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प्रकाश का त्याग, हेमा की मर्यादा! क्या धर्मेंद्र ने उजाड़े दो परिवार?

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मट्टी का बेटा हूं। मरतेमरते भी कुछ कर जाऊंगा। क्या एक औरत के लिए यह स्वीकार करना आसान होता है कि उसका पति हर रात उसके पास होने के बावजूद किसी और घर में सोने जाए? आखिर क्या मजबूरी थी कि बॉलीवुड की ड्रीम गर्ल जिसके एक इशारे पर पूरी दुनिया कदम तोलती थी, उसने अपनी पूरी जिंदगी एक हाफ मैरिज यानी आधी शादी के सहारे गुजार दी। क्यों धर्मेंद्र जो अपनी मर्दानगी और उसूलों के लिए जाने जाते थे। शादी करने के बाद भी हेमा मालिनी के साथ एक छत के नीचे कभी नहीं रह पाए। और सबसे बड़ा सवाल जूहू की उन गलियों में दो बंगले थे। दूरी सिर्फ 5 मिनट की थी। लेकिन उन दो घरों के बीच ऐसा कौन सा अदृश्य पहाड़ था जिसे पार करने में धर्मेंद्र को पूरी जिंदगी लग गई। आज हम बॉलीवुड के पन्नों में दबी उस फाइल को खोलेंगे जिस पर धूल तो बहुत जमी है लेकिन उसके नीचे छिपे जज्बात आज भी उतने ही ताजा हैं। यह कहानी सिर्फ प्यार की नहीं यह कहानी है बंटवारे की। दिल के बंटवारे की, वक्त के बंटवारे की और एक ऐसे रिश्ते की जिसे दुनिया ने नाम तो बहुत दिए, पर समझ कोई नहीं पाया। अगर हम 70 और 80 के दशक की बात करें तो फिजाओं में एक अलग ही नशा था। उस दौर में रोमांस का मतलब सिर्फ धर्मेंद्र और हेमा मालिनी हुआ करता था। स्क्रीन पर जब यह दोनों आते थे तो लगता था कि कायनात ने इन्हें एक दूसरे के लिए ही बनाया है। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं थी।

धर्मेंद्र पंजाब के सहनेवाल गांव का वो सीधा-साधा लड़का जो आंखों में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई आया था। उसके पीछे एक बहुत बड़ी सच्चाई छूट गई थी। वह सच्चाई थी प्रकाश कौर। धर्मेंद्र की पहली पत्नी। एक ऐसी महिला जिन्होंने उस वक्त धर्मेंद्र का हाथ थामा था जब उनके पास ना तो शहरत थी, ना पैसा और ना ही यह जगमगाती दुनिया। प्रकाश कौर उस नींव की पत्थर की तरह थी जिस पर धर्मेंद्र की सफलता की इमारत खड़ी हुई थी। वह घर संभाल रही थी, बच्चे पाल रही थी और धर्मेंद्र मुंबई की चकाचौंध में अपनी जगह बना रहे थे। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। धर्मेंद्र के जीवन में हेमा मालिनी की एंट्री महज एक कोस्टार के तौर पर नहीं बल्कि एक तूफान की तरह हुई। हेमा मालिनी दक्षिण भारत की वो खूबसूरत कली जिसे ड्रीम गर्ल कहा जाता था। उनके लिए दीवानों की कमी नहीं थी। संजीव कुमार जैसा संजीदा कलाकार हो या जितेंद्र जैसा सुपरस्टार हर कोई हेमा से शादी करने के लिए कतार में खड़ा था। किस्से तो यहां तक मशहूर हैं कि जितेंद्र और हेमा की शादी के लिए चेन्नई में मंडप तक सज गया था। लेकिन ऐन वक्त पर धर्मेंद्र का वहां पहुंचना किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। कहा जाता है कि धर्मेंद्र ने उस दिन वह किया जो सिर्फ एक पागल प्रेमी ही कर सकता है। उन्होंने उस शादी को रुकवाया और दुनिया की परवाह किए बिना हेमा का हाथ थाम लिया। 1980 में जब उन्होंने शादी की तो यह सिर्फ दो दिलों का मिलन नहीं था बल्कि सामाजिक मान्यताओं के खिलाफ एक बहुत बड़ा विद्रोह था। लेकिन असली कहानी शादी के बाद शुरू होती है। शादी तो हो गई लेकिन सवाल यह था कि अब क्या? धर्मेंद्र पहले से शादीशुदा थे। चार बच्चों के पिता थे। समाज परिवार और खुद उनके अपने बच्चे सनी और बॉबी इस नए रिश्ते से बेहद नाराज थे। ऐसे में धर्मेंद्र के सामने एक तरफ अपना पुराना परिवार था जिसे वह छोड़ना नहीं चाहते थे और दूसरी तरफ हेमा थी जिन्हें वह खोना नहीं चाहते थे। यहीं से शुरू हुआ वह दौर जो किसी भी आम इंसान को मानसिक रूप से तोड़ कर रख देता। धर्मेंद्र ने एक ऐसा रास्ता चुना जो सुनने में अजीब लगता है लेकिन शायद वही एकमात्र विकल्प था। उन्होंने दो नामों पर सवारी करने का फैसला किया। यह फैसला था दो अलग-अलग घर लेकिन एक ही पति हेमा मालिनी जो चाहती तो धर्मेंद्र को मजबूर कर सकती थी कि वह अपनी पहली पत्नी को छोड़ दें या फिर अपने स्टारडम का रूप दिखाकर हक मांग सकती थी। उन्होंने एक अलग ही रास्ता चुना।

उन्होंने खामोशी और त्याग का रास्ता अपनाया। सोचिए कैसा लगता होगा उस नई नवेली दुल्हन को जिसका पति दिन भर उसके साथ रहे, शाम को उसके साथ वक्त बिताए लेकिन जैसे ही रात गहराने लगे, वह अपनी गाड़ी मोड़कर दूसरे घर चला जाए। यह कोई एक दिन की बात नहीं थी। यह सालों साल चला। जूहू में हेमा मालिनी का बंगला और वहां से बमुश्किल कुछ मिनटों की दूरी पर धर्मेंद्र का पुश्तैनी घर जहां प्रकाश कौर और उनके बेटे रहते थे। धर्मेंद्र एक पेंडुलम की तरह इन दो घरों के बीच झूलते रहे। हेमा मालिनी ने एक पुराने इंटरव्यू में बहुत ही सादगी से इस दर्द को बयां किया था। उन्होंने कहा था मैं किसी को डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी। धर्मेंद्र जी के ऊपर पहले से जिम्मेदारियां थी। उनका एक परिवार था और मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से उस घर में कोई क्लेश हो या किसी की खुशियां छीन जाए। यह शब्द कहने में बहुत आसान लगते हैं। लेकिन इसे जीने के लिए जिगर चाहिए। आज के दौर में जहां रिश्तों में जरा सी खटास आने पर लोग अलग हो जाते हैं। हेमा ने अपनी शर्तों पर एक ऐसा रिश्ता निभाया जिसमें इंतजार के सिवा कुछ नहीं था। जैसे-जैसे वक्त बीता, हेमा और धर्मेंद्र की दो बेटियां हुई, ईशा और अहाना। अब सवाल और तीखे हो गए। क्या धर्मेंद्र अपनी बेटियों को वह वक्त दे पाएंगे जो एक पिता को देना चाहिए? क्या वह स्कूल के फंक्शन में आएंगे? क्या वह रात को लोरी सुनाने मौजूद होंगे? धर्मेंद्र ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। वह एक विजिटिंग फादर तो बने लेकिन कभी भी फुल टाइम फादर नहीं बन पाए। ईशा देओल ने कई बार बताया है कि बचपन में उन्हें अपने पापा की कमी खलती थी, लेकिन साथ ही वह यह भी मानती हैं कि जब भी उन्हें पापा की सबसे ज्यादा जरूरत होती थी, वह किसी सुपर हीरो की तरह हाजिर हो जाते थे। धर्मेंद्र अक्सर रात के अंधेरे में जब दुनिया सो रही होती थी, अपनी बेटियों से मिलने आते थे। वह चुपचाप आते, बेटियों को प्यार करते और फिर अपनी जिम्मेदारियों के दूसरे मोर्चे पर यानी अपने पहले घर लौट जाते। यह उनकी जिंदगी का एक ऐसा रूटीन बन गया था

