[संगीत] इतिहास कहता है कि साल 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हुई और दिल्ली में कमान बदली। औरंगजेब ने सेंट्रल एशिया से मिडिल ईस्ट तक के लड़ाके अपनी सेना में भर रखे थे। औरंगजेब के जाने के बाद यह लड़ाके मानो लावारिस हो गए। कुछ वापस लौट गए तो कुछ देश में ही भटकने लगे। इनमें से एक सिपे सालार था दोस्त मोहम्मद खान। पश्तून से आया यह सैनिक काफी हुनरमंद था। औरंगजेब के लिए वो मालवा में लड़ाईयां लड़ता। बागियों को ठिकाने लगाता। औरंगजेब का जाना उसके लिए मानो सर से छत छिन जाने जैसा था। लेकिन दोस्त मोहम्मद खान के पास अपनी सेना थी। अपने भरोसेमंद पश्तून सैनिक जो उसके इशारे पर किसी से भी लड़ जाने को तैयार थे। ऐसे में दोस्त मोहम्मद खान ने पश्तून वापस जाने के बजाय एक प्लान बनाया फ्रीलांस करने का। उसने मालवा इलाके के छोटे राजाओं को अपनी पेड सर्विज देनी शुरू कर दी। तुम मुझे पैसे दो। मैं तुम्हें सिक्योरिटी दूंगा। मेरे सैनिक तुम्हारी रक्षा करेंगे। सालों तक मालवा के राजाओं को सेवा देने का उसे फल भी मिला। 1709 में दोस्त मोहम्मद खान ने डूबते बेरसिया स्टेट को पट्टे पर ले लिया यानी लीज़ पर और फिर मंगलगढ़ की राजपूत रियासत और रानी कमलापति के गोंड साम्राज्य के खात्मे के बाद उस पर भी अपना कब्जा जमा लिया। जब इलाका बढ़ता गया तो दोस्त ने 1723 में बड़ा तालाब के किनारे पहाड़ी पर अपना गढ़नुमा एक किला बना लिया और खुद को नवाब घोषित कर दिया। बस यहीं से शुरुआत हुई भोपाल रियासत की। 1723 में दोस्त मोहम्मद खान के सर पर सजी भोपाल के नवाब की पगड़ी आज बॉलीवुड के नवाब सैफ अली खान के सर पर है। 2011 में उनके पिता मंसूर अली खान पटौदी के निधन के बाद सैफ अली खान के सर पर यह पगड़ी सजी थी। लगा मानो भोपाल रियासत को दोबारा चिराग मिल गया हो।
माना जा रहा था कि सैफ अली खान पटौदी पैलेस के साथ-साथ भोपाल रियासत की करीब 15,000 करोड़ की प्रॉपर्टी के मालिक हो जाएंगे। दर्जनों आलीशान महल हजारों एकड़ जमीन उनके अंडर आ जाएगी। लेकिन अब ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। केंद्र सरकार इस प्रॉपर्टी को शत्रु संपत्ति घोषित कर चुकी है और अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने उस पर मोहर भी लगा दी है और सैफ अली खान और उनका परिवार अपनी 15,000 करोड़ की संपत्ति को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। लेकिन फैसला लगातार उनके खिलाफ आ रहा है। किस्सा के इस एपिसोड में बात होगी भोपाल रियासत की। सुनाएंगे आपको इस रियासत का सैकड़ों साल पुराना इतिहास और कैसे इस रियासत के तार एक प्रेम विवाह के चलते सैफ अली खान से जाकर जुड़ गए और बताएंगे उस वाक्य के बारे में जिसके चलते हरियाणा में मौजूद पटौदी रियासत के नवाब 781 किमी दूर मौजूद भोपाल रियासत की अरबों की जायदाद के वारिस बन गए और अब यह हजारों करोड़ों की प्रॉपर्टी देश के बंटवारे के चलते शत्रु संपत्ति घोषित हो गई। साथ ही बात होगी सालों से चली आ रही उस कानूनी बैटल की भी जो सैफ अली खान और उनका परिवार इस 15,000 करोड़ की