हेलो दोस्तों, मैं हूं एक डाकिया। एक पाकिस्तान का जासूस हमारे हिंदुस्तान में घुस चुका था। उनका मकसद था हमारे प्यारे हिंदुस्तान को और हमारे जवान फौजों को नुकसान पहुंचाना। लेकिन मैंने कैसे सबकी जान बचाई। सब जानेंगे आज के इस वीडियो में। इसलिए वीडियो को एंड तक देखना और चैनल को सब्सक्राइब जरूर करना। राजस्थान बाड़मेर सुबह 7:22 पाकिस्तान बॉर्डर से सिर्फ 15 कि.मी. दूर इस छोटे से कस्बे की सड़क पर एक आदमी अपनी पुरानी साइकिल धीरे-धीरे चला रहा है। पीली वर्दी, कंधे पर भारी थैला और चेहरे पर ऐसी बेचैनी जो आम दिनों में कभी नहीं दिखती थी। उस आदमी का नाम था मांगीलाल। पिछले 22 सालों से वह उसी इलाके में डाक बांट रहा था। हर घर उसे जानता था और वह हर घर को किसके बेटे की नौकरी लगी, किसकी बेटी की शादी हुई, किस घर में दुख आया, किस घर में खुशी मांगीलाल सब जानता था लेकिन आज उसके थैले में एक ऐसा लिफाफा था जिसने उसकी पूरी रात की नींद छीन ली थी।
वो लिफाफा [संगीत] उसने तीन बार खोला नहीं लेकिन तीन बार महसूस जरूर किया था। बार-बार उसे थैले में रखता फिर निकालता फिर हाथ से दबाकर देखता क्योंकि उस लिफाफे में कुछ अजीब था। कुछ ऐसा जो उसके 22 साल के अनुभव से मेल नहीं खा रहा था और सबसे बड़ी बात वो लिफाफा उसके दोस्त के नाम था। लेकिन असली खेल अब शुरू होता है क्योंकि अगर उस सुबह मांगीलाल ने वो लिफाफा सही पते तक पहुंचा दिया होता तो शायद भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर कुछ ऐसा होता जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। एक साधारण डाकिया अनजाने में एक ऐसी जासूसी साजिश के बीच खड़ा था, जो भारतीय सेना की गतिविधियों को पाकिस्तान तक पहुंचा रही थी। साल 2016 बाड़मेर सेक्टर राजस्थान राजस्थान का बाड़मेर इलाका हमेशा से संवेदनशील माना जाता रहा है। थार का लंबा रेगिस्तान दूर-दूर तक फैली खाली जमीन और ऐसी बॉर्डर जहां कई जगह सिर्फ कांटेदार तार ही भारत और पाकिस्तान को अलग करती है। दिन में सब कुछ शांत दिखता है। लेकिन रात होते ही यही इलाका इंटेलिजेंस एजेंसियों के लिए सबसे मुश्किल जगह बन जाता है।
यहां तस्करी नई बात नहीं थी। कभी हथियार, कभी नकली नोट, कभी ड्रग्स और कभी-कभी इंसान भी। बॉर्डर के दोनों तरफ ऐसे नेटवर्क मौजूद थे जो छोटी-छोटी जानकारियों के बदले मोटी रकम लेते थे। कौन सी सेना की गाड़ी कब निकली, कौन सा रास्ता खाली है, कहां पेट्रोलिंग कम होती है? ऐसी हर जानकारी की कीमत होती थी और इन्हीं सबके बीच मांगीलाल अपनी साइकिल चलाता रहता था। उसकी जिंदगी बहुत साधारण थी। छोटा सा सरकारी क्वार्टर, पत्नी, दो बेटे और हर महीने की सीमित तनख्वाह। लेकिन एक चीज उसे बाकी लोगों से अलग बनाती थी। वो सिर्फ चिट्ठियां नहीं बांटता था। वो लोगों की जिंदगी पढ़ता था। कौन कब बदल रहा है? कौन नया आया है? कौन अचानक ज्यादा मिलनसार हो गया। उसकी नजर हर चीज पर रहती [संगीत] थी। यही वजह थी कि जब कस्बे में एक नया आदमी आया, तो सबसे पहले मागी लालाल ने ही उसे नोटिस किया। उस आदमी का नाम था शौकत भाई। बाड़मेर का छोटा बाजार। 6 महीने पहले शौकत भाई ने बाजार के कोने पर एक छोटी सी दुकान खोली थी। बाहर बोर्ड लगा था। मोबाइल रिचार्ज और एसटीडी कॉल्स। दुकान साधारण थी। लेकिन उसका मालिक असाधारण तरीके से लोगों से घुलता मिलता था। हमेशा मुस्कुराना, हर आने वाले को चाय ऑफर करना और हर किसी से मीठी बातें करना। धीरे-धीरे पूरे कस्बे में लोग उसे जानने लगे। मांगीलाल भी कभी-कभी वहां रुक जाता था। गर्मी में ठंडा पानी पी लेता। 2 मिनट आराम कर लेता और फिर अपनी साइकिल लेकर निकल पड़ता। शौकत भाई अक्सर उससे कहते डाकिए भाई आपसे बड़ा भरोसेमंद आदमी कोई नहीं होता। आप तो हर घर का हिस्सा हो। उस वक्त मांगीलाल को यह बातें सामान्य लगती थी।
लेकिन असलियत कुछ और थी। शौकत भाई दुकान नहीं चला रहा था। वो नेटवर्क बना रहा था। उसे इलाके के लोगों से ज्यादा इलाके की जानकारी चाहिए थी। कौन से में है? किसका रिश्तेदार बीएसएफ में है? कौन बॉर्डर के पास रहता है? कौन किस रास्ते से आता जाता है? वह हर छोटी बात याद रखता था। और सबसे अहम उसने दोस्ती की उस इंसान से जो पूरे इलाके में सबसे ज्यादा घूमता था और वो था डाकिया। क्योंकि एक डाकिया सिर्फ चिट्ठियां नहीं पहुंचाता वो खबरें भी देखता है। स्थानीय पोस्ट ऑफिस सुबह 10:15 उस दिन पोस्ट ऑफिस में हमेशा की तरह भीड़ थी। लकड़ी की पुरानी मेजें, पंखे की धीमी आवाज और चारों तरफ बिखरी सैकड़ों चिट्ठियां। मांगीलाल अपने हिस्से की डाक छांट रहा था। बिजली के बिल, सरकारी नोटिस, बैंक के कागज सब कुछ सामान्य था। फिर उसके हाथ में वो लिफाफा आया। सफेद रंग का साधारण लिफाफा, ना कोई सेंडर का नाम, ना कोई रिटर्न एड्रेस। बस ऊपर लिखा था शौकत भाई। पहली नजर में सब सामान्य लगा। लेकिन जैसे ही मांगीलाल ने उसे हाथ में उठाया, उसका हाथ रुक गया। 22 साल के अनुभव ने उसी पल उसे संकेत दे दिया था कि कुछ गलत है। लिफाफा बहुत हल्का था। इतना हल्का कि उसमें कागज होने का एहसास ही नहीं हो रहा था। उसने धीरे से उसे दबाया। अंदर कुछ छोटा, सख्त और सपाट था। अब उसकी सांस थोड़ी धीमी हो गई। वो खिड़की के पास गया और लिफाफे को सूरज की रोशनी के सामने किया। हल्की सी आकृति दिखाई दी। वो कागज नहीं था। वो एक सिम कार्ड था और तभी उसके दिमाग में एक साथ कई चीजें घूम गई। पाकिस्तान बॉर्डर शौकत भाई कोई सेंडर एड्रेस नहीं और एक छिपा कर भेजा गया सिम कार्ड मांगीलाल समझ गया था कि मामला साधारण नहीं है। उसने फैसला उसी वक्त कर लिया। वो साइकिल लेकर डिलीवरी पर नहीं निकला। सीधे पोस्ट मास्टर के कमरे में पहुंच गया। पोस्ट मास्टर ने बिना समय गवाए जानकारी स्थानीय पुलिस तक पहुंचाई। पुलिस ने मामला तुरंत इंटेलिजेंस ब्यूरो को सौंप दिया। क्योंकि बॉर्डर इलाके में बिना पहचान वाला सिम कार्ड कोई छोटी बात नहीं थी। उस रात आईबी के दो अधिकारी पोस्ट ऑफिस पहुंचे। लिफाफा बहुत सावधानी से खोला गया।
अंदर सचमुच एक सिम कार्ड था। लेकिन डराने वाली बात सिर्फ इतनी नहीं थी। सिम कार्ड पहले से एक्टिव था और उसमें कुछ नंबर सेफ थे। सभी नंबर पाकिस्तान के [संगीत] थे। उनमें से कुछ नंबर पहले से इंटेलिजेंस एजेंसियों की निगरानी में थे। अब मामला साफ हो चुका था। शौकत भाई सिर्फ दुकानदार में ही था। वो एक स्लीपर एजेंट [संगीत] था। अगले कुछ घंटों में उसकी पूरी बैकग्राउंड जांच शुरू हुई। नकली पहचान पत्र, फर्जी किराया नामा, अलग-अलग राज्यों में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबर सब धीरे-धीरे सामने आने लगा। एजेंसियों को समझ आ गया कि वह पिछले 3 सालों से भारतीय सेना की गतिविधियों पर नजर रख रहा था। उसका काम था जानकारी इकट्ठा करना। कौन सी यूनिट कब निकलती है, किस रास्ते से सैन्य गाड़ियां जाती हैं? कहां पेट्रोलिंग कम होती है? कौन सा इलाका कमजोर है? और यह सारी जानकारी बॉर्डर पार भेजी जाती थी। लेकिन असली खतरा अभी