Cli

श्रीदेवी की मौ!त से पहले बोनी कपूर ने किया था ये काम?हुआ चौंकाने वाला खुलासा।

Uncategorized

यह कहानी श्रीदेवी की है। वो श्रीदेवी जिनके आने से सीन शुरू नहीं होता था बल्कि माहौल बन जाया करता था। मेरे हाथों से नौ नौ चूड़ियां किसी के हाथ ना पाएगी ये लड़कीहै मुझको। हवा हवाई जिनकी हंसी में बचपन था। आंखों में गहराई और अदाकारी में वो जादू जो उनकी मौजूदगी में हीरो को भी साइड एक्टर वाला एहसास करवाता था। श्रीदेवी वो लड़की थी जिसने बचपन में कैमरे का सामना किया।

जवानी में इंडस्ट्री पर राज किया और हर दौर में खुद को साबित किया। चाहे कॉमेडी हो, दर्द हो, मासूमियत हो या फिर मजबूती। श्रीदेवी हर किरदार को ऐसे जी रही थी मानो जैसे उनकी अपनी कहानी। दुनिया ने उनकी खूबसूरती को देखा लेकिन असल में वो उनकी मेहनत, अनुशासन और हिम्मत से बनी एक कहानी थी। जिंदगी ठीक चल रही थी। परिवार, बेटियां, वापसी की तारीफें सब कुछ चल रहा था। लेकिन तभी अचानक एक दिन सब कुछ बदल गया। और इसीलिए आज जो कहानी हम आपको सुनाने जा रहे हैं वो सिर्फ श्रीदेवी की कहानी नहीं है। यह कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की की भी कहानी नहीं है। यह कहानी है उस सुबह की जब नींद खुलते ही खबर ने 140 करोड़ भारतीयों के दिल को बैठा दिया।

यह कहानी है उन तीन दिनों की जिसमें सवाल बढ़ते गए। जवाब देर से आए और हर घंटे के साथ बेचैनी और गहरी होती गई। यह कहानी है श्रीदेवी के मौत के उस रहस्य की जो कागजों में तो सुलझ गया लेकिन लोगों के मन में आज भी अधूरा है कि श्रीदेवी की नेचुरल थी, अननेचुरल थी या कोई ऐसी घटना घटित हुई थी जिसके बारे में कभी किसी को पता ही नहीं चला। श्रीदेवी का इंडिया में क्यों नहीं हुआ? क्या कुछ था

जो श्रीदेवी के साथ हुआ था और जो हम जान नहीं पाए। अगले कुछ मिनट में श्रीदेवी की पूरी कहानी हम आपको सुनाएंगे। हमारी आपसे गुजारिश है कि क्राइम बुक चैनल से आप जरूर जुड़े ताकि इस रिश्ते को हम और आप और मजबूत कर सकें। अब शुरुआत श्रीदेवी से करते हैं शुरू से। श्रीदेवी का सफर किसी एक सुपरहिट फिल्म या किसी एक दौर से नहीं बना। उनका रिश्ता सीधे दर्शक के दिल से था। जब एक्टिंग की शुरुआत की तो कैमरा उनके लिए डर नहीं था। एक स्वाभाविक जगह थी। बहुत ही कम कलाकार होते हैं जो बचपन में ही भावनाओं की परतों को इतनी आसानी समझ लेते हैं।

श्रीदेवी उन्हीं में से थी। उन्हें रोना सिखाया नहीं गया। वो रोने का मतलब समझती थी। उन्हें हंसना सिखाया नहीं गया। वो हंसी के पीछे की वजह को जानती थी। इसीलिए जब वो पर्दे पर रोती थी तो लोग उसे महसूस करते थे। वो अनकंफर्टेबल हो जाते थे। उनकी आंखों में आंसू आते थे। और जब वो हंसती थी तो वो सीन लोगों को गुदगुदाता था। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई, श्रीदेवी की एक्टिंग में और डेप्थ आती गई। दक्षिण भारतीय फिल्मों में उन्होंने लैंग्वेज बैरियर को तोड़ा।

कई बार तो हिंदी ठीक से नहीं आती थी लेकिन भाव इतने सच्चे थे कि शायद उन शब्दों से आगे लोग महसूस कर रहे थे। कैमरा उनकी आंखों पर टिक जाता था। दर्शक समझ जाता था कि वो क्या कहना चाह रही है। यही वजह थी कि श्रीदेवी जहां भी जाती हैं, वह खुद को अलग साबित कर देती। उनकी अभिनय में एक्टिंग में दिखावा नहीं था। सब कुछ नेचुरल था। हिंदी सिनेमा में उन्होंने वो किया जो उस दौर में कम एक्ट्रेस कर पाई। उन्होंने सिर्फ हीरो के साथ स्क्रीन साझा नहीं की बल्कि कहानी का बोझ अपने कंधों पर उठाया। उनकी फिल्मों में हीरो जरूरी थे लेकिन फोकस श्रीदेवी पर था।