प्रॉपर्टी हासिल करने के लिए लड़ रहा है। नमस्कार, मैं हूं भूपेंद्र सोनी और आप देख रहे हैं खबरगांव और यह किस्सा है भोपाल रियासत की विवादित संपत्ति का। [संगीत] भोपाल रियासत के किस्से अनसुने लेकिन काफी दिलचस्प है। भोपाल नवाब हमीदुल्लाह की पाकिस्तान जाने की इच्छा, जिंदा के साथ उनकी दोस्ती, तिरंगा फहराने पर गोली चलने का वाकया, आजादी के 2 साल बाद भारत में विलय। ऐसे कई किस्से इस वीडियो में हम आपको सुनाने वाले हैं। तो अंत तक हमारे साथ बने रहिए। [संगीत] तो कहानी की शुरुआत करते हैं एकदम शुरुआत से। साल 1723 में दोस्त मोहम्मद खान के साथ शुरू हुई भोपाल रियासत साल 1728 में ही मराठों की आधीनता में आ गई थी। पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने दोस्त मोहम्मद के औरंगजेई वंश को हराया और भोपाल पर अपना कब्जा जमा लिया। लेकिन भोपाल में मराठाओं ने सीधा कब्जा नहीं किया। उसे अपने आधीन रखा और उनसे टैक्स वसूलते रहे। यह रियासत इंदौर के होलकर और ग्वालियर के सिंधिया घराने के कंट्रोल में हुआ करती थी। इससे परेशान होकर साल 1809 में भोपाल रियासत के नवाब गौस मोहम्मद खान ने ब्रिटिशर्स को लेटर लिखा और ब्रिटिश संरक्षण की मांग की। लेकिन अंग्रेजों ने इस लेटर पर ध्यान नहीं दिया। इस वक्त तक मराठा और ब्रिटिशर्स के बीच दो युद्ध हो चुके थे। जिसे हम एंग्लो मराठा वॉर के नाम से जानते हैं। लेकिन 1817 में हुआ तीसरा एंग्लो मराठा युद्ध मराठाओं की हार लेकर आया।
भोपाल से मराठाओं का कब्जा खत्म हुआ और भोपाल के अगले नवाब नजर मोहम्मद खान ने खुशी-खुशी अंग्रेजों की आधीनता स्वीकार कर ली। भोपाल रियासत भारत की उन तमाम रियासतों में से एक थी जिन्होंने अंग्रेजों से अपने हितों के लिए दोस्ती बनाकर रखी थी। जिसके बदले अंग्रेज उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराते थे। नजर मोहम्मद खान की खातिरदारी से अंग्रेज खुश हुए। 1818 में भोपाल को ब्रिटिश रियासत का दर्जा दिया गया। एंग्लो भोपाल संधि हुई जिसमें भोपाल रियासत का एरिया और बढ़ा दिया गया। रायसेन सिहोर को इसमें शामिल किया गया। विंध्य रेंज तक इस रियासत का विस्तार किया गया। मालवा पठार से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक की सीमाएं बढ़ा दी गई और फिर देश की आजादी से 2 साल पहले तक भोपाल रियासत स्थिर लेकिन सेमी ऑटोनॉमस स्टेट बना रहा। यानी इस रियासत पर आधा अधिकार अंग्रेजों का भी था। आजादी के वक्त क्या-क्या हुआ इसका किस्सा भी काफी दिलचस्प है। लेकिन उसकी बात हम वीडियो में आगे करेंगे। फिलहाल नवाबों की टाइमलाइन पर एक नजर मार लेते हैं। नजर मोहम्मद खान सिर्फ 3 साल तक भोपाल रियासत के नवाब रहे। 1816 से 1819 तक। उनके बाद भोपाल रियासत में महिला नवाबों का दौर शुरू हुआ। शहरियार खान की किताब बेगम्स ऑफ भोपाल से मिली जानकारी के मुताबिक नज़र मोहम्मद के निधन के बाद रियासत की कमान उनकी पत्नी कुदसिया बेगम ने अपने हाथ में ले ली। कुदसिया बेगम के बाद सत्ता मिली उनकी छोटी बेटी सिकंदर बेगम के पति जहांगीर मोहम्मद खान को। लेकिन असल सत्ता चलाती थी कुदसिया बेगम की बड़ी बेटी और सिकंदर बेगम की बड़ी बहन सुल्तान शाहजहां बेगम। साल 1837 से 1844 तक जहांगीर मोहम्मद खान नवाब बने रहे। 1844 को शाहजहां बेगम ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और फिर 1860 तक राजपाठ चलाती रहीं। फिर 1860 में भोपाल की तीसरी महिला नवाब बनी सिकंदर बेगम। 8 साल सत्ता चलाने के बाद साल 1868 में शाहजहां बेगम की वापसी हुई जो 1901 तक भोपाल की सत्ता पर काबिज रहीं। शाहजहां बेगम ही भोपाल में सबसे लंबे वक्त तक राज करने वाली नवाब बनी। यानी भोपाल रियासत में किसी मर्द नवाब ने भी उनके जितने वक्त तक भोपाल की सत्ता नहीं संभाली है। पहले 1844 से 1860 तक फिर 1868 से 1901 तक। शाहजहां बेगम के बाद सत्ता मिली कखोरो जहान बेगम को। 1901 से 1926 तक। कखोरो बेगम को कैखुसरू बेगम के नाम से भी जाना जाता था। आगे चलकर उन्होंने अपने बेटे नवाब हमीदुल्लाह खान के पक्ष में सत्ता छोड़ दी जो 1949 तक भारत में विलेय से पहले तक भोपाल के नवाब बने रहे। यहां तक हमने भोपाल रियासत की नवाबी डायनेस्टी समझ ली। लेकिन असली कहानी शुरू होती है नवाब हमीदुल्लाह के दौर से। इन्हीं के राज में पटौदी और भोपाल रियासत की कड़ी जुड़ी और यहीं से भोपाल रियासत की शत्रु संपत्ति विवाद की जड़े शुरू होती हैं। शत्रु संपत्ति यानी एनिमी प्रॉपर्टी। [संगीत] भोपाल रियासत के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह खान हाईली इंटेलेक्चुअल और डशिंग पर्सनालिटी के इंसान थे। उनकी मां भोपाल की नवाब थी। उनकी परदादी जहांगीर बेगम ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसलिए मानो परंपरा सी हो गई थी कि भोपाल रियासत के राजकुमार अलीगढ़ से पढ़ाई करते ही करते थे। हमीदुल्लाह भी अलीगढ़ से ही पढ़े लेकिन बाद में बैरिस्टर की पढ़ाई करने लंदन चले गए। ओलो के शौकीन हमीदुल्लाह को तेज रफ्तार हवाई जहाज उड़ाना पसंद था। साल 1926 में भोपाल नवाब बनने से पहले ही उनकी शादी करा दी गई थी। 1916 में हमीदुल्लाह की शादी उनकी मां की पसंद से मैमूना सुल्तान से कराई गई। जिनका परिवार भोपाल रियासत से ही जुड़ा हुआ था। मैमूना और हमीदुल्लाह की तीन बेटियां हुई। बड़ी बेटी आबिदा सुल्तान, दूसरी बेटी साजिदा सुल्तान और तीसरे नंबर की बेटी राबिदा सुल्तान। आबिदा सुल्तान ही इस किस्से की मेन कैरेक्टर हैं।
नवाब हमीदुल्लाह की वही बेटी जिनके फैसलों के चलते आज पूरे भोपाल रियासत की 15,000 करोड़ की प्रॉपर्टी शत्रु संपत्ति घोषित हो चुकी है और सैफ अली खान का परिवार इसे लेकर कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ता आ रहा है। आबिदा सुल्तान की किताब आबिदा सुल्तान एक इंकलाबी शहजादी की खुद नविश्त के मुताबिक नवाब हमीदुल्लाह वैसे तो अपनी मां कैखसरू बेगम के काफी करीब थे। उनकी सभी बातें मानते थे। उनकी ही समझाइश में राजपाठ चलाते थे। लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि उनकी राजनीति मुस्लिम लीग की ओर झुकी हुई थी और मोहम्मद अली जिन्ना के काफी अच्छे दोस्त थे। साल 1930 में जब लंदन में गोलमेज सम्मेलन हुआ तो नेहरू, गांधी, जिन्ना जैसे लीडरों के साथ हमीदुल्लाह भी शामिल होने एक ही प्लेन में लंदन गए थे। इसके अलावा 1930 में ही उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर भी बना दिया गया। वह चेंबर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर भी थे। यह भारत के सभी राजकुमारों का एक संगठन था जिसमें नवाब हमीदुल्लाह की तूती बोलती थी। हमीदुल्लाह के ही नक्शे कदम पर चलती थी उनकी बड़ी बेटी आबिदा। भोपाल के इतिहासकार शाहनवाज खान ने खबरगांव को बताया कि 20 साल की उम्र तक ही आबिदा 70 से ज्यादा शेरों का शिकार कर चुकी थी। वो दूसरी राजकुमारियों से अलग फैंसी कपड़ों और गहनों का शौक नहीं रखती थी। वो घुड़सवारी करती। उनकी दादी कैखसरू बेगम उन्हें गाड़ियां चलाने के लिए प्रेरित करती। रोज सुबह उनके पैलेस के सामने चमचमाती काली डमलर कार लाकर खड़ी कर दी जाती और फिर आबिदा उसमें अपनी दीदी को उनकी पसंदीदा जगह पर घुमाया करती। आबिदा अपने पिता की तरह ही हवाई जहाज उड़ाने की भी शौकीन थी। उन्होंने बॉम्बे और कोलकाता फ्लाइंग क्लब से हवाई जहाज उड़ाने की ट्रेनिंग भी ले रखी थी। वह भारत की दूसरी और पहली मुस्लिम महिला पायलट थी जिन्हें फ्लाइंग का आधिकारिक लाइसेंस मिला था। भोपाल रियासत की महिलाओं से उनके तेवर बिल्कुल अलग थे। सालों से भोपाल रियासत की बड़ी बेटियां खुद को एक नवाब के तौर पर देखने लगती थी। लेकिन आबिदा जैसे एक बेपरवाह और पुरानी परंपराओं को चुनौती देने वाली महिला थी। 18 जुलाई 1926 को उनकी शादी कुरवाई के नवाब सरवर अली खान से करवा दी गई थी। आबिदा और सर्वर का एक बेटा हुआ शेरियार खान जो आगे चलकर पाकिस्तान के जानेमाने डिप्लोमेट बने। यही नहीं पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। आबिदा अपनी किताब आबिदा सुल्तान एक इंकलाबी शहजादी की खुदनविश्त में बताती हैं कि कैसे वो अपने पिता के साथ मुस्लिम लीग के कार्यक्रमों में शामिल होते। यहां तक कि उनके पिता जब गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने लंदन गए तब वह भी उनके साथ गई थी। यही कुछ कारण भी रहे जिनकी वजह से अपने पिता की तरह ही आबिदा के अंदर भी पाकिस्तान की ओर झुकाव बढ़ गया। साल 1947 को जब देश आजाद हुआ तो उससे ठीक 2 साल पहले ही साल 1945 में अंग्रेजों ने भोपाल रियासत को अपनी अधीनता से आजाद कर दिया। नवाब हमीदुल्लाह एक इंडिपेंडेंट शासक बन गए थे। लेकिन 1947 में आजादी के बाद हमीदुल्लाह ने भारत में शामिल होने से इंकार कर दिया। पूरा घटनाक्रम समझते हैं। आजादी के कुछ वक्त पहले ही हमीदुल्लाह का पाकिस्तान प्रेम दिखने लगा था। साल 1947 में ही हमीदुल्लाह ने चेंबर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर के पद से इस्तीफा दे दिया। जिन्ना के कहने पर हमीदुल्लाह ने भोपाल को स्वतंत्र रखने की वकालत शुरू कर दी। या फिर पाकिस्तान में शामिल होने की वकालत करने लगे। कहा जाता है कि नवाब ने भोपाल के बैंक में जमा वहां के लोगों का पैसा कराची भेज दिया था और बैंक को दिवालिया घोषित कर दिया था। प्लानिंग थी कि पाकिस्तान में बैंक ऑफ भोपाल की नींव रखी जाएगी।
