Cli

कभी सरकार के बड़े समर्थक थे सोनम वांगचुक, फिर ऐसा क्या हुआ कि बैठ गए धरने पर?

Uncategorized

अगर आप पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया या फिर खबरों पर नजर रख रहे हैं तो आपने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचु का नाम जरूर सुना होगा। दिल्ली के जंतरमंतर पे वे अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर एक समय सरकार की कई नीतियों की सराहना करने वाले सोनम वांगचुक आज उसी सरकार के खिलाफ धरने पर क्यों बैठे हैं? कब से शुरू हुई यह तकरार? इस बार उनकी मांगे क्या हैं? क्या यह आंदोलन सिर्फ लद्दाख तक सीमित है या इसके पीछे शिक्षा, पर्यावरण और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे बड़े मुद्दे भी जुड़े हुए हैं? आइए पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं। नमस्कार, मेरा नाम है रिचा पराशर और आप देख रहे हैं वन इंडिया हिंदी। [संगीत] दरअसल सोनम वांगचू का यह विरोध अचानक शुरू नहीं हुआ है। इसके पीछे कई वर्षों से चली आ रही मांगे, अधूरे वादे और लगातार बढ़ता असंतोष जुड़ा हुआ है। वांगचू का कहना है कि लद्दाख के लोगों से किए गए कई महत्वपूर्ण वादे आज तक पूरे नहीं हुए। उनका आरोप है कि सरकार के साथ कई दौर की बातचीत के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला। जिसके बाद उन्होंने एक बार फिर से भूख हड़ताल का रास्ता अपनाया है और इस बार का भूख हड़ताल उनका सिर्फ लद्दाख के मुद्दे पर नहीं है बल्कि को जनता पार्टी का जो एजुकेशन मिनिस्टर का इस्तीफा है

इस मुद्दे पर भी वह भूख हड़ताल कर रहे हैं। इस बार उनके आंदोलन में केवल लद्दाख की संवैधानिक मांगे नहीं है। जैसा कि मैंने बताया बल्कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक, युवाओं के भविष्य, पर्यावरण संरक्षण और सरकार की जवाबदेही जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। यही वजह है कि आंदोलन अब केवल एक क्षेत्रीय विरोध नहीं है बल्कि राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। तो सबसे पहले बात करते हैं सोनम वोंगचुक की। कौन है सोनम वोंगचुक? वे एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं। उन्हें लद्दाख में शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए कामों के लिए देश विदेश में पहचान मिली। आपको याद होगा फिल्म 3 इडियट्स उसके मशहूर किरदार फुनसुख वांगू वो उनके जो उस किरदार की प्रेरणा के जो सोर्स हैं वो सोनम वांगचुक ही हैं। कहा जाता है कि काफी हद तक सोनम वांगचुक को ही देखकर इस किरदार का का चरित्र लिखा गया था। दिलचस्प बात यह है कि सोनम वांगचुक कभी मौजूदा केंद्र सरकार के आलोचक नहीं बल्कि कई मुद्दों पर उसके समर्थक और सकारात्मक टिप्पणी करने वालों में से गिने जाते थे। वर्ष 204 में दिए गए एक बयान में उन्होंने कहा था कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन जैसे जन आंदोलनों की वजह से 2014 में मौजूदा बीजेपी सरकार सत्ता में आई। उनका कहना था कि जब कोई सरकार जन आंदोलन और पारदर्शिता के वादों से सत्ता में आती है तो उससे सत्य जवाबदेही और न्याय के ऊंचे मानकों की अपेक्षा करना स्वाभाविक है। वांगचुक ने उस दौरान अन्ना हजारे के आंदोलन का भी जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि तत्कालीन सरकार ने अन्ना हजारे की भूख हड़ताल के दौरान 13वें दिन लोकपाल विधेयक पारित कर दिया था। वांगचुक ने इसे सरकार की संवेदनशीलता और जन भावनाओं के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया का उदाहरण बताया था। इसी संदर्भ में उन्होंने उम्मीद जताई थी

कि वर्तमान सरकार भी लोकतांत्रिक संवाद और जनहित से जुड़े मुद्दों पर उसी तरह संवेदनशीलता दिखाएगी। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज वही सोनम बांगचुक सरकार पर वादे पूरे नहीं करने, बातचीत की प्रक्रिया ठप होने और लद्दाख सहित कई जनहित के मुद्दों पर ठोस कारवाई ना करने का आरोप लगाते हुए दिल्ली के जंतरमंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। तो चलिए एक बार बात करते हैं मौजूदा आंदोलन की। सोनम वांगशुक इस समय नई दिल्ली के जंतरमंतर पर जैसा कि मैंने बताया अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के लिए बैठे हुए हैं कर रहे हैं। वे कॉकर जनता पार्टी के बैनर तले चल रहे आंदोलन में शामिल हैं। उनके अनुसार वे यह कदम अपनी इच्छा से नहीं बल्कि मजबूरी में उठा रहे हैं क्योंकि सरकार ने लद्दाख से जुड़े कई अहम वादों को पूरा नहीं किया और बातचीत की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ी। तो अब सवाल उठता है कि आखिर उनकी मुख्य मांगे क्या है? क्या सिर्फ लद्दाख का मुद्दा है या फिर जनता पार्टी का मुद्दा भी वह अब अपना मुद्दा बना चुके हैं। सबसे बड़ी मांग है उनका लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत शामिल करना। छठी अनुसूची के तहत आने वाले क्षेत्रों को अपनी भूमि, प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष संवैधानिक संरक्षण मिलता है।

