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मोदी की विदेश नीति की 4 बड़ी गलतियां, जिसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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ईरान और अमेरिका में डील हो गई। सुलह करवाने वालों में पाकिस्तान भी शामिल है। लेकिन इस समूचे घटनाक्रम में क्या भारत अप्रासंगिक नजर आया? क्या पिछले कुछ सालों में ऐसा हो रहा है कि दुनिया को पता ही नहीं चल रहा कि भारत किसके पक्ष में खड़ा है? और क्या इसकी वजह से भारत ने अपना भरोसा खोया है। ऐसे ही कुछ सवालों के द मिडिएशन क्वेश्चन इज द रॉन्ग वन में भारत की विदेश नीति और मौजूदा वैश्विक संकट को समझा रहे हैं।

उनके तर्कों को पहले चार पॉइंट्स में जानते हैं। पहला पॉइंट ईरान अमेरिका युद्ध विराम को शांति समझौता मान लेना जल्दबाजी होगी। दूसरा पॉइंट भारत को यह चिंता छोड़ देनी चाहिए कि मध्यस्थता किसने की। उसे यह देखना चाहिए कि स्थाई शांति और अंतरराष्ट्रीय नियम कैसे बचेंगे। तीसरा पॉइंट आज के युद्ध दुनिया को बड़े आर्थिक, सैन्य और नैतिक संकट की तरफ धकेल रहे हैं। चौथा पॉइंट पिछले कुछ वर्षों में भारत की समस्या यह रही है कि वो किन सिद्धांतों के पक्ष में खड़ा है यह दुनिया को साफ नहीं दिखा। अब बात पहले पॉइंट की करते हैं कि आखिर क्यों ईरान अमेरिका की डील को स्थाई शांति समझौता मान लेना जल्दबाजी होगी।

अभी यह साफ नहीं है कि आने वाले महीनों में अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता किस दिशा में जाएगा। जिस युद्ध विराम और रूपरेखा की घोषणा हुई है, वह शायद दोनों पक्षों के गहरे मतभेदों को हल करने से ज्यादा उन्हें कुछ समय के लिए टालने की व्यवस्था है और यह मतभेद अब भी जोखिम पैदा करते हैं। अगर यह समझौता टिक भी गया तो यह ज्यादा से ज्यादा एक तनावपूर्ण विराम होगा। इसे स्थाई शांति समझौता नहीं कहा जा सकता। चुनाव से पहले डॉन्ड ट्रंप प्रशासन के पास एक प्रलोभन है कि वह इस टकराव में उलझा हुआ ना दिखें।

साथ ही वह महंगाई के जोखिम और ऊर्जा कीमतों में संभावित झटकों से भी बचना चाहते हैं। लेकिन जब यह दबाव खत्म हो जाएगा तब क्या ट्रंप अमेरिकी ताकत की सीमाओं की सच्चाई को स्वीकार करेंगे या फिर ट्रंप और अमेरिकी व्यवस्था अपने चोट खाए अहंकार को संतुष्ट करने के लालच में पड़ जाएंगे। अब तक इजराइल के पास इस संभावित समझौते को कमजोर करने की तमाम वजहें थी।

पूरी तरह से सैन्य बढ़त हासिल करने की कोशिश ना तो उसे सुरक्षा दे पाई है और ना ही स्थाई नियंत्रण। कूटनीतिक स्तर पर भी वह काफी हद तक अलग-थलग पड़ गया है, लेकिन इस युद्ध के कारण इस क्षेत्र को कुछ और झटके भी लग सकते हैं। मसलन इराक जैसे देश प्रॉक्सी कंपटीशन की संभावित जमीन बन सकते हैं। ईरान ने जिस प्रभावी तरीके से अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल किया है, उसने गल्फ देशों के सामने एक बात साफ कर दी है। मिडिल ईस्ट में शर्तें तय करने का काम अमेरिका पर छोड़ने की कीमत और जोखिम दोनों बहुत बड़े हो सकते हैं। लेकिन ईरान समेत गल्फ के इन सभी देशों को घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ सकता है और यह किसी भी शांति व्यवस्था को और जटिल बना सकता है।