सदमा में उनकी एक्टिंग देखने के बाद लोग थिएटर से चुपचाप बाहर निकले। जैसे मानो किसी ने भीतर कुछ तोड़ दिया हो। लेकिन चालबाज में वही अभिनेत्री दो अलग-अलग किरदार निभाकर हंसाती है, चौंकाती है। कॉमेडी उनके लिए मेहनत का काम नहीं थी। उनके स्वभाव में थी। उनकी टाइमिंग, उनकी बॉडी लैंग्वेज, उनकी आंखों की हल्की सी हरकत यह सब कुछ इतना सहज था कि सब कुछ अपने आप चल रहा था।

यह दौर ऐसा था जब फिल्मों की सफलता का पैमाना बदल रहा था। फीस, पोस्टर, ओपनिंग की बातें ज्यादा होने लगी थी। लेकिन श्रीदेवी के साथ सभी को भरोसा था। उनका नाम अपने आप में एक वादा था कि दर्शक टिकट इस भरोसे पर खरीदता है कि श्रीदेवी की पिक्चर है तो अच्छी फिल्म होगी और यही वजह था कि वो सुपरस्टार बन गई। फिर अचानक से उन्होंने वो किया जो कम लोग करते हैं। खुद को पीछे कर लिया। दिल टूटने के बाद उन्होंने शादी की। परिवार चुना, बेटियां हुई।

कैमरे से दूरी बना ली। कई साल तक वो पर्दे पर आई नहीं। लोगों ने मान लिया कि शायद श्रीदेवी की कहानी खत्म हो गई है। लेकिन कुछ कलाकारों की कहानियां खत्म नहीं होती। वो बस जिंदगी के दूसरे हिस्से का इंतजार करते हैं और श्रीदेवी कहानी भी वैसी थी। जब दोबारा वापस हुई तो शोरशराबे के साथ नहीं इंग्लिश विंग्लिश जैसी एक सदी हुई फिल्म के साथ एक आम औरत के किरदार को लेकर जो आत्मसम्मान की तलाश में है। उस फिल्म ने बताया कि श्रीदेवी अब भी वही है। बस ठहरी हुई है, गहरी हो गई है।

उम्र उनके अभिनय को कम नहीं बल्कि और अर्थपूर्ण बना चुकी है। उनकी वापसी किसी ट्रेंड की वजह से नहीं बल्कि जरूरत की वजह से थी। दर्शकों को उनकी जरूरत थी। 2018 तक जिंदगी एक संतुलन में दिख रही थी। परिवार था, बेटियां बड़ी हो रही थी। एक बेटी की फिल्म आने वाली थी। रिश्तेदारों की शादियां थी। हंसीज़ाक चल रहा था। तस्वीरें थी, वीडियो थे। किसी को अंदाजा नहीं था क्या होने वाला है। फिर यूएई से एक शादी का न्योता आता है। कपूर परिवार जाता है, रिश्तेदार जाते हैं, दोस्त जाते हैं। शादी रस अल खैमा में थी। शादी की तस्वीरें सामने आती हैं।

वीडियो वायरल होते हैं और श्रीदेवी हर फ्रेम में जिंदगी से भरी हैं। वो नाच रही हैं, हंस रही हैं। लोगों से मिल रही हैं। पूरी तरह। कहीं ऐसा लगा नहीं कुछ गड़बड़ होने वाला है। शादी खत्म होती है। ज्यादातर मेहमान भारत लौट आते हैं। उनके पति बोनी कपूर भारत लौट आते हैं। बेटियां लौट आती है। लेकिन श्रीदेवी दुबई में रुक जाती है। किसी को अजीब नहीं लगा। वो पहले भी दुबई जाती थी। एक बड़े होटल में चेक इन किया। अकेली शांत और बाहर निकलने की कोई जल्दबाजी नहीं। अगले दो दिन भी वह होटल से बाहर नहीं निकली।

किसी को तब भी यह असामान्य नहीं लगा। क्योंकि कलाकारों का कुछ वक्त अपने साथ गुजारना कोई नई बात नहीं थी। लेकिन एक रोज उन्होंने तय किया कि वो दुबई लौटेंगे। वजह बहुत सिंपल थी। अपनी पत्नी को सरप्राइज़ देना, साथ बैठकर डिनर करना, कुछ वक्त गुजारना। और यहीं से कहानी धीरे-धीरे उस मोड़ की तरफ बढ़ने लगी जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। जिस दिन बोनी कपूर ने दुबई से लौटने का फैसला किया उस दिन किसी के मन में कोई आशंका नहीं थी। ना बोनी कपूर के ना श्रीदेवी की। शाम को बोनी कपूर होटल पहुंचे। वहीं होटल जहां श्रीदेवी ठहरी थी। वही कमरा दरवाजे पर घंटी बजी। कुछ सेकंड की खामोशी और फिर दरवाजा खुला।

