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‘सतलुज’ फिल्म का पूरा सचः कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा ?

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क्या एक फिल्म 30 साल पुराने जख्मों को फिर से हरा कर सकती है? क्या एक इंसान की सच्चाई की तलाश आज भी सत्ता, राजनीति और समाज को असहज कर देती है? आखिर क्यों रिलीज होने के कुछ ही घंटों बाद एक फिल्म को डीटी प्लेटफार्म से हटा दिया गया। क्या यह व्यक्ति की आजादी का मामला है या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक शांति का? नमस्कार, मैं हूं कृष्णा तिवारी और आप देख रहे हैं संपन्न भारत। आज की इस विशेष रिपोर्ट में हम बात करेंगे फिल्म सतलुज की जो पहले पंजाब 1995 और उसके बाद पहले दुलूधारा के नाम से जानी जाती थी। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि पंजाब के इतिहास के सबसे विवादित अध्यायों में से एक है जो फिर से चर्चा केंद्र में आई है। इस रिपोर्ट में हम जानेंगे कि जसवंत सिंह खाड़ा कौन थे? उन्होंने ऐसा क्या खुलासा किया जिसने पूरी व्यवस्था को हिला दिया और उनकी मौत कैसे हुई?

अदालतों ने कहा कि फिल्म में दिखाया गया। क्या छूट गया और क्यों आज भी यह फिल्म राजनीति से लेकर समाज तक हर जगह बहस का विषय बन चुकी है। 1990 के दशक का पंजाब एक ऐसा दौर जिसे आज भी लोग डर, गोलियों की आवाज, आतंकवाद, पुलिस कारवाई और अनगिनत परिवारों के बिखर जाने के दौर के रूप में याद करते हैं। एक तरफ खाली उग्रवाद अपने चरम पर था, दूसरी तरफ सरकार और सुरक्षा एजेंसी आतंकवाद को खत्म करने के लिए बड़े अभियान चला रही थी। इन्हीं परिस्थितियों के बीच सामने आते हैं जसवंत सिंह खालड़ा जो पेशे से बैंक कर्मचारी थे लेकिन मानव अधिकारों के लिए आवाज उठाने के कारणों में पूरी दुनिया में पहचाने गए। जसवंत सिंह खालड़ा ने अपने साथियों के साथ अमृतसर पट्टी और तरन तारण के तीन श्मशान घाटों के रिकॉर्ड खनालेल शुरू किए। महीनों की मेहनत के बाद उन्हें ऐसे दस्तावेज मिले जिनमें हजारों ऐसे लोग के अंतिम संस्कार का रिकॉर्ड था जिनकी पहचान स्पष्ट नहीं थी। खरड़ा का दावा था कि यह केवल अज्ञात शव नहीं बल्कि इनमें से बड़ी संख्या में उन लोगों की थी जिन्हें पुलिस हिरासत में मार दिया गया और बाद में बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। जनवरी 1995 में जब उनके निष्कर्ष मीडिया सामने आए तो पूरे देश में हलचल मच गई। मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा और कनाडा के संसद में भी इस विषय पर भरपूर चर्चा हुई। लेकिन इसके कुछ ही महीनों बाद सितंबर 1995 में घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। आरोप लगा कि पंजाब पुलिस ने अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से जसवंत सिंह खाड़ा का अपहरण कर लिया। कई सप्ताह तक उनका कोई पता नहीं चला।

बाद में आरोप लगा कि उन्हें हिरासत में यातनाएं दी गई और उनकी हत्या कर दी गई। बताया गया कि उनका शव हरिके क्षेत्र के सतलुज में और ब्यास नदी के संगम के पास फेंक दिया गया था। उनकी पत्नी परमजीत कौर खलड़ा ने हार नहीं मानी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अकाली नेता जे एस तोहरा ने हस्तक्षेप किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता को देखते हुए पंजाब सरकार, डीजीपी और वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा और बाद में सीबीआई जांच के आदेश दिए। 1996 में सीबीआई की शुरुआती जांच में अपहरण की पुष्टि हुई और 1999 को विस्तृत जांच में हत्या की बात स्थापित हो गई। इसके बाद वर्षों तक अदालतों में मुकदमा चला। 2005 में सीबीआई की विशेष अदालत ने छह पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया। 2007 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पांच अधिकारियों को उम्र कैद की सजा भी सुनाई और 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने केवल खरड़ा की हत्या की जांच नहीं की बल्कि उन कथित अवैध अंतिम संस्कारों की भी जांच का आदेश दिया जिनका खुलासा उन्होंने किया था। सीबीआई जांच में अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार के मामले की पहचान हुई और लगभग 600 शवों की पहचान भी हो सकी। बाद में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने बड़ी संख्या में पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया भी पूरी कराई थी।