अब आते हैं दूसरे पॉइंट पर कि भारत को ये फ़िक्र क्यों छोड़ देनी चाहिए कि मध्यस्थता किसने की। भारत में कई लोग इस बात पर हाथ मसलते रह गए कि पूरे संघर्ष में उसकी कोई खास भूमिका नहीं रही। लेकिन भारत यह समझने में गलती कर रहा है कि इस समूचे घटनाक्रम में उसकी भूमिका सीमित क्यों रही? साथ ही वह यह भी ठीक से नहीं समझ रहा है कि इस समय दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत किस चीज की है।

एक परिपक्व शक्ति को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि मध्यस्थता कौन कर रहा है। भारत के पास दबाव बनाने की क्षमता नहीं थी। ना उसके पास जरूरी गठबंधन थे और सच कहें तो मध्यस्थता करने की कूटनीतिक क्षमता भी नहीं थी। भारत और दुनिया को किसी भी ऐसी मध्यस्थता का स्वागत करना चाहिए जो स्थाई शांति ला सके। इसलिए पाकिस्तान हो, कतर हो, ओमान हो या कोई और। अगर वह दुनिया को सही दिशा में ले जाता है, तो उसे श्रेय मिलना चाहिए। भारत और पाकिस्तान के मामले में भी हमने अपनी प्रतिष्ठा को लेकर गलत सोच बना ली है।

समझदार प्रतिक्रिया यह नहीं है कि हम मध्यस्थता को ही खारिज कर दें। बल्कि सुलह कराने वाले को नतीजों के आधार पर जज करना चाहिए। अगर पाकिस्तान ऐसी ईमानदार शांति की तरफ बढ़ता है जो भारत को स्वीकार्य हो तो उस मध्यस्थ का स्वागत किया जाना चाहिए। यह आसान काम नहीं है लेकिन मध्यस्थता नहीं हुई। साबित करने की हमारी औपचारिक जिद ने हमें नुकसान पहुंचाया है। संक्षेप में कहें तो भारत अपनी अप्रासंगिकता को गलत तरीके से समझ रहा है क्योंकि वह गलत सवाल पूछ रहा है।

अब समझते हैं कि आखिर कैसे आज के युद्ध पूरी दुनिया को बड़े संकट की ओर धकेल रहे हैं। हमें मौजूदा वैश्विक स्थिति की एक बुनियादी बात समझनी होगी।

हम लगातार यूक्रेन, गजा और ईरान जैसे युद्धों को इस तरह देख रहे हैं जैसे वो सिर्फ दो देशों या किसी एक क्षेत्र या सीमित संघर्ष हो। यह सच है कि यह हमारे युद्ध नहीं है। लेकिन सामूहिक रूप से देखें तो इन युद्धों ने दुनिया को अभूतपूर्व जोखिमों के सामने खड़ा कर दिया है। इनमें से कोई भी सिर्फ क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है। हर युद्ध वैश्विक, आर्थिक या सैन्य संकट का खतरा बढ़ाता है और हर युद्ध अपने तरीके से उन नियमों को कमजोर कर रहा है जिन पर किसी भी टिकाऊ, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नीव टिकी होती है। जैसे कि बल प्रयोग पर नियंत्रण, संप्रभुता का सम्मान और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की विश्वसनीयता।

गजा में इजराइल की कार्यवाही के दौरान दुनिया ने 21वीं सदी में जेनोसाइड यानी जनसंहार जैसी स्थिति को लगभग अपनी आंखों के सामने देखा। लेकिन दुनिया को बड़े खतरों की तरफ धकेलने वाली दूसरी चीजें भी हैं। ड्रोन आत्मरक्षा के लिए एक बेहद प्रभावशाली तकनीक बन चुके हैं। लेकिन अगर उन पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं रहा तो हिंसा को देशों की नियंत्रण क्षमता से भी तेजी से फैला सकते हैं। हम इसके असर सूडान और यमन में देख चुके हैं। और यह ड्रोन उन देशों ने भी इस्तेमाल किए हैं जिन्हें हम अपना करीबी दोस्त मानते हैं। ईरान ने एक और खतरनाक मिसाल को सामान्य बना दिया है।

