बड़े सुपरस्टार ने डॉक्टर बनकर रातोंरात कोई ऐसा चमत्कार किया हो जिसने उस गायक की जादुई आवाज वापस लौटा दी हो और क्या आप कभी उस शर्मीले इंसान पर विश्वास कर पाएंगे जो बाहर से एकदम शांत दिखता था। लेकिन जब बात अपने दोस्त की आई तो उसने उस वक्त के सबसे बड़े राजनीतिक तानाशाह की आंखों में आंखें डालकर पूरी सरकार को खुली चुनौती दे डाली थी। दोस्तों आज की यह कहानी किसी आम इंसान की नहीं है बल्कि यह कहानी है एक ऐसे फकीर की जिसकी आवाज में इतना जादू था कि दुश्मन भी उस आवाज का सहारा लेकर जंग जीतना चाहते थे। यह कहानी है सदी के सबसे महान गायक मोहम्मद रफी साहब की जिनकी जिंदगी के ऐसे ऐसे राजस और किस्से आज मैं आपको बताऊंगा जो किसी मसालेदार फिल्म की तरह लगते हैं। साल था 1962 और महीना था अक्टूबर का जब चीन ने अचानक भारत पर हमला करके सबको चौंका दिया था। लद्दाख और नेफा की उन जमा देने वाली बर्फीली चोटियों पर हमारे भारतीय जवान बहुत ही सीमित हथियारों सात दुश्मनों के सामने डटकर खड़े हुए थे। युद्ध के उस भयानक माहौल के बीच चीनी सेना यानी पीएलए ने एक ऐसी घटिया चाल चली जो किसी ने सपने में भी नहीं सोची थी। उन्होंने हथियारों वाले हमले के साथ-साथ एक बेहद

चतुर साइकोलॉजिकल वॉरफेयर शुरू कर दिया था। चीन का मकसद था बिना लड़े दुश्मन को हराना जो कि असल में उनके रणनीतिक विचारक सुन जू का पुराना दर्शन था। अपनी इस रणनीति को अंजाम देने के लिए चीनी सेना ने लद्दाख की पगोंग झील और दूसरी तमाम पोस्ट्स के पास बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लगा दिए थे। अब आप सोच रहे होंगे कि जंग के मैदान में उन लाउडस्पीकरों पर क्या बज रहा होगा? तो दोस्तों वहां जानबूझकर हमारे अपने ही हिंदी और पंजाबी गाने बजाए जा रहे थे। और सबसे हैरानी और झकझोर देने वाली बात यह थी कि दुश्मन की फौज लाउडस्कर पर शम्मी कपूर पर फिल्माया गया और मोहम्मद रफी की सुरीली आवाज में गाया हुआ सुपरहिट गाना तुमसा नहीं देखा। पूरे वॉल्यूम में बजा रही थी। यह सिर्फ एक गाना नहीं बज रहा था बल्कि यह चीन की तरफ से भारतीय सेना को एक बहुत बड़ा ताना था। यह एक ऐसी कोशिश थी जिससे भारतीय जवानों को यह एहसास दिलाया जा सके कि दुश्मन उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी हर चाल को बहुत गहराई से समझता है। चीनी सेना चाहती थी कि इन गानों को सुनकर हमारे जवानों को अपने घर की याद सताए, उनके अंदर हताशा पैदा हो और उनका मनोबल पूरी तरह से टूट जाए। सोचिए उन जवानों पर क्या गुजर रही होगी जो बर्फीली चोटियों पर देश के लिए जान देने को तैयार खड़े थे और दुश्मन उन्हें उनके ही देश की सबसे प्यारी आवाज सुनाकर कमजोर करने की साजिश रच रहा था। लेकिन चीन को शायद यह अंदाजा नहीं था कि जिस आवाज का वे अपने फायदे के लिए गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, वह आवाज किसी आम इंसान की नहीं बल्कि एक सच्चे देशभक्त की है। जब बॉम्बे में बैठे मोहम्मद रफी और उनके पक्के दोस्त सुपरस्टार दिलीप कुमार को सरहद के इन बिगड़े हुए हालात और चीनी सेना की इस भद्दी चाल के बारे में पता चला तो उनका खून खौल उठा। उस दौर में जहां बाकी लोग सिर्फ चंदा इकट्ठा करके अपनी देशभक्ति