बॉलीवुड में एक कहावत है कि यहां रिश्ते सेलुलाइट की तरह होते हैं। रोशनी पड़े तो चमकते हैं और अंधेरा आए तो बस एक खाली रील की तरह रह जाते हैं। यहां रिश्ते बने भी बहुत और टूटे भी बहुत। लेकिन सबसे ज्यादा खामोश [संगीत] रही वो आखिरी मुलाकातें। जब दो दोस्त हंसते बोलते साथ बैठे [संगीत] थे और उन्हें जरा भी एहसास नहीं था कि यह साथ बैठना उनकी दोस्ती का आखिरी लम्हा बनने वाला है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी है। एक ऐसी दोस्ती की कहानी जो किसी फिल्मी सीन की तरह शुरू हुई जिसमें भरोसा था, अपनापन था, जान देने [संगीत] वाला साथ था। लेकिन इसका अंत धीरे-धीरे आई खामोशियों में कहीं गुम हो गया। नमस्कार फिल्म की कारवाला एक बार फिर हाजिर है एक ऐसे किस्से के साथ जो शायद आपने पहले कहीं सुना हो लेकिन जितना सुना उससे कहीं ज्यादा अभी तक यह अनकाहा रहा। मैं बात कर रहा हूं अमिताभ बच्चन और अमजद खान के याराना की। दोस्तों, कहानी शुरू करने से पहले एक बात जरूर जानना चाहूंगा कि इस कहानी का असली गुनहगार कौन है? यह जरूर बताइएगा कमेंट बॉक्स पर अपने राय लिखकर। चलिए किस्से को सिलसिलेवार ढंग से शुरू करते हैं।
पर्दे पर एक जयता, एक गब्बर, एक हीरो और एक खलनायक। लेकिन कैमरे के पीछे दो ऐसे दोस्त जिनकी मिसाल पूरी फिल्म इंडस्ट्री दिया करती थी। साल 1975 रमेश सिपी की छोले [संगीत] रिलीज हुई और बॉलीवुड हमेशा के लिए बदल गया। फिल्म ने इतिहास रचा। अमिताभ बच्चन पहले से स्टार थे। लेकिन अमजद खान उन्होंने तो अपनी पहली फिल्म अपने पहले रोल से ही पूरे हिंदुस्तान को हिला दिया। कितने आदमी थे? ये सिर्फ डायलॉग नहीं था। एक पूरे दौर की पहचान बन गया। शो की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन और अमजद खान की दोस्ती धीरे-धीरे गहरी होती चली गई। दोनों घंटों साथ बैठते, हंसते, बातें करते और देखते ही देखते यह रिश्ता सिर्फ को स्टार्स का नहीं रहा बल्कि भाइयों से भी बढ़कर हो गया। उस दौर में अमिताभ बच्चन को लेकर एक बात बहुत मशहूर थी। लोग कहते थे कि वो घमंडी हैं, रिजर्व हैं और अपने अलावा किसी से ज्यादा मतलब नहीं रखते। लेकिन साल 1989 में एक ऐसी रात आई जिसने इन तमाम बातों को एक ही झटके में गलत साबित कर दिया। उस वक्त द [नाक से की जाने वाली आवाज़] ग्रेट गैंबलर की शूटिंग [संगीत] चल रही थी। अमिताभ बच्चन अमजद खान दोनों स्कूल में थे।
अमिताभ शूटिंग के लिए गोवा पहुंच चुके थे। अमजद खान भी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मुंबई से सड़क के रास्ते गोवा जा रहे थे। लेकिन रास्ते में एक भयानक सड़क हादसा हो गया और अमजद खान की कार बुरी तरह दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हालत इतनी खराब थी कि कुछ देर के लिए सबको लगा कि हादसे में कोई नहीं बचा। लेकिन जैसे तैसे किसी तरह अमजद [संगीत] खान ने अपने परिवार को संभाला और परिवार समेत खुद गंभीर हालत में पर्जी के एक अस्पताल पहुंच गए। जब यह खबर अमिताभ बच्चन तक पहुंची तो उनके पैरों से जमीन खिसक गई। वो तुरंत अस्पताल पहुंचे। डॉक्टरों ने जांच की तो पता चला कि अमजद खान की पसलियां टूट चुकी थी और उन्हीं टूटी हुई पसलियों ने उनके फेफड़ों को भी नुकसान पहुंचाया था। जो इंसान पर्दे पर अपनी आवाज से पूरे हिंदुस्तान को डरा देता था वो उस रात एक सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था। डॉक्टर ने साफ कहा तुरंत सर्जरी करनी होगी। [संगीत] लेकिन समस्या यह थी कि ऑपरेशन से पहले अस्पताल के कागजों पर किसी को जिम्मेदारी लेके दस्तखत कर लेते। कमरे में कई लोग मौजूद थे। फिल्म के लोग भी, करीबी लोग भी [संगीत] लेकिन कोई आदमी नहीं आया। सब डर रहे थे कि अगर कुछ गलत हो गया तो एक आदमी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था और उसके आसपास खड़े लोग जिम्मेदारी लेने से बच रहे थे और तभी एक हाथ आगे बढ़ा। वो हाथ अमिताभ बच्चन का। उन्होंने बिना एक पल रुके, एक पल गवाए, कागज उठाए, दस्तखत किए और डॉक्टरों से कहा, [संगीत] सर्जरी शुरू कर दी। उस रात जिस इंसान को लोग घमंडी कहते थे, उसी इंसान ने वो किया जो बाकी सब मिलकर नहीं कर पाए।