लेकिन ऐसा कुछ ना हो सका और नवाब को अपने इस फैसले के लिए लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। शुरुआत में हमीदुल्लाह चाहते थे पाकिस्तान में शामिल हो जाएं। लेकिन जब उन्हें समझ में आया कि उनकी रियासत देश के बीचों-बीच मौजूद है। अगल-बगल के बाकी रजवाड़े भारत में ही विलय का फैसला ले चुके हैं। ऐसे में हमीदुल्लाह ने अपनी मंशा बदल दी। कश्मीर और हैदराबाद के राजाओं की तरह वह खुद को स्वतंत्र रखने की पैरवी करने लगे। जिन्ना के कहने पर हमीदुल्लाह ने माउंटबेटन की बैठकों में जाना भी बंद कर दिया। जहां रजवाड़े विलेय को लेकर चर्चा किया करते थे। 15 अगस्त 1947 को भले ही भारत आजाद हो चुका था। लेकिन हमीदुल्लाह भोपाल को भारत सरकार से अलग आजाद रखने की पैरवी कर रहे थे। 1948 में नवाब जब हज करने गए तो भोपाल के अंदर आंदोलन शुरू हो गया। उस वक्त भोपाल के प्रोमिनेंट लोगों की अगुवाई में भोपाल को भारत में शामिल करने की मांग उठने लगी थी। भारत के पक्ष में झंडा उठाने वाले इन लोगों में कई अहम नाम शामिल थे। जिनकी लिस्ट ये रही। [संगीत] हिस्सा है कि 2 साल के जन आंदोलन के बाद 1 जून 1948 को जब भोपाल रियासत का झंडा उतारकर तिरंगा लगाया जा रहा था तब नवाब के सैनिकों और आंदोलनकारियों के बीच जमकर झड़प हुई। झड़प हिंसक हो गई। भीड़ को कंट्रोल करने के लिए गोलियां तक चलानी पड़ी थी। भोपाल के बतौलेबाज आज भी कहते हैं भोपाल में जब लोगों ने तिरंगा फहराया था तो नवाब ने गोलियां चलवा दी थी। हालांकि भोपाल के इतिहासकार शाहनवाज खान बताते हैं कि गोलियां तिरंगा फहराने वालों पर नहीं चली थी। शहर में जगह-जगह आंदोलन हो रहे थे। हिंसक झड़पें हो रही थी जिसके चलते कुछ जगहों पर गोलियां चलानी पड़ी थी। जिसमें कुछ लोग भी मारे गए थे। हालांकि यह इतिहासकारों का अपना एक तर्क है, लेकिन वहां के जो आम लोग हैं, वह इस गोलीबारी को किसी और ही ढंग से देखते हैं। इतिहासकार शाहनवाज खान बताते हैं कि आंदोलनकारियों और भारत सरकार के दबाव में आकर भले ही नवाब ने रियासत का भारत में विलय कर लिया था, लेकिन उनकी बड़ी बेटी आब के इरादे कुछ और ही थे। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट बताती है कि आजादी और विभाजन के करीब 6 महीने पहले जिन्ना के फोन की घंटी बजी। फोन भारत से आया था। लाइन पर उस और भोपाल रियासत की राजकुमारी और हमीदुल्लाह की उत्तराधिकारी आबिदा सुल्ताना थी। आबिदा ने कहा कि सिंहासन पर बैठने के बजाय वह पाकिस्तान आना चाहती हैं। यह सुनकर जिन्ना काफी खुश हुए। आखिरकार अब हमारे पास श्रीमती पंडित का मुकाबला करने के लिए कोई तो होगा। श्रीमती पंडित से जिन्ना का आशय जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित से था जो उस वक्त संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही थी।