साबित कर रहे थे। वहीं इन दोनों सितारों ने सीधे उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से संपर्क किया और किसी भी हाल में इंडो चाइना बॉर्डर पर जाने की अनुमति मांग ली। इतिहास गवाह है कि उससे पहले कोई भी भारतीय कलाकार युद्ध के मोर्चे पर ऐसे नहीं गया था। यह अपने आप में एक दिलेरी भरा कदम था। जब दोनों दिग्गज लद्दाख की उस खतरनाक सरहद पर पहुंचे, तो उनका सामना – डिग्री तापमान की उस कंपा देने वाली ठंड से हुआ जिसके वे बिल्कुल भी आदि नहीं थे।

जवानों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई और उनकी फरमाइशें छोटे-छोटे कागजों पर लिखकर रफी साहब के पास आने लगी। लेकिन तभी एक दिल तोड़ देने वाला हादसा हो गया। कड़ाके की उस बर्फीली ठंड ने भारत की सबसे सुरीली आवाज यानी मोहम्मद रफी का गला पूरी तरह से जाम कर दिया और उनकी आवाज एकदम खामोश हो गई। जो शख्स जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर वहां आया था। जब उसने अपनी ही आवाज खो दी तो वह अपने तंबू में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा। वहां मौजूद सेना के अधिकारियों ने इस परेशानी को देखते हुए उन्हें ठंड से बचने के लिए ब्रांडी यानी शराब पीने का सुझाव दिया। लेकिन रफी साहब अपने उसूलों के इतने पक्के थे कि उन्होंने शराब को हाथ लगाने से भी साफ इंकार कर दिया। ऐसे नाजुक मौके पर उनके जिगरी दोस्त दिलीप कुमार ने एक घरेलू चिकित्सक की भूमिका निभाते हुए कमान अपने हाथ में ली। दिलीप कुमार ने तुरंत सैन्य रसोई से ताजा अदरक और शहद मंगवाया और अपनी मां के पुराने नुस्खे का इस्तेमाल करते हुए उसे उबालकर एक काढ़ा तैयार किया जिसे उन्होंने रातोंरात रफी साहब को पिलाया और फिर अगली सुबह एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने पूरी फिजा बदल दी। रफी साहब की वह जादुई आवाज पूरी तरह से वापस लौटाई थी। उस दिन उन्होंने दुश्मन के हौसले पस्त करते हुए आवाज दो हम एक हैं और कर चले हम फिदा जानोत तन साथियों जैसे जोशीले देशभक्ति गीत गाए आवाज दो हम एक हैं जिसने हिमालय की चोटियों को गुंजा दिया और जवानों में आदम्य साहस भर दिया जिसकी वजह से चीन का वह घटिया मनोवैज्ञानिक युद्ध पूरी तरह विफल हो गया। लेकिन दोस्तों सरहद पर जवानों के दिलों में आग लगाने वाली इस जादुई आवाज का सफर किसी आलीशान महल या बड़े संगीत घराने से नहीं शुरू हुआ था। बल्कि इसकी शुरुआत एक फकीर की रूहानी आवाज से हुई थी। चलिए थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। जहां बंटवारे से पहले वाले पंजाब के एक छोटे से गांव कोटला सुल्तान सिंह में 24 दिसंबर 1924 को एक बच्चे ने [संगीत] जन्म लिया। जिसके पिता हाजी अली पेशे से एक बावर्ची थे। घर में सब लोग प्यार से उसे फीको बुलाते थे। और इस परिवार में संगीत का दूर-दूर तक कोई नाम ओ निशान नहीं था। लेकिन उस गांव की धूल भरी पगडंडियों पर जब एक बुजुर्ग फकीर गाते हुए निकलता था तो यह छोटा सा फीको उस फकीर की आवाज से इस कदर सम्मोहित हो जाता था कि मीलों तक उसके पीछे पीछे चलता रहता और उसके गाए गीतों को याद कर लेता था। जब रफी वही गीत अपनी गांव की गलियों में गाते तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे। लेकिन