जिसने उन्हें अंदर ही अंदर थका दिया था। हम अक्सर हेमा मालिनी के नजरिए से या धर्मेंद्र की मजबूरी की बात करते हैं। लेकिन इस कहानी का तीसरा और सबसे अहम पहलू प्रकाश कौर है। उस महिला की सहनशक्ति की मिसाल देना मुश्किल है। एक पत्नी के तौर पर यह जानना कि आपका पति किसी और महिला से शादी कर चुका है और उसके साथ वक्त बिताता है किसी कयामत से कम नहीं होता। लेकिन प्रकाश कौर ने कभी मीडिया में आकर तमाशा नहीं किया। उन्होंने कभी हेमा के खिलाफ जहर नहीं उगला। उन्होंने अपनी चुप्पी को ही अपनी ढाल बना लिया। उन्होंने अपने बेटों, सनी और बॉबी को संभाला जो उस वक्त बगावत पर उतर आए थे। कहा जाता है कि सनी देओल अपने पिता के इस फैसले से इतने नाराज थे कि घर का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया था। लेकिन प्रकाश कौर ने उस घर को बिखरने नहीं दिया। उन्होंने धर्मेंद्र को उनके परिवार से जोड़े रखा। ये उनकी महानता थी कि धर्मेंद्र को कभी अपने पहले परिवार से कटने का एहसास नहीं हुआ। फिर वक्त ने एक और करवट ली। जैसे-जैसे उम्र ढलती गई, धर्मेंद्र का मन मुंबई की भीड़भाड़ और इन दो घरों की कशमकश से उचाट होने लगा। बॉबी देओल ने एक बार बातों ही बातों में बताया था कि अब पापा मुंबई में कम और अपने लोनावला या पनवेल वाले फार्म हाउस पर ज्यादा रहते हैं। यह एक बहुत बड़ा इशारा था। इसका मतलब था कि धर्मेंद्र अब ना तो पूरी तरह जूहू वाले पहले घर में थे और ना ही हेमा के घर में। वह प्रकृति की गोद में अपनी भैंसों, खेतों और पुराने गीतों के बीच सुकून तलाशने लगे थे। शायद यह उनका तरीका था। का उस अपराध बोध गिल्ट से बचने का जो दो परिवारों के बीच बंटने से पैदा हुआ था। पनवेल का फार्म हाउस उनका एस्केप बन गया था। वहां वह घंटों अकेले बैठते, अपनी शायरी लिखते और शायद अपनी जिंदगी के उन फैसलों का हिसाब लगाते जो उन्होंने जवानी के जोश में लिए थे। हेमा मालिनी ने भी अपनी दुनिया अलग बसा ली। उन्होंने खुद को भरनाट्यम, राजनीति और अपनी बेटियों के भविष्य में इतना व्यस्त कर लिया कि उन्हें अकेलेपन का एहसास ही ना हो। लोग कहते हैं

