1962 के चीनी हमले में चीनी सेना संख्या में भारतीय सेना से न सिर्फ़ दोगुनी थी बल्कि उनके पास बेहतर हथियार थे और वो लड़ाई के लिए पूरी तरह से तैयार थे.उनके पास रसद की भी कोई कमी नहीं थी. सबसे बढ़कर उनका नेतृत्व अनुभवी था और उनको 10 साल पहले कोरिया में लड़ने का अच्छा अनुभव मिल चुका था.भारत को पहला झटका वालौंग में लगा.
इसके बाद से ला पास भी भारत के हाथ से जाता रहा. इस पूरे इलाक़े में भारत के दस से बारह हज़ार सैनिक चीन के 18 से 20 हज़ार सैनिकों का सामना कर रहे थे.उनके पास प्रथम विश्व युद्ध के ज़माने की ली इनफ़ील्ड रायफ़लें थीं. अमरीका से भेजी गईं
ऑटोमेटिक राइफ़लें उनके पास पहुंच तो गईं थीं लेकिन अभी तक उन्हें पैकिंग क्रेट्स से भी नहीं निकाला गया था.दूसरी बात सैनिकों को अभी उन्हें चलाने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था. से ला के बाद चीनी बोमडिला शहर की तरफ़ बढ़ आए थे. कुल मिला कर भारत का 32000 वर्ग मील इलाका चीन के नियंत्रण में आ गया था.नेविल मेक्सवेल अपनी किताब ‘इंडियाज़ चाइना वार’ में लिखते हैं, ‘हालात इतने बिगड़ गए थे
कि भारतीय कमांडर बिजी कौल ने नेहरू से कहा कि कुछ विदेशी सेनाओं को भारत की मदद के लिए आमंत्रित करना चाहिए ताकि चीन पर जवाबी कार्रवाई की जा सके.’उस समय भारत में अमरीकी राजदूत जे के गालब्रेथ ने अपनी आत्मकथा ‘अ लाइफ़ इन अवर टाइम्स’ में लिखा है, ”हर स्तर पर भारतीय सदमे की हालत में थे. पूरे भारत में इंडियन एयरलाइंस की उड़ानें रद्द कर दी गई थीं
ताकि उन विमानों का सैन्य इस्तेमाल किया जा सके. न सिर्फ़ असम बल्कि बंगाल और यहाँ तक कि कलकत्ता पर ख़तरे के बादल मंडरा रहे थे.”नेहरू ने लिखे केनेडी को दो पत्रइस ख़तरे के बीच 19 नवंबर को नेहरू ने अमरीका के राष्ट्रपति कैनेडी को दो पत्र लिखे. इन पत्रों को वॉशिंगटन में भारतीय दूतावास से व्हाइट हाउस तक पहुंचाया गया. इन पत्रों को, ख़ास कर दूसरे पत्र को उस समय तक सार्वजनिक नहीं किया गया था.
बाद में गालब्रेथ ने अपनी डायरी में लिखा, ”एक नहीं हमारे पास मदद के दो अनुरोध आए थे. दूसरे अनुरोध को बहुत गुप्त रखा गया था. ये पत्र सिर्फ़ राष्ट्रपति के पढ़ने के लिए था. ( फ़ॉर हिंज़ आईज़ ओनली) उसके बाद उसे नष्ट कर दिया जाना था.”इसके बाद कई भारतीय सरकारों ने इस तरह के किसी भी पत्र के अस्तित्व से इनकार किया.लेकिन मशहूर पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने इंडियन एक्सप्रेस के 15 नवंबर, 2010 में लिखे अपने लेख ‘जेएन टू जेएफ़के, आइज़ ओनली’ में लिखा, ”नेहरू के उत्तराधिकारी लाल बहादुर शास्त्री ने बताया कि उन्होंने प्रधानमंत्री सचिवालय और विदेश मंत्रालय में मौजूद सारे रिकार्डों की जाँच करवाई है, लेकिन उन्हें इन पत्रों के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं मिला.”लेकिन अमरीकी विदेश मंत्रालय के अभिलेखागार ने इन पत्रों के अस्तित्व को तो स्वीकार किया लेकिन इनमें लिखा क्या था, इसको गुप्त रखा.लेकिन वर्ष 2010 में जॉन एफ़ केनेडी प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी एंड म्यूज़ियम ने इन पत्रों को सार्वजनिक कर दिया.
मंत्रियों तक को नहीं थी इस पत्र की हवाइस पत्र में नेहरू ने लिखा, ”चीनियों ने नेफ़ा के बहुत बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है और वो कश्मीर में लद्दाख़ में चुशाल पर भी कब्ज़ा करने वाले हैं.”इसके बाद नेहरू ने लिखा, ”भारत को चीन के हमले से निपटने के लिए यातायात और युद्धक विमानों की ज़रूरत है.” नेहरू ने इस पत्र का अंत ये कहते हुए किया कि ”वो इसी तरह का पत्र ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हारोल्ड मैकमिलन को भी भेज रहे हैं.”अभी व्हाइट हाउस को ये पत्र मिला ही था कि गालब्रेथ ने एक टॉप सीक्रेट टेलिग्राम अमरीकी राष्ट्रपति, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री को भेजा.इसमें लिखा था, ”मुझे गुप्त रूप से पता चला है कि नेहरू आपको एक और पत्र भेजने वाले हैं. इसके बारे में उनके मंत्रियों तक को नहीं बताया गया है.”अमरीका में भारत के राजदूत बी के नेहरू ने 19 नवंबर को ख़ुद अपने हाथों से वो पत्र राष्ट्रपति कैनेडी तक पहुंचाया.
12 स्कवार्डन विमानों की माँगइस पत्र में नेहरू ने लिखा, ”आपको पहला संदेश भेजने के कुछ घंटों के अंदर नेफ़ा में हालात और बिगड़ गए हैं. पूरी ब्रह्मपुत्र घाटी पर गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है. अगर तुरंत कुछ नहीं किया गया तो पूरा असम. त्रिपुरा, मणिपुर और नागालैंड चीन के हाथ पड़ जाएगा.”इसके बाद नेहरू ने स्पष्ट माँग करते हुए लिखा, ”हमें कम से कम युद्धक विमानों के 12 स्कवॉर्डन चाहिए. शुरू में जब तक हमारे पायलट इन्हें चलाने का प्रशिक्षण नहीं ले लेते, अमरीकी पायलटों को इन्हें चलाना होगा. अमरीकी पायलटों का इस्तेमाल भारतीय शहरों और ठिकानों की सुरक्षा के लिए किया जाएगा. लेकिन तिब्बत के अंदर हवाई हमले भारतीय वायुसेना अकेले करेगी. इसके लिए हमें बी- 47 बमवर्षकों की दो स्कवॉर्डन्स की भी ज़रूरत होगी.”नेहरू ने कैनेडी को आश्वस्त किया कि इन हथियारों को इस्तेमाल सिर्फ़ चीन के ख़िलाफ़ होगा और इन्हें पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कभी इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. ( जॉन एफ़ केनेडी प्रेसेडेंसियल लाइब्रेरी एंड म्यूज़ियम, नेहरू कॉरेसपोंडेंस, नवंबर 11 – 19 1962)