उनके पिता हाजी अली को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं था और इस गाने बजाने के शौक के कारण रफी को कई बार डांट और मार तक खानी पड़ती थी। लेकिन कहते हैं ना कि हुनर अपनी जगह बना ही लेता है। करीब 9-10 साल की उम्र में जब उनका परिवार काम की तलाश में लाहौर शिफ्ट हो गया तो वहां भट्टी गेट इलाके में रफी अपने बड़े भाई मोहम्मद दीन की नाई की दुकान पर बाल काटने का काम करने लगे। वहां कैंची की आवाज और भीड़ के शोर के बीच भी उस लड़के के होठों पर हमेशा कोई ना कोई गीत रहता था। एक दिन उसी दुकान पर जब मशहूर उस्ताद पंडित जीवन लाल बाल कटवाने आए तो उस बच्चे की आवाज सुनते ही उन्होंने तुरंत रफी को संगीत की बुनियादी तालीम लेने की सलाह दे डाली। घर में संगीत का सख्त विरोध था। लेकिन उनके बड़े भाई मोहम्मद दीन और उनके एक बेहद करीबी दोस्त हमीद भाई उस बच्चे के टैलेंट को पहचान चुके थे। इन दोनों की मेहनत और हमीद भाई के प्रयासों से आखिरकार रफी को लाहौर में फिरोज निजामी और छोटे गुलाम अली जैसे संगीत के दिग्गजों से सीखने का मौका मिल गया। उस बच्चे का पहला पब्लिक परफॉर्मेंस 1937 में लाहौर के ऑल इंडिया एग्िबिशन में हुआ था। वहां कुंदन लाल सहगल का बहुत बड़ा कॉन्सर्ट चल रहा था कि अचानक बिजली चली गई और भीड़ उग्र होने लगी। तब उस 13 साल के बच्चे ने बिना किसी माइक के गाते हुए पूरी भड़की हुई भीड़ को एकदम शांत कर दिया था। जिसे देखकर खुद के एल सहगल ने उसी वक्त भविष्यवाणी कर दी थी कि यह लड़का आगे चलकर एक महान गायक बनेगा। वह भविष्यवाणी उस वक्त सच होने लगी जब 1944 में हमीद भाई के साथ रफी साहब ने बॉम्बे यानी आज के मुंबई में कदम रखा। लेकिन माया नगरी में उनका संघर्ष और भी भयानक था। भिंडी बाजार की एक छोटी सी 10/10 की खोली में वे 10-12 लोगों के साथ एडजस्ट करते थे। उनके रियाज की वजह से किसी दूसरे की नींद खराब ना हो। इसलिए रफी रोज सुबह 4:30 बजे उठकर मरीन ड्राइव के किनारे समंदर की लहरों के शोर के बीच अपना रियाज करने जाया करते थे। एक दिन वहीं मरीन ड्राइव पर मशहूर अभिनेत्री और गायिका सुरैया ने उनकी इस रहस्यमई आवाज को सुना और उन्हें अपने घर आकर रियाज करने का प्रपोजल दे दिया। बॉम्बे में उन्हें पहला बड़ा ब्रेक नौशाद के पिता के एक सिफारिशी खत के

जरिए फिल्म पहले आप में मिला था। उन्होंने अपना सब कुछ संगीत को दे दिया था। लेकिन जिंदगी ने उन्हें 1947 के देश के बंटवारे के दौरान एक बहुत बड़ा दर्द दिया। उन खौफनाक दंगों में उनकी पहली पत्नी बशीरा बेगम के माता-पिता की मौत हो गई। जिसकी वजह से उनकी पत्नी पाकिस्तान चली गई और उनका तलाक हो गया। इस भयानक त्रासदी ने रफी साहब के दिल पर एक गहरा घाव छोड़ा जिसने हमेशा के लिए उनकी आवाज में एक अजीब सा दर्द और ठहराव पैदा कर दिया। यही वजह थी कि जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में उन्होंने सुनो सुनो दुनिया वालों बापू की यह अमर कहानी गाया। तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने आंसू नहीं रोक पाए थे। और 15 अगस्त 1948 को रफी साहब को मेडल देकर सम्मानित किया गया था। इस आवाज की ताकत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि 1952 में फिल्म बैजू बावरा की भारी सफलता के बाद जब वे सच में हिंदी सिनेमा के बेताज बादशाह और संगीत के तानसेन बन गए थे तो राग दरबारी में गाए उनके गाने ओ दुनिया के रखवाले को एक फांसी की सजा पाए। कैदी ने अपनी आखिरी ख्वाहिश के तौर पर सुनने की मांग की थी। अपने दर्द और ठहराव से आगे बढ़कर मोहम्मद रफी के पास एक ऐसी जादुई क्षमता थी जिसे संगीत विश्लेषक गिरगिट तकनीक कहते हैं। वे किसी भी अभिनेता की ऑन स्क्रीन पर्सनालिटी, उसके हावभाव और उसके चरित्र को पकड़ कर अपनी आवाज को पूरी तरह से उसी के अनुसार बदल लेते थे। यह सिर्फ सुरों का खेल नहीं था बल्कि यह वॉइस एक्टिंग का सबसे बड़ा और चरम नमूना था। उदाहरण के तौर पर जब वे शम्मी कपूर के लिए गाते थे तो उनकी आवाज में एक जंगलीपन, एक्सट्रीम एनर्जी और वाक्यों के अंत में एक हल्का सा झटका होता था। मशहूर गाना चाहे कोई मुझे जंगली कहे या तारीफ करूं क्या उसकी मैं आखिरी लाइन को बार-बार रिपीट करना इसी गायन शैली का हिस्सा था। चाहे कोई मुझे जंगली कहे। लेकिन जैसे ही वे अपने दोस्त दिलीप कुमार के लिए माइक पर आते थे तो उनकी आवाज एकदम मखमली धीमी और एक गहरे दर्द के साथ ट्रेजडी किंग की छवि में ढल जाती थी। दिल ने जिसे पाया था आंखों ने गवाया है। यह उनकी आवाज का ही जादू था कि हर एक्टर को लगता था कि रफी साहब सिर्फ और सिर्फ उसी के लिए बने हैं। लेकिन इस सुरीली और परफेक्ट दुनिया के पीछे बॉलीवुड में ईगो क्लैश और विवादों का एक दूसरा डार्क चैप्टर भी चल रहा था। जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे कि इतने शांत इंसान की भी किसी से ऐसी टक्कर हो सकती थी। यह गॉसिप जुड़ा है इंडस्ट्री के सख्त और जिद्दी संगीतकार ओपी नयर से जो अपने भारी अहंकार, समय की पाबंदी और सख्त मिजाज के लिए काफी बदनाम थे। ओपी नयर का उसूल था कि वे सुबह ठीक 9:00 बजे अपने स्टूडियो का गेट बंद कर देते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि रफी साहब को नई ईयर की रिकॉर्डिंग में पहुंचना था। लेकिन वे शंकर जयकिशन की एक रिकॉर्डिंग में ऐसे फंसे कि उन्हें नई ईयर के स्टूडियो पहुंचने में पूरा एक घंटा देर हो गई। रफीली साहब क्योंकि एक बेहद सीधे और सच्चे इंसान थे तो उन्होंने कोई बहाना बनाने के बजाय नयर को साफ-साफ सच बता दिया। बस फिर क्या था? ओपी नयर का ईगो बहुत बुरी तरह हर्ट हो गया। उन्होंने उसी वक्त गुस्से में आकर रफी का सारा हिसाब कर दिया और मुंह पर कह दिया कि आज के बाद वे [संगीत] कभी रफी के साथ काम नहीं करेंगे। यह किसी भी म्यूजिक डायरेक्टर की तरफ से एक विनाशकारी निर्णय था

क्योंकि रफी ही नयर की सबसे बड़ी कामयाबी का राज्य थे। इस अहंकार की टक्कर के कारण नयर ने अगले 3 सालों तक रफी पर बैन लगाए रखा और उनकी जगह महेंद्र कपूर से गाने गवाए। हालांकि महेंद्र कपूर एक अच्छे गायक थे पर खुद नयर भी मानते थे कि उनमें रफी जैसी बात नहीं थी। लेकिन रफी साहब का दिल बहुत बड़ा था। 