राजनीतिक को राज्य की नीति के एक वैध औजार की तरह स्वीकार किया जाने लगा है। अगर ईरान में युद्ध विराम कायम भी रहता है तब भी हम संगठित वैश्विक हिंसा के खिलाफ मौजूद अवरोधों को कमजोर कर रहे हैं। अब समझते हैं कि आखिर भारत जिन सिद्धांतों के पक्ष में खड़ा है, वे साफ नजर क्यों नहीं आ रहे। इसे समझने के लिए हमें देखना होगा कि इस पूरी तस्वीर में भारत कहां खड़ा है।

सबसे पहले तो हमने अपनी स्थिति को लेकर दोहरी भाषा बोली। हम उतने मल्टी अलाइन नहीं थे जितना हम दावा करते रहे। ईरान अपने इलाके में एक जटिल शक्ति है। कई बार वह क्षेत्र के दूसरे देशों के लिए अस्थिरता भी पैदा करता है। लेकिन वो लंबे समय से अमेरिकी दबाव का सामना करने वाला देश भी रहा है और किसी भी संभावित क्षेत्रीय संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। इसके बावजूद हमने इजराइल को बहुत उत्साह के साथ अपनाया।

फिर अमेरिका को और बाद में यूएई को भी। ऐसा करते हुए हम खुद को उन राजनीतिक शक्तियों के साथ खड़ा कर बैठे जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर रही थी। समस्या इन रिश्तों में नहीं थी। भारत के इन देशों के साथ वैध हित जुड़े हैं।

समस्या यह थी कि अमेरिका के सामने हमारा रवैया एक याचक जैसा दिखाई दिया और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में हो रहे किसी भी अपराध का नाम लेने तक का साहस हम नहीं दिखा सके। दुनिया को यह बात साफ दिखाई देती है। समस्या यह है कि आज भारत ऐसा देश दिखाई देता है जो किसी भी सिद्धांत की रक्षा करने के लिए तैयार नहीं है। बेशक पश्चिम में ज्यादातर शक्तियां गहरे स्तर पर पाखंडी हैं।

लेकिन एक परिपक्व शक्ति दूसरों के पाखंड को अपनी गलतियों का बहाना नहीं बनाती। भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी को स्वीकार किया और उसे दुनिया की शांति जैसी सामान्य बातों के पीछे छिपाने की कोशिश भी की।

अब जब विराम हो गया है तो वैश्विक कूटनीति का काम सिर्फ यह सुनिश्चित करना नहीं है कि युद्ध विराम बना रहे। असल काम यह देखना है कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नियमों को कुछ हद तक बहाल किया जा सकता है। हम ऐसे दौर में हैं जहां अमेरिका जैसी बड़ी शक्ति मौजूद नियमों को बदलना चाहती है। दुनिया के बाकी हिस्से इस भ्रम में रहे हैं कि इसका जवाब सिर्फ द्विपक्षीय समझौतों से दिया जा सकता है। लेकिन आज जरूरत ऐसे वैश्विक गठबंधन खड़े करने की है जो नियमों की रक्षा करें और बड़े विनाशकारी जोखिमों की संभावना को कम करें। भारत की इकलौती कूटनीतिक प्रासंगिकता यही हो सकती है कि वह उन नियमों और सिद्धांतों की पैरवी करें। दुनिया को इस विराम का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि उन सिद्धांतों और साझा वैश्विक हितों के समर्थन को फिर मजबूत किया जा सके जिनसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था संभव होती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह लंबे समय में भी भारत के हित में है और यह उसकी असली ताकत का स्त्रोत भी है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी मध्यस्थता की क्षमता नहीं खोई। उसने यह भरोसा खोया कि दुनिया को पता हो कि भारत आखिर किसके पक्ष में खड़ा है।

2014 से पहले की विदेश नीति में नैतिकता की बातों को लेकर आज काफी आलोचना होती है। उस नीति की अपनी सीमाएं थी। लेकिन अब एक खालीपन ने उसकी जगह ले ली है और उस खालीपन को यथार्थवाद का नाम दिया जा रहा है। पीवी मेहता के इन तर्कों पर

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