सामने श्रीदेवी थी वो चौंक गई। यह चौंकना डर का नहीं था। हैरानी का था। फिर मुस्कुराहट आई पहचान वाली। कुछ पल के लिए सब कुछ बिल्कुल नॉर्मल था। पतिप की मुलाकात, हालचाल, शादी की बातें, घर की बातें, बेटियों का जिक्र। कुछ देर ड्राइंग रूम में बैठकर बातचीत हुई। बोनी कपूर ने बताया कि वो उन्हें डिनर पर ले जाना चाहते हैं। शनिवार की शाम दुबई में अच्छे रेस्टोरेंट्स में काफी भीड़ होती है। इसलिए कहा तैयार हो जाइए। श्रीदेवी उठी बेडरूम की तरफ गई और फिर बाथरूम में चली गई। इसमें कुछ भी अननेचुरल नहीं था।

ना जल्दबाजी ना तनाव। बोनी कपूर ड्राइंग रूम में बैठे रहे। टीवी ऑन किया, स्पोर्ट्स चैनल लगाया। क्रिकेट मैच आ रहा था। वक्त धीरे-धीरे गुजरता गया। पहले कुछ मिनट, फिर 15 20 मिनट और फिर आधा घंटा। बीच में आवाज दी। शायद बाथरूम तक नहीं पहुंची। उन्होंने फिर से ध्यान मैच पर लगा लिया। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बढ़ता रहा, बेचैनी और बढ़ती गई। कमरे के फोन से बाथरूम में कॉल किया गया। घंटी गई लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। एक बार नहीं, दो बार नहीं। कई बार नहीं। अब बोनी कपूर परेशान हुए। वो उठे बाथरूम की तरफ गए। बाहर से आवाज दी। कोई रिएक्शन नहीं। फिर दरवाजे को हल्के से धक्का दिया। दरवाजा बंद नहीं था। और फिर दरवाजा जब खुला तो जो सामने था उसने सब कुछ बदल दिया। बात टब में श्रीदेवी थी। पूरा शरीर पानी के अंदर चेहरा भी कोई हलचल नहीं। कोई आवाज नहीं। वो पल ऐसा था जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है। घबराहट अविश्वास डर सब कुछ एक साथ। उन्होंने श्रीदेवी को हिलाने की कोशिश की। पानी से निकालने की कोशिश की लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। इसके बाद फोन किया दोस्तों को, होटल को, डॉक्टर को।

कुछ ही देर में होटल स्टाफ पहुंचा, डॉक्टर आए, जांच की गई और पता चला कि श्रीदेवी अब इस दुनिया में नहीं है। शुरुआती तौर पर डॉक्टर ने कहा कि शायद दिल का दौरा पड़ा होगा। उस वक्त किसी ने सवाल नहीं किया। सदमे की हालत थी। पुलिस को जानकारी दी गई। दुबई पुलिस आई। बॉडी को अस्पताल ले जाया गया। भारतीय दूतावास को जानकारी दी गई। पूरी प्रक्रिया वैसी थी जैसे किसी विदेशी नागरिक की मौत के बाद होती है। रात काफी हो गई थी। दुबई में मामला आधिकारिक रूप से दर्ज हुआ। भारत में तब ज्यादातर लोग सो चुके थे।

किसी को अंदाजा नहीं था कि सुबह क्या खबर आने वाली है। इसके बाद रविवार की सुबह जब भारत में नींद खुलती है तो मोबाइल पर एक ही नाम था। श्रीदेवी की मौत हो गई। सोशल मीडिया ठहर गया। चैनलों की सुबह की बुलेटिन बदल गई। लोग एक दूसरे को फोन करके पूछ रहे थे क्या वाकई में श्रीदेवी मर गई। शुरुआती खबर यही थी कि दिल का दौरा पड़ा। लोगों ने इसे स्वीकार करने की कोशिश की लेकिन मन नहीं मान रहा था क्योंकि श्रीदेवी बीमार नहीं थी।

शादी में वो पूरी तरह फिट थी। हंस रही थी, नाच रही थी। संडे बीता भारत में इंतजार था बॉडी कब आएगी? अंतिम दर्शन अंतिम संस्कार। लेकिन दुबई में रविवार को पोस्टमार्टम नहीं होता है। वहां नियम सख्त है। छुट्टी का दिन छुट्टी का रहता है। सोमवार को पोस्टमार्टम होता है और यहीं से कहानी करवट लेती है। रिपोर्ट आती है कि श्रीदेवी की मौत दिल के दौरे से नहीं बल्कि डूबने से हुई थी बाथ टब में। बस इसी एक लाइन ने सब कुछ बदल दिया। सवाल उठने लगे। स्टूडियो गर्म हो गए। सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई।

