और अब भारतीय लोक कला जगत से एक बेहद दुखद खबर आई है। पंडवानी की महान गायिका पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन हो गया है। वो 70 वर्ष की थी। लंबे समय से उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी। तीजन बाई की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें तुरंत ही रायपुर के एम्स में भर्ती करवाया गया था।
जहां उन्होंने आखिरी सांस ली है। तो छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियानी गांव में जन्मी थी तीजन बाई। आपको बता दें कि पंडवानी लोक गायन को देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया तक नई पहचान पहचान उन्होंने दिलवाई थी। कपालिक शैली में प्रस्तुति उन्होंने दी जिसे कभी पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। दमदार आवाज जीवंत अभिनय और साथ ही प्रभावशाली मंच प्रस्तुति से उन्होंने इस लोक कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया था।
पांच दशक से ज्यादा लंबे अपने सफर में तीजन बाई ने एशिया यूरोप समेत दुनिया भर में कई देशों में पंडवानी का परचम लहराया। भारतीय लोक कला में उनके अतुल्य योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। संजय बताया जा रहा है कि काफी लंबे समय से उनकी तबीयत नासाज थी।
यह बिल्कुल 70 साल की उम्र और पूरी जिंदगी उन्होंने जिस जीवता के साथ पंडवाणी का प्रचार किया और अपनी कला को जीवित रखा। तमाम चुनौतियों के बावजूद तो ये अपने आप में एक बहुत बड़ा मतलब कई जीवन का जीवन उन्होंने अपने एक जीवन में जिया जिसमें लोगों के साथ संघर्ष संगीत के लेकर उनका समर्पण ये तमाम चीजें थी।
सीजन भाई के बारे में यह सत्य है कि वो अनपढ़ थी लेकिन उन्होंने अपनी जिंदगी ऐसे जी चारचार डिलीट यानी डॉक्टरेट की उपाधियां उनको मिली और इसके साथ ही पूरी दुनिया में जो सम्मान मिला वो उनकी जीवता उनकी एक निष्ठा और संगीत और अपनी कला के प्रति समर्पण को लेकर था क्योंकि उन्होंने तीन-तीन विवाह किए लेकिन तीनों विवाह सफल नहीं हो सके।
समाज ने उनको बहिष्कृत किया। गांव के बाहर झोपड़ी बनाकर रही लेकिन तमाम चीजें छोड़ दी लेकिन नहीं छोड़ा तो एक पंडवाणी का जुनून जो उन्हें यहां तक लेकर पहुंचा और अब ऐसा लग रहा है कि जैसे देव सभा में वो पंडवाणी की प्रस्तुति के लिए प्रस्थान कर गई है और अब देव वृंद वहां उनकी पंडवाणी का आनंद लेंगे तो जो अमर गाथा उन्होंने महाभारत लोक महाभारत की अमर गाथा गाई है वो अमर गाथा हमेशा हमेशा के लिए लोगों के दिलों में रह गई है जब अनपढ़ थी और उन्हें भिलाई स्टील कंपनी में उनको नौकरी मिली भिलाई के स्टील कारखाने में तो अपने वेतन लेने के लिए उन्हें दस्तखत करने पड़ते थे।
उन्होंने अपने हाथ पर टीजन के नाम का टैटू गुदवा लिया था और उसी को देखकर उसी की नकल से वो हमेशा अपने दस्तखत करती थी यानी सैलरी ड्रा करती थी। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने देश दुनिया पूरी दुनिया में पंडवाणी को एक अलग पहचान दी और वेदमती शैली की महिलाओं को वेदमती शैली में पंडवाणी गाने गाने का अधिकार था लेकिन उन्होंने सिर्फ पुरुष कापालिक शैली में मंच पर खड़े होकर प्रदर्शन करते हैं। महिलाएं बैठकर मंच के किनारे सिर्फ गाती थी। तीजन बाई पहली ऐसी महिला हुई जिन्होंने मंच पर कापालिक शैली में और वेदमती से लेकर कापालिक शैली में इसका ना केवल सफल गायन किया बल्कि लोगों को यह बताया और सबसे बड़ी चीज मैं बताऊंगा कि महिला होने के नाते महिलाओं के प्रसंग द्रोपदी चीर हरण उनका प्रिय प्रसंग था और इसके साथ ही द्रोपदी के चीर हरण का बदला लेने वाले अर्जुन भीम कीचक वध ये सारे उनके प्रिय प्रसंग थे .
यानी महिलाओं की जो सशक्तता है उसको लेकर जीवन भर उनकी पंडवाणी लोगों को बताती रही कि महिलाओं को सशक्त होना कितना जरूरी है और महिलाओं की गरिमा महिमा और उनकी इज्जत की रक्षा करने के लिए लोग इस तरह से अमर होते हैं।
संजय जिस तरह से जुझारू और जितना संघर्षों से भरा जीवन आपने बताया सोचिए पांच दशक से ज्यादा लंबे समय तक उन्होंने एशिया से ले यूरोप तक दुनिया के कई देशों में पंडवानी का परचम लहराया है और कितने सारे पुरस्कारों से अतुल्य योगदान के लिए उन्हें नवाजा गया। पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से उन्हें नवाजा गया। उनके बारे में हमें थोड़ी और जानकारी दीजिए। हमारे दर्शकों को बताइए। हालांकि जिस तरह के बारे में जिन जिस तरह की तमाम वीडियोस अभी बहुत वायरल हो रहे हैं उनके बारे में वो कई बार रूरल एरिया में गांव के एरिया में बहुत प्रचलन में है। जी हां बिल्कुल पंडवानी एक तो गांव के एरिया में प्रचलन में गांव से लेकर उसे शहर ही नहीं शहरों से दूर विदेशों तक पूरी दुनिया में उसको लेकर गई और बृजलाल जी के परिवार में उनका जन्म हुआ।
उनकी बिटिया थी और क्योंकि वहां पर उस उस समाज में महिलाओं का पंडवानी गाना स्टेज पर परफॉर्म करना बिल्कुल मना था और 13 साल की उम्र में जब अपने नाना को पंडवाणी गाते हुए देखा उनके नाना बड़े मशहूर कलाकार थे उस इलाके के और जब उन्होंने छुप छुप कर वो उन्हें रियाज करते हुए देखती थी और ऐसा उनका लगन ऐसी उनकी लगन थी कि उनको बहुत सारे प्रसंग तो नाना को देखते हुए याद हो गए.
एक एक दिन उनके पिता ने उनको देख लिया बृजलाल जी ने की तीजन पंडवाणी गा रही है तो वो बहुत खुश हुए और उन्होंने समाज के का की परवाह किए बगैर उनको पंडवाणी की शिक्षा दी और साथ ही उनको देशमुख जी ने भी शिक्षा दी निष् किया और उसके बाद जो हुआ वो पूरी दुनिया उसकी साक्षी है।
तो भारतीय लोक कला जगत से एक बेहद ही दुखद खबर। पंडवानी की महान गायिका पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का निधन हो गया है। 70 साल की थी और जानकारी यह है कि काफी लंबे समय से वह बीमार थी। तबीयत खराब होने के बाद उन्हें रायपुर के एम्स अस्पताल में भर्ती करवाया गया था।