जिन्ना से सहमति के बाद साल 1950 में आमिदा पाकिस्तान चली गई। वहां उन्हें कई प्रमुख पद मिले। वो पाकिस्तान की पहली महिला प्रोटोकॉल मिनिस्टर भी बनी। 1954 में उन्हें पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त राष्ट्र भी भेजा गया। 1958 में ब्राजील और चिली की वो राजदूत बनी। उनके बेटे शहरियार खान भी पाकिस्तान के बड़े डिप्लोमेट हुए। हमीदुल्लाह भले ही पाकिस्तान ना जा सके। भले ही भोपाल रियासत का पाकिस्तान में विलय ना करा सके लेकिन पाकिस्तान में हमेशा उनकी दिलचस्पी बनी रही। 1956 में वो वहां के प्रधानमंत्री बनने की कोशिश में भी थे। बकायदा वो सूटकेस में पैसों के साथ पाकिस्तान गए थे। लेकिन वो प्लान सक्सेसफुल ना हो सका। साल 1960 में हमीदुल्लाह का निधन हो गया। बड़ी बेटी साल 1950 में ही पाकिस्तान जा चुकी थी। ऐसे में दूसरे नंबर की बेटी साजिदा को भोपाल रियासत का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। जिसमें सबसे अहम रोल निभाया सैफ अली खान के दादा ने। यहीं से भोपाल रियासत में पटौदी खानदान की एंट्री होती है। हरियाणा में अरावली की पहाड़ियों के पास एक छोटी सी रियासत है पटौदी। साल 1804 में फैज तलब खान ने इस रियासत की नींव रखी थी। इस छोटी सी रियासत के अंडर सिर्फ 52 गांव ही आते थे। लेकिन शानो शौकत के लिए यह रियासत पूरे देश में मशहूर थी। साल 1917 में इस रियासत के आठवें नवाब बने इफ्तिकार अली खान। डैशिंग पर्सनालिटी के साथ यह यंग नवाब इंग्लैंड के लिए क्रिकेट खेला करता था। इस यंग नवाब की दोस्ती भोपाल की राजकुमारी साजिदा से हो गई थी। मेलजोल बढ़ता गया। दोनों के बीच प्यार हुआ। लेकिन इस कहानी में हिंदी फिल्मों की तरह प्यार के आड़े आ गए लड़की के पिता यानी नवाब हमीदुल्लाह। नवाब हमीदुल्लाह इस रिश्ते के खिलाफ थे। उनका मानना था कि पटौदी रियासत उनके ओदे से काफी छोटी रियासत है। यहां तक कि उनके पास कोई अच्छा महल तक नहीं है। जबकि उस वक्त भोपाल रियासत के पास अहमदाबाद पैलेस, फ्लैग हाउस, नूरुस् सभा, मोती महल, गोहर महल जैसी दर्जनों बड़ी-बड़ी प्रॉपर्टीज थी। सोहा अली खान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे अपने होने वाले ससुर हमीदुल्लाह को मनाने के लिए इफ्तार ने पटौदी में एक बड़ा पैलेस बनाने की सोची। सफेद रंग वाले इस पैलेस में यूरोपियन आर्किटेक्ट्स का इस्तेमाल किया गया। लेकिन खर्च इतना बढ़ गया कि कंस्ट्रक्शन पूरा होने से पहले ही इफ्तिकार के पास पैसे खत्म हो गए। ऐसे में उन्होंने कंजूसी करनी शुरू की। पैलेस के किनारे और बैक साइड के फर्श पर संगमरमर की जगह सीमेंट का फ्लोर बनाया गया
और इसे छिपाने के लिए कालीन का इस्तेमाल किया गया। छतों के ऊपर नक्काशी कम की गई और जैसे तैसे उस पैलेस का काम पूरा हुआ। खैर इफ्तिकार की मेहनत रंग लाई। उनके जुनून को देखते हुए हमीदुल्लाह ने साजिदा और इफ्तिकार की शादी को मंजूरी दे दी और यहीं से भोपाल रियासत और पटौदी रियासत की खानदानी रिशेदारी शुरू हो गई। शादी के बाद इफ्तार पटौदी रियासत के साथ-साथ भोपाल रियासत का भी कामकाज देखने लगे। लेकिन ज्यादातर वो भोपाल में ही रहा करते थे। क्योंकि साजिदा ही नवाब हमीदुल्लाह की इकलौती उत्तराधिकारी थी। इफ्तिकार और साजिदा के चार बच्चे हुए। मंसूर अली खान पटौदी, सालेहा सुल्तान, बेगम