3 साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बाद एक दिन वे खुद चुपचाप ओपी नयर के घर गए और उन्हें गले लगाकर माफी मांग ली। रफी साहब की इस हैरतंगेज सादगी को देखकर ओपी नयर जैसा सख्त इंसान भी फूट-फूट कर रो पड़ा। नयर ने रोते हुए कहा था कि रफी तुम मुझसे बहुत बड़े इंसान हो। मैं अपने ईगो को नहीं हरा पाया लेकिन तुमने हरा दिया। इन विवादों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। 60 के दशक में रॉयल्टी के मुद्दे पर रफी और स्वर कोकिला लता मंगेशकर के बीच एक ऐसा गंभीर वैचारिक मतभेद शुरू हुआ जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री में हड़कंप मचा दिया था। लता जी का एकदम साफ मानना था कि चकि गायकों की आवाजत से संगीत कंपनियां और निर्माता करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। इसलिए गायकों को हर एक रिकॉर्ड की बिक्री पर जीवन भर रॉयल्टी मिलनी चाहिए। यह एक बहुत ही प्रैक्टिकल सोच थी। लेकिन वहीं दूसरी तरफ रफी साहब का अपना एक अलग सूफी सिद्धांत था। उनका मानना था कि जब एक गायक ने एक बार गाना रिकॉर्ड कर लिया और निर्माता ने उसकी तय की गई फीस दे दी तो गायक का काम और उसका अधिकार वहीं खत्म हो जाता है। रफी साहब के हिसाब से फीस मिलने के बाद रॉयल्टी की मांग करना उनके उसूलों के बिल्कुल खिलाफ था। इन दोनों दिग्गजों के बीच यह कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी बल्कि एक सैद्धांतिक लड़ाई थी। इस विवाद का असर यह हुआ कि दोनों दिग्गजों ने करीब 3-4 साल तक एक दूसरे के साथ कोई युगल गीत यानी डएट नहीं गाया। पूरे बॉलीवुड में खलबली मच गई क्योंकि इन दोनों के बिना फिल्में अधूरी थी। आखिरकार संगीतकार एसडी बर्मन और जयकिशन को आगे आना पड़ा और उनके कड़े प्रयासों से इस विवाद को किसी तरह सुलझाया गया। बाद में खुद लता मंगेशकर के अनुसार रफी साहब ने एक चिट्ठी लिखकर इस विवाद को शांत किया था। एक आम इंसान को लगता है कि इन सितारों की जिंदगी बहुत आसान होती है। लेकिन रफी साहब की जिंदगी में 1968 69 के दौरान एक ऐसा दौर आया जिसने उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया था। वे हज यात्रा के लिए मक्का गए हुए थे और वहां अचानक उनका सामना एक कट्टर मौलाना से हो गया। उस मौलाना ने रफी को पहचान लिया और उनसे कहा कि तुम इस्लाम के खिलाफ काम कर रहे हो। गाना बजाना इस्लाम में हराम है और अल्लाह तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा। रफी जो ईश्वर से बहुत डरने वाले और पांच वक्त के नमाजी इंसान थे। इस फतवे को सुनकर अंदर तक दहल गए थे। भारत लौटते ही उन्होंने यह बड़ा ऐलान कर दिया कि वे अब जीवन में कभी गाना नहीं गाएंगे। [संगीत] उन्होंने तुरंत अपने सारे रिकॉर्डिंग शेड्यूल रद्द कर दिए और संगीत से सन्यास लेकर लंदन जाकर अपने बेटे खालिद के पास रहने लगे। पूरे हिंदी सिनेमा में मातम छा गया। यह वह दौर था

जब फिल्म आराधना की सफलता के बाद किशोर कुमार तेजी से उभर रहे थे। कई महीनों तक रफी साहब संगीत से दूरी बनाए रहे। ऐसे नाजुक मोड़ पर संगीतकार नौशाद और रफी के परिवार वालों ने उन्हें समझाने का बेड़ा उठाया। नौशाद ने उनसे एक बहुत ही गहरी बात कही। उन्होंने कहा कि तुम्हारी यह आवाज तुम्हारी निजी संपत्ति नहीं है बल्कि यह आवाम यानी जनता की अमानत है और तुम्हें अल्लाह की दी हुई इस नियामत को छीनने का कोई हक नहीं है। इस तार्किक और भावनात्मक अपील ने अपना