लद्दाख के कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन लंबे समय से यही मांग कर रहे हैं कि उनकी पहचान और संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। दूसरी प्रमुख मांग है लद्दाख को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक सुरक्षा देना। कई संगठनों का कहना है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी पहले की तुलना में सीमित हो गई है। इसलिए वे अधिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय निर्णय में उसकी जो भी निर्णय हो या फिर उसकी प्रक्रिया हो उसमें भागीदारी चाहते हैं। कुछ समूह लद्दाख को पुनराज्य का दर्जा देने की मांग भी उठा रहे हैं। हालांकि इस मुद्दे पर अलग-अलग संगठनों की राय भी अलग-अलग हो सकती है। लेकिन एक और सवाल उठता है कि आखिर यह पूरा आंदोलन शुरू कैसे हुआ? इसकी जड़े कहां हैं? इसके लिए हमें साल 2019 में लौटना होगा। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए के अधिकांश प्रावधानों को हटाने के साथ राज्य का पुनर्गठन किया। इसके बाद जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया। उस समय लद्दाख के कई लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया क्योंकि उनका मानना था कि अलग केंद्र शासित प्रदेश बनने से क्षेत्र का विकास तेज होगा और प्रशासनिक फैसले स्थानीय जरूरतों के मुताबिक लिए जा सकेंगे लेकिन समय बीतने के साथ कई स्थानीय संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समूहों ने चिंता जतानी शुरू की। उनका कहना था कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बावजूद लद्दाख की जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण, स्थानीय संस्कृति और पारंपरिक पहचान की सुरक्षा के लिए पर्याप्त [संगीत] संवैधानिक व्यवस्था नहीं की गई। उनका यह भी कहना था कि सरकारी नौकरियों, भूमि अधिकारों और स्थानीय लोगों के हितों को लेकर स्पष्ट कानूनी सुरक्षा का अभाव है। इसी वजह से लद्दाख के विभिन्न संगठनों ने संविधान की छठी

अनुसूची के तहत विशेष संवैधानिक संरक्षण, अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार, सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ाने की मांग तेज कर दी। समय के साथ यह मांग एक बड़े जन आंदोलन का रूप लेती गई और सोनम वांगचुक इसके प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए। उनका कहना है कि यदि समय रहते इन मुद्दों का समाधान नहीं किया गया तो लद्दाख की पर्यावरणीय, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन इस बार आंदोलन सिर्फ लद्दाख का नहीं है। सोनम वांगचुक ने अपने मौजूदा अनशन के दौरान शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली, पेपर लीक, युवाओं के भविष्य और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को भी उठाया है। उनका कहना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था पारदर्शी नहीं होगी और युवाओं का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा तो देश के विकास पर भी असर पड़ेगा। इसी वजह से जंतरमंतर पर चल रहा यह आंदोलन अब कई सामाजिक और नागरिक मुद्दों का मंच बनता दिखाई दे रहा है। हाल के दिनों में कई सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र संगठन और कुछ सार्वजनिक हस्तियां भी उनसे मिलने पहुंची और उनके आंदोलन का समर्थन या फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। वहीं सरकार की ओर से इन मांगों पर समय-समय पर बातचीत और विभिन्न स्तरों पर चर्चा की बात कही जाती रही है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस आंदोलन का अगला पड़ाव क्या होगा? क्या केंद्र सरकार आंदोलनकारियों के साथ फिर से औपचारिक बातचीत शुरू करेगी? क्या लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने, संवैधानिक सुरक्षा देने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने जैसी मांगों पर कोई ठोस फैसला लिया जाएगा या फिर यह आंदोलन और लंबा खिस सकता है।

इन सवालों के जवाब फिलहाल भविष्य के गद में है। लेकिन इतना जरूर है कि यह मामला अब केवल लद्दाख तक सीमित नहीं रह गया है। सोनम बांगशुक ने अपने आंदोलन के जरिए पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय अधिकार, शिक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे कई मुद्दों को एक साथ राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया है। यही वजह है कि उनके समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं। एक पक्ष इसे लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार बता रहा है। जबकि दूसरा पक्ष सरकार के साथ संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के जरिए समाधान निकालने की बात कर रहा है। फिलहाल इतना तय है कि यह अनशन केवल एक व्यक्ति का विरोध प्रदर्शन नहीं बल्कि उन सवालों का प्रतीक बन चुका है जिन्हें लेकर लद्दाख के कई सामाजिक संगठन वर्षों से आवाज उठाते रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच आगे क्या बातचीत होती है। क्या कोई समाधान निकलता है और क्या यह आंदोलन देश की नीति और राजनीति पर एक अलग असर छोड़ पाता है या फिर विफल हो जाता है। इस खबर में इतना ही अपडेट्स के लिए देखते रहें वन इंडिया। सब्सक्राइब टू वन इंडिया एंड नेवर मिस एन अपडेट। [संगीत] [संगीत]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *