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एक बैंक के ठीक बाहर एक मुर्दे को दफ़नाने की ज़िद एक ‘मुर्दा खाते’ की झकझोर देने वाली कहानी।

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हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जो कभी ना कभी बैंक ना गया हो हम अमूमन बैंक क्यों जाते हैं पैसे निकालने के लिए पैसे जमा करने के लिए आजकल हालांकि अब जब से डिजिटल का दौर आया है तो बैंक आना जाना हम सबका कम हो गया क्योंकि अब आपके पास मोबाइल पे ये बैंक के ऐप है आप वहीं ये सब कुछ कर सकते हैं। फिर एटीएम जगह-जगह हम पैसे निकाल लेते हैं।

लेकिन फिर भी कई वजह हैं जिनकी वजह से देश में अब भी बहुत सारे बैंक और उनके ब्रांचेस हैं। लेकिन अगर कोई ये जिद करने लगे कि मुझे ठीक एक बैंक के दरवाजे के सामने एक मुर्दे को दफनाना है। उसकी कब्र वही बनानी है। और इसके बाद बैंक के स्टाफ जब भी जाए बैंक में रोजाना अपना काम करने के लिए तो उसकी कब्र से होकर गुजरे।

अजीब बात है। अटपटी बात भी है कि बैंक के दरवाजे पर कोई किसी मुर्दे को क्यों दफनाएगा? वहां उसकी कब्र क्यों बनाएगा? लेकिन बहुत सारे लोग एक ताबूत लेकर एक बैंक के दरवाजे पर पहुंचते। और यही मांग करते हैं कि हमें इसी बहन के दरवाजे पर इस मुर्दे को दफनाना है ताकि बहन के मुलाजिम हर दिन उसकी कब्र को पार कर गुजरे ताकि उन्हें एहसास हो कि उन्होंने क्या किया है। यह कहानी झारखंड से आई है और झकझोर देने वाली कहानी है।

इस कहानी की शुरुआत एक तस्वीर से करते हैं। यह जो आपके स्क्रीन पर इस वक्त एक तस्वीर है, इसमें आप देखेंगे कि सामने सबसे पहले एक बैंक के बोर्ड का नाम है। झारखंड ग्रामीण बैंक उसके ऊपर ब्रांच का भी नाम लिखा हुआ है। गढ़वा इलाका है और बाड़गढ़ यह ब्रांच है। यह एक सेमी गवर्नमेंट बैंक है झारखंड यानी कि अर्ध सरकारी बैंक। अब बैंक के बोर्ड से जब कैमरा नीचे आता है तो नीचे काले रंग का एक ताबूत रखा हुआ है। उस ताबूत के साथ चार महिलाएं बैठी हैं फिर बीच में एक खड़ी भी हो जाती है और दाएं बाएं दो तरफ दो मेल है। और उनके सामने यह ताबूत है।

इस ताबूत के साथ एक कमेंट्री चल रही है। सामने खड़ा एक शख्स जो कैमरे में है नहीं वो कुछ बोल रहा है। तो उसे सुनने के लिए पहले मैं चुप हो जाता हूं। उसे सुनिए फिर आगे की कहानी। का अंत होता है। हम लोगों ने तुम्हारे खिलाफ को रिपोर्ट किया। उसके बाद भी तुमने अपना आदत नहीं छोड़ा। घोर होता है। उनके साथ नाइंसाफी होती है।

इस बात का भी सबूत है हमारे पास कि बैंक में खाता खोलने का भी तुम पैसा लेते हो और केक नहीं तो हम यहीं पर खुदाली लेके आए हैं। यहीं पर रतन लकड़ा का दफन करेंगे। और डेली तुमको उनके कब्र से होकर अपने बैंक में जाना पड़ेगा। उस शख्स की आखिरी लाइन यही है जो कह रहा है कि से ठीक बैंक के सामने दफनाएंगे ताकि बैंक के मुलाजिम हर रोज इसकी कब्र को पार कर जाए। अब सवाल ये है कि ये लोग कौन है जो यहां ताबूत लेकर पहुंचे। ये महिलाएं कौन है और दाएं बाएं बैठे हुए दो पुरुष कौन है? और थोड़ा सा कैमरे अगर हटाता हूं तस्वीर इससे अलग चलता हूं।