जादू किया और रफ्फी के मन का सारा भ्रम तोड़ दिया। उन्होंने वापस आकर फिल्म अमर अकबर एंथनी और हम किसी से कम नहीं जिसमें उनका गाया हुआ ब्लॉकबस्टर गीत क्या हुआ तेरा वादा था उसके जरिए अपना सिंहासन वापस हासिल कर लिया। रफी साहब की जिंदगी का सबसे मसालेदार और उनकी हिम्मत की सच्ची मिसाल देने वाला किस्सा जुड़ा है हिंदुस्तान की राजनीति के सबसे खौफनाक दौर यानी 1975 की इमरजेंसी से। मीडिया और गसिप मैगजींस ने अक्सर यह अफवाह फैलाई कि किशोर कुमार और मोहम्मद रफी के बीच गहरी दुश्मनी थी। लेकिन अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट थी। रफी साहब किशोर कुमार को बहुत सम्मान देते थे और उन्हें प्यार से किशोर दा कहकर बुलाते थे। उस दौर में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था तो प्रेस और नागरिक अधिकारों को बुरी तरह कुचल दिया गया था। सत्ता की पूरी ताकत उस वक्त उनके बेटे संजय गांधी और सूचना एवं प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला के हाथों में आ चुकी थी। उस खौफनाक माहौल में संजय गांधी ने किशोर कुमार को आदेश दिया कि वे यूथ कांग्रेस की एक रैली में गाएं और सरकार की 20 सूत्रीय नीतियों का प्रचार करें। किशोर कुमार ने सत्ता के इस अहंकार के आगे झुकने से साफ इंकार कर दिया। नतीजतन सरकार ने रातोंरात ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के सभी गानों पर सख्त बैन लगा दिया और उनकी आवाज को राष्ट्रीय मीडिया से मिटा दिया गया। जब यह बात रफी साहब को पता चली तो वे खामोश नहीं रह सके। जिस संजय गांधी के सामने बड़े-बड़े नेता और जज अपना सिर नहीं उठाते थे,

उनके सामने मोहम्मद रफी और गायक मन्नाडे सीधे जाकर खड़े हो गए। रफी जो आमतौर पर विवादों से दूर रहने वाले इंसान थे, उन्होंने उस दिन संजय गांधी की आंखों में आंखें डालकर तीखा सवाल किया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे महान व्यक्ति का पोता होने के बावजूद वे कला और कलाकारों पर ऐसी क्रूर तानाशाही कैसे थोप सकते हैं? रफी साहब ने यह तक कह दिया था

कि यदि किशोर कुमार पर से यह बैन हटाया जाता है, तो वे बदले में मुफ्त में 10 शो करेंगे। यह एक असली कलाकार का दूसरे कलाकार के प्रति बेमिसाल प्रेम था। जिसे मुख्यधारा का मीडिया अक्सर प्रतिद्वंदता का नाम देकर बेचता रहा। 31 जुलाई 1980 को जब सीने में दर्द के कारण रफी साहब का निधन हुआ तो लाखों प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। लोग उनकी कब्र की मिट्टी तक घर ले गए ताकि उनकी आवाज रफी जैसी हो जाए। मोहम्मद रफी केवल हिंदी सिनेमा के तानसेन नहीं थे। वे एक ऐसी सांस्कृतिक शक्ति थे जिनकी आवाज ने युद्ध के मैदानों से लेकर राजनीतिक उथल-पुथल तक हर मोर्चे पर भारत की आत्मा को झकझोरा और उसे एकजुट किया। जब तक हिमालय की बर्फीली हवाएं चलेंगी, रफी के गीतों की गूंज और उनकी यह दास्तान हमेशा इतिहास के पन्नों में अमर रहेगी। और दोस्तों अगर आपको बॉलीवुड के इन अनकही कहानियों और गहरे राजों को जानना पसंद है तो अभी इस वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन दबाना ना भूलें। बोलें।

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