नूर बानो और आबिदा सुल्तान जिनका नाम उनकी मां की ही बड़ी बहन के ऊपर रखा गया जो पाकिस्तान चली गई थी। जिनकी बात हमने वीडियो में पहले भी की। बड़ा बेटा होने के चलते मंसूर अली खान पटौदी को भोपाल की नवाबी मिली। इंडियन क्रिकेट टीम के कैप्टन रह चुके मंसूर अली खान ने बॉलीवुड एक्ट्रेस शर्मीला टैगोर से शादी की। उनके तीन बच्चे हुए सैफ अली खान, सोहा अली खान और सबा अली खान। वैसे तो सैफ का जन्म दिल्ली में हुआ लेकिन चौथी क्लास तक सैफ भोपाल के फ्लैग हाउस पैलेस में ही रहते थे। वहीं से उन्होंने पढ़ाई की। उनके साथ पढ़े लिखे लोग आज भी भोपाल के कोहे फिजा इलाके में आपको मिल जाएंगे। बाद में सैफ मुंबई शिफ्ट हो गए थे। यहां तक तो साफ समझ आ रहा है कि नवाब हमीदुल्लाह ने अपना उत्तराधिकारी अपनी दूसरी बेटी साजिदा को बनाया। यानी मंसूर अली खान पटौदी की मां को। साजिदा से प्रॉपर्टी मंसूर अली खान को मिली और मंसूर अली खान से सैफ अली खान को। यानी वही भोपाल रियासत की प्रॉपर्टी के असली हकदार हैं। लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट है। क्या वह भी समझते हैं। भारत सरकार का मानना है कि हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम 1956 की धारा 19 के मुताबिक भोपाल नवाब हमीदुल्लाह की उत्तराधिकारी उनकी बड़ी बेटी यानी आबिदा सुल्तान है। जिन्होंने पाकिस्तान जाना चुना। इसके चलते भोपाल रियासत की प्रॉपर्टी पर शत्रु संपत्ति कानून 1968 लागू होगा और भोपाल रियासत की सारी प्रॉपर्टी शत्रु संपत्ति घोषित की जाएगी और इसका मालिकाना हक कस्टोडियन ऑफ एनिमी संस्था के पास जाएगा जिसका इस्तेमाल वो देश के हित में करेंगे लेकिन सैफ अली खान के परिवार का तर्क कुछ और है। साल 1999 में सैफ अली खान का परिवार इस मामले में कोर्ट चला गया। निचली अदालत में कुछ तर्क दिए गए। पहला तर्क यह कि आबिदा के पाकिस्तान जाने के बाद भी नवाब हमीदुल्लाह जिंदा थे। यानी प्रॉपर्टी नवाब के नाम पर ही थी। नवाब के निधन के बाद उनकी दूसरी बेटी को उत्तराधिकारी बनाया गया। ऐसे में प्रॉपर्टी परिवार के पास ही रही। इसमें शत्रु संपत्ति कानून 1968 इस मामले में लागू नहीं होता।
दूसरा तर्क यह था कि सैफ अली खान का परिवार चाहता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ यानी कि शरीयत एक्ट 1938 के मुताबिक नवाब हमीदुल्लाह की प्रॉपर्टी का बंटवारा होना चाहिए। यानी प्रॉपर्टी सिर्फ उत्तराधिकारी को नहीं बल्कि उनकी सभी संतानों और बहनों के परिवार को मिलनी चाहिए। साल 1999 में सैफ अली खान का परिवार इस मामले को ट्रायल कोर्ट लेकर गया था। वहां से फैसला परिवार के पक्ष में आया। लेकिन कस्टोडियन ऑफ एनिमी संस्था ने हाईकोर्ट में लोअर कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। अब जुलाई 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस पर अंतिम फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने भोपाल रियासत की करीब 15,000 करोड़ की प्रॉपर्टी जिसमें फ्लैग स्टाफ हाउस, अहमदाबाद पैलेस, नूर सबा पैलेस और भोपाल के कोहे फिजा इलाके की