बाकी था। वो नया सिम कार्ड इस नेटवर्क की अगली [संगीत] स्टेज था। इसके जरिए सुरक्षित कम्युनिकेशन शुरू होना था। यानी आने वाले दिनों में कुछ बड़ा होने वाला था और तभी पूरी कहानी बदल गई क्योंकि वो सिम कार्ड अपने मालिक तक पहुंचा ही नहीं। बाड़मेर रात 2:40 पूरा कस्बा सो रहा था। सड़कें खाली थी। हवा में रेत उड़ रही थी और उसी अंधेरी रात में दो बिना नंबर वाली गाड़ियां धीरे-धीरे शौकत भाई की दुकान के पास आकर रुकी। कोई सायरन नहीं, कोई शोर नहीं। सिर्फ खामोशी। [संगीत] कुछ सेकंड बाद दरवाजा खुला। अंदर बैठे शौकत भाई ने शायद समझ लिया था कि खेल खत्म हो चुका है। उसे बिना हंगामे के उठाया गया। दुकान सील कर दी गई। उसके कमरे की तलाशी शुरू हुई। वहां से कई नक्शे मिले। अलग-अलग मोबाइल नंबर, बॉर्डर के आसपास के स्केच और कुछ ऐसी तस्वीरें जिन्हें देखकर साफ हो गया कि निगरानी लंबे समय से चल रही थी। पूछताछ में उसने कबूल किया कि उसने जानबूझकर लोगों से दोस्ती की थी। जानबूझकर मददगार बनने का नाटक किया था और सबसे ज्यादा भरोसा उसने मांगीलाल पर बनाया था क्योंकि एक डाकिया पूरे इलाके की धड़कन जानता है। लेकिन जिस आदमी को उसने अपना सबसे आसान रास्ता समझा वही उसकी सबसे बड़ी गलती बन गया। अगली सुबह आईबी के एक अफसर ने मांगीलाल से पूछा तुम्हें आखिर शक कैसे हुआ? मांगीलाल कुछ पल चुप रहा। फिर धीरे [संगीत] से बोला साहब 22 साल से चिट्ठियां बांट रहा हूं। खुशी वाली चिट्ठी भारी लगती है। दुख वाली उससे भी [संगीत] भारी। लेकिन वह लिफाफा बहुत हल्का था।
इतनी हल्की चिट्ठी कभी नहीं होती। कमरे में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा छा गया क्योंकि कभी-कभी देश को बचाने के लिए ट्रेनिंग नहीं तजुर्बा काफी होता है। कुछ दिन बाद वही कस्बा शौकत भाई गायब हो चुका था। उसकी दुकान बंद पड़ी थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। लेकिन सच बहुत कम लोगों को पता था। इंटेलिजेंस एजेंसियां अपना काम कर चुकी थी और मामला चुपचाप खत्म कर दिया गया। मांगीलाल को कोई मेडल नहीं मिला। ना टीवी इंटरव्यू, ना अखबार में फोटो, ना कोई सम्मान समारोह। अगली सुबह वह फिर उसी समय उठा। वही पीली वर्दी पहनी, वही पुरानी साइकिल निकाली और चिट्ठियां बांटने निकल पड़ा। जैसे कुछ हुआ ही ना हो। लेकिन असल में बहुत कुछ बदल चुका था। उसके थैले में अब वो लिफाफा नहीं था जो शायद बॉर्डर के इस पार तबाही ला सकता था। एक साधारण डाकिए ने सिर्फ अपने अनुभव और ईमानदारी के दम पर [संगीत] एक पूरे जासूसी नेटवर्क की कड़ी तोड़ दी थी। कहते हैं, युद्ध सिर्फ बंदूके नहीं जीतती। कभी-कभी एक आदमी की सतर्कता हजार सैनिकों के बराबर साबित होती है और भारत जैसे देश में जहां दुश्मन हमेशा सीमा पर खड़ा नहीं होता, वहां मांगीलाल जैसे लोग ही असली सुरक्षा कवच होते हैं क्योंकि देश को बचाने के लिए हमेशा हथियार नहीं चाहिए होते। कभी-कभी बस एक डाकिए की उंगलियां और सही सोच काफी [संगीत] होती हैं। अगर आपको यह वीडियो पसंद आई हो तो हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। वीडियो को लाइक और शेयर करके अपने दोस्तों तक भी पहुंचाइए और आप यह वीडियो भारत के किस शहर या राज्य से देख रहे हैं कमेंट में जरूर बताइए। साथ ही अगली डॉक्यूमेंट्री किस टॉपिक पर देखना चाहते हैं वह भी नीचे कमेंट करें। मिलते हैं अगली एक और सच्ची खौफनाक और दिल दहला देने वाली कहानी के साथ। तब तक के लिए शुक्रिया। [संगीत]