तो एक और तस्वीर है जो बहुत सारे लोग खड़े हुए यहां पर इसी ताबूत के सामने इनकी भीड़ नारे लगा रहे हैं। एक और तस्वीर है जो बिल्कुल सड़क की है जब यह बैंक तक लोग एक ताबूत को अपने साथ उठाकर लेकर आ रहे हैं। यह बैंक पहुंचने से पहले की तस्वीर है। अब आखिर बैंक के सामने दफनाने की जिद क्यों? तो इस कहानी की शुरुआत होती मार्च से इसी साल मार्च के महीने से। झारखंड में एक बड़ी आबादी आदिवासियों की है जो दूरदराज के इलाकों में रहते हैं और उनके लिए अलग-अलग स्कीम है और झारखंड ग्रामीण बैंक ऐसे आदिवासी बहुल्य इलाके में जहां उनकी तादाद ज्यादा है काफी पॉपुलर है क्योंकि एक सेमी गवर्नमेंट बैंक है अर्ध सरकारी बैंक है।

इस बैंक में आमतौर पर जो सरकारी स्कीम होते हैं योजनाएं होती हैं उसके पैसे डायरेक्ट खाता में पहुंचता है इन आदिवासियों के। तो अलग-अलग जो स्कीम है, पेंशन योजनाएं हैं, यहां बैंक में आता है और इसीलिए इस बैंक में सभी के खाते हैं। अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से जब जरूरत पड़ती है, सब बैंक से पैसे निकाल लेते हैं। ऐसे ही एक खाता इसी बैंक में एक बुजुर्ग रतन लकड़ा का था। रतन लकड़ा के परिवार में उनका एक बेटा है जिसको दिखाई नहीं देता। नेत्रहीन है। उसकी एक पत्नी है यानी बहू और एक रतन की अपनी पत्नी। चार लोग एक घर में रहते हैं।

यह चार लोगों का परिवार है। तीन महीने पहले अचानक पता चला कि रतन को टीबी है। तबीयत बिगड़ने लगी। सरकारी स्कीम के तहत उन्हें कुछ पैसे मिलते थे और वो पैसे सीधे इसी ग्रामीण बैंक में आते थे। जरूरत के हिसाब से वो अपने पैसे निकालने लगते थे और जब भी जरूरत होती निकालते।

लेकिन अब जब बीमारी के बारे में पता चला तो कुछ दबाव के लिए अलग से भी खर्च होने लगा। अब वो बैंक पहुंचे मार्च के महीने में कि खाते से हमारे पैसे निकालने हैं। बैंक वालों ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि आपके खाते से आप पैसे नहीं निकाल सकते क्योंकि आपका केवाईसी अपडेटेड नहीं है। अब आपको पता है आजकल केवाईसी मतलब आपके बारे में पूरी जानकारी उस दस्तावेज के सूरत में हर गवर्नमेंट डिपार्टमेंट में बैंक हो या बाकी जगह होना चाहिए। अब यहां ये याद रखिए कि ये झारखंड का वो इंटीरियर इलाका है जहां कोई पढ़ा लिखा नहीं है। सब आदिवासी हैं और इनके लिए यह बैंक है ताकि उनकी हेल्प कर सके। तो रतन की बहू ने कहा वो थोड़ी स्कूल तक पढ़ी हुई थी कि ठीक है आप केवाईसी अपडेट कर दीजिए उन्होंने कहा ठीक है।

आप उनको लेकर आइए उन्होंने कहा वो बीमार है अभी-अभी पता चला है तो बैंक वालों ने कहा नहीं उनको लेकर आना पड़ेगा बहू ने कहा ठीक है बीमारी की हालत में वो अपने ससुर को लेकर क्योंकि पति नाबीना है नेत्रहीन है दिखाई नहीं देता बैंक पहुंच गई जब बैंक पहुंची तो बैंक के स्टाफ ने जितने कागज थे वो सारी चीजें कराई। फिर कहता है कि आज नहीं हो पाएगा। फिर किसी दिन उन्होंने कहा बड़ी मुश्किल से लेकर आए हैं। बीमार है उम्र दराज है।

बैंक वालों ने कहा हमारे पास और भी काम वापस भेज दिया। मार्च से वो शुरुआत थी। इसके बाद अप्रैल, मई, जून तीन महीने तक रतन जो एक बीमार और बुजुर्ग बैंक के चक्कर काटता रहा अपनी बहू के साथ। बैंक वाले हर बार कोई ना कोई बहाना कर कर वापस भेजते थे। केवाईसी नहीं होता, बायोमेट्रिक नहीं होता। और इस दौरान बीमारी बढ़ती जा रही है। पैसों की जरूरत है। डॉक्टरों को भी दिखाना है, दवा भी लेनी है। और बेटा एक जिसको दिखाई नहीं देता। बहू है, पत्नी है। तो जो भी जमा पूंजी घर की सब लूट गई।

