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जब अमिताभ की आवाज़ से नफ़रत और इंदिरा गांधी की सिफ़ारिश ने सुनील दत्त को कर दिया कंगाल!

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नमस्कार दोस्तों, एक बार फिर आप सभी का स्वागत है मनोज फिल्मी पडकास्ट में। सुनील दत्त की बर्थ एनिवर्सरी पर आज जानेंगे उस फिल्म का किस्सा जिसे बनाने में वो लगभग कंगाल हो गए थे। बंगला तक गिरवी रखना पड़ा। गाड़ियां भी बिक गई और वह पूरी तरह से कर्ज में डूब गए। इस फिल्म में सुनील दत्त अमिताभ बच्चन को लेना नहीं चाहते थे। पर इंदिरा गांधी जी के कहने पर उन्हें लिया गया। फिल्म हिट रही और तीन नेशनल अवार्ड भी जीते थे। दोस्तों वीडियो में आगे बढ़ने से पहले प्लीज मेरे चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकन को जरूर प्रेस कर दीजिएगा। तो चलिए दोस्तों वीडियो को शुरू करते हैं। आज अगर सुनील दत्त जिंदा होते तो उनका 97वां जन्मदिन मनाया जाता। पर अब वह नहीं है।

फैंस और परिवार के दिलों में उनकी यादें और फिल्मों की विरासत बसी है। संजय दत्त तो पिता की बर्थ एनिवर्सरी पर भावुक हो गए और पोस्ट में उनके लिए प्यार उड़ेला। संजय दत्त ने पिता सुनील दत्त के साथ अपने बचपन की एक तस्वीर शेयर की और लिखा कि आप हमेशा मेरी प्रेरणा और मेरी ताकत थे। हो और हमेशा रहोगे। सुनील दत्त 6 जून 1929 को पाकिस्तान के झेलम में पैदा हुए थे। अपने करियर में उन्होंने कई हिट फिल्में दी। डायरेक्ट और प्रोड्यूस भी की पर एक फिल्म के कारण वह कंगाल होने की कगार पर पहुंच गए थे। उन्हें अपना बंगला तक गिरवी रखना पड़ गया था। यह फिल्म रेशमा और सेरा का किस्सा है जो साल 1971 में आई थी। इसे सुनील दत्त ने डायरेक्ट किया था और साथ में एक्टिंग भी की थी। उनके साथ फिल्म में वाहिदा रहमान और अमिताभ बच्चन भी थे। हालांकि आपको जानकर हैरानी होगी कि सुनील दत्त रेशमा और सेरा में अमिताभ बच्चन को कास्ट नहीं करना चाहते थे।

उन्हें अमिताभ की आवाज से सख्त नफरत थी। बताया जाता है कि इंदिरा गांधी की सिफारिश पर अमिताभ को रेशमा और सेरा में लिया गया था। लेकिन जब रेशमा और सेरा बनी तो यह हिट रही और तीन नेशनल अवार्ड भी जीते। पर इसमें उनकी सारी जमा पूंजी लग गई थी। उन्हें अपना बंगला तक गिरवी रखना पड़ा और वह कंगाल होने की कगार पर भी पहुंच गए। दरअसल फिल्म एक लव स्टोरी थी जो राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित थी। एक परिवार के बीच प्यार को लेकर खून खराबा हो जाता है। हीरो का भाई उसकी प्रेमिका के परिवार को मौत के घाट उतार देता है। हीरो विलेन बन जाता है और फिर अपने ही भाई से बदला लेता है। रेशमा और सेरा में जहां वहिदा रहमान ने रेशमा का तो सुनील दत्त ने सेरा का किरदार निभाया था। जबकि अमिताभ बच्चन उनके भाई बने थे और उनका रोल मूक बधीर का था।

यानी वह बोल नहीं सकते थे। सुनील दत्त को अमिताभ बच्चन की आवाज पसंद नहीं थी, पर ना चाहते हुए भी इंदिरा गांधी के कहने पर वह फिल्म में ले लिए गए। इंदिरा गांधी तब सुनील दत्त की पत्नी नरगिस की अच्छी दोस्त हुआ करती थी। नरगिस ने जब सुनील दत्त के सामने रेशमा और सेरा में अमिताभ बच्चन को लेने की बात रखी, तो वह मना नहीं कर पाए। साथ ही इंदिरा गांधी अमिताभ बच्चन की मां तेजी बच्चन की भी गहरी दोस्त थी। इलाहाबाद के दिनों से उनकी दोस्ती थी। एक्ट्रेस शिवा आकाशदीप साबिर ने एक बार सिद्धार्थ कनन को दिए इंटरव्यू में अमिताभ बच्चन के बारे में सुनील दत्त से हुई अपनी बातचीत का जिक्र किया था। शिवा ने बताया था कि दरअसल दत्त साहब ने मुझसे कहा था कि हमें उनकी आवाज बिल्कुल पसंद नहीं थी। उनकी आवाज किसी रेडियो जॉकी जैसी लगती थी। सुनील दत्त ने शुरू में प्लान किया था कि फिल्म की शूटिंग सिर्फ 15 दिनों में पूरी कर लेंगे। लेकिन आखिर में पता चला कि ऐसा होना असंभव है।

लगभग 100 लोगों की टीम थी। सुनील दत्त ने जैसलमेर से 80 मील दूर पोचीना नाम के गांव में अपनी यूनिट के टेंट लगाए। 15 दिनों की शूटिंग आखिरकार 2 महीने से अधिक समय तक चली। जिससे प्रोडक्शन कास्ट काफी बढ़ गया। पहले फिल्म को सुखदेव डायरेक्ट कर रहे थे। नरगिस ने जब फिल्म के रसेस देखे तो वह कुछ जमे नहीं। तब सुनील दत्त ने सुखदेव की जगह ली और खुद फिल्म डायरेक्ट की। हालांकि वह हर सीन में परफेक्शन चाह रहे थे। सुनील दत्त की बेटी नम्रता दत्त ने अपनी किताब मिस्टर एंड मिसेज दत्त मेमोरीज ऑफ आवर पेरेंट्स में बताया है कि एक बार सुनील दत्त को एक शॉट के लिए 100 ऊंट चाहिए थे लेकिन उन्हें सिर्फ 99 ही मिल पाए। उन्होंने शूटिंग करने से मना कर दिया। राखी ने बताया कि पहले 15 दिनों तक सुनील दत्त चाहते थे कि वह स्थानीय लोगों को देखें और किरदार के भाव में ढल जाएं।

लेकिन प्लानिंग की कमी के कारण खर्च बढ़ गया। जिसकी वजह से सुनील दत्त को बांद्रा स्थित अपना बंगला गिरवी रखना पड़ा। गाड़ियां तक बिक गई। सुनील अन्य फिल्मों से होने वाली कमाई भी रेशमा और सेरा में लगा रहे थे। इसीलिए उनकी सारी संपत्ति दांव पर लग चुकी थी। सुनील दत्त के हालात ऐसे हो गए थे कि वह अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिए बस में जाते थे। इतना ही नहीं प्रोड्यूसर्स भी उन पर पैसा लगाने से बचने लगे थे। इस मुश्किल समय से बाहर आने के लिए सुनील दत्त ने बी ग्रेड फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। जब वह घाटे से बाहर आए तो उन्होंने फिर से अच्छी फिल्में करनी शुरू कर दी। तो दोस्तों, आज का वीडियो यहीं समाप्त करते हैं। मिलते हैं नेक्स्ट वीडियो में। तब तक के लिए आप सभी को टाटा बाय-ब टेक केयर।

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