करीब 5,800 एकड़ की जमीन को शत्रु संपत्ति माना है। इसके अलावा कोर्ट ने सिहोर और रायसेन जिले की 1400 एकड़ जमीन को शत्रु संपत्ति माना है। यानी सैफ अली खान के परिवार का इस पर कोई हक नहीं है। साथ ही हाईकोर्ट ने एक अलग ट्रिब्यूनल बनाकर साल भर के अंदर इन सभी जमीनों और प्रॉपर्टीज का आकलन कर कस्टोडियन ऑफ एनिमी संस्था को यह पूरी प्रॉपर्टी सौंपने का आदेश दिया है। यानी प्रॉपर्टी सैफ अली खान परिवार के हाथ से छूट गई है। हालांकि सैफ अली खान परिवार के पास अब भी इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देने की ऑप्शन है। किस्मत देखिए, जिस दिन सैफ अली खान मुंबई में हुए हमले के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हुए, उसी दिन कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था। हालांकि सैफ अली खान या
उनके परिवार की तरफ से फिलहाल इस मसले पर कोई बयान नहीं आया है। हालांकि खबरगांव की टीम ने इस फैसले को लेकर कुछ जानकारों से बात कर उनका वर्जन जानने की कोशिश की। भोपाल रियासत से जुड़े सुमेर खान का कहना है कि भोपाल नवाब हमीदुल्लाह बड़ी बेटी आबिदा के पाकिस्तानी नागरिक बनने के बाद भी जिंदा थे। यानी प्रॉपर्टी की उत्तराधिकारी आबिदा नहीं बनी थी। उनकी मृत्यु के बाद उनकी छोटी बेटी साजिदा सुल्ताना को प्रॉपर्टी मिली। फिर उनके बेटे मंसूर अली खान पटौदी को और अब सैफ अली खान को भोपाल नवाब घोषित किया गया। अब यह समझ से परे है कि कैसे केंद्र सरकार इसे शत्रु संपत्ति घोषित कर रही है। झीलों के शहर के नाम से मशहूर भोपाल की आज देश में अलग पहचान है। भोपाल का ओल्ड सिटी कहलाने वाला इलाका आज भी पुरानी यादें समेटे हुए हैं। शहर में चारों ओर रियासत काल की बड़ी-बड़ी इमारतें मौजूद हैं। घने पेड़ों से घिरे आलीशान महल। देश की सबसे बड़ी मस्जिद बेगम का अपना ताजमहल, मोती महल, गौहर महल। आज भी भोपाल की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। ओहे फिजा की पहाड़ी के सबसे ऊपर मौजूद नूरु सबा पैलेस आज एक लग्जरी हेरिटेज होटल है।
इस होटल के नाम का मतलब है सुबह की पहली किरण जिसे सैफ अली खान की बुआ साले सुल्तान चलाया करती थी। साल 2020 में उनकी मृत्यु हो गई। जनाजे में शामिल होने सैफ अली खान भोपाल आए थे। कुछ-कुछ सालों के अंतराल में सैफ भोपाल आते रहते हैं। हालांकि भोपाल या पटौदी के हेरिटेज की जिम्मेदारी सैफ की बड़ी बहन सबा अली खान संभालती हैं जो पेशे से एक ज्वेलरी डिजाइनर हैं। भोपाल रियासत की करीब 15,000 करोड़ की प्रॉपर्टी अब भी दांव पर है। पटौदी पैलेस को वापस पाने के लिए सैफ अली खान पहले ही एक लंबी जद्दोजहद झेल चुके हैं। जिसकी कहानी हम आपको किस्सा के किसी और एपिसोड में सुनाएंगे। भोपाल रियासत, इसका इतिहास, इसकी प्रॉपर्टी की जंग और अब सैफ परिवार की जद्दोजहद का यह किस्सा आपको कैसा लगा हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। इस किस्सा को लिखा था मेरे साथी हिमांशु ने और इसे कैमरा के पीछे रिकॉर्ड किया है मेरे साथी आनंद ने। आप देख रहे हैं खबरगांव। शुक्रिया। [संगीत]