लेकिन अमिताभ सिर्फ यहीं नहीं रुके। उन्होंने अमजद खान को बेहतर इलाज दिलाने के लिए मुंबई पहुंचाने का फैसला किया। उस दौर में चार्टर्ड प्लेन का इंतजाम करना कोई छोटी मोटी बात नहीं थी। लेकिन अमिताभ [संगीत] ने वो भी किया। उस रात गोवा के उस अस्पताल में दोस्ती ने अपना सबसे खूबसूरत रूप दिखाया। वक्त बीता अमजद खान ठीक हुए और दोनों की दोस्ती पहले से भी ज्यादा गहरी हो गई। इतनी गहरी कि साल 1981 में [संगीत] एक फिल्म आई याराना उसमें गाना था तेरे जैसा यार कहां? लोग उसे सिर्फ एक फिल्मी गीत समझते थे। लेकिन जो इन दोनों को करीब से जानते थे वो समझते थे कि यह सिर्फ गाना नहीं है। यह उनकी दोस्ती की असली और मुकम्मल तस्वीर है। इससे पहले कि मैं पूरा किस्सा बताऊं, आपसे एक छोटी सी गुजारिश है। अगर आप ऐसे ही अनसुने अनप्रेटेड किस्से सुनना चाहते हैं तो प्लम कार वाला को अभी सब्सक्राइब कर लीजिए ताकि कोई किस्सा आपसे छूटे नहीं। चलिए कहानी को आगे बढ़ाते हैं। साल 1983 अमजद खान ने बतौर डायरेक्टर अपनी पहली फिल्म शुरू की टोरपुस। ये फिल्म सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं थी अमजद खान की। ये फिल्म उनके लिए एक सपना थी। वो चाहते थे कि अमिताभ बच्चन भी इस फिल्म में कम से कम एक गेस्ट रोल तो जरूर करें। लेकिन अमिताभ ने फिल्म का हिस्सा बनने से मना कर दिया। शायद वो व्यस्त रहे हो। शायद उन्हें रोल सही ना लगा हो या फिर उन्होंने अपने स्टारडम को देखते हुए इससे मना कर दिया हो। असल में वजह क्या थी ये कोई नहीं जानता। फिल्म बनी लेकिन बदकिस्मती देखी है कि वो सेंसर बोर्ड में अटक गई। डेढ़ साल तक फिल्म रिलीज नहीं हो पाई। अमजद खान टूटने लगे। उनका पहला सपना धूल खा रहा था। तब उन्होंने अपने पुराने दोस्त अमिताभ [संगीत] बच्चन का दरवाजा खटखटाया। उस वक्त अमिताभ बच्चन राजनीति में भी सक्रिय थे। उनकी पहुंच थी। उनका रसूख था। उनकी बातों में वजन भी था। और एक दोस्त की तरह उन्होंने मदद भी की। कहा जाता है कि उनकी कोशिशों के बाद टोरप्लेस रिलीज हो पाई। लेकिन यहीं से कहानी बदल गई। कुछ दिनों के बाद एक अखबार में खबर छपी कि कैसे अमिताभ बच्चन के पास अमजद खान पहुंचे और किस तरह से अमिताभ बच्चन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर फिल्म रिलीज करवाई। जब अमिताभ बच्चन ने वो खबर पढ़ी तो वो नाराज हो गए। उन्हें लगा कि दोस्तों के बीच की बात अखबार की सुर्खी कैसे गई? उन्होंने अमजद खान को बुलाया और पूछा ये खबर बाहर कैसे गई? अमजद खान खुद भी हैरान थे और इन सब बातों से अनजान भी थे।
उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ भी नहीं पता भाई कि यह क्यों हुआ, कैसे हुआ। लेकिन दोस्तों, कभी-कभी रिश्ते सच से नहीं सिर्फ शक से टूट जाते हैं और यहां भी वही हुआ। दोनों के बीच एक पत्नी सी दरार आ गई जो बाहर से दिखाई नहीं [संगीत] देती थी लेकिन अंदर मौजूद थी। वक्त बीतता गया। दोनों साथ काम भी करते रहे। लेकिन पहले जैसी बात अब दोनों के बीच में नहीं रही। बातचीत होती थी, मुलाकातें भी होती थी। लेकिन अब उन मुलाकातों में पहले वाली गर्माहट नहीं बची। दोनों शायद एक दूसरे को समझाना चाहते थे, लेकिन कौन पहल करे, कौन पहला कदम उठाए, यह तय नहीं हो पा रहा था। फिर आया साल [संगीत] 1999। शशि कपूर