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जब एक्टर जितेंद्र पर लगा अपनी ही बहन की इज्जत लूटने का आरोप फिर जो हुआ वो..

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आज ये दास्ता है उस शख्स की जिसके सफेद लिबाज और सफेद जूतों ने ना सिर्फ फैशन के मायने बदल दिए बल्कि बॉलीवुड के पर्दे पर कामयाबी की एक ऐसी इबारत लिखी जो आज भी सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। मुसाफिर हूं यारों ना घर है। आज बात मुंबई के चौल से निकल कर माया नगरी की बादशाहत पाने वाले उस बेमिसाल चेहरे की जिसे देखकर थिएटर में बैठी हर लड़की का दिल धड़क उठता था और सिनेमा हॉल की खिड़कियों पर टिकटों के लिए छिड़ जाया करती थी। तुमसे ओ हसीना कभी मोहब्बत ना मैंने करनी थी। तुमसे ओ हसीना। यह कहानी है उस कलाकार की जिसने पर्दे पर सिर्फ रोमांस नहीं किया बल्कि डांस को एक नया जुनून, एक नई रफ्तार और एक ऐसा अनोखा स्टाइल दिया कि दुनिया उन्हें जंपिंग जैक के नाम से पुकारने लगी। आज बात उस कद्दावर सितारे की जिसने 70 और 80 के दशक के बड़े-बड़े दिग्गजों की हुकूमत के बीच अपना एक अलग साम्राज्य खड़ा किया.

आज ये दास्तान है उस वर्सटाइल एक्टर की जिसने एक तरफ संजीदा फिल्मों में अपनी खामोश अदाकारी से लोगों की आंखें नमकी तो दूसरी तरफ दक्षिण भारतीय रिमेक का वो बादशाह बना जिसके आगे बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स हाथ बांधकर खड़े रहते थे। ताकी ओ ताकी ओ ताकी ताकी ताकी रे तब से तू आंख में ताकी आज ये कहानी है उस हिम्मत वाले रवि कपूर की जिसने जूनियर आर्टिस्ट से लेकर मेगा स्टार बनने तक का सफर अपनी मेहनत और पसीने से तय किया। हे कनवर लाल ना आज ये दास्ता है उस गूंजती हुई आवाज की जिसने जब भी पर्दे पर संवाद बोले तो पूरा हिंदुस्तान उसका मुरीद हो गया। विजय कुमार का बदन जिंदा है।

क्यों? अपने समाज की गंदगी को देखकर। यह कहानी है उस दौर की जब एक तरफ राजेश खन्ना का जादू था तो दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का एंग्री यंग मैन अवतार लेकिन उसी बीच अपनी एक अलग चमक बिखेरने वाला वो चेहरा जितेंद्र था।

जी हां कोई और नहीं। हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के एवर ग्रीन सुपरस्टार और चहेते अभिनेता जितेंद्र की। परदे जाके परदे आ गुड। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि जिस अभिनेता को पूरी दुनिया प्यार की मूरत मानती थी, उसी सुपरस्टार ने अपनी बचपन की मोहब्बत और बीवी को धोखा देकर एक नहीं दो नहीं बल्कि बॉलीवुड की कई बड़ी हीरोइनों के साथ अपनी नजदीकियों के चर्चे आम किए। एक में भी तन्हा थे। शो में भी अकेले हैं। क्या आप जानते हैं कि जिस जितेंद्र की शादी की शहनाइयां बजने वाली थी उसी वक्त एक दूसरे सुपरस्टार ने ऐ मौके पर पहुंचकर उस शादी को मंडप में ही उजाड़ दिया था। आखिर क्या थी वो कड़वी सच्चाई जिसने जितेंद्र को अपनी मोहब्बत से दूर कर दिया।

किसी से खेलना फिर छोड़ देना। क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी आया जब जितेंद्र पर उनकी ही अपनी चचेरी बहन ने यौन शोषण जैसे शर्मनाक और सनसनीखेज आरोप लगाकर पूरी फिल्म इंडस्ट्री को हिला कर रख दिया था।.

आखिर क्यों उनकी अपनी बहन ने दुनिया के सामने उन्हें एक गुनहगार के तौर पर पेश किया और क्यों अपनी मौत को करीब देखकर जितेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई थी। आखिर कैसे एक करवा चौथ की रात ने उनकी जिंदगी बचा ली। बताएंगे सब कुछ जितेंद्र के बचपन के संघर्ष से लेकर उनकी रंगीन मिजाजी के अनसुने किस्सों तक का सच। तो चलिए बिना किसी देरी के शुरू करते हैं जंपिंग जैक जितेंद्र की जिंदगी की यह सबसे गहरी विवादित और सनसनीखेज दास्तान। हसीनों हसीनों की ये आदत नमस्कार आप सभी का स्वागत है बॉलीवुड नवेल के इस एपिसोड में। सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी हर थोड़े से यह दास्तान शुरू होती है 7 अप्रैल 1942 के उस मंजर से जब पूरा हिंदुस्तान आजादी की लड़ रहा था।

पंजाब के अमृतसर के एक छोटी सी गली में अमरनाथ कपूर और कृष्णा कपूर के घर एक किलकारी गूंजी। घर में खुशियां तो आए लेकिन उस बच्चे के जन्म के साथ ही कुदरत ने एक अजीब खेल खेल दिया था। क्या आप यकीन करेंगे कि बॉलीवुड का यह ताकतवर दिखने वाला अभिनेता महज 7 महीने में ही पैदा हो गया था।

जी हां, जितेंद्र एक प्रीमेच्योर बेबी थे और उस वक्त उनकी मां की उम्र मात्र 15 साल थी। डॉक्टर्स के लिए भी यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि वो बच्चा सही सलामत रहा। लेकिन अमृतसर की वो गलियां रवि कपूर की किस्मत में ज्यादा दिन नहीं थी। विभाजन के कुछ समय बाद ही उनका परिवार सपनों के शहर बंबई आ गया। लेकिन दोस्तों, बंबई आने का मतलब यह नहीं था कि उनके पास कोई बंगला या फिर गाड़ियां थी। पूरा कपूर परिवार गिरगांव की एक रामचंद्र बिल्डिंग नाम की चौड़ में रहने लगा। जरा कल्पना कीजिए। एक ऐसा छोटा सा कमरा जहां एक तरफ खाना पकता था तो दूसरी तरफ पूरा परिवार सोता था। चोल की उन तंग गलियों और कतार में लगकर पानी भरने वाली जिंदगी के बीच रवि कपूर का बचपन बीता।

उनके पास पहनने के लिए महंगे कपड़े नहीं थे और ना ही खाने के लिए शाही पकवान। लेकिन आंखों में एक गजब की चमक थी जो चोल की उस अंधेरी गलियों को चीर कर आसमान छूना चाहती थी। पढ़ाई लिखाई के लिए उनका दाखिला गिरगांव के ही सेंटबेस्टियन बोयन हाई स्कूल में कराया गया और यहीं से शुरू होती है एक और दिलचस्प कहानी। क्या आप जानते हैं कि जिस बेंच पर बैठकर रवि कपूर स्कूल की पढ़ाई कर रहे थे उसी स्कूल में उनके साथ एक और लड़का पढ़ता था जिसका नाम था जतिन खन्ना। जी हां, वही जतिन खन्ना जो आगे चलकर दुनिया का पहला सुपरस्टार राजेश खन्ना बना।

मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू आई रुक मस्तानी कब इन दोनों की दोस्ती स्कूल से शुरू हुई और चर्च गेट के केसी कॉलेज तक साथ चलती रही ना छूटे यार ना छूटे ध्यान से बढ़कर यारी कॉलेज के दिनों में जहां राजेश खन्ना के पास अपनी गाड़ी थी तो वहीं रवि कपूर अक्सर पैदल या फिर बस के धक्कों में अपनी जिंदगी गुजारते थे। घर के हालात तब और ज्यादा बिगड़ गए जब उनके पिता जो फिल्मों में नकली गहने सप्लाई करते थे उन्हें अचानक दिल का दौरा पड़ा।

पिता बिस्तर पर थे कमाई का जरिया बंद हो चुका था और घर में दाने-दाने के लाले पड़ गए थे। यही वो मोड़ था जहां से एक मासूम रवि कपूर को अपनी पढ़ाई और अपनी मासूमियत को दांव लगाकर जॉन की उस तंग जिंदगी से बाहर निकलना पड़ा। वह अपने पिता के नकली गहनों का झोला उठाकर फिल्म स्टूडियोज के चक्कर लगाने लगे ताकि चंद रुपयों का इंतजाम हो सके। उन्हें नहीं पता था कि जिन स्टूडियोज में वो गहने बेचने जा रहे हैं एक दिन वही दुनिया उन्हें अपना कोहिनूर बना लेगी।

पिता की बीमारी और घर की तंगहाली ने रवि कपूर को वक्त से पहले बड़ा कर दिया और फिर शुरू होता है उनकी जिंदगी का वो दौर जिसे सुनकर आज भी संघर्ष करने वाले नौजवानों की आंखों में आंसू आ जाते हैं। रवि कपूर यानी जितेंद्र हाथ में नकली गहनों का झोला लेकर चूच-चूं करती बस में बैठकर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटका करते थे। चोल की तंग जिंदगी से ऊब चुका यह नौजवान जब फिल्मी सितारों को आलीशान गाड़ियों से उतरते देखता तो उसके मन में भी एक पीस उठती। जितेंद्र के पास बामुश्किल बस का किराया होता था। कभी-कभी तो वह पैदल ही निकल जाया करते थे। उन दिनों एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी।

रवि कपूर को पता चला कि अगर कोई फिल्म में भीड़ का हिस्सा बनता है, तो उसे दिन भर के काम के बदले ₹5 और सेट पर मुफ्त का खाना मिलता है। भूख और तंगहाली का आलम यह था कि रवि कपूर ने बिना झिझक उस भीड़ का हिस्सा बनना स्वीकार किया, लेकिन मजे की बात यह है कि उस सीन में उन्हें एक साधु का रोल मिला था। रवि कपूर को ढेर सारी राख अपने शरीर पर मलनी थी और घंटों तक एक ही मुद्रा में खड़े रहना था। चिलचिलाती धूप में राख की वजह से उनकी खाल जलने लगी और खुजली हो रही थी। लेकिन वो टस सेम मस नहीं हुए। क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों? क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वह हिलेंगे या फिर शिकायत करेंगे तो डायरेक्टर उन्हें सेट से बाहर निकाल देगा और उन्हें वह मुफ्त का खाना नहीं मिलेगा।

शाम को जब उन्हें ₹5 और खाने की थाली मिली तो उनकी आंखों में आंसू थे। सालों बाद जब वो सुपरस्टार बन गए तब उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था उस दिन उस थाली के खाने का जो स्वाद था वो मुझे आज तक दुनिया के सबसे महंगे होटल्स के खाने में भी नहीं मिला है।

यही वो छोटी-छोटी कहानियां हैं जिन्होंने एक चोल के लड़के को बॉलीवुड का अजय सितारा बनाया। इसे मेहनत और परिवार की दुआएं कहिए या फिर किस्मत? पिता की गहने सप्लाई करने के बहाने उनकी मुलाकात उस दौर के दिग्गज फिल्म मेकर वी शांताराम से हुई। शांताराम जी अपनी अनुशासन प्रियता के लिए जाने जाते थे। रवि को देखते ही उन्होंने उसकी कद काठी ताड़ ली और फिल्म नवरंग के लिए प्रस्ताव दिया। रवि कपूर की खुशी का ठिकाना नहीं था।

उन्हें लगा कि शायद उन्हें कोई हीरो का रोल मिलने वाला है। लेकिन दोस्तों किस्मत ने यहां भी उनके साथ एक क्रूर मजाक किया। क्या आप यकीन करेंगे कि जिस सुपरस्टार को हम मर्दानी आवाज में संवाद बोलते देखते हैं, उसे अपनी पहली फिल्म में एक लड़की का बॉडी डबल बनना पड़ा था। फिल्म की हीरोइन संध्या को एक गाना शूट करना था। लेकिन उनकी हाइट कम पड़ रही थी। शांताराम जी ने रवि को बुलाया। उन्हें लड़की के कपड़े पहनाए।

भारी मेकअप थोपा गया और साड़ी पहनाकर कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। रवि कपूर का पुरुषत्व अंदर से रो रहा था। लेकिन घर में बीमार पिता और खाली पड़े चूल्हे की याद ने उन्हें यह सब करने की ताकत दी। लेकिन संघर्ष यहां खत्म नहीं हुआ बल्कि असली इम्तिहान तो अब शुरू होना था। शांताराम जी ने उन्हें अपने स्टूडियो में ₹150 महीने की नौकरी पर रख लिया। जहां वह एक जूनियर आर्टिस्ट बनकर रह गए। वो एक ऐसा दौर था कि बड़े सितारे जूनियर आर्टिस्ट को इंसान तक नहीं समझते थे। करीब 5 सालों तक रवि कपूर ने सेट पर लाइटें पकड़ी, भीड़ का हिस्सा बने और डायरेक्टरों की गालियां सुनी। एक सनसनीखेज किस्सा जो आज भी बॉलीवुड के गलियारों में मशहूर है। वो है फिल्म सेहरा की शूटिंग का। फिल्म की शूटिंग बीकानेर के रेगिस्तान में हो रही थी।

रवि कपूर सिर्फ 30 मिनट लेट पहुंचे। अनुशासन के पक्के शांताराम जी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उन्होंने पूरी यूनिट के सामने रवि कपूर को जमकर फटकारा और चीखते हुए कहा, तुम मुंबई वापस चले जाओ। तुम कभी एक्टर नहीं बन सकते। रवि कपूर के पैरों तले जमीन खिसक गई। वो फूट-फूट कर रोए। शांताराम जी के पैरों में गिर गए। हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाए कि अगर वह घर वापस गए तो उनका परिवार भूखा मर जाएगा। शांताराम जी का दिल पसीजा लेकिन रवि कपूर ने उस दिन अपनी आंखों के आंसू पोंछ कर यह कसम खाई कि एक दिन वो इस इंडस्ट्री पर राज करेंगे। रवि कपूर अब भी जूनियर आर्टिस्ट ही थे। लेकिन उनकी आंखों में जलती वो आग शांताराम जी ने भांप ली थी। 1964 में जब वो अपनी नई फिल्म गीत गाया पत्थरों ने बना रहे थे तो उन्होंने रवि को एक फाइनल चांस देने का फैसला किया लेकिन यहां भी एक पेंच था। शांताराम जी ने कहा एक्टिंग की दुनिया में रवि कपूर नाम के बहुत लोग हैं। आज से दुनिया तुम्हें जितेंद्र के नाम से जानेगी।

पर क्या आप जानते हैं दोस्तों इस पहली फिल्म के स्क्रीन टेस्ट में जितेंद्र इतना घबरा गए थे कि सिर्फ एक लाइन बोलने के लिए उन्हें 30 टेक लेने पड़े। कैमरे का खौफ ऐसा था कि उनके पसीने छूट रहे थे। सूरज सुबह निकलता है। फिर से पढ़िए। सूरज सूरज हम सूबा निकलता बावजूद इसके शाराम जी ने उन पर दांव खेला। फिल्म रिलीज हुई लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ओंधे मूछा गिरी। जितेंद्र एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़े थे जहां से वो चले थे बेरोजगार और गुमनाम। लेकिन दोस्तों असली धमाका तो अभी बाकी था। 1967 में एक ऐसी फिल्म आई जिसने ना सिर्फ जितेंद्र को चोल से निकालकर महलों में पहुंचाया बल्कि उन्हें हिंदी सिनेमा का वो जंपिंग जैक बना दिया जिसके स्टाइल की नकल आज भी लोग करते हैं।

बेरोजगारी और गुमनामी के उस दौर में जितेंद्र को लगने लगा था कि शायद शांताराम जी की वह बात सच हो जाएगी कि वह कभी एक्टर नहीं बन पाएंगे। लेकिन तभी एक ऐसी फिल्म आई जिसने ना सिर्फ जितेंद्र का करियर बचाया बल्कि बॉलीवुड में डांस और स्टाइल की पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी। वो साल था 1967 जब डायरेक्टर रविकांत नागायच अपनी एक जासूसी फिल्म फर्ज के लिए एक नया और ऊर्जावान हीरो ढूंढ रहे थे।

जितेंद्र को इस फिल्म के लिए साइन किया गया। लेकिन दोस्तों इस फिल्म की शूटिंग के दौरान एक ऐसा इत्तेफाक हुआ जिसने जितेंद्र को हमेशा हमेशा के लिए अमर कर दिया। फिल्म के एक गाने मस्त बहारों का आशिक की शूटिंग होनी थी। जितेंद्र ने जब अपना वार्ड्रोब चेक किया तो उन्हें कुछ भी पसंद नहीं आया।

उन्होंने पास की एक दुकान से सफेद रंग की टीशर्ट, सफेद पट और सफेद टी शूज खरीदे। एक बार एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद खुलासा किया था कि उन्होंने सफेद कपड़े इसलिए पहनना शुरू किया क्योंकि सफेद कपड़ों को साफ रखना और मैच करना सबसे आसान था। जितेंद्र ने बताया कि अगर मैं रंगीन कपड़े पहनता तो मुझे हर शर्ट के लिए अलग पट और अलग जूतों की जरूरत होती लेकिन सफेद रंग के साथ झंझट नहीं था। कोई भी सफेद शर्ट किसी भी सफेद पट के साथ चल जाती थी। इससे भी ज्यादा मजेदार बात यह है कि उन्होंने सफेद जूते इसलिए खरीदे क्योंकि उस दौर में सफेद जूतों पर अगर कोई दाग लग जाता तो वह महज सफेद चौक या फिर चूना रगड़कर उन्हें फिर से नया जैसा बना लेते थे।

उन्हें बार-बार महंगे पॉलिश या धोबी के चक्कर नहीं काटने पड़ते थे। आज जिसे दुनिया बॉलीवुड का सबसे बड़ा स्टाइल मानती है वो दरअसल एक मिडिल क्लास लड़के का अपनी जेब बचाने का एक छोटा सा जुगाड़ था। जितेंद्र की यही मिडिल क्लास सोच उन्हें दूसरे सितारों से अलग और जमीन से जुड़ा हुआ बनाती थी। लेकिन क्या आप यकीन करेंगे कि जिस सफेद रंग को आज जितेंद्र की पहचान माना जाता है, उसे उस वक्त के फैशन पंडितों ने बकवास करार दिया था। लेकिन जब वो गाना पर्दे पर आया और जितेंद्र ने उन सफेद जूतों में बिजली के रफ्तार से उछल कूद शुरू की तो पूरे देश के युवा दीवाने हो गए।

उनके इसी अनोखे और फुर्तीले डांस स्टाइल की वजह से उन्हें बॉलीवुड का पहला जंपिंग जैक कहा जाने लगा। अभी-अभी तो आई हो। अभी-अभी जाना है। फर्श ब्लॉकबस्टर साबित हुई और जितेंद्र रातोंरात चोल के अंधेरे से निकलकर शोहरत की बुलंदियों पर जा बैठे। इसके बाद तो जैसे जीत का एक सिलसिला शुरू हो गया। 1969 में फिल्म जीने की राह आई जिसने साबित कर दिया कि जितेंद्र सिर्फ नाच गाना ही नहीं बल्कि संजीदा अभिनय भी कर सकते हैं। इस फिल्म के गाने आने से उसके आए बहार ने गलियों गलियों में धूम मचा दी। बड़ी मस्तानी है मेरी महबूबा। लेकिन दोस्तों असली ट्विस्ट तो तब आया जब 70 के दशक की शुरुआत में जितेंद्र पर यह ठप्पा लगने लगा कि वो सिर्फ मसाला फिल्में ही कर सकते हैं।

इस इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने हाथ मिलाया दिग्गज डायरेक्टर गुलजार साहब से। परिचय, खुशबू और किनारा जैसी फिल्मों में जितेंद्र ने बिना चश्मा हटाए बिना उछल कूद किए अपनी आंखों से वह अभिनय किया कि बड़े-बड़े आलोचक दंग रह गए। पर जितेंद्र की भूख यहां शांत नहीं होने वाली थी। 80 का दशक शुरू होते-होते उन्होंने अपना रुख मोड़ा दक्षिण भारत की तरफ। उन्होंने तेलुगु और तमिल फिल्मों के रिमेक बनाने का एक ऐसा कारखाना खोला जिसने बॉलीवुड के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। हिम्मतवाला में जब वो श्रीदेवी के साथ मटकों के बीच नैनों में सपना गाते हुए नजर आए तो बॉक्स ऑफिस पर नोटों की बारिश होने लगी।

सपना सपना में सजना में दिल आ गया। क्या आप जानते हैं जितेंद्र ने अपने पूरे करियर में 80 रिमेक फिल्मों में काम किया है जो आज भी एक अटूट रिकॉर्ड है। वो एकमात्र ऐसे एक्टर बने जिन्हें रिमेक किंग कहा गया। उन्होंने एक साल में 10 से 12 फिल्में दी और हर फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर्स की झोली भर देती थी। दोस्तों, जहां आज के दौर में छोटे-मोटे स्टार्स भी करोड़ों की कारों में घूमते हैं, तो वहीं सुपरस्टार जितेंद्र से जुड़ा एक ऐसा किस्सा है जो आपको हैरान कर देगा। सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी जितेंद्र ने अपनी जड़े नहीं छोड़ी थी। फर्ज और जीने की राह जैसी हिट फिल्में देने के बाद भी जितेंद्र काफी समय तक अपनी उसी पुरानी सेकंड हैंड फिएट कार में घूमते रहे। कहा जाता है कि एक बार फिल्म के सेट पर एक प्रोड्यूसर ने उनसे पूछा कि जितेंद्र जी आप इतने बड़े स्टार बन गए हैं। कोई शानदार विदेशी गाड़ी क्यों नहीं खरीद लेते? इस पर जितेंद्र ने मुस्कुराते हुए बहुत ही सादगी से जवाब दिया।

गाड़ी विदेशी हो या फिर देसी वो मुझे सेट पर वक्त से पहुंचा देती है। बस उतना ही काफी है। मुझे दिखावे से ज्यादा अपने काम और परिवार के भविष्य की चिंता है। दरअसल जॉन की उस गरीबी ने जितेंद्र को पैसे की कीमत समझा दी थी। वो सेट पर अक्सर घर का बना सादा खाना ही खाते थे और अपनी पहली कमाई का बड़ा हिस्सा उन्होंने अपनी मां के हाथों में लाकर रख दिया था ताकि चोल का कर्ज चुकाया जा सके।

उनकी यही सादगी थी कि वह घंटों तक सेट पर बिना किसी नखरे के जूनियर आर्टिस्टों के साथ बैठकर गपशप लड़ाते। यही वजह थी कि स्पॉटबॉय से लेकर बड़े डायरेक्टर तक हर कोई जितेंद्र का मुरीद था। शहरत की ऊंचाइयों पर बैठे जितेंद्र के पास अब वो सब कुछ था जिसका उन्होंने चोल की तंग गलियों में सपना देखा था। लेकिन इस कामयाबी के साथ ही उनकी निजी जिंदगी में ऐसी आग लगी जिसने बॉलीवुड के गलियारों में सनसनी मचा दी। जहां दुनिया उन्हें सफेद जूतों वाला चॉकलेटी हीरो कहती थी। तो वहीं पर्दे के पीछे उनके इश्क के चर्चे तबाही ला रहे थे। बात दरअसल उस दौर की है जब जितेंद्र की जिंदगी में सबसे पहले एंट्री हुई थी एक 14 साल की मासूम लड़की की जिसका नाम था शोभा। जितेंद्र अभी स्टार नहीं बने थे और शोभा ब्रिटिश एयरलाइंस में एयर होस्ट्रेस बनने की तैयारी कर रही थी।

दोनों ने एक दूसरे से प्यार के कसमें वादे किए लेकिन जैसे ही जितेंद्र सुपरस्टार बने, उनकी नियत डगमगाने लगी। क्या आप यकीन करेंगे कि जितेंद्र ने अपनी मंगेतर शोभा को अंधेरे में रखकर बॉलीवुड की सबसे बड़ी ड्रीम गर्ल यानी हेमा मालिनी को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया था। यह बॉलीवुड का वो काला सच है जिसे सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। दरअसल हेमा मालिनी के माता-पिता धर्मेंद्र के सख्त खिलाफ थे क्योंकि वो शादीशुदा थे। बस इसी बात का फायदा उठाकर जितेंद्र ने एक कलयुगी दोस्त का फर्ज निभाया। उन्होंने अपने दोस्त संजीव कुमार का लव लेटर जो हेमा के लिए था उसे बदलकर अपनी नजदीकियां हेमा से बढ़ा ली।

सनसनीखेज मोड़ इस मामले में तब आया जब जितेंद्र पंडित लेकर चेन्नई पहुंच गए ताकि गुपचुप तरीके से हेमा मालिनी से वह शादी कर सकें। शादी की रस्में बस शुरू होने ही वाली थी कि तभी वहां एक तूफान आया। धर्मेंद्र जितेंद्र की गर्लफ्रेंड यानी शोभा को लेकर सीधे शादी के मंडप में पहुंच गए। फिर वहां जो हंगामा हुआ उसे आज भी बॉलीवुड का सबसे बड़ा ड्रामा माना जाता है।

धर्मेंद्र ने के नशे में खूब शोर मचाया और शोभा ने जितेंद्र को सरेआम खूब हरी-खोटी सुनाई। नतीजा यह हुआ कि वह शादी टूट गई और जितेंद्र को अपमानित होकर वापस लौटना पड़ा। फिर आखिरकार 1974 में जितेंद्र ने शोभा से ही शादी की। लेकिन उनकी ठरक यहां भी शांत नहीं हुई। शादीशुदा होने और दो बच्चों यानी एकता और तुषार का बाप होने के बावजूद जितेंद्र का नाम उस दौर की सबसे हसीन अदाकारा रेखा के साथ जुड़ा। फिल्म एक बेचारा की शूटिंग के दौरान दोनों के अफेयर की खबरें अखबारों की हेडलाइन बनी। कहा जाता है कि रेखा उनके लिए पागल थीं लेकिन जितेंद्र सिर्फ उनका इस्तेमाल कर रहे थे।

जब रेखा को यह पता चला कि जितेंद्र उन्हें सिर्फ अपना टाइम पास समझते हैं तो वह बुरी तरह से टूट गई और उन्होंने जितेंद्र के साथ अपना रिश्ता हमेशा के लिए खत्म कर लिया। लेकिन दोस्तों असली धमाका तो अभी भी बाकी था। असली के दशक में जब श्रीदेवी और जयाप्रदा जैसी नई हीरोइनें आई तो जितेंद्र की रंगीन मिजाजी ने फिर से अंगड़ाई ली। कहा जाता है कि श्रीदेवी को बॉलीवुड में हिट कराने के पीछे जितेंद्र का बहुत बड़ा हाथ था। लेकिन इसके बदले उन्होंने श्रीदेवी के साथ वो नजदीकियां बढ़ाई कि उनकी पत्नी शोभा ने घर छोड़ने तक की धमकी दे डाली। जितेंद्र की जिंदगी का यह भाग सिर्फ रोमांस का नहीं बल्कि धोखे, साजिश और उस लस्ट का था जिसने उनके पारिवारिक जीवन को कई बार बर्बादी की कगार पर खड़ा किया।

अफेयर्स और टूटे शादियों के इन विवादों ने जितेंद्र की इमेज को एक प्ले बॉय की तरह पेश कर दिया। लेकिन उम्र के ढलते पड़ाव में उन पर एक ऐसा आरोप लगा जिसने ना सिर्फ उनकी साख मिट्टी में मिला दी बल्कि पूरे कपूर खानदान के पैरों तले जमीन खिसका दी।

जहां दुनिया उन्हें एक सम्मानित बुजुर्ग और दादा नाना के रूप में देख रही थी। तो वहीं अचानक आई एक खबर ने पूरे देश को सन्न्य कर दिया। बात साल 2018 की है जब पूरी दुनिया में मी टू मूवमेंट की लहर चल रही थी। बड़े-बड़े दिग्गजों के चेहरे से नकाब उतर रहे थे। इसी बीच एक ऐसी खबर आई जिसने हेडलाइंस में आग लगा दी। जितेंद्र की अपनी चचेरी बहन ने उन पर यौन उत्पीड़न का बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाया।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस भाई पर एक बहन सबसे ज्यादा भरोसा करती है, उसी भाई पर उसने 47 साल पुराने जख्मों को कुरेदते हुए एफआईआर दर्ज करा दी। उस महिला का आरोप था कि साल 1971 में जब वो सिर्फ 18 साल की थी, जितेंद्र उसे फिल्म की शूटिंग दिखाने के बहाने शिमला के एक होटल में ले गए थे। वहां उन्होंने के में उसके साथ जबरदस्ती की। उस बहन ने बताया कि वह इतने सालों तक इसीलिए चुप रही क्योंकि जितेंद्र का कद बहुत बड़ा था और वह अपने माता-पिता को अपने ही भतीजे की इस काली करतूत से दुखी नहीं करना चाहती थी।

इस खबर ने जितेंद्र के सफेद कपड़ों पर वो दाग लगा दिया जिसे मिटाना नामुमकिन था। हालांकि जितेंद्र और उनके वकीलों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया और इसे पैसे ऐचने की एक साजिश करार दिया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि उनकी बहन दिमागी रूप से बीमार है। लेकिन दोस्तों इस विवाद ने जितेंद्र की छवि को जो नुकसान पहुंचाया उसकी भरपाई आज तक नहीं हो सकी है। विवादों का सिलसिला यही नहीं रुका।

जितेंद्र का एक और सनसनीखेज किस्सा मशहूर है। डिस्को डांसर मिथुन चक्रवर्ती के साथ। एक दौर था जब जितेंद्र अपनी कामयाबी के में चूर थे। जब पहली बार संघर्ष कर रहे मिथुन उनके सामने आए तो जितेंद्र ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा था इसकी शक्ल तो काले गुंडे जैसी है।

यह तो कभी हीरो नहीं बन सकता। उन्होंने यहां तक चुनौती दे दी थी कि अगर मिथुन स्टार बन गया तो वो फिल्में करना छोड़ देंगे। लेकिन कुदरत का करिश्मा देखिए कुछ ही सालों में पासा पलट गया। जितेंद्र की फिल्में फ्लॉप होने लगी और मिथुन चक्रवर्ती देश के सबसे बड़े सुपरस्टार बन गए। हालात ऐसे बिगड़े कि अपना डूबता हुआ करियर बचाने के लिए जितेंद्र को उसे मिथुन चक्रवर्ती के पास जाना पड़ा। उन्हें स्वर्ग से सुंदर जैसी फिल्मों में मिथुन के बड़े भाई का रोल करना पड़ा ताकि उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर चल सकें। यह जितेंद्र के अहंकार पर वक्त का सबसे करारा तमाचा था। इन तमाम उतार-चढ़ावों, विवादों और आरोपों के बीच जितेंद्र की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ भी आया जहां उन्होंने को अपनी आंखों के सामने खड़े देखा। वो एक ऐसी रात थी जिसने उन्हें हमेशा के लिए बदल दिया। अहंकार की चोट और आरोपों की मार झेल रहे जितेंद्र को शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि जिस जिंदगी को वह अपनी शर्तों पर जी रहे हैं, वह एक पल में खाक हो सकती थी।

विवादों और शोहरत के शोर के बीच उनकी कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जहां विज्ञान हार गया और विश्वास की जीत हुई। यह वो वाक्या है जिसे सुनकर आज भी जितेंद्र की रूह कांप जाती है। बात साल 1976 की है। जब जितेंद्र अपने करियर के चरम पर थे। उन्हें एक बहुत जरूरी फिल्म की शूटिंग के लिए चेन्नई रवाना होना था। फ्लाइट के टिकट बुक थे। पैकिंग पूरी थी और गाड़ी घर के बाहर इंतजार कर रही थी। लेकिन उसी दिन करवा चौथ का त्यौहार था।

जितेंद्र की पत्नी शोभा ने जिद पकड़ ली कि जब तक वह चांद नहीं देख लेती और जितेंद्र के हाथों से पानी नहीं पी लेती वो उन्हें जाने नहीं देंगी। जितेंद्र झल्ला रहे थे। उन्हें लग रहा था कि काम का नुकसान होगा। लेकिन शोभा की जिद के आगे उन्हें आखिरकार झुकना पड़ा। उन्होंने अपनी फ्लाइट कैंसिल कर दी और घर पर रुक गए। क्या आप यकीन करेंगे कि जिस वक्त जितेंद्र अपने घर की छत पर खड़े होकर अपनी पत्नी का व्रत खुलवा रहे थे, ठीक उसी वक्त आसमान में एक भयानक मंजर घट रहा था। वो फ्लाइट इंडियन एयरलाइंस 171 थी जिसमें जितेंद्र को सवार होना था।

फ्लाइट के टेक ऑफ के कुछ ही देर बाद एक भयानक दुर्घटना का वो शिकार हो गई। विमान के इंजन में आग लग गई और वो आग का गोला बनकर जमीन पर आ गिरी। उस विमान में सवार एक-एक शख्स की मौत हो गई। जितेंद्र ने जब न्यूज़ में यह खबर देखी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वो सफेद लिबास जिसे वो अपनी शान समझते थे। उस दिन पसीने से तर- बतर था। शोभा का वो व्रत जितेंद्र के लिए ढाल बन गया था। इस घटना ने जितेंद्र को हिला कर रख दिया और उन्होंने पहली बार महसूस किया कि शोहरत और पैसे से भी ऊपर कोई ताकत है जो इंसानी तकदीर लिखती है। फ्लाइट शाम को थी 7:00 बजे तो मैं एयरपोर्ट पे गया।

एयरपोर्ट पे गया तो पता लगा फ्लाइट डिलेड है। घर पहुंचा पाली पे रहता था। एट 10:30 11 मेरे बालकनी से मैं देखता हूं कि आग का गोला ऐसेसे जा रहा है। मुझे 3 घंटे बाद चार घंटे बाद फोन कॉल पे फोन कॉल फोन कॉल पे फोन कॉल माय टिकट इज देयर आई एम सपोज्ड टू गो देयर फ्लाइट क्रैश। दोस्तों समय का चक्र बड़ी तेजी से घूमता है। और सुनहरे दौर के न जाने कितने सितारे वक्त की धूल में कहीं खो गए। लेकिन आज जितेंद्र उस सुनहरी पीढ़ी के उन चुनिंदा और खुशनसीब चिरागों में से एक हैं जिन्होंने ब्लैक एंड वाइट सिनेमा की सादगी से लेकर आज के दौर के रंगीन और डिजिटल सिनेमा तक के हर उतार-चढ़ाव को अपनी आंखों से देखा है।

आज जब हम मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि अमिताभ बच्चन का वो एंग्री यंग मैन अवतार हो, शत्रुघ्न सिन्हा की वो खनकती आवाज हो या फिर प्रेम चोपड़ा जैसे दिग्गज जितेंद्र उन्हीं महान कलाकारों की उस अंतिम कतार के मजबूत स्तंभ हैं जो आज भी हमारे बीच मौजूद हैं और उस दौर की यादों को जिंदा रखे हुए हैं। यह वो चंद नाम हैं जिन्होंने ना सिर्फ सिनेमा को बनते देखा बल्कि उसे अपने पसीने और मेहनत से सींचा भी है। आज साल 2026 में 84 साल की उम्र पार कर चुके जितेंद्र अपनी उस चकाचौंध भरी दुनिया से दूर हैं। उन्होंने कुल 200 से ज्यादा फिल्में की जिसमें से 121 फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही। उनके नाम सबसे ज्यादा रिमेक फिल्में करने का वह वर्ल्ड रिकॉर्ड है जिसे आज का कोई भी सुपरस्टार छू तक नहीं सका है।

उन्हें दादा साहेब फाल्के और फिल्म फेयर लाइफटाइम अचीवमेंट जैसे तमाम बड़े सम्मानों से नवाजा गया। आज वो मुंबई के अपने आलीशान बंगले में एक गार्डियन की तरह रहते हैं। जहां उनकी बेटी एकता कपूर ने टीवी इंडस्ट्री पर राज किया और बेटे तुषार कपूर ने अभिनय में हाथ आजमाया। जितेंद्र अब सिर्फ एक पिता या दादा नहीं बल्कि एक ऐसे बिजनेस एंपायर के मार्गदर्शक हैं जो करोड़ों का टर्नओवर करता है। हालांकि उम्र के इस पड़ाव पर भी वो फिट हैं और कभी-कभी रियलिटी शोज़ में अपनी उसी पुरानी मुस्कान के साथ नजर आते हैं। तो दोस्तों, यह थी मुकम्मल दास्तान जंपिंग जैक यानी जितेंद्र की। एक ऐसा लड़का जो चोल की तन्हा से निकला जिसने अपनी पहली फिल्म में लड़की का गेटअप पहना जिसने अपमान सहा, संघर्ष किया और फिर दशकों तक बॉलीवुड के सिंहासन पर राज किया। उनकी जिंदगी में इश्क के रंग भी थे और धोखे के दाग भी। उन पर कामयाबी के फूल भी बरसे और आरोपों के पत्थर भी। लेकिन इन सबके बीच सच यही है कि जितेंद्र जैसा ना दूसरा कोई हुआ है और ना कभी होगा। उनके वो सफेद जूते, वो सफेद कपड़े और वो बिजली जैसी फुर्ती आज भी हिंदी सिनेमा की एक ऐसी याद है जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। जितेंद्र की इस रोलर कोस्टर जिंदगी के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि शोभा कपूर ने उन्हें वो स्थिरता दी जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी या फिर आपको लगता है कि उनके अफेयर्स ने उनकी छवि को हमेशा के लिए धुंधला कर दिया।

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