इलाज के लिए पैसे नहीं है। एक ही सहारा है बैंक जो सरकार स्कीम के तहत देती है। और बैंक वाले पैसे नहीं दे रहे। केवाईसी जब तक अपडेट नहीं होगा हम आपको पैसे नहीं देंगे और वह बैंक के चक्कर काट रहा है बेचारा कि आप कर लो साहब पर पैसे तो दे दो बहु गिड़गिड़ा रही है कि पैसे देंगे तो इनकी जान बच जाएगी हम इलाज कर सकते हैं और जो बीमारी है उसमें उनको थोड़ा उसने कहा है कि अच्छा पौष्टिक खाने की जरूरत है हम कहां से खाना लाए हमें तो दो वक्त का खाना वैसे ही नहीं मिल रहा है पर पत्थर दिल बैंक अफसरों पर कोई भी असर नहीं हुआ फिर इसके बाद एक और सबसे बड़ी इंसानियत जब शर्मसार होती उस दिन यह शर्मसार हुई जिस दिन बहू मतलब ससुर से चला नहीं जा रहा है। पर एक आखिरी उम्मीद कि शायद पैसा निकल आए।

बुरी तरह बीमार मतलब लगभग कुछ पता नहीं क्या होगा। मजबूरी में उठाकर फिर से बैंक पहुंची। 3 महीने बाद का यह किस्सा सुना रहा हूं। और यह बात है जून के लास्ट एंड बिल्कुल आखरी हफ्ते की पहुंची वहां उसने कहा कि आपने कहा था कि उनको लेकर आना पड़ेगा। इससे पहले बहू अकेले भी कई चक्कर काट चुकी थी इन तीन महीनों में बट जिसका खाता है उसको लेकर आओ। तो वो लेकर आई। अब बैंक की सेकंड फ्लोर पर बैंक के दूसरी मंजिल पर वह जगह है जहां बायोमेट्रिक और केवाईसी होता है और उसके स्टाफ बैंक के वहां बैठते हैं। अब ये बुजुर्ग पहुंचे ग्राउंड फ्लोर पर चलने की हालत में नहीं। मतलब बैठने की भी हालत में नहीं।किसी तरह उन्होंने नीचे जमीन पर लेटा दिया उनकी बहू ने। ऊपर गई। उसने कहा आपसी कर दीजिए। हमारे ससुर की हालत ऐसी नहीं है कि वह सीढ़ियां चढ़कर सेकंड फ्लोर तक आ सके। तो अगर आप में से कोई भी एक शख्स नीचे चला जाए, उनका अंगूठा ले ले, बायोमेट्रिक कर दे तो खाते से पैसे मिल जाएंगे। बैंक स्टाफ ने मना कर दिया। कोई एक सज्जन इंसान होगा बैंक में। उसने कहा रतन की बहू से कि सामने एक कमरा है। वहां बैंक के सबसे बड़े बाबू बैठे हुए हैं। वो बैंक मैनेजर थे। उनको जाकर बताओ। वह तुम्हारी मदद करेंगे। बहू बेचारी भागी उस कमरे के आगे हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।

शीशे के पीछे से बैंक मैनेजर ने देखा। बाहर आया। पूछा क्या हुआ? उसने कहा ऐसी ऐसी बात है। तीन महीने से मेरे ससुर का केवाईसी नहीं हुआ। सख्त बीमार है। दवा के लिए पैसे नहीं है। अच्छे खाने के लिए पैसे नहीं है। पैसे बैंक में है। पर निकाल नहीं पा रहे हैं क्योंकि केवाईसी नहीं हुआ है। तो बोला ठीक है आप ले आइए। बोला हम ले आए हैं। लेकिन वो नीचे हैं। सीढ़ी चढ़कर ऊपर नहीं आ सकते। पता नहीं क्या हो जाएगा क्योंकि वो चलना छोड़िए बैठ भी नहीं पा रहे।