फिल्म अजूबा बना रहे थे। अमजद खान को फिल्म में बड़ा रोल मिला था, साइनिंग भी हो गई थी, मुहूर्त [संगीत] भी हो गया था। लेकिन शूटिंग शुरू होने से पहले अचानक अमजद खान को फिल्म से हटा दिया गया और उनकी जगह अमरीश पुरी को साइन कर दिया गया। अमजद खान को गहरा झटका लगा जब उन्हें यह पता चला। उन्होंने वजह जाननी चाही लेकिन कोई साफ वजह [संगीत] उन्हें नहीं मिली और तभी उनके [नाक से की जाने वाली आवाज़] मन में वो पुराना शक फिर जाग गया। उन्हें लगा कि शायद अमिताभ बच्चन ने अपना प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें फिल्म से बाहर करवा दिया। इस बार अमजद खान चुपचाप नहीं रहे। उन्होंने मीडिया [संगीत] के सामने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। लेकिन अमिताभ बच्चन उन्होंने कुछ नहीं कहा। ना सफाई दी, ना जवाब दिया बस खामोश रहे।
लेकिन दोस्तों कभी-कभी खामोशी सबसे ज्यादा [संगीत] दर्द देती है। अमजद खान को शायद सबसे ज्यादा यही बात चुभ कि जिस दोस्त का साथ उन्होंने हद से बाहर जाकर दिया उसी दोस्त ने इस पूरे वाक्य को लेकर कोई सफाई नहीं दी। ना इंकार किया ना इकरार किया वो एक शब्द भी नहीं बोला। लेकिन किस्मत शायद इन दोनों को एक आखिरी मौका देना चाहती थी। इसी दौरान एक फिल्म बन रही थी इंसानियत। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और अमजद खान एक बार फिर कास्ट किए गए थे। दोनों के शुभप्रिंंतक सोच रहे थे कि शायद अब सब ठीक हो जाएगा। शायद सालों की गलतफहमियां [संगीत] दूर हो जाएंगी। शायद फिर से वही पुरानी हंसी लौट आएगी। वही अपनापन, वही दोस्ती। लेकिन दोस्तों, जिंदगी हमेशा फिल्मों जैसी नहीं होती। कई बार क्लाइमेक्स आने से पहले कहानी खत्म हो जाती है। यहां भी ऐसा हुआ। अमजद खान ने इंसानियत फिल्म के कुछ सीन तो शूट किए लेकिन फिल्म कंप्लीट करते की उससे पहले 27 जुलाई 1992 को वो इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए। दो साल बाद जब इंसानियत रिलीज हुई तो लोगों को एहसास [संगीत] हुआ कि किस्मत ने इन दो दोस्तों को एक आखिरी बार साथ आने का मौका भी नहीं दिया। अमजद खान की मौत के साथ बहुत सी बातें अधूरी रह गई। एक सफाई जो शायद कभी [संगीत] दी जानी थी। एक मुलाकात जो शायद होनी जरूरी थी और एक दोस्ती जो शायद बच सकती थी लेकिन बदकिस्मती से कुछ नहीं हो सका। दो दोस्त बहुत दूर जा चुके थे।
इतनी दूर जहां से वापस [संगीत] आने का कोई रास्ता नहीं था। अमिताभ बच्चन ने एक बार कहा था कि उनका और अमजद खान का रिश्ता एक निशब्द संबंध था। निशब्द यानी बिना शब्दों का रिश्ता। और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा दर्द भी है क्योंकि कई रिश्ते लड़ाई से नहीं टूटते बल्कि इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि कुछ बातें वक्त रहते [संगीत] कही नहीं जाती। आज भी जब तेरे जैसा यार कहां गाना बजता है तो वो सिर्फ एक गीत नहीं लगता। ऐसा लगता है जैसे दो दोस्तों की अधूरी कहानी अब भी कहीं गूंज रही है। तो दोस्तों अगर यह किस्सा आपके दिल तक पहुंचा हो तो वीडियो को लाइक कीजिएगा और उस दोस्त को जरूर शेयर कीजिए जिसे आप होना नहीं चाहते। जिससे बात करने का दिल है जिससे सारे गिरे शिकवे मिटाने की ख्वाहिश तो है लेकिन हिम्मत नहीं हो रही है तो मेरे ख्याल से आज सही दिन है एक नई पहल की नई शुरुआत की क्योंकि रिश्ते टूटने में वक्त नहीं लगता है लेकिन कभी-कभी अपनी ओर से उठाया एक कदम उस रिश्ते को बचा सकता है और फिर हरा भरा कर सकता है। ऐसे ही अनसुने अनफिल्टर्ड किस्सों के लिए फिल्म कारवाला को सब्सक्राइब करना मत भूलिए। हम फिर मिलेंगे एक और हैरान कर देने वाले किस्से के साथ। तब तक अपना और अपनों का रखिए बेहद ख्याल।