लोग पूछने लगे कि कोई बाथ टब में भला कैसे डूब सकता है? फ्लोर पर पानी क्यों नहीं था? वो अकेली क्यों थी? शराब का जिक्र क्यों आया? अब मामला सिर्फ हादसे का नहीं शक का हो गया। केस दुबई पुलिस प्रोसीक्यूशन तक पहुंचा। बॉडी भारत भेजने पर रोक लग गई। जांच तेज हो गई। तीन दिन तक हर एंगल से जांच हुई। सीसीटीवी फुटेज देखे गए। होटल स्टाफ से पूछताछ हुई। डॉक्टरों से सवाल किए गए। बोनी कपूर के बयान को दर्ज किया गया। कोई बाहरी शख्स उस कमरे में आया नहीं था। किसी जबरदस्ती कोई निशान नहीं मिले थे। तीसरे दिन एक स्टेटमेंट आया कि डूबने से हुई। यह एक हादसा था। किसी तरह की साजिश नहीं पाई गई। कागजों में यह कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन लोगों के मन में अभी भी शक था। शक इसलिए क्योंकि कहानी अब तक पूरी नहीं है।

तीसरे दिन जैसे ही क्लीयरेंस मिला, औपचारिकताएं तेज हुई, डेथ सर्टिफिकेट जारी हुआ, पासपोर्ट कैंसिल हुआ। इसके बाद बॉडी को यहां से पैक किया गया और विशेष विमान से श्रीदेवी को भारत लाया गया। जिस पल उनका ताबूत मुंबई पहुंचा, यह साफ हो गया कि यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं पूरे देश का शोक है। एयरपोर्ट से लेकर अंतिम संस्कार स्थल तक लोगों की भीड़ थी। आंखें नम थी, चेहरे चुप थे। सरकार की तरफ से राष्ट्रीय सम्मान दिया गया। तिरंगे में लिपटा शरीर, सलामी, अंतिम विदाई। यह सब उस कलाकार को दिया गया सम्मान था जिसने दशकों तक लोगों के जीवन में खुशी, दर्द, हंसी और आंसू बांटे थे।

लेकिन अंतिम संस्कार के बाद भी सवाल खत्म नहीं हुए। बल्कि वह और जोर से पूछाने लगे कि आखिर तीन दिन क्यों लगे? बात क्यों? क्यों शराब का जिक्र? भारत में पोस्टमार्टम क्यों नहीं हुआ? यह सवाल सिर्फ शख्स से नहीं बल्कि उस इमोशन से भी थे जो श्रीदेवी से लोगों को थी। आम आदमी को लगा कि कुछ मौत सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट समझ में नहीं आती। श्रीदेवी की तरह दिव्या भारती की भी मौत हुई थी। तब भी सवाल हुआ था। दिव्या भारती को भी श्रीदेवी कहा गया था और उनकी के कई साल बाद श्रीदेवी घटना आती है। बॉलीवुड में जब भी कोई होती है तो शक हमेशा होता है और उनकी को एक लाइन में समेटना आसान नहीं होता।

यही वजह था कि लोग मानने को तैयार नहीं थे कि बस एक घटना थी। धीरे-धीरे समय आगे बढ़ा। चैनलों ने नए मुद्दे पकड़ लिए। सोशल मीडिया की बहस कमजोर पड़ गई। लेकिन श्रीदेवी कहानी पूरी तरह कभी बंद नहीं हुई। जब भी कोई फिल्म टीवी पर आती है, जब भी कोई पुरानी क्लिप आती है, वह सवाल धीरे से उठता है जो इस कहानी को एक कदम पीछे हटकर देखने पर मजबूर करता है। मौत चाहे जैसी हुई हो, श्रीदेवी की जिंदगी उससे कहीं बड़ी थी। उनका योगदान, उनकी कला, उनका असर किसी एक आखिरी पल से तय नहीं हो सकता। जो छोड़ा वो सवालों से बड़ा है। आज भी जब हम और आप चालबाज देखते हैं तो हंसते हैं।

सदमा देखते हैं तो खामोश होते हैं। इंग्लिश विंग्लिश में खुद को ढूंढ लेते हैं। यह सब किसी रहस से नहीं उस कला से जुड़ा है। शायद यही वजह है कि बहुत से लोग कहते हैं कुछ कहानियां पूरी नहीं होती। बस आगे बढ़ जाती हैं। श्रीदेवी की कागजों में एक दुर्घटना है। लेकिन लोगों के दिलों में एक सवाल है। कागज बंद हो सकते हैं। जांच पूरी हो सकती है। लेकिन यादें बंद नहीं होती और शायद श्रीदेवी की मौजूदगी सबसे बड़ी उन यादों में से ही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *