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हँसी का बादशाह… गोविंदा की बर्बादी का सच कैसे बने हीरो से जीरो ?जानकर हैरान रह जाएंगे।

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मेरे बारे में कुछ कहना नहीं। चुपचापबैठे रहो बोलना नहीं। उस इंसान ने टाइम की कदर नहीं की। आज टाइम ने उसकी कदर छोड़ दी। अब मेरे को नहीं गाने का है। मेरी मर्जी। भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में गोविंदा इकलौते ऐसे नाम थे जिसके बारे में कोई प्रोड्यूसर, डायरेक्टर या उनके साथ काम करने वाला कोई भी कलाकार अगर उनकी बुराई करता तो यकीन मानिए कुछ ही लम्हों बाद उनकी जुबान से तारीफ के गोविंदा के बारे में जरूर फूल झड़ने लगते हैं।

उसको साइन करो तो लेट आता है बस। मेरे हिसाब से लेकिन आज भी वन ऑफ द मोस्ट अमेजिंग एक्टर्स इज गोविंदा। गोविंदा का फिल्मी सफर 1986 में शुरू हुआ और हैरत की बात तो यह है कि महज कुछ फिल्मों के बाद ही उनकी शहरत अपने सवाब पर पहुंच गई। कहते हैं सिर्फ 2 सालों के अंदर गोविंदा ने इंडस्ट्री की तकरीबन हर हीरोइन के साथ काम कर लिया था। कौन सी अभिनेत्रियों के साथ आपने अभी तक फिल्में की? मैं तकरीबन 99% सभी हीरोइन के साथ काम कर चुका हूं। बड़ी से लेकर तो छोटी तक। स्वच्छ जब संजय दत्त, अनिल कपूर, सनी देओल, शाहरुख खान, सलमान खान, आमिर खान, अजय देवगन और अक्षय कुमार जैसे सितारे एक्शन के मैदान में अपनी बादशाहत कायम कर रहे थे। वहीं दूसरी ओर गोविंदा ने अकेले अपने दम पर हंसी और खुशियों की एक अलग दुनिया खड़ी कर दी थी।

अरे मंडे तक अगर तूने पैसा नहीं दिया ना तो तू कुरु मैं यानी कि एक पैरेलल इंडस्ट्री। वो थी कॉमेडी की इंडस्ट्री। रहने दो रहने दो। आओ मां बदलत के गले लग जाओ। हां, शाहरुख, सलमान या आमिर से उन्हें वक्त बेवक़ मुकाबला मिलता रहा। मगर सच्चाई यह है कि अपने प्राइम इयर्स में गोविंदा का कोई असली मुकाबला था ही नहीं। सुन, चुन्नू वो खंभा नहीं है। जिसे तुझ जैसा कुत्ता टांग उठा के गीला कर डाले। क्या? ये यहां तक कि अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार ने भी एक इंटरव्यू में मान लिया कि गोविंदा की एनर्जी का सेट पर मैच कर पाना तकरीबन नामुमकिन होता था।

एक ट्रेन चुरा ले थे हमने। क्या? रेलगाड़ी में प्लेन इसलिए नहीं लूटते कि ऊपर से माल फेंकेंगे नीचे टूट जाएगा। [हंसी] कमेटी अच्छी करता है। छोड़ देते हल्की फुल्की कभी-कभी। अब कहते हैं, जहां मेरे पास गिरे चुने लोग ऑटोग्राफ लेने आते थे, वहीं गोविंदा के लिए भीड़ उमड़ पड़ती तुम दोनों हो कौन? ना चीज़ को बड़े मियां कहते हैं। अरे इस चीज को छोटे मियां।

दोस्तों उस दौर में गोविंदा के पास इतना काम था कि उनकी नींद महज 3 से 4 घंटों की होती थी। यहां तक कि एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने एक साथ 70 फिल्में साइन कर ली। कितनी फिल्में करते हैं रिकॉर्ड? मैं मेरा डिपेंड करता है कभी दो करता हूं। कभी चार करता हूं, कभी पांच करता हूं। जरा सोचिए एक सितारा जिसकी चकाचौंध से इंडस्ट्री का हर कोना रोशन गोविंदा के पास इस समय कोई 50-60 के करीब फिल्में हैं। क्या ये बात सही है? मेरे पास 70 70 फिल्में हैं। आज उसी सितारे की ओर एक भी दर्शक नहीं बल्कि पूरी इंडस्ट्री भी उनसे नजरें फेर चुकी है। क्या करें? हम गरीबों की जिंदगी खत्म हो जाती है मगर हमारे काम खत्म नहीं होते। लोग तारीफ तो करते हैं मगर काम देने की बारी आती है तो सब चुप्पी साध लेते हैं।

क्या यह कहा जा सकता है कि गोविंदा को अब काम करना पसंद नहीं या फिर यह सच है कि उन्हें कोई काम देना ही नहीं चाहिए। मैं वो लोग से कहना चाहूंगा पर मुझ पर बहुत कृपा है बाप्पा की। मैं 100 करोड़ का काम छोड़ चुका हूं। मगर पिछले 10 से 15 सालों से वही गोविंदा अपने ही अतीत की छाया से जूझ रहे हैं। जहां बॉबी देओल, सनी देओल, संजय दत्त जैसे सितारे शानदार कमबैक कर चुके हैं। वहीं गोविंदा अब भी पर्दे से गायब हैं। उनके चाहने वालों ने उन्हें बड़े पर्दे पर देखे हुए 5 सालों से भी ज्यादा वक्त गुजार दिया है। गोविंदा साहब का कहना है कि इंडस्ट्री के कुछ लोगों ने उनके खिलाफ साजिश रची है। उनकी फिल्मों को थिएटर तक पहुंचने से रोक दिया जाता है।

ऐसा ही कैसे हो गया कि गोविंदा की ही फिल्म रिलीज नहीं हो रही है। बैलेंसर ही नहीं मिल रहा है। मुझे किसी का साथ नहीं रहा। मगर क्या आप यकीन करेंगे अगर मैं कहूं कि गोविंदा के डाउनफॉल का असल कारण कुछ और भी था। एक ऐसा राज जिसके बारे में कभी किसी ने खुलकर बात नहीं की। क्या गोविंदा का राजनीति की राह चुनना गलत था? क्या उसी रास्ते ने उनके चमकते हुए नाम को गुमनामी की धूल में मिला दिया? अंडे का डबल हाफ फ्राई टकले की डाल खरबूजे की खाल बिनबत्ते की डाल मारू एक कान के नीचे आवाज आएगी तेरे नाक के नीचे। दोस्तों क्या गोविंदा जैसा हीरो किसी भ्रम का शिकार था जो खुद को जेम्स कैमरून की फिल्म का हीरो समझ बैठा। अवतार टाइटल मैंने ही दिया था। कहा मैं आयुर्वेद क्या-क्या करता रहता हूं और तुम ये कहा मुझे कलर करोगे पूरी बॉडी में मेरे। मैंने कहा मुझसे नहीं होगा। सॉरी। तो दोस्तों कैसे उनके गिरते करियर का एक कारण उनके अपने नाम से ही जुड़ा हुआ है। जिसे जो मिलता है नसीब से मिलता है। के बारे में और भी रहस्यमई कहानियां।

Lयूपी वाला ठुमका लगाऊं के हीरो जैसे नाच के दिखाऊं। इंडस्ट्री में ऐसा नेचुरल एक्टर शायद अब कभी नहीं होगा। ये तीन खान सलमान खान, शाहरुख खान और ये आमिर खान ये तीन के बराबर एक गोविंदा है। आज भले ही लोग उन्हें घमंडी कहते हैं। मगर आप उनके पुराने इंटरव्यू देखें तो साफ महसूस करेंगे। गोविंदा हमेशा खुद को एक खुशनसीब इंसान मानते थे। शायद इसलिए भी क्योंकि जिस जमीन से वह निकले थे उस जमीन पर खड़े होकर कोई भी ख्वाब में भी ऐसा नहीं सोच सकता था कि वो एक दिन सुपरस्टार बनेगा।

जा बाब तू ना रहा दिल बेकाबू क्या कर गई हसीना। पर दोस्तों इस स्टार डम के पीछे छिपे 21 साल के संघर्ष को अक्सर लोग भूल जाते हैं। जिसके लिए हमें एक बार थोड़ा पीछे चलना होगा। गोविंदा का बचपन महाराष्ट्र के विरार शहर की एक छोटी सी चोल में बी था। हालांकि उनका बैकग्राउंड आर्टिस्टिक था।

उनकी मां और पिता दोनों ही अपने जमाने के कलाकार रह चुके थे। घर में शेरों शायरी, अभिनय और संगीत की गूंज हमेशा बनी रहती। मगर सच्चाई यह थी कि गोविंदा का जीवन बहुत साधारण था। तब से मैंने जिंदगी में सिर्फ एक ही चीज सीखी है कि दुनिया में गरीब पैदा होना कोई जुर्म नहीं। गरीब मरना सबसे बड़ा जुर्म है। जवाब उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और वसई कॉलेज से बीकॉम की डिग्री हासिल की। मां चाहती थी कि बेटा अच्छी नौकरी करें और बेटे ने मां की ख्वाहिश पूरा करने की पूरी कोशिश की। मगर उनकी टूटी फूटी अंग्रेजी ने हर इंटरव्यू का दरवाजा बंद कर दिया।

कहीं से भी नौकरी हाथ नहीं लगी। इसका मतलब आप अंग्रेजी नहीं जानते। क्या बात करते हैं? अंग्रेजी में आपको हम काऊ का ऐसे सुनाऊं? बेटे को परेशान देख उनके पिता ने उन्हें राय दी। बेटा एक्टिंग एक ऐसी दुनिया है जिसमें ना निवेश की जरूरत है और ना निवेशक की। इसमें सिर्फ जरूरत है मेहनत, लगन और हुनर की। और यही वो लम्हा था जब गोविंदा ने ठान लिया कि अब उनका रास्ता सिनेमा की तरफ ही जाएगा। बम बम बम बम बम्बई बंबई हमको चम गई। और फिर किस्मत ने उन्हें मिला दिया गुफी पेंटर से जो उस वक्त बी आर चोपड़ा प्रोडक्शन हाउस के एडवरटाइजिंग मैनेजर थे और गोविंदा साहब के लिए यह मुलाकात किसी वरदान से कम ना थी। एक कार्यक्रम में जब उन्होंने गोविंदा के वन टेक परफॉर्मेंस देखे तो दंग रह गए।

उन्होंने तुरंत गोविंदा को 1 घंटे की [संगीत] शॉर्ट फिल्म दे दी। जब गोविंदा ने उस फिल्म को देखा तो उन्हें समझ में आ गया क्यों ना ऑडिशन देने से कहीं बेहतर होगा कि वह अपनी परफॉर्मेंस को कैमरे पर रिकॉर्ड करें और प्रोड्यूसर को दिखा दे। यहीं से उन्होंने अपनी कैसेट्स रिकॉर्ड की और कई प्रोड्यूसर्स को अपनी वो कैसेट्स दिखाई। का नजारा दिल की धड़कन थम गई। वैसे दोस्तों आपको बता दें यह 1980 का दौर था। अमिताभ बच्चन पॉलिटिक्स में जाने की वजह से अपनी चमक खोने लगे थे। विनोद खन्ना कमबैक करने की कोशिश कर रहे थे। और अगर तीनों खान की बात करें तो शाहरुख, सलमान और आमिर अभी मैदान में उतरे नहीं थे।

अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी का नाम तो दूर-दूर तक नहीं था। तो ऐसे दौर में जब इंडस्ट्री के बड़े-बड़े चेहरे ठहराव महसूस कर रहे थे। गोविंदा एक ताजा हवा की तरह है। उन्होंने दर्शकों को वो दिया जिसकी उन्हें तलाश थी। हंसी, रंग, नृत्य और जिंदगी से भरपूर करिश्माई अदाकारी। फिल्मों के सारे हीरो मेरे आगे है जीरो। साल था 1986 और अचानक जैसे आसमान में कोई नया सितारा चमक उठा हो। लव 86, इल्जाम, तन बदन जैसी फिल्मों ने गोविंदा को महज एक झटके में फिल्मी दुनिया का उभरता नायक बना दिया।

इन फिल्मों की कामयाबी ने उनकी तकदीर बदल दी थी। आई एम स्ट्रीम डांसर। आई एम स्ट्रीम डांसर। गोविंदा और उनका परिवार जो बरसों से मुंबई की चोल की जिंदगी जी रहा था। अब एक नई उम्मीद के साथ अपने सपनों को परवाज देता नजर आ रहा था। मुंबई में नए-नए आए हो और सर छुपाने के लिए छप्पर भी नहीं मिला अभी तक। यह बताओ कि तुम्हारा आगे का क्या प्रोग्राम? वैसे दोस्तों आज हम गोविंदा को उनकी बेहतरीन कॉमेडी के लिए जानते हैं। लेकिन उस वक्त उन्हें पहचान मिल रही थी उनके डांस और उनके एक्शन के लिए। कहते हैं इल्जाम की शूटिंग खत्म होते ही उन्होंने लगातार 30 फिल्में साइन कर ली और आलम यह था कि एक दिन में तीन-तीन फिल्मों के सेट पर जाना उनकी रोजमर्रा की आदत बन चुकी है।

लोग कह रहे हैं कि गोविंदा साहब के पास डेढ़ 200 फिल्में हैं। अरे वाह डेढ़ 200 नहीं है भैया। और नतीजा यह हुआ कि हर एक फिल्म सुपरडुपर हिट। ऐसा ठुमका जो आम दर्शक से लेकर समीक्षक तक सबको झूमने [संगीत] पर मजबूर कर देता था। यूपी वाला ठुमका लगाओ के हीरो जैसे नाच के दिखाऊं।

दर्शक गोविंदा को देखकर झूमने लगते। यह वो दौर था जब गोविंदा पर्दे पर आते थे तो थिएटर की दीवारें मुस्कुरा उठती थी। जहां वह खड़े होते वहीं से फिल्में हिट हो जाती। मगर कहते हैं ना जिंदगी कभी सिर्फ तालियों की नहीं होती। कभी-कभी उन तालियों के शोर में अपने ही कदमों की आहट खो जाती है और गोविंदा भी खो गए अपने ही बनाए शोर में। अरे भाई इस मासूम का कोई वारिस है? मैं तीन गिनूंगा। अगर तीन गिनने तक कोई नहीं आया तो यह बच्चा मेरा हो जाएगा। महज 24 वर्ष की उम्र में वो 70 फिल्मों के कॉन्ट्रैक्ट साइन कर चुके थे। सुबह की पहली किरण से लेकर रात के आखिरी सीन तक वो भागते रहते एक सेट से दूसरे सेट पर एक चेहरे से दूसरे किरदार में कभी हीरो बनकर हंसाते तो कभी आशिक बनकर रुलाते।

ऐसी बात नहीं करने का। तू पंखा बनाता है कि नहीं? अबे बनाना पंखा। मेरी का पंखा है। मैंने कभी तुम्हारे जिस्म से नहीं तुम्हारी आत्मा से प्यार किया। पर इस दौड़ भाग के बीच में शायद उन्होंने खुद से मिलने का वक्त नहीं निकाला और यहीं से शुरू हुआ वो सफर जो उन्हें आसमान से जमीन पर ले आया। गोविंदा साहब एक के बाद एक सुपरहिट फिल्म देते चले जा रहे थे। उनके पास फिल्मों की लाइन लगी थी। तभी दिलीप कुमार साहब ने उन्हें सलाह दी। गोविंदा 70 नहीं सिर्फ सच्ची कहानियों पर ध्यान दो और सिर्फ उन्हें ही साइन करो। हर फिल्म को एक मकसद दो।

21 साल का था मैं। हमने 75 फिल्म साइन कर ली थी। आदरणीय दिलीप साहब की ऐसी मुझ पर कृपा रही के वो आए कहे गोविंद इसमें से 25 फिल्में छोड़ दे। गोविंदा ने उनकी बात मानी भी 25 फिल्में छोड़ दी। मगर फिर भी 40 फिल्में बाकी रह गई और वो चल पड़े बिना रुके और बिना थंबे। कभी गोरेगांव का सेट तो कभी बांद्रा और कभी फिल्म सिटी। गोविंदा का दिन सूरज से पहले शुरू होता और देर रात को खत्म होता। मेरा सामान तेरे को चला गया और मैं बेवकूफों की तरह देखती रही। पता भी नहीं पूछा। तो भूल गई तुझे कुछ नहीं।

कई बार तो हालात ऐसे हो गए कि मेकअप के नीचे उनकी थकान मुस्कुरा रही होती थी। कमरिया से सारी आई [संगीत] अब आंटी की। पर ज्यादा काम, ज्यादा शोहरत और जरा सी लापरवाही। किस्मत को यही तो चाहिए होता है किसी कहानी को पलटने के लिए। इतनी सारी फिल्में होने की वजह से गोविंदा सेट पर लेट पहुंचने लगे और उनकी लेट लतीफी मशहूर होने लगी। कहते हैं एक बार अमरीश पुरी साहब ने उन्हें देर से सेट पर आने की वजह से जोरदार थप्पड़ जड़ दिया और यह थप्पड़ सिर पर नहीं कैरियर पर पड़ा था।

सारी फिल्म सिटी में यही बात जगजाहिर हो गई थी कि गोविंदा बड़े-बड़े सुपरस्टार को सेट पर इंतजार करवाते हैं और यह बातें अब दर्शकों तक भी पहुंचने लगी थी। पूरी इंडस्ट्री बोलती थी कि उसको साइन करो तो लेट आता है बस। था कि लेट ही प्रोबब्ली इज टू स्लीप लेट एंड रीच लेट। वो दर्शक जो कभी गोविंदा के एक एक्सप्रेशन के दीवाने थे वो भी कहने लगे थे। अब वो पुराना गोविंदा नहीं रहा। कंप्लीट एंटरटेनर कंप्लीट एक्टर हर फन में माहिर है। लेकिन इंडस्ट्री जैसे पिछले कुछ सालों में बदली है गोविंदा नहीं बदले। और इंडस्ट्री के वो लोग जो कभी उनके साथ काम करने के लिए लालायित रहते थे वो भी कहने लगे थे वो आता तो है पर कभी वक्त से नहीं आता। और मैंने हर दूसरे कलाकार से सुना है कि गोविंदा काफी लेट आते हैं अपने फिल्मों के सेट पर।

कहते हैं वक्त जब रूठता है तो सिर्फ शोहरत नहीं छीनता। वो इंसान का यकीन भी तोड़ देता है। उसके साथ काम करने का बस एक ही होता था कि टाइम पे जरा वक्त के पाबंद नहीं थे। कि शायद गोविंदा की सबसे बड़ी गलती थी कि उन्होंने जिंदगी को भी एक कॉमेडी फिल्म समझ लिया। जहां आखिरी में सब कुछ ठीक हो जाता है। नािया ने पागल मुझे किया। लेकिन असल जिंदगी में कट के बाद भी दर्द बाकी रहता है। पर अब सवाल तो यह है क्या सिर्फ उनकी ही गलती थी या फिर उस सिस्टम की जिसने एक चमकते सितारे को धीरे-धीरे बुझा दिया। वैसे में जो ताकत है वो मां के आशीर्वाद में नहीं देवताओं की जुबान में नहीं।

सत्य शिव सुंदर सब कहता है। सेट पर उनकी लेट लतीफी अब मशहूर हो चली थी। अब वो प्रोड्यूसर जो कभी गोविंदा के नाम पर फिल्में भेज देते थे अब माथा पकड़ने लगे थे। धीरे-धीरे ये चर्चा इंडस्ट्री की गलियों में तैरने लगी थी। गोविंदा के बारे में तो कुछ बोलो। क्या बोलूं? ये जो लेट आता है। मैंने क्या किया? गोविंदा अब पहले वाले गोविंदा नहीं रहे। अब उनमें एक अजीब सी अकड़ आ गई है। ऐसा ही एक किस्सा मशहूर है। फिल्म एक और एक 11 की शूटिंग चल रही थी। गोविंदा को एक सीन पसंद नहीं आया। वो बोले भाई डेविड यह सीन ऐसे नहीं चलेगा। इसे बदल दो।

डेविड धवन जो गोविंदा के सबसे करीबी दोस्त माने जाते थे। वे बोले नहीं चीची सीन जैसा है वैसा परफेक्ट है। और उस सीन पर मोहर लगा दी। उनके साथ काम कर रहे हीरो संजय दत्त ने। संजय दत्त ने कहा सीन तो बिल्कुल सही है। गोविंदा का चेहरा तमतमा उठा। एक सीन की बहस ने दोस्ती का रिश्ता तोड़ दिया। कहते हैं उस दिन से गोविंदा और संजय दत्त एक दूसरे से नजरें चुराने लगे। पाजी नाराज क्यों हो रहे हो यार? मैं एक्साइटमेंट में बकवास कर रहा हूं। मैंने बचपन में एक बार हाथ गाड़ी चलाई थी।

लोग कहने लगे अब गोविंदा के अंदर घमंड आ गया है। मर शायद कोई नहीं जानता था कि वह घमंड नहीं एक अंदरूनी बेचैनी थी। एक बेचैनी खुद को साबित करने की जब दुनिया उन्हें पुराना हीरो कहने लगी। जो गोविंदा बेहद नम्र स्वभाव के थे। उनमें चिड़चिड़ापन आ गया था। हालात तो यह हो गए कि फिल्म रन भोला रन की शूटिंग के दौरान जब एक जूनियर आर्टिस्ट को गोविंदा को थप्पड़ मारना था। थप्पड़ जरा जोर से लग गया।

गोविंदा के सब्र का बांध यहीं टूट गया। उन्होंने उस एक्टर को धक्का दे दिया और गुस्से में डायरेक्टर नीरज बोरा को भी तमाचा जड़ दिया। अरे जा कोई जरूरत नहीं है मुझे किसी की। लोग यह भी कहते हैं कि गोविंदा के साथ वही हुआ जो राजेश खन्ना और देवानंद साहब के साथ हुआ। गोविंदा साहब हीरो के रोल से हटना ही नहीं चाहते थे। वह हमेशा लीड हीरो बनके आना चाहते थे। रोहिंदा साहब मानते थे कि कैरेक्टर रोल उनकी शान के खिलाफ है। इसी अहंकार में उन्होंने कई बड़ी-बड़ी स्क्रिप्ट रिजेक्ट कर दी। जैसे कि चांदनी, गदर, देवदास, ताल और अवतार जैसी बड़ी फिल्में। एक्चुअली ज्यादा चल रही थी उन दिनों। तो थोड़ा सा था, हवा में था मैं। जनाब, बॉलीवुड में हवाएं भी बदल चुकी थी। वो दौर आ चुका था जब सिनेमा की हंसी सिर्फ चेहरे से उठती थी। अब दर्शक कॉमेडी तो चाहते थे पर टिपिकल नहीं। ऊपर से हमको किसी ने पानी नहीं। अरे बाबूजी अरे पन्नू तू तो बाबूजी अब उन्हें चाहिए थी मल्टीस्टार धमाल।

जहां हेराफेरी, गोलमाल, हंगामा जैसी फिल्मों में हंसी की बरसात कई चेहरों से हो रही थी। के साइड में एक रेड बटन है। ह दबा दिया। नहीं दबाना था। मगर वही एक शख्स था गोविंदा जिसे अब भी यकीन था कि 90ज का वो बादशाह है जो एक मुस्कुराहट से भीड़ को दीवाना बना सकता है। अपने आप को मुगले आजम हम लोग का अनारकली समझता है बे। कितना नचा रहा है। पर आपको तो पता है वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। साल 2000 के आते-आते गोविंदा की फिल्में एक-एक करके बॉक्स ऑफिस पर गिरने लगी। अंखियों से गोली मारे बेटी नंबर वन दिल ने फिर याद किया प्यार दीवाना होता है। सबकी सब फिल्में फ्लॉप होने लगी थी। शायद तब गोविंदा को समझ जाना चाहिए था कि 90ज का पर्दा गिर चुका है। पर अफसोस गोविंदा वो नहीं कर पाए जो उनके समकालीन कर गए।

जैकी साफ, मिथुन, अनिल कपूर सब ने अपने किरदारों का रंग बदला। मगर गोविंदा वो अपने किरदार में बंधे रह गए। हां, यह बात उनकी पत्नी सुनीता अहूजा तक ने भी कह दी। हीरो सिर्फ एक समय तक के लिए रहता है। आपको ट्रेंड के साथ चलना चाहिए जैसे वो मैं सोचती हूं। मे बी ही डिडट लाइक कि मैं सेकंड लीड करूं क्योंकि उसने 90ज में सोलो हिट्स ही मारे थे। हां, जब यही बात उनके सबसे अच्छे मित्र डेविड धवन ने भी कही तो यह बात गोविंदा को इतनी बुरी लगी कि उन्होंने 10 सालों तक डेविड धवन से बात तक नहीं की। फोन पे मैंने सुन लिया वो कह रहे हैं बहुत सवाल पूछने लग गया है। यह मेरा नहीं दिल है कि मैं उसके साथ काम करूं। देखो जो छोटा-मोटा रोल कहीं मिल जाए तो कर ले।

तो आइए दोस्तों कुछ उन पहलुओं पर बात कर लेते हैं जिनसे गोविंदा की रफ्तार मानो थम सी गई। हां सेट पर देरी से पहुंचना उनकी पहचान बन गई थी। जब तक फिल्म हिट थी तब तक कोई इन बातों पर बात नहीं करता। पर जैसे ही फ्लॉप का दौर शुरू हुआ लोगों ने कहना शुरू कर दिया। वो तो लेट ही आएंगे। जो है वैसा रहेगा नहीं। हम्म। जो कल जो होगा वैसा रहेगा नहीं। जो परसों है वैसा रहेगा नहीं। हमेशा चेंज होता रहता है ना? हां। यह गोविंदा की काबिलियत ही थी कि हर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर जब भी उनकी लेट लतीफी की बात करता तो वो यह बात जरूर कहता। गोविंदा देर से आते हैं मगर जब आते हैं तो तीन दिन का काम 3 घंटे में कर जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी बुराई होती है कि वो कहता है लेट आता है। अब मैंने तीन फिल्में बनाई।

पहले हिस्ट्री में भी लेट आता था लेकिन मेरा काम हो जाता था। कहते हैं गोविंदा बहुत ज्यादा अंधविश्वासी हो गए थे। एस्ट्रोलॉजी, न्यूमरोलॉजी, राहु काल अब यह सब उनके फैसले तय करने लगे थे। मैंने 24 लाख गायत्री उपासना की। मैं कभी हीरो दिखाई नहीं देता था। हमें हीरो लगने लग गया। अब यह गोविंदा के अंधविश्वास थे या उनके डूबते हुए कैरियर से घबराना था। हमारे बिना जी सकती है। तू इसे जीने दे और चल वरना हम मर जाएंगे। रुसल पहला निरहानी कहते हैं कि कभी-कभी तो वो शूटिंग के दौरान चिल्लाने लगते। सब लोग दूर हट जाओ। झूमर गिरने वाला है। कभी कहते कादर खान पानी में डूब जाएंगे और तो और उनके कपड़ों के रंग भी अब ज्योतिषी तय करने लगे थे।

इसी एस्ट्रोलॉजी से जुड़ा आपको एक मजेदार किस्सा बताते हैं। उनकी फिल्म थी मनी है तो हनी है। इस फिल्म की शूटिंग चल रही थी। गोविंदा ने सेट पर एक ज्योतिषी को बुलवाया। ज्योतिषी बोला साहब आपका राहु काल चल रहा है। अगर एक मुर्गी सेट पर लाई जाए तो सब मंगल हो जाएगा। बस फिर क्या था? प्रोडक्शन टीम ने सचमुच में एक मुर्गी मंगवाई। मुर्गी के साथ शूटिंग शुरू हुई पर मुर्गी मर गई। मगर गोविंदा साहब ने उस ज्योतिषी की बात को मानते हुए उस मरी मुर्गी के साथ सूट पूरा किया। इसी तरह से तमाम घटनाएं जो गोविंदा अंधविश्वास के तौर पर अपना जाते थे। साधु वली सभी यही कह गए हैं। तो दोस्तों इसे नियति का खेल ही कहिए कि वक्त बदल गया। लोगों की पसंद बदल गई पर गोविंदा नहीं बदले और यही उनके सबसे बड़ी हार का कारण बना। 90ज के टॉप स्टार हो।

अभी आप 90ज के दुनिया में आज भी रहोगे दैट्स नॉट गोइंग टू वर्क। अगर गोविंदा अपने जीवन में किसी को सबसे ज्यादा मानते थे तो वह थी उनकी मां। वो मां जिनके कहे शब्द गोविंदा के लिए किसी फरमान से कम नहीं थे। जैसी करनी [संगीत] वैसी भरनी। उनकी पत्नी सुनीता भी एक बार कहती हैं, “मुझे अपने जीवन में गोविंदा जैसा पति ना मिले। मगर गोविंदा जैसा बेटा जरूर मिले। क्योंकि ऐसा बेटा नसीब वालों को मिलता है। गोविंदा की मां बेहद आध्यात्मिक थी।

गोविंदा खुद कहते हैं वह जो कह देती वही हो जाता। यहां तक कि उन्होंने अपनी की तारीख 3 महीने पहले बता दी और गोविंदा की मां उसी तारीख को दुनिया को छोड़कर चली गई। वैसे जब 1993 में उनकी तबीयत बिगड़ी तो गोविंदा ने 60 लाख बार महामृत्युंजय जाप किया। सोचिए 60 लाख बार एक बेटे की ममता का यह मंजर आज के जमाने में शायद ही कोई समझ पाए। गोविंदा बताते हैं कि एक बार उनकी मां ने कह दिया था 21 साल की उम्र में तुम इंडस्ट्री में कमाल कर दोगे और सच में वैसा ही हुआ।

और जब मेरे पास खूब काम आया तो मां ने यही कहा अगर भगवान ने तुम्हें काम दिया है तो तुम्हें काम से इंकार करने का कोई हक नहीं। और भगवान ने जब मुझे काम दिया है तो मैं क्यों ठुकराऊं? मुझ जैसे कितने ऐसे लोग हैं जिनको काम ही नहीं मिलता। पर क्या यही सच था कि उन्होंने मां के कहने पर इतना काम किया। उनके कंधों पर परिवार टिका था। गोविंदा ने अपने जीवन में 11 मौतें देखी थी। अपने पिता, अपनी मां, अपने कजिंस, अपनी बहन, जीजा यहां तक कि अपनी खुद की बेटी को दुनिया छोड़कर जाते देखा था।

इतने हादसों के बाद भी उन्होंने किसी रिश्ते को अधूरा नहीं छोड़ा। हर जिम्मेदारी को दिल से निभाया। फिर चाहे वह उनकी बहन का बच्चा हो या अपना खुद का बच्चा। जिसने जो मांगा वो दिया। लेकिन इन सबका नतीजा यह हुआ कि वह हर वक्त काम में डूबे रहने लगे और ज्यादा काम करने की वजह से अक्सर लेट हो जाया करते। और जब उनकी फिल्में फ्लॉप होना शुरू हुई तो इंडस्ट्री ने उनसे भरोसा उठा दिया। वैसे उगते सूरज को तो सभी सलाम करते हैं और इंडस्ट्री का तो यह पुराना नियम है। प्रोड्यूसर विशाल जी कहते हैं कि गोविंदा बेहद जमीनी थे। वो सभी की बातों को सुन लिया करते थे। मेरे हिसाब से हिंदुस्तान में 90% एक्टर लेट आते लेकिन किसी की हिम्मत नहीं होती है मुंह पर बोलने की। गोविंदा का करियर अब उस मोड़ पर था। जहां से लौटना मुश्किल था। धीरे-धीरे वो ज्योतिष और अंकों में डूब गए। वैसे ऐसा नहीं कि इस ज्योतिष से उनका नया-नया लगाव हुआ था। उनका नाम ही कुछ किस्मत के भरोसे था। उनका असली नाम गोविंद अरुण अहूजा था।

मगर अंक शास्त्रियों के कहने पर उन्होंने उसे बदलकर गोविंदा कर लिया था। चांद का डोला लाया हूं दुल्हन आनंद आनन आनंद आनंद आनंद आनंद आनंद। इसी तरह किसी ज्योतिषी ने कहा कि तुम्हें राजनीति में उतरना चाहिए। राजनीति में तुम बहुत ऊपर तक जाओगे। बस फिर क्या था गोविंदा का करियर तो डगमगा ही रहा था और उन्होंने राजनीत की तरफ भी मुंह मोड़ लिया। अब बॉलीवुड से उनका दूर-दूर तक नाता खत्म हो गया था। मैं अपने सर पे हाथ के कसम खाता हूं कि मैं जो कुछ भी [संगीत] कहूंगा सच कहूंगा। सच के सिवा कुछ भी नहीं कहूंगा। लेकिन मैं जब भी किसी से कुछ कहने चाहता हूं तो वो लोग मुझे बोल देते और यह फैसला उनके करियर के लिए बहुत खराब साबित हुआ।

राजनीति के बाद प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का विश्वास उनसे पूरी तरह उठ गया। मैं जिस वक्त से पॉलिटिक्स से बाहर आया हूं, मुझे 5 साल काम नहीं मिला और उस 5 साल काम नहीं मिलने पे मुझे और मेरे परिवार को काफी कष्ट से निकले। अब ना फिल्में थी और ना ही रोल और ना ही नए ऑफर। गोविंदा कभी हीरो नंबर वन थे। अब इंडस्ट्री में नो वन बन चुके थे। जरा सोचिए एक ऐसा आदमी जो कभी लाखों चेहरों पर मुस्कान लाया करता था। वो आज खुद अपनी हंसी के पीछे एक सन्नाटा छुपाए बैठा है। मेरा तू मेरा तू मेरा तू मेरा हीरो नंबर कभी जो हर फ्रेम में जान डाल देता था वो आज किसी फ्रेम में नजर ही नहीं आता पर मेरे इस वीडियो को देखने के बाद आप जरूर कमेंट करिएगा क्या मैं सही हूं गोविंदा का नाम कभी मिटा नहीं बस ठहर गया है क्योंकि आज भी जब हम टीवी खोलते हैं और टीवी पर जब उनका डांस और उनके गाने बजते हैं तो लाखों चेहरे मुस्कुराए बिना रह ही नहीं पाते। तू मुझको उतार दे दे और बदले में क्योंकि यही सच्चाई है।

वैसे एक बात तो तय है कि ऐसा कलाकार सदी में सिर्फ एक बार ही पैदा होता है। अगर आप मानते हैं कि गोविंदा जैसा कलाकार ना कोई हुआ और ना कोई ऐसा कलाकार होगा तो इस वीडियो को जरूर शेयर करिए। कहने लगे कि आपको कोई डिलीवरी प्रॉब्लम नहीं है। मांगते हैं उतने बच्चे पैदा कर सकती हैं आप। इस सिलसिले में मेरी कोई भी खिदमत की जरूरत हो तो मैं हाजिर हूं। पकड़ के बैठ जाइए। इस उम्र में ऐसे ख्याल से भी आता है।

कैसे आए गोरी हम तोहरे घर मा? [संगीत] तो चलिए हमारे सवाल का जवाब जरूर दीजिएगा। अब बताइएगा कि गोविंदा जी ने बड़े मियां छोटे मियां को छोड़कर अमिताभ जी के साथ किस और फिल्म में काम किया है? अरे यह तो गाड़ी में बिठा लिया।

अरे कोई ऑटो दिला दो भैया। और उससे भी बड़ी बात गोविंदा जी अगर एक बार फिर पर्दे पर आए तो आप उन्हें किस हीरो के साथ देखना चाहेंगे? अपनी जुदा अपनी शान जुदा। ना समझ हम है इंसान जुदा। वो कैसे रोल करें जो आज एक बार फिर सक्सेस हो जाए। हां, गोविंदा जी को आप खुद क्या सलाह देना चाहेंगे कि एक बार हम सभी का चहेता यह हीरो हीरो नंबर वन फिर बन जाए। लव यू लव यू टू आई लवयू। दोस्तों, हर बार की तरह एक बार फिर मैं आपका दिल से शुक्रिया करता हूं। क्योंकि आपका एक-एक व्यू यही तो है जोमुझे और मेरे परिवार की किसी न किसी रूप में आर्थिक मदद करता है और मेरे जीवन यापन को थोड़ा सा और आसान बनाता है। एक ऐसी आलम भैया आंख हमारी नम गई।

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