अदालतों ने अपने आदेशों में मानव अधिकारों के गंभीर उल्लंघन की बात कही और कई मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कारवाई भी की। अब बात करते हैं फिल्म सतलुज के निर्देशक हनी ट्रेहन की। यह फिल्म अभिनेता दिलजीत दोसा को जसवंत सिंह खाड़ा के किरदार में दिखाती है। वर्षों तक सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और नाम बदलने के विवाद में फंसी रही। पहले इसका नाम गुलूधारा था। फिर पंजाब 95 किया गया और अंतत सतलुज के नाम से यह फिल्म रिलीज हुई। हाल ही में फिल्म उड्डी पर आई लेकिन कुछ ही समय बाद भारत में इसे प्लेटफार्म से हटा दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को हवाला दिया। जबकि इस फैसले को लेकर देश भर में नई बहस चल गई है। फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा के संघर्ष उनके द्वारा जुबराए गए। दस्तावेज, उनके अपहरण और कथित हत्या को केंद्र में रखा गया। कई कानूनी रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाओं से प्रेरणा ली गई। लेकिन फिल्म में कुछ पात्रों और स्थानों के नाम बदल दिए गए। समर्थकों का कहना है कि यह फिल्म मानव अधिकारों के संघर्ष की कहानी है। जबकि आलोचकों का कहना है कि यह फिल्म पंजाब में आतंकवाद के दौर की पूरी तस्वीर नहीं दिखाती। आलोचक कहते हैं कि उस समय आम नागरिक, व्यापारी, किसान और पुलिसकर्मी भी लगातार हिंसा के साए में रहे हैं। उर्वादी संगठनों द्वारा हत्याएं, फिरौती और वह धमकी की बात आम थी। कई व्यापारी पंजाब छोड़कर दूसरे राज्यों में जा चुके थे। सुरक्षा बल लगातार हमलों का सामना कर रहे थे। उनका कहना है कि यह फिल्म इस पूरे परिदर्श की बजाय केवल राज्य की कथित यात्रियों पर ज्यादा ध्यान देती है। विवादित का सबसे बड़ा कारण फिल्म में बार-बार दिखाई देने वाला 25,000 लोगों के मारे जाने या लापता होने का दावा है। जबकि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई सीबीआई जांच में 2097 अवैध अंतिम संस्कारों की पहचान की गई थी। 25,000 का आंकड़ा किसी अधिकारिक जाति से प्रमाणित नहीं है

और इसी वजह से कई राजनीतिक नेताओं और विशेषज्ञों ने फिल्म निर्माताओं के इस दावे के समर्थन में प्रमाण मांगे हैं। दूसरी ओर फिल्म के समर्थकों का कहना है कि इसका उद्देश्य पूरे पंजाब के इतिहास को दिखाना नहीं बल्कि जसवंत सिंह खारड़ा के संघर्ष और मानव अधिकारों की लड़ाई को सामने लाना है। का तर्क है कि अगर अदालतों ने मानव अधिकार उल्लंघन स्वीकार किए हैं और कई पुलिस अधिकारियों को सजा हुई है तो उस सच्चाई को पर्दे पर दिखाने पर गलत क्या है? अब इस फिल्म का असर राजनीति पर दिखाई देने लगा है। पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा फिर गम आ गया है। अलग-अलग राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इसे देख रहे हैं। कुछ इसे इतिहास को सामने लाने की कोशिश बता रहे हैं तो कुछ इसे समाज को बांटने वाला नैरेटिव कह रहे हैं। हाल के दिनों में फिल्म को दोबारा बहाल करने और हटाने दोनों पक्षों में मांगे उठी हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि पंजाब के 1980 और 1990 के दशक के घाव आज भी पूरी तरह भरे नहीं है। उनका कहना है यह फिल्म या राजनीतिक बयान समाधान नहीं है। जरूरत है सच्चाई न्याय संवाद और मेल मिलाप की ताकि जिन परिवारों ने किसी भी पक्ष से अपने प्रियजनों को खोया है उन्हें न्याय और सम्मान मिल सके।

फिलहाल इतना तय है कि सतलुज केवल एक फिल्म नहीं रही। यह इतिहास मानव अधिकार, राजनीति अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता और न्याय व्यवस्था से जुड़े राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन चुका है। एक पक्ष इसे सच बोलने की कोशिश मानता है। दूसरा पक्ष इसे अधूरी कहानी कहता है। लेकिन फैसला आखिरकार दर्शकों और इतिहास के गंभीर अध्ययन पर ही टिका हुआ है। आपकी क्या राय है इस फिल्म के ऊपर? क्या यह फिल्म को बिना रोक-टोक जनता तक पहुंचाना चाहिए या फिर संवेदनशील ऐतिहासिक विषयों पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए? आपकी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। आप देख रहे हैं जस संपन्न भारत। मैं आपके साथ कृष्णा तिवारी। धन्यवाद। जय हिंद।

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