अगर आप अपने किसी एक को कह दे वो नीचे जाकर अंगूठा का निशान ले ले बाकी ले ले। बैंक मैनेजर ने रतन की बहू को बुरी तरह डांटा और अपने एक स्टाफ को बुलाकर कहा इसे और नीचे जो इसका ससुर बैठा हुआ दोनों को बैंड से बाहर निकाल दो। जो एक वहां के सोशल वर्कर हैं। उन्होंने यह बात कही। खुद रतन की बहू ने भी ये बात कही। रतन की बहू की भाषा पता नहीं मतलब है तो हिंदी कितनी आप समझ पाएंगे नहीं। लेकिन मैं चाहता हूं दिल की बातें दिल तो सुन ही लेता है। तो उस दिन बैंक मैनेजर ने कैसे भगाया। रतन की खुद बहू और फिर वो जो एक सोशल वर्कर जिन्होंने बाद में इनकी मदद की। इन दोनों की बातें मैं चाहता हूं आप सुनिए।

मास्क से मैं आने लगी केवाईसी कराने के लिए। मैं आदत में भी आई ऑटो कर करके कि केवाईसी मेरा सा दोनों का पैस लगा है तो पैसा निकासी नहीं होने पा रहा है। मैं बोली कि सर मैं एक बार ले ले आ रही हूं। ऑटो का करके स्थिति खराब होने जा रहा है। तो चल थोड़ा देख लीजिए। मैं नीचे रखी हूं ऑटो करके। तो बोलने लगे कि नंदलाल इसको निकालो तो जल्दी बाहर रतन लकड़ा और उनकी पत्नी का केवाईसी तीन महीनों से नहीं हो रहा था। मार्च, अप्रैल, मई तीन महीना तक उनकी जो बहू है फुल मनी लकड़ा वो बैंक में दौड़ती रही और परेशान होके वो अपने ससुर को यहां टांग के ले आई। मैनेजर से कहा कि मैं अपने ससुर को टांग के ले आई हूं। मरनासन है। कृपया आप चल के देख लीजिए। बैंक में नहीं चढ़ सकते हैं। है ना? आप उनका केवाईसी कर दीजिए। बैंक मैनेजर अपना चपरासी को बोलते हैं इसको बाहर निकालो। दरवाजा बंद करो। हटाओ यहां से। है ना? केवाईसी नहीं हुआ। इस तरीके से बैंक से बाहर कर दिया। पैसे फिर नहीं मिले। अपने पैसे हैं जब आपके खाते में थक हार कर बहू अपने ससुर को किसी तरह वापस फिर लेकर घर आती है।

हालत खराब है। धीरे-धीरे गांव वालों को पता चल रहा है। फिर यह भी पता चल रहा है कि अब शायद रतन के बचने की उम्मीद नहीं है। यह बात उस सोशल वर्कर जिसको अभी आपने सुना उसने गांव इनसे कहा था हम तुम्हारी मदद करेंगे पैसे निकलवाने में। वो पहुंचा एक दिन बैंक और उसने जाकर बैंक मैनेजर से कहा देखो वो तीन महीने से बुजुर्ग भटक रहा है। अगर वो मर गया तो गांव के लोग गुस्से में है। पता नहीं तुम्हारे बैंक का क्या करेंगे। बैंक मैनेजर पहली बार डरा। उसे लगा वाकई कुछ हो सकता है। उसने अपने दो मुलाजिम को हुक्म दिया चले जाओ उसी के घर और जाकर उसका बायोमेट्रिक कर दो। मतलब जो बंदा बैंक के नीचे तक आकर लौटा दिया गया एक अंगूठा और बायोमेट्रिक के लिए। अब डर की वजह से बैंक मैनेजर ने अपने दो मुलाजिम को उसके घर भेजा। वो गए उस बुजुर्ग के अंगूठे के निशान लिए बायोमेट्रिक लिया।

और बोला ठीक है हम जा रहे हैं। शायद रतन सिर्फ इसी उम्मीद में जिंदा था कि एक बार ये जो भी केवाईसी होता ये भी नहीं पता था। पैसे मिल जाए तो शायद दवा आ जाए तो मेरी जान बच जाए। जैसे ही वह बायोमेट्रिक सब हुआ और उससे पूछा कि अब हो गया अब तो मिल जाएंगे। बैंक वालों ने कहा हां उसे पता नहीं कहां से एक एक इत्मीनान सा हुआ। उधर बैंक वाले केवाईसी करके गए। इधर रतन ने दम तोड़ दिया। रतन की मौत हो गई। जिस रतन का अपना पैसा एक बैंक खाते में पड़ा था। जिसके लिए तीन महीने तक चक्कर काटता रहा। वो पैसे उसे नहीं मिले। इंतजार में मर गया।

अब जब मर गया तो पूरे गांव को यह कहानी मालूम थी। उसी के बाद रतन की लाश को एक ताबूत में रखकर पूरा गांव उस बैंक के बाहर जाकर खड़ा हो गया और ताबूत बैंक के सामने रखा कि रतन की लाश को हम इसी बैंक के बाहर दफनाएंगे ताकि बैंक के हर मुलाजिम हर दिन इसकी लाश के ऊपर से गुजर कर जाए तो उन्हें एहसास हो। कि वह कितनी तकलीफ से गुजरा।

अब जब यह सब कुछ हुआ तो बैंक वाले ऑर्डर गए। उन्हें लगा ये तो मामला बिगड़ गया। पता नहीं क्या होगा। बड़ी मुश्किल से फिर लोगों को समझाया गया। वहां से लाश हटाई गई। इसके बाद रात के अंधेरे में बैंक के दो बड़े अफसरों को कहा गया कि आप रतन के घर जाओ। उनके बीवी बेटे जो और बहू को समझाओ कि यह सारी चीजें बंद कर दें बैंक के खिलाफ कोई नारे ना करें कोई केस ना करें और जो भी होगा हम अलग से भी पैसे दे देंगे मतलब अब डर के मारे वो जो तीन महीने तक इंतजार करता रहा जिसका केवाईसी के नाम पर उसी के खाते का पैसा नहीं दिया जिसके पैसे की वजह से उसका इलाज नहीं पाया वो पाया और वो मर गया अब मरने के डर ने जीते जी तो उससे डरे नहीं बैंक बैंक वाले उसके घर पहुंच गए। रात के अंधेरे में पहले पहुंचकर उन्होंने लाइट बंद करवाई घर की। फिर उन्होंने दी।

फिर बातें की। इत्तेफाक से कुछ गांव वालों को इन बैंक के अफसरों के वहां पहुंचने की खबर मिल गई। गांव वाले पहुंच गए घर में। दोनों बैंक के मुलाजिम देखकर घबरा गए। उनमें से एक होशियार उस आदिवासी इलाके का शख्स उसने निकाला मोबाइल और शूट करना शुरू कर दिया सवाल के साथ कि इतनी रात को आप यहां क्या कर रहे हो? यह पूरी बातचीत मैं चाहता हूं। आप भी सुनिए। इतना रात को आप लोग कहां आए हैं? बैठिए बैठिए। कहां आए हैं? छोड़िए।

आप बैंक मैनेजर हैं ना? हैं रुकिए। नहीं सब कर रहे हैं। फालतू वाला ये सब चीज नहीं है। रुकिए। आपका कोई ये है। कोई नहीं है। कुछ इसका मतलब क्या है? आप लोग कहां आए हैं? इतना रात को बैंक है क्या? हैं? आप लोग जवाब दीजिए। नहीं वो बोला नहीं। बैंक है कि क्या है? आप लोग कहां आए हैं रात में? लाइट क्यों बंद कराए थे? इसका जवाब दीजिए हम लोगों को। लाइट क्यों बंद करवाए? बच्चा को काहे लाइट बंद करवाए? अरे छोड़िए ना सर। बैठिए बैठिए। इज्जत से बैठिए आप लोग। बैठिए। नहीं हम नहीं नहीं कहां जा रहे हैं? मारना चाह रहे हैं। मारेंगे नहीं। हम लोग मारेंगे नहीं।

लेकिन आप लोग आए कहां है? रात के बर्गर के बैंक मैनेजर कृष्णा कुमार राम और ये क्या नाम है उनका? जी नंदलाल नंदलाल रात में आकर के इस विधवा महिला के घर में लाइट बंद करा करके यहां पर क्या बात कर रहे हैं जब हमने आया कि यहां पर ये लोगों को पकड़ने तो गाड़ी देख लीजिए कि यहां 200 किलोमीटर दूर में गाड़ी रखे हैं। लाइट दिखाइए जी। इधर लाइट दिखाइए। बैंक मैनेजर जा रहे हैं यहां देख लीजिए। आगे-आगे नंदलाल जा रहे हैं। अरे काहेल अर्जुन जी ये सब कर रहे हैं। आपसे कोई मेरा पर्सनल कुछ है क्या? और कुछ बोलना है बोलिए। अरे क्या समझ में नहीं आ रहा। देख लीजिए मैं आप लोगों को दिखा रहा हूं। नंदलाल जी गाड़ी में बैठ गए। बाइक इतना दूर बताइए। कहां जाते हैं? भाग रहे हैं यहां से। पूरब की ओर जा रहे हैं।

पता नहीं अब कहां जा रहे हैं ये लोग। और बैंक मुलाजिम भाग गए। इसके बाद जब यह खबर मीडिया में आई तो रांची तक पहुंची। झारखंड की राजधानी कैपिटल है रांची। इस वक्त वहां के चीफ मिनिस्टर रहे हेमंत सोरेन। उन्होंने जब इस खबर को सुना तो एक सोशल मीडिया पर पोस्ट भी किया और फिर कहा कि इस पर एक्शन हो। उसके बाद तो फिर क्या डीएम, वीएम, डीसी सब सब जुड़ गए। कि भैया इंसाफ होगा कारवाई करेंगे। लेकिन अफसोसनाक बात यह है कि जीते जी रतन अपने पैसे को जो उसका ही अपना पैसा था बैंक के खाते से निकाल नहीं पाया मर गया अब मरने के बाद उसका नेत्रहीन बेटा बहू और पत्नी है 10 दिन तक पैसे फिर भी नहीं निकले बैंक वालों से पूछा गया क्यों तो उन्होंने कहा कि बस हम डेथ सर्टिफिकेट का इंतजार कर रहे हैं मृत्यु प्रमाण पत्र का जैसे ही वो आ जाएगा उसको जांच करेंगे कि हां भाई यह आदमी मर चुका है। पैसे उनके जो करीबी नोमिनी है उनको दे देंगे। मतलब मजाक देखिए कि पहले जीते जी पैसे नहीं दिए और जब वो मर गया रतन तब कह रहे हैं पहले इसके मौत का सबूत लाओ कागज में।

फिर उस कागज को हम चेक करेंगे। फिर हम देखेंगे वह सच में मरा है या झूठ में मरा है। उसके परिवार वाले उसके पैसे हड़पने तो नहीं चाहते हैं। जब तसल्ली हो जाएगी तो फिर वो पैसे दे देंगे। मतलब जीते भी पैसे निकालने का इंतजार और मरने के बाद भी पैसे निकलने का इंतजार और यही होता है। और इंतजार के लिए कभी कोई सरकारी दफ्तर सबूत नहीं मांगता। उसकी वजह यह है कि इंतजार हमेशा जनता करती है। वह जनता जो उन सरकारी अफसरों को बनाती है। और इस पूरी कहानी का सबसे अफसोसनाक पहलू यह क्योंकि लाखों रुपए रतन के खाते में नहीं थे। महज चंद थे। सिर्फ चंद हजार और उस चंद हजार ने जान ले ली। ऐसी कहानियां भरी पड़ी है। चाहे झारखंड हो, उड़ीसा हो। उड़ीसा की शायद मैंने आपको एक कहानी सुनाई थी बहुत चार पांच महीने पहले।

एक भाई जिसकी बहन की मौत हो गई और वो बहन अकेली थी उसके आगे पीछे कोई नहीं। भाई ही उसका नॉमिनी था और बहन की के कई महीने बाद वह जाता है बैंक और कहता है कि मेरी बहन मर गई। बैंक के जो खाते में पैसे हैं पता नहीं शायद ₹31,000 थे। तो भैया मैं ही अकेला उसका वारिस हूं। मुझे दे दो। बैंक वालों ने कहा कि नहीं उसका डेथ सर्टिफिकेट लेकर आओ। हम कैसे मान लें कि तुम्हारी बहन मर गई है। अब वो पढ़ा लिखा नहीं सरकारी दफ्तर के चक्कर काटता रहा। कोई डेथ सर्टिफिकेट देने को तैयार नहीं। तीन महीने बीत गए चक्कर काटते काटते एक दिन बैंक वालों से बात किया। उसने कहा हम कैसे मान ले कि तुम्हारी बहन मर चुकी है। उस बेचारे को लगा कि और तो कोई सूरत है नहीं। बहन की लाश ही दिखा देते हैं।

तीन महीने बाद उसने अपने जिन हाथों से अपनी बहन को कब्र में दफनाया था। कब्र खोदकर उस बहन अब उसकी लाश कंकाल हो चुकी थी। उस कंकाल को अपने कंधे पर डालता है। 3 किलोमीटर पैदल चलता है और बैंक के दरवाजे पर ले जाकर रख देता है। ये लो मेरी बहन। मर चुकी है। अब देख लो। अब तो पैसे दे दो। ना जाने ऐसे कैसे कैसे किस्से जो झझोर कर रख देते हैं। उनहीं में से यह कहानी थी।

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