कि हेमा अकेली रह गई लेकिन हेमा कहती हैं कि वह अपने आप में पूरी हैं। उन्होंने धर्मेंद्र से कभी शिकायत नहीं की कि आप रात को क्यों चले जाते हैं या आप हमारे साथ क्यों नहीं रहते? उन्होंने उस प्यार को जैसा था वैसा ही स्वीकार किया। इसे आप मजबूरी कह सकते हैं या फिर प्यार की इंतहा लेकिन यह सच है कि हेमा ने कभी भी धर्मेंद्र को चुने जाने के लिए मजबूर नहीं किया। उन्होंने धर्मेंद्र को आजाद छोड़ दिया। एक इंटरव्यू में धर्मेंद्र ने भावुक होकर कहा था, मैंने हेमा को वह खुशी नहीं दी जिसकी वह हकदार थी, लेकिन मैंने उसे कभी अकेला नहीं छोड़ा। यह एक लाइन उस पूरे रिश्ते का सार है। साथ ना रहकर भी साथ निभाना यही इस प्रेम कहानी की सबसे बड़ी पहेली है। दुनिया की नजरों में हेमा मालिनी दूसरी औरत थी। एक होम ब्रेकर थीं। उन पर उंगलियां उठी, ताने मारे गए। लेकिन अगर आप गौर से देखें तो हेमा ने कभी किसी का घर नहीं तोड़ा। उन्होंने तो बस अपनी एक अलग दुनिया बनाई जिसमें धर्मेंद्र एक मेहमान की तरह आते थे और अपनी मर्जी से चले जाते थे। उन्होंने प्रकाश कौर के घर में कभी दखल नहीं दिया। उन्होंने कभी यह नहीं चाहा कि सनी और बॉबी उन्हें मां कहें या अपनाएं। उन्होंने अपनी मर्यादा की लकीर खुद खींची और कभी उसे पार नहीं किया। लेकिन क्या यह सब इतना आसान था? बिल्कुल नहीं। उन रातों के बारे में सोचिए जब हेमा बीमार रही होंगी और उन्हें पानी देने वाला कोई नहीं होगा। क्योंकि धर्मेंद्र अपने असली घर में थे। उन त्यौहारों के बारे में सोचिए जब बाकी दुनिया अपने पूरे परिवार के साथ फोटो खिंचवा रही होती थी और हेमा को सिर्फ अपनी बेटियों के साथ संतोष करना पड़ता था और उधर प्रकाश कौर के दिल पर क्या बीतती होगी जब टीवी पर उनके पति को ड्रीम गर्ल के साथ रोमांस करते या अवार्ड लेते दिखाया जाता था। यह दर्द दोनों तरफ था। धर्मेंद्र उस पुल की तरह थे जिस पर दोनों तरफ से भारी ट्रैफिक था और वह पुल धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा था। फिर भी यह रिश्ता टूटा नहीं। यह बिखरा नहीं।

आज के दौर में जब हम लिव इन और ओपन मैरिज जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। धर्मेंद्र और हेमा की कहानी हमें रिश्तों की जटिलता का एक अलग ही पाठ पढ़ाती है। यह सिखाती है कि प्यार का मतलब हमेशा हसिल करना नहीं होता। कभी-कभी प्यार का मतलब होता है समझौता। एक ऐसा समझौता जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी कुछ खुशियों की कुर्बानी देते हैं ताकि रिश्ता जिंदा रहे। धर्मेंद्र ने अपनी सुकून की कुर्बानी दी। हेमा ने अपने सामाजिक हक की कुर्बानी दी और प्रकाश कौर ने अपने स्वाभिमान के एक हिस्से की कुर्बानी दी। अंत में यह सवाल आज भी हमारे जहन में गूंजता है। क्या धर्मेंद्र का फैसला सही था? क्या दो परिवारों को इस तरह अधर में लटकाए रखना न्याय था? शायद नैतिक तौर पर हम इसे गलत कह सकते हैं। शायद समाज के नियमों के हिसाब से यह पाप था। लेकिन जब आप हेमा मालिनी की आंखों में देखते हैं तो वहां शिकायत नहीं बल्कि एक सुकून दिखता है। यह कहानी हमें बताती है कि जिंदगी ब्लैक एंड वाइट नहीं होती। यह ग्रे होती है। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें कोई नाम नहीं दिया जा सकता। उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है। धर्मेंद्र और हेमा की यह दास्तान बॉलीवुड की सबसे बड़ी लव स्टोरी है या सबसे बड़ा समझौता इसका फैसला तो देखने वालों को करना है। लेकिन एक बात तय है ऐसी कहानी ना पहले कभी लिखी गई थी और ना शायद भविष्य में कभी दोहराई जाएगी। एक शहर, दो घर और बीच में खड़ा एक इंसान जो ताउम्र अपने दिल के दो टुकड़ों को जोड़ने की कोशिश करता रहा। क्या यही संघर्ष इस कहानी को इतना महान और इतना दर्दनाक बनाता है? नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं। और दोस्तों अगर आपको बॉलीवुड के इन अनकही कहानियों और गहरे राजों को जानना पसंद है, तो अभी इस वीडियो को लाइक करें और हमारे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन दबाना ना भूलें। बोले

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