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श्री जगन्नाथ मंदिर का ध्वज उल्टा क्यों लहराता है,असली वजह ?

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श्री जगन्नाथ के ऊपर स्थित लाल ध्वज हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। ऐसा क्यों होता है? यह तो आप सभी भक्तों के मन में सवाल जरूर उठता होगा। इसके पीछे का कारण तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं। लेकिन आज हम आपको इससे जुड़ी कथा के बारे में बताएंगे। ध्वज के विपरीत दिशा में लहराने की कथा या कारण हनुमान जी से जुड़ी है। दरअसल हनुमान जी क्षेत्र की दशों दिशाओं से रक्षा करते हैं। यहां के कण-कण में हनुमान जी का [संगीत] निवास है। हनुमान जी ने यहां कई तरह के चमत्कार बताए हैं।

उन्हीं में से एक है समुद्र के पास स्थित मंदिर के भीतर समुद्र की आवाज को रोक देना। इस आवाज को रोकने के चक्कर में ध्वज की दिशा भी बदल गई थी। दरअसल एक बार नारद जी भगवान जगन्नाथ के दर्शन के [संगीत] लिए पहुंचे तो उनका सामना हनुमान जी से हुआ। हनुमान जी ने कहा कि इस वक्त तो प्रभु विश्राम कर रहे हैं। आपको इंतजार करना होगा। [संगीत] नारद जी द्वार के बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे। कुछ वक्त [संगीत] बीते तो उन्होंने मंदिर के द्वार के भीतर झांका।

तो प्रभु जगन्नाथ श्री लक्ष्मी के साथ उदास बैठे थे। उन्होंने प्रभु से इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि यह समुद्र की आवाज मुझे सोने नहीं [संगीत] दे रही। नारद जी ने यह बात बाहर आकर हनुमान जी को बताई। हनुमान जी ने क्रोधित होकर समुद्र से कहा कि तुम यहां से दूर हटकर अपनी आवाज रोक लो [संगीत] क्योंकि मेरे स्वामी तुम्हारे शोर के कारण विश्राम नहीं कर पा रहे। यह सुनकर समुद्र देव ने प्रकट होकर कहा कि हे महावीर हनुमान यह आवाज रोकना मेरे बस की नहीं है। जहां तक पवन वेग चलेगा यह आवाज वहां तक जाएगी। आपको इसके लिए अपने पिता पवन देव से विनती करनी होगी। तब हनुमान जी ने अपने पिता पवन देव का आवाहन किया और उनसे कहा कि आप मंदिर की दिशा में [संगीत] ना बहें। इस पर पवन देव ने कहा कि पुत्र यह संभव नहीं है।

परंतु तुम्हें एक उपाय बताता हूं। तुम्हें मंदिर के आसपास [संगीत] ध्वनि रहित वायु कोशीय वृत्त या विवर्तन बनाना होगा। हनुमान जी समझ गए। तब हनुमान जी ने अपनी शक्ति से खुद को दो भागों में विभाजित किया और फिर वो वायु से भी तेज [संगीत] गति से मंदिर के आसपास चक्कर लगाने लगे। इससे वायु का ऐसा चक्र बना कि समुद्र की ध्वनि मंदिर के भीतर ना जाकर मंदिर के आसपास ही घूमती रही और मंदिर में श्री जगन्नाथ जी आराम से सोते [संगीत] रहे। यही कारण है कि तभी से मंदिर के सिंह द्वार में पहला

कदम प्रवेश पर ही आप सागर द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते। लेकिन इसे शाम को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। इसी तरह मंदिर के बाहर स्वर्ग द्वार है जहां पर मोक्ष प्राप्ति के लिए शव जलाए जाते हैं। लेकिन जब आप मंदिर से बाहर निकलेंगे तभी आपको लाशों के जलने की गंध महसूस होगी। यह कहानी आपको कैसी लगी हमें नीचे कमेंट सेक्शन पर लिखकर बताना ना भूलिएगा। टिल देन वीडियो को लाइक और शेयर करें। साथ ही चैनल को भी जरूर सब्सक्राइब कर लें।

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